Saturday, September 29, 2012

ऐसा मंटो किसी यूटोपिया में नहीं, हमारे जमाने के भारतीय उपमहाद्वीप में पैदा हुआ था

सआदत हसन मंटो पर यह शानदार लेख कवि-कार्टूनिस्ट श्री राजेन्द्र धोड़पकर ने कुछ समय पहले लिखा था. उसे यहाँ प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है- 



सआदत हसन मंटो ने जितनी तूफानी और अराजक जिंदगी जी, उसे देखते हुए यह वाक्य लिखना मुश्किल होगा कि मंटो आज अगर जिंदा होते, तो सौ बरस के होते, हालांकि यह भी सही है कि वह बहुत जल्दी गुजर गए. मंटो की महानता का जश्न मनाने में यह एक क्रूर-सी सुविधा है कि वह हमारे बीच नहीं हैं, क्योंकि जिंदा मंटो को बर्दाश्त करना हमारे आज के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक माहौल के बस की बात नहीं थी. मंटो को बर्दाश्त करना उनके जीते जी भी बहुत आसान नहीं था. वह किसी दायरे में अंटते ही नहीं थे. तरक्कीपसंद कभी यह समझ नहीं पाए कि मंटो का क्या करें, गैर तरक्कीपसंदों के लिए वह एक मुसीबत ही थे, जो तोड़-फोड़ करते चलते थे. न वह हुक्मरानों के प्रिय हो सकते थे, न हुक्मरानों की मुखालफत करने वालों के अनुशासन में आ सकते थे. अब सुविधा यह है कि हम उनकी कुछ कालजयी कहानियों और ‘सियाह हाशिये’ का जिक्र करके उन्हें महान लेखक बता सकते हैं. अंग्रेजीदां लोग ‘भाषा लिटरेचर’ के एक लेखक की महानता बखान कर अपनी भारतीयता पुख्ता कर सकते हैं, मंटो उनके लिए सुरक्षित हैं, क्योंकि सलमान रश्दी, मंटो को भारतीय भाषाओं के लेखकों में एकमात्र महत्वपूर्ण लेखक कह चुके हैं. प्रगतिशीलों को मंटो के उपद्रवों की फिक्र करने की जरूरत नहीं है. बाकी लोग भी ‘टोबा टेकसिंह’ और ‘काली सलवार’ को बेखटके महान बता सकते हैं.

मंटो ने उन कहानियों के अलावा भी खूब लिखा है, जिन्हें याद करना मंटो को समझने के लिए जरूरी है. मंटो बाजारू लेखक नहीं थे, लेकिन पेशेवर लेखक थे और लेखन उनकी रोजी-रोटी थी. किसी पेशेवर लेखक की तरह उन्होंने खूब लिखा और उसमें से बहुत कुछ साहित्यिक रूप से खराब है, लेकिन वह दिलचस्प हर वक्त है. मंटो के लेखन की खूबी यह है कि लेखन को जीविका बनाते हुए और अपने लेखन के प्रति पूरी तरह ईमानदार और प्रतिबद्ध होते हुए भी वह परंपरागत अर्थ में लेखक या साहित्यकार नहीं बने. वह साहित्य को भी उसी तरह दिलचस्पी, आश्चर्य और कौतूहल से देखते रहे, जैसे वह बाकी दुनिया को देखते थे. साहित्यकारों और सिनेमा के लोगों के उनके संस्मरण शायद इसीलिए इतने अनोखे हैं, क्योंकि वह साहित्य में साहित्यकार नहीं थे, फिल्मी दुनिया में रहकर भी फिल्मी आदमी नहीं थे. दुनिया के साहित्य में इतने अच्छे व्यक्तिचित्र शायद ही किसी ने लिखे हों, जो किसी भी महान गल्प से तुलना करने योग्य हों.

