Friday, August 2, 2013

देश की छाती दरकते देखता हूँ - कबाड़ख़ाना की तीन हजारवीं पोस्ट



यह कबाड़ख़ाना की तीन हजारवीं पोस्ट है. एक तरह से देखा जाय तो इस में कुछ भी नया या बहुत बड़ा नहीं पर व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह महत्वपूर्ण है कि कई बार इस ब्लॉग को पूरी तरह निष्क्रिय कर देने की इच्छा मन में आने के बावजूद यह अब तक सांस ले रहा है और मुझे इस के जल्दी अदृश्य हो जाने की कोई ख़ास वजह या संभावना नज़र नहीं आती. जब तक संसार में साझा करने को चीज़ें रहेंगी कबाड़ख़ाना भी बना रहेगा.

आज की यह पोस्ट हिन्दी के महानतम कवियों में से एक केदारनाथ अग्रवाल जी को समर्पित है. इस पोस्ट को मुकम्मल सूरत देने में कबाड़खाने में इधर लगातार पोस्ट किये जा रहे निराले कवि संजय चतुर्वेदी का सब से बड़ा योगदान है. उनका हार्दिक आभार. पहले केदार जी की कुछ कवितायेँ प्रस्तुत हैं-


१. 
आज नदी बिलकुल उदास थी
 

आज नदी बिलकुल उदास थी. 
सोई थी अपने पानी में, 
उसके दर्पण पर- 
बादल का वस्त्र पडा था. 
मैंने उसको नहीं जगाया, 
दबे पांव घर वापस आया. 

२. 
ज़िन्दगी
 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को,
पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ!
सत्य के जारज सुतों को,
लंदनी गौरांग प्रभु की, 
लीक चलते देखता हूँ!
डालरी साम्राज्यवादी मौत-घर में,
आँख मूँदे डाँस करते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मैं अहिंसा के निहत्थे हाथियों को,
पीठ पर बम बोझ लादे देखता हूँ.
देव कुल के किन्नरों को,
मंत्रियों का साज साजे,
देश की जन-शक्तियों का,
खून पीते देखता हूँ,
क्रांति गाते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
राजनीतिक धर्मराजों को जुएँ में,
द्रोपदी को हारते मैं देखता हूँ!
ज्ञान के सब सूरजों को,
अर्थ के पैशाचिकों से,
रोशनी को माँगते मैं देखता हूँ!
योजनाओं के शिखंडी सूरमों को,
तेग अपनी तोड़ते मैं देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
खाद्य मंत्री को हमेशा शूल बोते देखता हूँ
भुखमरी को जन्म देते,
वन-महोत्सव को मनाते देखता हूँ!
लौह-नर के वृद्ध वपु से,
दण्ड के दानव निकलते देखता हूँ!
व्यक्ति की स्वाधीनता पर गाज गिरते देखता हूँ!
देश के अभिमन्युयों को कैद होते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मुक्त लहरों की प्रगति पर,
जन-सुरक्षा के बहाने,
रोक लगाते देखता हूँ!
चीन की दीवार उठते देखता हूँ!
क्राँतिकारी लेखनी को,
जेल जाते देखता हूँ!
लपलपाती आग के भी,
ओंठ सिलते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
राष्ट्र-जल में कागजी, छवि-यान बहता देखता हूँ,
तीर पर मल्लाह बैठे और हँसते देखता हूँ!
योजनाओं के फरिश्तों को गगन से भूमि आते,
और गोबर चोंथ पर सानंद बैठे,
मौन-मन बंशी बजाते, गीत गाते,
मृग मरीची कामिनी से प्यार करते देखता हूँ!
शून्य शब्दों के हवाई फैर करते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
बूचड़ों के न्याय-घर में,
लोकशाही के करोड़ों राम-सीता,
मूक पशुओं की तरह बलिदान होते देखता हूँ!
वीर तेलंगानवों पर मृत्यु के चाबुक चटकते देखता हूँ!
क्रांति की कल्लोलिनी पर घात होते देखता हूँ!
वीर माता के हृदय के शक्ति-पय को
शून्य में रोते विलपते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
नामधारी त्यागियों को,
मैं धुएँ के वस्त्र पहने,
मृत्यु का घंटा बजाते देखता हूँ!
स्वर्ण मुद्रा की चढ़ौती भेंट लेते,
राजगुरुओं को, मुनाफाखोर को आशीष देते,
सौ तरह के कमकरों को दुष्ट कह कर,
शाप देते प्राण लेते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
कौंसिलों में कठपुतलियों को भटकते,
राजनीतिक चाल चलते,
रेत के कानून के रस्से बनाते देखता हूँ!
वायुयानों की उड़ानों की तरह तकरीर करते,
झूठ का लम्बा बड़ा इतिहास गढ़ते,
गोखुरों से सिंधु भरते,
देश-द्रोही रावणों को राम भजते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
नाश के वैतालिकों को
संविधानी शासनालय को सभा में
दंड की डौड़ी बजाते देखता हूँ!
कंस की प्रतिमूर्तियों को,
मुन्ड मालाएँ बनाते देखता हूँ!
काल भैरव के सहोदर भाइयों को,
रक्त की धारा बहाते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
व्यास मुनि को धूप में रिक्शा चलाते,
भीम, अर्जुन को गधे का बोझ ढोते देखता हूँ!
सत्य के हरिचंद को अन्याय-घर में,
झूठ की देते गवाही देखता हूँ!
द्रोपदी को और शैव्या को, शची को,
रूप की दूकान खोले,
लाज को दो-दो टके में बेचते मैं देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मैं बहुत उत्तप्त होकर
भीम के बल और अर्जुन की प्रतिज्ञा से ललक कर,
क्रांतिकारी शक्ति का तूफान बन कर,
शूरवीरों की शहादत का हथौड़ा हाथ लेकर,
श्रृंखलाएँ तोड़ता हूँ
जिन्दगी को मुक्त करता हूँ नरक से!! 

