Monday, October 14, 2013

मैं तय करती हूं कि तुम मेरे सार्त्र बनने के लायक नहीं - मनीषा का बयान

कल की पोस्ट 'कब चुप्पी तोड़ेंगे आप' पर आई टिप्पणियों की संख्या पर मुझे हैरत नहीं हुई. असद जी ने शायद सबसे सारे मसले की नब्ज़ पहले ही पकड़ ली थी और उनके कमेन्ट ने उस पोस्ट को काफ़ी समृद्ध किया. मुनीश भाई हमेशा की तरह सच्चे कबाड़ी की तरह अपनी बात को बेलौस लहज़े में कहते रहे हैं और निखिल आनंद गिरि जी, अनवर सुहैल जी, और सुमन सिंह जी की टिप्पणियाँ भी ख़ासे ज़रूरी सवाल पैदा करती हैं.

और ब्लॉगिंग के मेरे उस्ताद और शानदार इंसान इरफ़ान ने अभी अभी जो बात कही है उसे मैं दोबारा यहाँ रखता हुआ इरफ़ान को धन्यवाद कहता हूँ -मैं असद ज़ैदी की बात से शब्दशः सहमत हूं. जिस तरह राजेंद्र यादव प्रमोद नाम के अपने नौकर को बचा रहे हैं इससे साफ़ है कि उनकी कई नसें उसके हाथ में हैं. ऐसे मौक़ों पर अच्छे नेटवर्क वाले जिस आत्मविश्वास से भरे रहते हैं, राजेंद्र यादव उसका अपवाद नहीं हैं. मैं ऐसे उन सभी वर्चस्वशाली लोगों को धिक्कारता हूं जिन्होंने ज्योति के विरोध में अपने सारे शक्तिस्रोतों को आज़माया. ज्योति के साथ मैं हर तरह के समर्थन में खुद को प्रस्तुत पा रहा हूं. हिंदी साहित्य के अनेक स्थापित लोग पाठकों के मन में अपनी कृतियों के प्रति इतना भी भरोसा और स्नेह नहीं जगा सके हैं कि उनकी किताबें बिना किसी सेकंड थॉट के कबाड़ी को न दी जा सकें.


जानी मानी लेखिका आर. अनुराधा, जिनके लिए मेरे मन में बहुत आदर है, का कहना है – ‘"स्त्री विमर्श के पुरोधा" की नज़र से देखे जा रहे ऐसे वरिष्ठ व्यक्ति की इस पूरी घटना में जो भूमिका रही, वह न सिर्फ सरासर गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि किसी छुपे एजेंडा/स्वार्थ की आशंका भी जताती है. वरना इस मामले में साफ तौर पर ज्योति कुमारी का पक्ष मजबूत और प्रमोद की हरकत अपराधिक है. ऐसे में अगर सब कुछ अपनी आंखों से देखने के बाद भी कोई लगातार अपराधी के पक्ष में खड़ा दिखता है, उसका बचाव तक करता है और आरोपी पर शुरू से ही लगातार दबाव डालता है कि वह अपनी बात न कहे, पुलिस में न जाए, माफ़ कर दे, समझौता कर ले, और आखिर में वही स्त्री-विरोधी गंदा हथियार कि तुम किसी लायक नहीं थी (मैंने ही पर दया की, इंसान बनाया, वरना तू कौन!) तो निश्चित तौर पर यह नैतिक अपराध है. कानून तो अपना काम करेगा, वह अलग बात है.

लेकिन सच कहूं तो यह मेरे लिए इस पोस्ट को लगाना और व्यापक रूप से उसका ऐसा ठंडा असर देखना कहीं न कहीं निराशा और क्षोभ भी पैदा करने वाला रहा.  किसी क़िस्म के साहित्यकार होने का मुझे व्यक्तिगत रूप से कोई मुग़ालता नहीं और हिन्दी साहित्य के किसी भी "शिखरपुरुष" (यह स्वनामधन्य पदवी ही अपनी आप में इस क़दर हास्यास्पद लगती है मुझे) से मुझे न तो कुछ लेना है न उन्हें कुछ देना है. और मुझे इनमें से किसी से डर भी नहीं लगता. 

बस कुछ ज़रूरी मानवीय मुद्दे होते हैं जहां बगैर लाग-लपेट के और कई बार तो बिना सोचे समझे आपने जिस पक्ष में खड़ा हो जाना होता है, वहां खड़ा होना ही पड़ता है. 

और बातों के निर्माण में पारंगत हो चुके लोग अभी और बातें बनाएंगे, बहस को खेंचेंगे और बकौल वीरेन डंगवाल, मुर्दा गधे पर जम के लाठी चारज होगा.

फ़िलहाल अपने ब्लॉग की महत्वपूर्ण कबाड़न मनीषा पाण्डेय की फेसबुक वॉल से उसी की इजाज़त लेकर मैं यह पोस्ट लगाता इस मसले को यहीं समाप्त कर रहा हूँ. (बशर्ते कोई और कबाड़ी इस मामले में कुछ नई और ज़रूरी बात कहने की इच्छा रखता हो.) कबाड़खाना अपना काम जारी रखेगा - 

... पेप्पोर, रद्दी पेप्पोर ...


मैं तय करती हूं कि तुम मेरे सार्त्र बनने के लायक नहीं - मनीषा पाण्डेय    


वैसे इस सत्‍य से किसको इनकार है कि बहुसंख्‍यक हिंदुस्‍तानी मर्द निहायत सामंती, घटिया और मर्दवादी हैं. 

