Tuesday, February 14, 2012

माफ करना हे पिता! – २

(पिछली किस्त से आगे)


माफ करना हे पिता! – २

शंभू राणा

लेकिन यह उऋण होने का खयाल मेरे मन में आ ही क्यों रहा है ? मैं तो इस खयाल से सहमत ही नहीं कि माँ-बाप के ऋण से कोई उऋण भी हो सकता है। क्या यह किसी लाले बनिये का हिसाब है, जिसे चुका दिया जाये ? हाँ, लाला बोले, कितना हिसाब बनता है तुम्हारा ? हाँ, यार ठीक है ‘वैट’ भी जोड़ो, डंडी मार लो, छीजन काट लो, औरों से दो पैसा ज्यादा लगा लो और कुछ ? हाँ, अब बोलो दो दिन देर क्या हुई यार कि तुमने तो चौराहे पर इज्जत उतार ली। लो पकड़ो अपना हिसाब और चलते-फिरते नजर आओ। आज से तुम्हारा हमारा कोई रिश्ता नहीं। अब ऋण तो कुछ इसी तर्ज में चुकता किया जाता है। क्या माँ-बाप से इस जबान में बात करनी चाहिये ? मैं तो नहीं कर सकता। क्यों न हमेशा उनका कर्जदार रहा जाये और एक देनदार की हैसियत से खुद को छोटा महसूस करते रहें। माँ की प्रसव पीड़ा और पिता का दस जिल्लतें झेल कर परिवार के लिये दाना-पानी जुटाने का मोल तुम चुका सकते हो नाशुक्रो कि उऋण होने की बात करते हो ?

शहर वही देहरादून, मोहल्ला चक्कूवाला या बकरावाला जैसा कुछ। पास में एक सूखा सा नाला या नदी है, जहाँ खास कर सुबह के वक्त सुअर डोलते हैं। कतार में मिट्टी गारे से बनी खपरैल की छत वाली चार-छः कोठरियाँ हैं। हर कोठरी में अलग किरायेदार रहता है। कोठरी के भीतर एक दरवाजा है, जो इस कोठरी को उस से जोड़ता है। यह दरवाजा अपनी-अपनी ओर सब बन्द रखते हैं। बाहर-भीतर जाने का दरवाजा अलग है। एक दिन माँ इस दरवाजे की झिर्री में हाथ डाल कर दरवाजे के उस ओर रखे कनस्तरों तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। झिर्री काफी छोटी है, न उसका हाथ पहुँच पाता न मेरा। इस ओर कनस्तर खाली हैं। मुझे भूख लगी है, शायद माँ भी भूखी है। पिता कहाँ हैं, कनस्तर क्यों खाली हैं, पता नहीं। याद नहीं। इस चित्र के चित्रकार भी तुम्हीं हो पिता मेरे। इस तस्वीर को मैं नोंच कर फेंक नहीं सकता एलबम से। लेकिन यह सब कह कर आज तुमसे शिकायत नहीं कर रहा। ऐसा करके क्या फायदा। वैसे भी तुम कभी घरेलू मामलों में जवाबदेह रहे नहीं। सूचना का अधिकार तुम पर लागू नहीं होता था। शिकायत या कहो कि झुँझलाहट मुझे खुद पर है कि मैं इस चित्र का कोई रचनात्मक उपयोग नहीं कर पाया। तब से आज तक यह अनुभव दिमाग की हंडिया में बस खदबदा रहा है। मैं इसे दूसरों के आगे परोसने लायक नहीं बना पाया कि औरों की तृप्ति से मेरा असंतोष कम हो। ऐसी बातों को यूँ सपाटबयानी में कहने से दूसरों के दिलों में सिर्फ दया ही उपजती है जो कि अपने काम की नहीं। अब ऐसा भी नहीं कि हर चीज हमेशा काम की न होती हो, दया-ममता लड़कियों के भी तो नाम होते हैं।

