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Saturday, October 21, 2017

और अगर फिर भी ख़ून बचा हो आने वाली नस्ल में

मेरी तरफ़ भी देखो
- संजय चतुर्वेदी

मरने के बाद
मेरी अस्थियाँ गंगा में विसर्जित कर देना
और राख थोड़ी बिखरा देना
हवाई जहाज़ से हिमालय की चोटियों पर
और थोड़ी कन्याकुमारी के महासंगम में
और किसी को हक़ नहीं देश से इतना प्यार करने का
थोड़ी-सी भस्म एक हण्डिया में भर
गाड़ देना मेरी समाधि में
लोग देखने आएँ मेरे अजायबघर
सौ दो सौ एकड़ ज़मीन ज़रूर घेर लेना
सबसे शानदार जगहों पर
और मेरे जन्म दिन पर छातियाँ भी पीटना
एक और बात जो दिलचस्प हो सकती है
बच्चों से मुझे कभी कोई लगाव नहीं रहा
लेकिन इसी बहाने अगर उनकी छातियों पर मूँग दली जाए
तो चलेगा
हालाँकि मेरे कोई पुत्री नहीं थी
वर्ना मैं उसके नाम
चार पाँच किलो चिट्ठियाँ भी छोड़ ही जाता
मैं दिन में एक सौ बयालीस घण्टे काम करता था
और उनसे नफ़रत करता रहूँगा
जो इससे कम कर पाते हैं
जीवन में सभी विषयों पर पढ़ा सोचा और लिखा
और कुछ छूट न जाए इसलिए
तैंतालीस में जब मुझे फ़्लू हुआ
मैंने दूरअन्देशी दिखाते हुए
एड्स वैक्सीन पर एक लेख लिखा
अब मिल नहीं रहा
उसे दोबारा लिखकर छपवा देना
और अगर फिर भी ख़ून बचा हो
आने वाली नस्ल में
तो मैं अपनी प्रिय मेज़ की दराज़ में
एक पाण्डुलिपि छोड़े जा रहा हूँ .


[1991]

Friday, October 20, 2017

रोटी हाथों में स्वतंत्रता की तरह होती है

हाथों में स्वतंत्रता की तरह
- संजय चतुर्वेदी

चाहे वो घर में बन रही हो
या खुले मैदान में
या किसी बनती हुई इमारत के नीचे
पकते हुए आटे की महक
रास्ते रोक लेती है
ठग लेती है भरे पेट वालों को भी
भुला देती है फर्क अच्छे-बुरे का
औकात पर आ जाते हैं सारे खयाल

रोटी हाथों में स्वतंत्रता की तरह होती है
खुशकिस्मत हैं वे

जिनका रास्ता रोटियाँ रोक लेती हैं।

Thursday, October 19, 2017

और वही आदमी था आज भी राजा

सात हजार साल बाद
- संजय चतुर्वेदी

कोई सात हजार साल बाद खोला उसने दरवाजा
बदल गई थी भाषा
लेकिन बदले नहीं थे आदमियों के आपसी संबंध
और वही आदमी था आज भी राजा
जिसके डर से वह बंद हुआ था
सात हजार साल पहले


Wednesday, October 18, 2017

हम चाहेंगे दुनिया हो तुम्हारे सपनों के मुताबिक

सपनों के मुताबिक
- संजय चतुर्वेदी

हम नहीं चाहेंगे
कि सौ साल बाद
जब हम खोलें तुम्हारी किताब
तो निकले उसमें से
कोई सूखा हुआ फूल
कोई मरी हुई तितली
हम चाहेंगे

