Monday, May 14, 2012

बाबा नागार्जुन का एक संस्मरण – ३



(पिछली किस्त से आगे)

अपनी उच्छृंखलता और मस्ती की ढेर-सी बातें बता चुकने के बाद मैंने अपराजिता से पूछा-- तुम तो सुनती ही रही हो, कुछ अपनी भी बतलाओ न ! 

देर तक मुसकराते रहीं देवीजी . कोंचने पर बोलीं-- ले-देकर एक ही तो देवर है अपना, हफ़्ते में एकाधबार मौक़ा मिलता है . बस, बातों का गिल्ली-डंडा खेल लेते हैं. घर बैठकर दो छोटे बच्चों को संभालते, तो तुम्हारा भी विद्यापति टैं बोल जाता !

बचपन के दिनोंवाले कई चेहरे सामने आ रहे हैं. सारे के सारे लड़के हैं-- दो-तीन बड़ी उम्रवाले, बाक़ी हमउम्र और छोटे. एक लड़की भी झाँक रही है.

यह लड़की तेरह वर्ष पार करके चौदहवें में प्रवेश कर चुकी है. मैं संस्कृत की व्याकरण मध्यमा का छात्र हूँ और इंदुकला के पिता शशिनाथ जी मेरे अन्नदाता हैं (उन दिनों मिथिला में ग़रीब छात्रों को परिवार का सदस्य बनाकर अध्ययन में वर्षों तक सहायता करने की प्रथा थी). इंदु मुझसे कहानियाँ सुनती है, विद्यापति के पद सुनती है, कौड़ियों का खेल खेलती है मेरे साथ... इसके पहले मुझे कहाँ मालूम था कि लड़की क्या होती है !

अठारह वर्ष का हुआ, शादी हुई . तब अपराजिता और उसकी दसियों सहेलियों के दर्शन हुए . यह एकदम नई बात थी मेरे लिए . इसके पहले पाँच-सात साल उसी माहौल में गुज़रे थे जहाँ छात्रों और अध्यापकों के दरमियान समलिंगी व्यभिचार के आतंक की अशुभ छाया व्याप्त थी . लोग अपने लड़कों को छात्रावासों में भेजने से हिचकते थे . 1930-32 के महान स्वाधीनता-संग्राम के चलते एक-एक कैंप-जेल में दस-दस हज़ार सत्याग्रही रखे गए थे . उनमें सभी उम्र के लोग थे . वहाँ भी अप्राकृतिक सेक्स-संपर्क ने अपना रंग दिखलाया था .

यह दुर्भाग्य है कि स्त्रियों और पुरुषों को वर्षों अलग-अलग रहना पड़े. हमारा हिंदी-भाषी क्षेत्र सामाजिक सहजीवन की दृष्टि से पड़ोसी प्रदेशों की अपेक्षा अधिक पिछड़ा हुआ है. हमारी यह लालसा तो रहती है कि फ़िल्मों में नए-नए चेहरे दिखाई पड़ें, किंतु अपनी पुत्री या पुत्रवधू को हम ‘मर्यादा’ की तिहरी परिधियों के अंदर छेके रहेंगे! लड़की के लिए इंजीनियरिंग या डाक्टरी की पढ़ाई करनेवाला युवक हासिल करना है तो दस हज़ार से लेकर पचास हज़ार रुपए खर्च करेंगे, मगर उसको उसकी रुचिवाला जीवन-साथी चुनने का अवसर कदापि नहीं देंगे और न उसे काम करने की छूट देना चाहेंगे . बेकारी और सामाजिक घुटन की ज़हरीली भाप बेचारी के तन-मन को पंगु बनाती जाएगी और हम-- ठहरिये, महाशय जी !

कौन हो, भाई?

इस तरह तो काम नहीं चलने का...

आप आईने की तरफ़ नहीं देख रहे हैं न ? किसने कहा था कि जनाब मन की झील के अंदर गोते लगा गए! मैं इस दर्पण की आत्मा हूँ . रूप-कथाओं वाला बैताल मेरे डर से थर-थर काँपता है... तो मैं भी तुम से डरूँ ?

नहीं, नागा बाबा, तुम काहे को मुझसे डरने लगे ! हाँ, इतना ज़रूर है कि लापरवाही करोगे, तो उत्पात मचा दूँगा. बैठने नहीं दूँगा चैन से, समझे ?

लो भई, फिर से एडजस्ट करो इसे... शाबाश! कितना बढ़िया आईना है...!

कंधों के पीछे से दो छोटी-पतली बांहें इधर लटक आईं .

कौन ? उर्मि, तुम हो ?

जी, पिताजी !

पगली, सामने तो आ !

उंहूं, नहीं आऊँगी सामने . आपकी पीठ के पीछे छिपी रहूँगी . क्या होगा सामने आकर ?

तो, रंज है तू ?

अब वे छोटी-पतली बाँहें दिखाई नहीं पड़ रही हैं . उर्मिला थी न अपनी ? दस साल की हो गई . क़ायदे से पढ़ती-लिखती होती, तो छठवीं श्रेणी की छात्रा होती किसी स्कूल की... लेकिन उसकी पढ़ाई का सिलसिला छूट गया है न? उर्मिला अपने बाप पर बेहद रंज है.

उर्मिला चूँकि लड़की है, बहुत कुछ समझने लगी है .

शोभाकांत ने पटना से कई बार लिखा है-- आपने, पिताजी, उर्मिला के बारे में शायद तय कर लिया है कि उसे मूर्ख ही रखेंगे.
नहीं, बेटा तुम ग़लत समझ रहे हो. मैं भला अपनी पुत्री को मैट्रिक भी नहीं करवाना चाहूँगा !

तो यों ही मैट्रिक हो जायेगी उर्मिला?

मैट्रिक में फर्स्ट डिवीजन लाया है. पटना कॉलेज में प्रि-युनिवर्सिटी क्लासेज़ का छात्रा है. बचपन में वर्षो तक बोन टी०बी० से आक्रांत था. एक टाँग शक्ति-शून्य है, इसी से लंगड़ाकर चलता है... उन्नीस साल का यह तरुण अपने बाप की रग-रग पहचानता है. उसे भली-भाँति पता है, पिताजी बातें बहुत करते हैं, काम नहीं करते ! समूचा परिवार पटना या इलाहाबाद कहीं जमकर रहता, तो उर्मिला भी पढ़ जाती और मंजू भी...

हाँ, बेटा! मैं गप्पी हूँ... अहदी भी हूँ और दांभिक भी .

(जारी)

1 comment:

Manu Tyagi said...

बढिया और सुंदर ...........आगे की प्रतीक्षा में