Sunday, November 10, 2013

बयालीस सालों में फाड़ा हुआ कागज़ है मेरी ज़िन्दगी


वह जानती है

- येहूदा आमीखाई

मैं जानता हूँ कि वह जानती है.
वे सोचते हैं कि वह नहीं जानती, जानती है वैसे
अलबत्ता.

इस खेल में फटता जाता है मेरा दिल
और रात में इसका खून सुनता है कराहों को
जैसे मेरे जीवन के बयालीस सालों के आरपार
फाड़ा जा रहा काग़ज़ रो रहा हो.

घर के अहाते में,
चौड़ी बेल के नीचे,
हिन्नोम की घाटी में,
एक बूढ़ी औरत ने एक बार मुझे बताया था:
“उसका सिर बर्फ़ की तरह सफ़ेद पड़ गया था
क्योंकि उसे भीतर से जलाया गया था!”
मैं भूल जाता हूँ वह क्या कह रही है
या किस से कह रही है –

बयालीस सालों में फाड़ा हुआ कागज़ है मेरी ज़िन्दगी.

3 comments:

Pramod Singh said...

ऐसे हंसते चेहरे के साथ कोई बयालीस वर्षों का फटा दिल निकाल लेता है?

सरिता भाटिया said...

नमस्कार !
आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [11.11.2013]
चर्चामंच 1426 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
सादर
सरिता भाटिया

मुनीश ( munish ) said...

हिन्नोम की घाटी में । लगता है जैसे मैं भी वहाँ गया होऊँ मैं कभी...