- कि हिंदी साहित्‍य आदि-इत्‍यादि की दुनिया में डॉमिनेशन भी मर्दों का है. 

- हिंदी की दुनिया में डॉमिनेट करने वाले और इस संसार की लगाम अपने हाथ में थामे मर्द इन व्‍हॉटएवर चांस यूरोप से नहीं आए हैं. सब उत्‍तर प्रदेश, बिहार आदि आदि हिंदी भाषी देशों-प्रदेशों के वासी हैं.

- हिंदी साहित्‍य की दुकान चलाने वाले भी विदाउट एक्सेप्शन मर्द नहीं महामर्द हैं. (कोट अनकोट)

- हिंदी की सारी पत्रिकाओं के संपादक मर्द हैं. 

- संस्‍थाओं, पुरस्‍कारों, अकादमियों आदि-आदि के सचिव, महासचिव, अतिमहासचिव सब मर्द हैं. 

- सबको खूबसूरत, मुस्‍कुराती, शरमाती, लजाती औरतें पसंद हैं.

- सब ऑफ़र करते हैं, आइए ना, कॉफी पीने चलेंगी, डिनर पर मिलते हैं, आपकी कहानी क्‍या तोप है. आपके भीतर अनूठी लेखकीय क्षमता है. आपमें सिमोन द बोवुआर होने के सारे गुण मौजूद हैं. और कौन है आपका सार्त्र, मैं ही तो हूं. आपका कामू है मेरा दोस्‍त. 

- सुना कभी आपने कि किसी औरत ने खींचकर तमाचा जड़ा हो किसी महानुभाव साहित्‍यकार को, जब वो उन्‍हें सिमोन द बोवुआर बनने का पाठ पढ़ा रहे थे. 

- किसी ने की हिम्‍मत कि चूल्‍हे में गया लेखन और भाड़ झोंकने गया कहानी का प्रकाशन. बुड्ढे की ऐसी की तैसी. अगर ये हिंदी की दुनिया वैसी ही है, जैसीकि ये है तो नहीं बनना मुझे राइटर. नहीं छपे मेरी कोई कहानी ताउम्र. भाड़ में जाओ सब के सब. 

- तुम कौन हो तय करने वाले कि मैं तुम्‍हारी सिमोन द बोवुआर हूं. मैं तय करती हूं कि तुम मेरे सार्त्र बनने के लायक नहीं.

इस भाषा में कब बोलना सीखेंगी लड़कियां. सीखें और विकल्‍प ढूंढें. अगर लिखना आता है तो कोई लिखने से रोक नहीं सकता. अगर लिखना ही जिंदगी है तो किसमें है दम कि तुम्‍हारी जिंदगी छीन ले तुमसे. 

लेकिन पहले इन सवालों का जवाब देना होगा. दुनिया को नहीं, किसी लेखक को नहीं, किसी मर्द को नहीं, अपने आपको. 

खुद को जवाब दो और मिलकर नई राह ढूंढो, लिखने की, छपने की, अपने पाठकों तक पहुंचने की और इस मिलकर जीने की.

4 comments:

तुषार राज रस्तोगी said...

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - जीवन हर पल बदल रहा है पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

arvind mishra said...

मनीषा का वक्तव्य एक गरिमायुक्त गंभीरता लिए हुए था जिसमें किसी व्यक्ति का नामोल्लेख नहीं था ..बल्कि उसका उद्येश्य आगाह करने का था सकारात्मक था -आपने कुछ नाम लेकर मनीषा के वक्तव्य को काफी हल्का कर दिया है -और आर अनुराधा को उधृत किया है जिन्होंने एक ख़ास मामले में साहित्यिक चोरी को प्रश्रय दिया और एक सरकारी प्रकाशन की साख को दांव पर रख डाला !
ऐसे ज्यादातर मामलों में गलतियां उभय पक्षों की होती हैं . एक पक्ष की ही खिंचाई और दूसरे का पक्ष पोषण एक ख़ास सोच के तहत ??

मुनीश ( munish ) said...

अब डेटा तो आपके पास होगा अशोक भाई लेकिन मैं देख रहा हूँ कि जिस चेतक गति से ये पोस्टें पढ़ी जा रही हैं उसे देख कर ये नहीं कहा जा सकता कि लोग अनभिज्ञ हैं या दही जमा है मुँह में उनके । लेकिन खैर...अगर ये मुद्दा आपने उठाया ही न होता तो खलता ज़रूर । इरफ़ान भी बदला नहीं है , जैसा मुझे लगा था, इसलिए भी संतोष हुआ बाक़ी तो दुनिया चल रही है , हम भी चल रहे हैं दो दिल मिल रहे हैं मग़र चुपके चुपके ये गाना तो है ही बैग्राउंड में बजता हुआ ।

मुनीश ( munish ) said...

कबाड़ पर आने के बाद मुद्दे को वो वैलिडिटी तो मिली है जिसका कि वो हक़दार था और लोग शर्माशर्मी उतरने शुरू हुए लगते हैं किन्तु आश्चर्य होता है इस मुद्दे पर महिला लेखकों की करुणाहीन या कहिए ठंडी तटस्थ सी प्रतिक्रियाएँ देखकर । ऐसा कुल जमा लब्बोलुबाव के हवाले से कहा ।