इसी कोठरी में मुझसे तीनेक साल छोटी बहन लगभग इतनी ही उम्र की होकर गुजर जाती है। उससे कुछ समय बाद, जब एक दोपहर पिता मुझे डॉक्टर के पास ले गये थे। बीमार हम दोनों थे, वह कम मैं ज्यादा। उस बच्ची का नाम याद है, गुड्डी था। माँ, पिता और मेरी जो एक मात्र फोटो मेरे पास है, उसमें वह भी माँ की गोद में है- शहद वाला निप्पल चूसती हुई। पिता कुर्ते की बाँहें समेटे मुझे गोद में लिये बैठे हैं। मैंने उस वक्त किसी बात पर नाराज होकर अपना एक हाथ अपने ही गरेबान में अटका लिया था। वह हाथ आज भी वहीं टँगा है। वैसे मुझे याद नहीं, पर इस तस्वीर को देख कर पता चलता है कि माँ की एक आँख दूसरी ओर देखती थी। दो भाई-बहन मुझसे पहले गुजर चुके थे, दो मेरे बाद मरे। मुझमें पता नहीं क्या बात थी कि नहीं मरा। बाद में पिता ने कई बार मन्नत माँगी कि तू मर जाये तो मैं भगवान को सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँ। यार, नंगा करके चौराहे पर सौ दफे जुतिया लो, पर ऐसी ‘बेइज्जती खराब’ तो मती करो ! प्रसाद की रकम पर मुझे सख्त ऐतराज है। कुछ तो बढ़ो। मैं इंसान का बच्चा हूँ भई, चूहे का नहीं हूँ। सवा रुपये में तो कुछ भी नहीं होगा, बुरा मानो चाहे भला। इंसान की गरिमा और मानवाधिकार नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं ? भगवान से या शैतान से, जिससे मर्जी हो कह दो कि जो चाहे उखाड़ ले, सवा रुपये में तो हम किसी भी सूरत नहीं मरेंगे। भूखे नंगे रह लेंगे, मरेंगे नहीं। प्रसाद खाकर तुलसीदास की तरह मस्जिद में सो रहेंगे।

फिर याद आता है कि माँ मायके चली जाती है। न जाने कितने अर्से के लिये और क्यों। मैं पिता के पास क्यों रह जाता हूँ जब कि उस उम्र के बच्चे को माँ के पास होना चाहिये ? पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगते हैं। दफ्तर में दो-एक लोगों की आज भी याद है। एक दीक्षित जी थे, थोड़ा मोटे से, शकल याद नहीं। बड़ी ही संक्रामक हँसी हँसते थे। एक जल्ला सिंह थे पिता की तरह चपरासी (बकौल पिता- ‘चढ़ बेटा फाँसी’)। शायद कांगड़ा के रहने वाले थे। जल्ला सिंह एक दिन घर से आयी चिट्ठी पढ़ रहे थे। उसकी एक पंक्ति याद है- कमर झुकाने का समय है, छुट्टी लेकर आ जाओ। मैंने पिता से इसका मतलब पूछा, उन्होंने बताया कि खेती-बाड़ी का समय है। धान यूँ झुक कर रोपते हैं। जल्ला सिंह को आज भी ग्रुप फोटो में नामों का क्रम देखे बिना पहचान लेता हूँ। पिता अर्थ एवं संख्या (सांख्यिकी) विभाग में थे। उनके कहे मुताबिक डी.एम. साला उनके विभाग के बिना दो कदम नहीं चल सकता। सारे डाटा हमारे पास होते हैं। डी.एम. हम से घबराता है।

(जारी)

2 comments:

Anup Sethi said...

अशोक जी, यह गद्य डिस्‍टर्ब कर रहा है. पिछली पोस्‍ट पर बटरोही जी की टिप्‍पणी पढ़ी तो खुद को उनसे सहमत सा ही पा रहा हूं. राणा जी जो लिख रहे हैं, वो उनका झुलसा हुआ यथार्थ है, पर थोड़ा भ्रमित भी कर रहे हैं. शायद वे खुद भी भ्रमित हैं, कि पिता को छोड़ें कि धारें. नकारें कि सकारें. वैसे वे खुद पिता की भूमिका में आए हैं या नहीं. क्‍योंकि व्‍यक्ति नई नई भूमिकाओं में नई नई तरह से अपना साक्षात्‍कार करता है.

मुनीश ( munish ) said...

ईमानदारी शायद इसे ही कहते हैं अनूप जी, आज हमें प्रभावित करने की बजाय परेशान करती है । लेकिन मैं तो एक ईमानदार मुल्क में रहता हूँ , वहीं का पानी पीता हूँ इसलिए मुझे अच्छा लग रहा है इस संस्मरण को पढ़ना ।