मंटो अगर लेखक, कलाकार, संस्कृतिकर्मी नहीं थे, तो क्या थे? इसका जायजा हमें पारसी थिएटर के मशहूर नाटककार आगा हश्र कश्मीरी पर लिखे मंटो के संस्मरण की शुरुआत में मिलता है, जहां दीनू या फजलू लोहार के साथ शराब पीकर और जुआ खेलकर मंटो के दिन बिताने के संस्मरण हैं. भविष्य के बारे में पूरी तरह उद्देश्यहीन मंटो एक अखबार के लिए काम करने लगते हैं, फिर अंग्रेजी उपन्यासों का तर्जुमा करके पैसे कमाने लगते हैं और धीरे-धीरे लेखक हो जाते हैं. मंटो की महानता इसमें है और इसीलिए शायद वह तरह-तरह की साहित्यिक अभिजात दृष्टि को आकर्षित भी करते हैं और मुश्किल में डालते हैं कि जिंदगी भर वह फजलू लोहार के साथ शराब पीने और जुआ खेलने वाले आदमी बने रहे. मंटो लेखक बन जाने के बाद अक्सर शायरों और अदबी लोगों को भी इस महफिल में लाते रहे, जिसमें फजलू लोहार ने आगा हश्र कश्मीरी के बारे में कहा था- ‘बुढ़ापे का इश्क बहुत बुरा होता है.’ मंटो ने खूब लिखा-पढ़ा, वह बेहद जहीन और विचारवान व्यक्ति थे, लेकिन उन्होंने साहित्यकार होने को उस महफिल के एक सदस्य होने से बेहतर नहीं माना और कभी साहित्यकार नहीं बने. इस बात को समझने के लिए इस्मत चुगताई की आत्मकथा ‘कागजी है पैरहन’ का एक उद्धरण बहुत ही सटीक है-‘मैं खुश किस्मत हूं कि जीते-जी मुझे समझने वाले पैदा हो गए. मंटो को तो पागल बना दिया गया. तरक्कीपसंदों ने भी उसका साथ न दिया. मुझे तरक्कीपसंदों ने ठुकराया नहीं, न ही सर पर चढ़ाया. मंटो खाक में मिल गया, क्योंकि पाकिस्तान में वह कंगाल था. मैं बहुत आसूदा हाल (खुशहाल) थी. फिल्मों से हमारी बहुत अच्छी आमदनी थी और अदबी मौत या जिंदगी की परवाह न थी और वैसे मैं तरक्कीपसंदों की खुद भी चमची बनी हुई थी.’ कोई भी हो, चाहे तरक्की पसंद या गैर तरक्की पसंद, उसे ‘कंफर्म’ करने वाले लोग चाहिए होते हैं, जो उनके सांचे में ढल जाएं. मंटो हमेशा बाहरी आदमी बने रहे. लेकिन इसी ने उन्हें महान बनाया.

मंटो ऐसे लेखक थे, जो लेखक होकर भी उस दुनिया में रमे रहे, जिसके बारे में वह लिखते थे. गरीब लोग, वैश्याएं, फिल्मों में सफल होने की कोशिश करती तवायफें वगैरह. मंटो इन लोगों से प्यार करते थे, लेकिन यहां भी उनमें बच्चों जैसी उत्सुकता, विस्मय और खिलंदड़ापन बना रहा. गहरी करुणा और प्रेम के बावजूद वह ‘बाजार से गुजरा, लेकिन खरीदार नहीं हुआ.’ इस सबने मंटो को वह उदात्त नैतिक दृष्टि दी, जो न परंपरा की दुहाई देने वाले शुद्धतावादियों में हो सकती है, न तरक्की को बंद गली बनाने वाले पेशेवर तरक्कीपसंदों में. मंटो की महानता यह है कि अपने पूरे लेखन में वह ‘जजमेंटल’ नहीं हैं, वह दुनिया का खेल देख रहे हैं. लोगों के साथ सुखी-दुखी हो रहे हैं. वह भयानक से भयानक स्थिति में भी इंसानियत की कोमलता देख लेते हैं. उनके मन में राग है, लेकिन द्वेष नहीं है. वह जज की तरह फैसला नहीं सुनाते, वह किसी बहुत संवेदनशील डॉक्टर की तरह बीमारी का जायजा लेते हैं. अपने एक लेख में वह संगीतकार रफीक गजनवी के ओछेपन, उनके अनैतिक रिश्तों के बारे में लिखते हुए अंत में उनके मानवीय पक्ष को ऐसे उभारते हैं कि वह लेख मनुष्यता की एक उदात्त त्रसदी की कथा बन जाता है. 

मंटो के समूचे लेखन में उनकी एक उज्जवल, निष्पाप और साफ छवि उभरती है, जहां वह अपने साथ पाप, लोभ, मोह, अपराध और गंदगी से जूझते अपने किरदारों को भी अपनी रोशनी में खड़ा कर देते हैं. मंटो का आकर्षण ही यह है कि वह लेखक बने बगैर लेखक हैं. शराबी हुए बगैर शराबखोर हैं. बिना किसी धार्मिक अनुशासन के घोर धार्मिक हैं. वह विचारक हुए बगैर तत्वचिंतन करते हैं. वह गलीज लोगों के किस्से सुनाते हुए भी हम जैसे लोगों से ज्यादा नैतिक हैं. बिना कार्यकर्ता हुए जन प्रतिबद्ध हैं. कार्ल मार्क्स ने कुछ इसी अंदाज में (बेशक दूसरे शब्दों में) साम्यवादी यूटोपिया के इंसान का जिक्र किया था. खास बात यह है कि ऐसा मंटो किसी यूटोपिया में नहीं, हमारे जमाने के भारतीय उपमहाद्वीप में पैदा हुआ था, यह हमारी खुशकिस्मती है.

('हिन्दुस्तान' से साभार)  

2 comments:

सागर said...

afsos is shaandar blog par Manto par kitna kam hai.

baramasa said...

इस आलेख के लिए राजेन्द्र को बधाई। कल ही मंटों पर एक आयोजन में हिस्सा ले रहा था। काश अपनी बात मैं इतनी खूबी के साथ रख पाता।