(कविता संग्रह, "कहें केदार खरी खरी" से)
 
३. 
कंकरीला मैदान
 

कंकरीला मैदान
ज्ञान की तरह जठर-जड़
लम्बा चौड़ा
गत वैभव की विकल याद में-
बडी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया.
जहाँ-तहाँ कुछ कुछ दूरी पर,
उसके उँपर,
पतले से पतले डंठल के नाजुक बिरवे
थर-थर हिलते हुए हवा में खड़े हुए
बेहद पीड़ित. 
हर बिरवे पर मुँदरी जैसा एक फूल है
अनुपम, मनोहर,
हर एसी मनहर मुंदरी को 
मीनों नें चंचल आँखों से
नीले सागर के रेशम के रश्मि तार से,
--हर पत्ती पर बड़े चाव से--बड़ी जतन से--
अपने अपने प्रेमीजन को देने के खातिर काढ़ा था
सदियों पहले.
किंतु नहीं वे प्रेमी आये
और मछलियाँ सूख गयी हैं--कंकड़ हैं अब.
आह! जहाँ मीनों का घर था
वहाँ बड़ा मैदान हो गया.

४. 
घोड़े का दाना 



सेठ करोड़ीमल के घोड़े का नौकर है

भूरा आरख.

बचई उसका जानी दुश्मन!

हाथ जोड़कर,
पाँव पकड़कर,
आँखों में आँसू झलकाकर,
भूख-भूख से व्याकुल होकर,
बदहवास लाचार हृदय से,
खाने को घोड़े का दाना
आध पाव ही बचई ने भूरा से माँगा.

लेकिन उसने
बेचारे भूखे बचई को,
नहीं दिया घोड़े का दाना;
दुष्ट उसे धक्का ही देता गया घृणा से!