दुनिया हो तुम्हारे सपनों के मुताबिक

Monday, July 17, 2017

छक्के छूट गए भाषा के माया ने ईश्वर को देखा

दिल्ली में इस डर को देखा
-  संजय चतुर्वेदी

असली को लतियाने वाले नकली के तेवर को देखा
खुसुर-पुसुर की कुव्वत देखी नैनामार ग़दर को देखा
गंगाजमनी लदर-पदर में गोताख़ोर हुनर को देखा
जे० एन० यू० की हिन्दी देखी परदेसी ने घर को देखा
मरियम जैसा भेस बनाए सखियों के लश्कर को देखा
निराधार बातों पर पैदा निराधार आदर को देखा
गयी शायरी मिले वज़ीफ़े दिल ने नई बहर को देखा

छक्के छूट गए भाषा के माया ने ईश्वर को देखा

Sunday, July 16, 2017

एक हाथ में मक्कारी है एक हाथ कन्दील

ईसा की जो खाल बेच दें उन्हें मिली इन्जील
- संजय चतुर्वेदी

आतंकी हैं परगतिसील
ज़िनाकार-हत्यारे-तस्कर सभी हुए जिबरील

वामन्थ से हाल मिल गया
मालपन्थ से माल मिल गया
कलापन्थ में अख़बारों में
उनको सुघड़ दलाल मिल गया
एक हाथ में मक्कारी है एक हाथ कन्दील

बड़े शहर का ये आलम है
हर दल्ला साहिब-ए-हशम है
हम नंगे तो घोर जहालत
वो नंगे तो कलाकरम है
उनको जो नंगा बोले उसकी निगाह अश्लील

कल्चर के जो मालबटोरा
सरमाए के रिशवतख़ोरा
उन्हें खुली ’आज़ादी’ इसकी
कर कुकर्म सम्मान-चटोरा
हर ज़लील हरक़त के हक़ में उनके पास दलील

पाँच सितारा अपरम्पारा
लगा उसी में लाल सितारा
जिसको फ़ौजें हरा न पाईं
उसे चरकटों ने दे मारा

ईसा की जो खाल बेच दें उन्हें मिली इन्जील.

Saturday, July 15, 2017

फ्रॉड में मक्कार लोगों के हरारत आएगी

फ्रॉड में मक्कार लोगों के हरारत आएगी
- संजय चतुर्वेदी

फ्रॉड में मक्कार लोगों के हरारत आएगी
नीम पोशीदा लफ़ंगों में शराफ़त आएगी

और टेढ़े रास्ते होंगे सचाई के लिए
साथ ही घटिया तरीक़ों में सलासत आएगी

इन्क़लाबी पार्टी बैठे वहाबी गोद में
और जैजैकार होगी ये भी नौबत आएगी

मुफ़लिसों के वास्ते स्मगलरों से राबिता
किस जहन्नुम से ये जन्नत की बशारत आएगी

जिस तरफ़ तहज़ीब करवट ले रही है इन दिनों

उस तरफ़ सब कुछ रहेगा पर मुसीबत आएगी

Friday, July 14, 2017

फिर भी ससुरे पिले पड़े हैं

सखी समन्वय
- संजय चतुर्वेदी

ऊपर है कुश्ती का आलम
नीचे-नीचे मिले पड़े हैं
सतत पराभव हुआ काव्य का

फिर भी ससुरे पिले पड़े हैं.

Thursday, July 13, 2017

निरन्तरता ही संसार को बचाएगी

निरन्तरता ही संसार को बचाएगी
      - संजय चतुर्वेदी

छियासी चिन्तकों ने सामूहिक आत्महत्या की
छियासी कलावन्तों ने

डायनोसॉर संघर्ष करके तैयार हुए थे श्रेष्ठ
डायनोसॉर नष्ट हो गए
वह सिर्फ़ एक आकाशीय दुर्घटना थी
या और कोई समझ में आ सकने वाली बात
इतिहास भरा पड़ा था दिग्गजों के इतिहास से
जो नहीं बदल पाए अपने आपको
चूहे निकल गए उनके ऊपर से
दीमकें निकल गईं
चींटियों ने लम्बी यात्राएँ कीं
हालाँकि पर निकलते ही भागे चमक की तरफ़
पर कीड़े नष्ट नहीं हुए