तब बचई भूरा से बोला :
पाँच सेर में आध पाव कम हो जाने से
घोड़ा नहीं मरेगा भूखा;
वैसे ही टमटम खींचेगा;
वैसे ही सरपट भागेगा;
आध पाव की कमी न मालिक भी जानेगा;
पाँच सेर में आध पाव तो यों ही भूरा!
आसानी से घट जाता है;
कुछ धरती पर गिर जाता है;
तौल-ताल में कुछ कमता है;
कुछ घोड़ा ही, खाते-खाते,-

इधर उधर छिटका देता है.

आध पाव में भूरा भैया!
नहीं तुम्हारा स्वर्ग हरेगा
नहीं तुम्हारा धर्म मिटेगा;
धर्म नहीं दाने का भूखा!-
स्वर्ग नहीं दाने का भूखा!-
आध पाव मेरे खाने से
कोई नहीं अकाल पड़ेगा.

पर, भूरा ने,
अंगारे सी आँख निकाले,
गुस्से से मूँछें फटकारे,
काले नोकीले काँटों से,
बेचार बचई के कोमल दिल को
छलनी छलनी कर ही डाला.
जहर बूँकता फिर भी बोला :
नौ सौ है घोड़े का दाम!-
तेरा धेला नहीं छदाम.
जा, चल हट मर दूर यहाँ से.

अपमानित अवहेलित होकर,
बुरी तरह से जख्मी होकर,
अब गरीब बचई ने बूझा :
पूँजीवादी के गुलाम भी
बड़े दुष्ट हैं;-
मानव को तो दाना देते नहीं एक भी,
घोड़े को दाना देते हैं पूरा;
मृत्यु माँगते हैं मनुष्य की,

पशु को जीवित रखकर!

(रचनाकाल: १२-०४-१९४६)
---
(साभार - हंस अगस्त २०००)
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महत्वपूर्ण युवा कवि संजय चतुर्वेदी ने यह वक्तव्य, केदार जी की शोक सभा में प्रस्तुत किया था. रवायती और लगभग कर्मकांडी शोकसभा में केदार जी की महानता की प्रशस्तियाँ गयी गयीं. उन्हें नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन के साथ प्रगतिशील धारा का आधार कवि बताया गया. उन सारी श्रद्धांजलियों में संजय चतुर्वेदी और कवियत्री निर्मल गर्ग का स्वर सचमुच केदार जी और उनकी परंपरा के लगाव के दर्द से पैदा हुआ था. काश ऐसी शोकसभाओं में हम परम्परागत, अर्थहीन शब्दावली के भव्य श्रद्धासुमनों की बजाय अपने निजी कनेर-गेंदा अर्पित करने की शुरुआत करते. 

मैं केदारनाथ अग्रवाल को संपूर्ण सम्मान के साथ याद करते हुए ही ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ.

- राजेंद्र यादव 

वरण की आपाधापी में निषेध की मर्यादा 
- संजय चतुर्वेदी 

पिछले बीस साल की हिंदी कविता जिस व्यवस्था या तंत्र का प्रतिरोध कर रही थी, ख़ुद उसी के मूल प्रत्यय 'मैनेजमेंट' और उसके मंत्र शब्द 'पॉज़िटिव एटीट्यूड' के सम्मोहन का शिकार रही है. प्रगतिशीलता के नाम पर भी जो कविता लिखी गई वह इस 'पॉज़िटिव एटीट्यूड' के बड़े बाज़ारू अर्थों को अपने में उतार गई. कहा गया की यह नारों से आगे का विकास और जीवन और उसकी उमंग के प्रति सकार और स्वीकार की कविता है. इस तरह एक ऐसे प्रगतिशील कविता-कारोबार का मैनेजमेंट तैयार हुआ जिससे किसी को कोई दिक्क़त न हो. एस लगने लगा जैसे कविता लिखी नहीं लिखवाई गई है. कविता में अन्तर्निहित बेचैनी की जगह फ़ॉर्मूला सोच-विचार के निकम्मे सुकून ने ले ली. जहाँ कहीं विरोध के या परेशानी पैदा करने वाले स्वर आते वहाँ कहा जाता की यह तो निरा नकार और निषेध है.  निगेटिव एटीट्यूड है. धीरे-धीरे हिम्मत इतनी बढ़ी की नैतिक गुस्से को दकियानूसी या असाहित्यिक नारेबाज़ी कहा जाने लगा. कुछ लोग यहाँ तक कहने लगे की नैतिकता की कविता में कोई जगह नहीं होती. जो काम असुविधाजनक सचाइयों को किनारे करने में कभी नायिकाओं के सहारे किया जाता था वह चिड़ियों और बच्चों के मार्फ़त किया जाने लगा. प्रतिरोध का काव्य बेचैन गतिशीलता न पाकर तलब-आराई बन गया. बड़ी तेज़ी से बहुत ज़्यादा ऐसा लिखा गया जो कविता के कारोबार में बेहतर माल बन सके. दरअस्ल यह जीवन की उमंग के प्रति साकार और स्वीकार न होकर जीवन में व्याप्त चालूपन, अवसरवाद और भ्रष्टाचार के प्रति स्वीकार की कविता का दौर रहा. ये कवियों के सुनहरे और कविता के काले दिन चल रहे हैं. 

ऐसे में जिन लोगों ने अपने कृतित्व, वाणी और आचरण से नकार और निषेध के सकारात्मक पक्ष को थामे रखा उनमें दो वृद्ध मनीषी, डॉ रामविलास शर्मा और केदारनाथ अग्रवाल बड़ी जीवट वाले रहे. जब-जब कविता और विचार में चालू संस्कृति के अश्वमेध का घोड़ा छूटा, इन बूढों ने उसे पकड़ा. और वे अकेले नहीं थे. रहबर और शील जैसे लोगों की भी एक परम्परा रही है. जब मुट्ठीभर कवियों का बोलबाला है लेकिन कविता अनर्थ हुई तब केदारनाथ अग्रवाल का बोलबाला नहीं रहा और उनकी ज़्यादातर कविताओं ने अपना हक़ अदा किया. कुछ लोग मानते हैं की केदार जी ठीक हैं लेकिन कविता अब बहुत आगे बढ़ चुकी है. इस भगदड़ में कविता तो क्या आगे बढ़ती, कुछ कवि-कवियत्रियाँ ज़ुरूर इतने आगे बढ़ गए हैं कि आज उन्हें पता है कि 2003 और 2005 तक उन्हें क्या-क्या प्राप्त कर लेना है, और इसके लिए उन्हें आज कहाँ, कौन से महीन काम करने हैं. उधर पीछे छूटे केदार ने भक्ति और रीति के सकारात्मक तत्वों को आज की कविता में साधा. उन्होंने आज की बात को छन्द की ताक़त दी. बहुत सी नयी बातें कहीं और परंपरा की उन्हीं शक्तियों से अपनी बात को आगे बढ़ाया जिनके दम से सदियों तक इस भूभाग की कविता यहाँ की जनता का दैनंदिन कारोबार रह चुकी थी.
  