छियासी डॉल्फ़िनों ने सामूहिक आत्महत्या की
छियासी सिंह छियासी बाघ छियासी हाथी
खड़े हैं अपने वज़नी दिमाग़ों के साथ
अपने हिस्से की आख़िरी ज़मीन पर
छियासी श्रेष्ठ दर्शन छियासी श्रेष्ठ विचार
पलट भी सकते हैं गतियों को
हो सकता है डायनोसॉर नष्ट नहीं हुए हों
हो सकता है वे चिड़िया बनके उड़ गए हों आसमान में
भर के अपनी हड्डियों में हवा
हो सकता है जो नीलकण्ठ बैठा है टेलीफ़ोन के तार पर
उसका जीवन हो सामूहिक निरन्तरता की सनद

जुलाहे ख़तरे में हैं
कुम्हार और लुहार लड़ रहे हैं अपनी आख़िरी लड़ाई
किसान का लड़का नहीं बनना चाहता किसान
और बाज़ार में आया है पैप्सी
छियासी हज़ार श्रेष्ठ कामगार
निराशोन्माद में कर सकते हैं सामूहिक आत्महत्या
छियासी हज़ार श्रेष्ठ कामगारों को लग सकते हैं पंख
छियासी लाख लोग उड़ सकते हैं बाज़ार पर
छियासी करोड़ आंखें देख सकती हैं
लड़ाई श्रेष्ठता की नहीं निरन्तरता की है

उड़ान की निरन्तरता ही संसार को बचाएगी

Wednesday, July 12, 2017

धरती पर कहीं कुछ गड़बड़ है

क्षमा हर गति की नियन्ता है
-संजय चतुर्वेदी

हम इस समुद्र का हिस्सा हैं
सूरज और चन्द्रमा हमारे हैं
पवित्र आत्माओं की धरती पर
क्षमा हर गति की नियन्ता है

वायु में जीवन की महक हूँ
जल में हूँ सोम की प्रभा
अग्नियों में प्रेरणा की अग्नि हूँ
दम्भ भी किसी की क्षमा से है

तीन बजे रात फ़ोन की घण्टी
बादलों में सतर्क-सी चुप्पी
पर्वतों में अजीब आवाज़ें
जंगल में पशु भी भयभीत हैं

धरती पर कहीं कुछ गड़बड़ है
उसकी क्षमा पर हम निर्भर हैं
धरती पर अगर कुछ गड़बड़ है
उसमें हमारा भी हिस्सा है

मुक्ति का रास्ता अकेले नहीं
प्रकृति रहेगी तो हम भी हैं
तीन बजे रात फ़ोन की घण्टी
कौन आवाज़ दे रहा है हमें

वायु में जीवन की महक हूँ
अग्नियों में प्रेरणा की अग्नि हूँ
पवित्र आत्माओं की धरती पर

जंगल में पशु क्यों भयभीत हैं

Tuesday, July 11, 2017

सबसे बड़े पद पर सबसे भयभीत आदमी बैठा

जनादेश
- संजय चतुर्वेदी

चालीस प्रतिशत लोगों ने वोट नहीं डाला
इनमें अधिकांश चाहते तो वोट डालते
उन्हें लगा इससे क्या होगा
या उन्होंने इसके बारे में कुछ सोचा ही नहीं

साठ प्रतिशत लोगों की निर्वाचन कवायद से जो सांसद निकले
वे तेईस प्रतिशत के समर्थन से बने
सैंतीस प्रतिशत लोगों ने किसी और को वोट दिया
और जिसे जनादेश माना गया
चालीस प्रतिशत लोग उससे बाहर कहीं रहते थे
इस तरह जिन लोकनिरपेक्ष नुमाइन्दों की संसद बनी
सतहत्तर प्रतिशत लोग उनसे निरपेक्ष थे

पच्चीस प्रतिशत सांसद लेकर जो सबसे बड़ी पार्टी उभरी
उसने अन्य पार्टियों का
जो चुनाव में उसकी मुख़ालफ़त करती थीं
बाहर से समर्थन प्राप्त किया
और इसके लिए जनता से नहीं पूछा जा सका क्योंकि यह संभव नहीं था

सबसे बड़ी पार्टी का जिन पार्टियों ने समर्थन किया
उन्होंने यह स्पष्ट किया
कि उनका सबसे बड़ी पार्टी से कोई सैद्धान्तिक मेल नहीं है
लेकिन सरकार चलाने के लिए
वे सबसे बड़ी पार्टी को बाहर से चलाएँगी
इसके लिए जनता से नहीं पूछा जा सका क्योंकि यह संभव नहीं था

सबसे बड़ी पार्टी में जो सबसे काँइयाँ नेता था
उसे सबसे बड़ा ख़तरा लोगों से रहा
सो उसने प्रधान पद के लिए गुप्त मतदान का
सबसे ज़्यादा विरोध किया
इसके लिए भी जनता से नहीं पूछा जा सका क्योंकि यह संभव नहीं था

जिन्होंने व्यावहारिक तौर पर लोकतन्त्र की जड़ें कुरेदीं
उन्होंने सैद्धान्तिक तौर पर उसका समर्थन किया
और जिन्होंने सैद्धान्तिक तौर पर लोकतन्त्र की जड़ें कुरेदीं
उन्होंने व्यावहारिक तौर पर उसकी माँग में धरना दिया

फिर कुछ दार्शनिक दिक़्क़तें राजधानी में रहीं
जिन्हें लोकनिरपेक्ष शक्तियों ने साफ़ किया
बाहरी ताक़तों से सर्वसम्मत निर्वाचन
और सन्दिग्ध ताक़तों से गठन हुआ
सबसे बड़े पद पर
सबसे भयभीत आदमी बैठा
सबसे भयभीत आदमी ने सबसे भयभीत मन्त्रिमण्डल चुना
और इस तरह तेईस फ़ीसदी के नुमाइंदों से
ऐसी भयभीत सरकार निकली

जिसने एक मज़बूत लोकतन्त्र का बाहर से समर्थन किया

Saturday, January 7, 2017

न हों ज्ञान से बड़ी किताबें

संजय चतुर्वेदी (फ़ोटो: प्रिन्स खटीमा उर्फ़ पवन अग्रवाल)

पुस्तक मेले
-संजय चतुर्वेदी

हुईं ज्ञान से बड़ी किताबें
अर्थतन्त्र के पुल के नीचे रखवाली में खड़ी किताबें

जंगल कटे किताब बनाई
लेकिन चाल ख़राब बनाई
आदम गए अक़ील आ गए
आकर अजब शराब बनाई

श्रम की पूजा करते करते मज़दूरों से लड़ीं किताबें

जैसे अपना हक़ आज़ादी
ज्ञान हमारा हक़ बुनियादी
लेकिन उस तक जाने वाली
राह नहीं है सीधी सादी

नीम फ़रेबी उनवानों की बद-आमोज़ गड़बड़ी किताबें

ये कैसी तालीम हो गई
अच्छी दवा अफ़ीम हो गई
जैसे जैसे बढ़ी किताबें
दुनियां ही तक़सीम हो गई

जब दो क़ौमें मिलना चाहीं आपस में लड़ पड़ी किताबें

शब्दों के शौक़ीन झमेले
इस दुनियां के पुस्तक मेले
इसके बदले में तू दे दे
ख़ुदा हमें दो दर्ज़न केले

अगर मुदर्रिस ही खोटे हों क्या कर लेंगी सड़ी किताबें

नई किताबें नया आदमी बना सकें तो ठीक बात है
नया आदमी अधिक सभ्य हो ये थोड़ी बारीक़ बात है
नई किताबें मेहनत करके नए रास्तों को पहचानें
और उन्हें धनवान बनाएं स्मृतियों में गड़ी किताबें

न हों ज्ञान से बड़ी किताबें