डॉ रामविलास शर्मा और केदारनाथ अग्रवाल दोनों ही पूर्णायु थे और भरा पूरा सक्रिय जीवन रहा इनका. इनके निधन में शोक के प्रसंग कम जीवन में संतोष के अधिक हैं. लेकिन एक सन्देश जो इनका होना इनके जाने के बाद हमें देता है वह बड़ा बेचैन करने वाला है. सारा जीवन सक्रिय रहने के बाद क्या इनका कुछ असर समाज पर पड़ा? बहुजन-अभिजन दोनों को छोड़ दीजिये, सघन सारस्वत संपर्क में रहने वाले लेखक समाज पर ही केन्द्रित करें तो मुझे लगता है इन दोनों के दखल और वोट का कुछ ख़ास असर लेखकों पर नहीं पड़ा. रहबर और शील को तो उनके जीवित रहते ही लेखन की रूलिंग-क्लास ने किनारे कर दिया था. इन दोनों को जब किनारे नहीं कर सकी तो टालती रही. जो रूलिंग-क्लास नागार्जुन और मुक्तिबोध जैसे ऊर्जावान कवियों को पचा गई और हरा गई वह इन दोनों को भी टालने में बड़ी कामयाब रही. आज हममें से कितने हैं जो श्रद्धांजलि के बाद कुछ दूर इनके रस्ते पर चलना चाहेंगे? हम तो इस पुस्तक-पुरस्कार माफ़िया के शीलवान अभिनेता हैं, जिनके दम से आज हिंदी किताबों का कारोबार संसार के कुछ सबसे अनैतिक कारोबारों में से एक है.
    
 कुरुसभा में विदुरवाणी का दखल बेअसर हुआ. इस चालू समाज में हरकत के लिए हमें ऐसे कवि की ज़ुरूरत है जो केदार और धूमिल एक साथ हो. हमें फ़ैज़ और हबीब जालिब एक साथ चाहिए. मैं चाहता हूँ इस कुरुसभा में कोई प्रतिभा और हिम्मत का धनी खड़ा होकर गालियां बकना शुरू कर दे.

8 comments:

vijay kumar sappatti said...

सबसे प्रथम तो तीन हजारवी पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई .
उसके बाद आज आपने केदारनाथ को याद करके बहुत शुभकारी किया है , atleast मेरे लिए .. मैं अक्सर उनकी जनवादी कविताएं पढता हों और भीतर ही भीतर कहीं कुछ उमड जाता है .

और हाँ .. कबाड़खाने की आयु , बहुत लम्बी है .हमसे भी ज्यादा.

आभार

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(3-8-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

सज्जन धर्मेन्द्र said...

तीन हजारवीं पोस्ट पर बधाई तो बनती है। बधाई स्वीकार कीजिए। पर भाई केदारनाथ अग्रवाल की सिर्फ़ चार कविताएँ? इतना बड़ा रचना संसार और सिर्फ़ चार कविताएँ। मैंने इनके तीन संग्रह कविता कोश पर यूनिकोड में जोड़ रखे हैं। लिंक नीचे दे रहा हूँ हो सके तो एक पोस्ट और केदार जी पर लिखिए।

http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%82_/_%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2#.Ufumj0q2HXg

http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%86%E0%A4%81%E0%A4%96%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%87_%E0%A4%A1%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%87_/_%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2#.UfumSUq2HXg

http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%AF%E0%A4%B2_%E0%A4%96%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%87_%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%A1%E0%A4%BC_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B9_/_%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2#.UfumTkq2HXg

प्रवीण पाण्डेय said...

तीन हजारवीं पोस्ट की बहुत बधाइयाँ, देश की दशा देख हृदय चीत्कार कर उठता है।

Pramod Singh said...

किसी हिम्‍मत के धनी के खड़ा होकर गालियां बकने देने का मौका मगर ये पुरस्‍कार माफिया के शीलवान अभिनेता देंगे नहीं.. उसमें गिन-गिनकर पतनशील तत्‍व गिनाते फिरेंगे फिर..

Pramod Singh said...
This comment has been removed by the author.
अनूप शुक्ल said...

तीन हजारवीं पोस्ट के लिये बहुत-बहुत बधाई। कबाड़खाना ब्लॉग जगत की सबसे बेहतरीन उपलब्धियों में एक है। यह नियमित बना रहे इसके लिये शुभकामनायें।

Priyankar said...

बहुत-बहुत बधाई !

और क्या तो तरीका हुआ इस माइलस्टोन तक पहुंचने का .

तीन हज़ारवीं पोस्ट सचमुच 'चेतावनी का चूंग्ट्या' है . बशर्ते हम इसे समझें .