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Saturday, June 20, 2015

पर्याप्त मौसम नहीं होते आदमी के पास


आदमी के पास इतना समय नहीं होता
-येहूदा आमीखाई

आदमी के पास इतना समय नहीं होता
कि हरेक चीज़ के वास्ते समय हो सके
उसके पास पर्याप्त मौसम नहीं होते
कि हर उद्देश्य के लिए मौसम हो
धर्मोपदेशक ग़लत थे इस बारे में

आदमी को ज़रूरत होती है एक ही पल प्यार करने और नफ़रत करने की
एक ही आंख से हंसने और रोने की
एक ही हाथ से पत्थर फेंकने और उन्हें इकठ्ठा करने की
युद्ध में प्रेम और प्रेम में युद्ध करने की

और नफ़रत करने और माफ़ करने की, और याद रखने और भूल जाने की
व्यवस्थित करने और गड़बड़ा देने की, खाने और पचाने की -
जिसे करने में इतिहास को सालों-साल लग जाते हैं
समय नहीं होता आदमी के पास
जब वह खो देता है वह ढूंढता है
जब वह पा लेता है, भूल जाता है
जब वह भूलता है वह प्यार करता है
जब वह प्यार करता है वह भूलना शुरू करता है

और उस की आत्मा बहुत अनुभवी और पेशेवर है
केवल उसकी देह ही बनी रहती है शौकिया हमेशा
वह कोशिशें करता है,
हारता है
भटकता है
कुछ नहीं सीखता -
अपनी खुशियों और पीड़ाओं में
धुत्त और अंधा

वह शरद में मरेगा जैसे पत्तियां मरती हैं सिकुड़ी हुईं
और भरा होगा अपने आप से और मीठे से


मैदान पर पत्तियां सूख रही हैं
नंगी शाखें अभी से उस जगह की ओर इशारा कर रही हैं
जहां हर चीज़ के लिए समय है

Wednesday, October 8, 2014

बिल्लियों जैसी होती हैं भाषाएं; आपको चाहिये उन्हें ग़लत तरीके से न सहलाएं

इजराइल के महाकवि येहूदा आमीखाई की यह कविता मैं पहले भी कबाड़खाने पर लगा चुका हूँ पर कल इसे कहीं भेजते हुए और दुबारा पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसे यहाँ फिर से होना चाहिए. एक अड़ियल ज़िद की तरह.


मेरे समय की अस्थाई कविता

-येहूदा आमीखाई

हिब्रू और अरबी भाषाएं लिखी जाती हैं पूर्व से पश्चिम की तरफ़
लैटिन लिखी जाती है पश्चिम से पूर्व की तरफ़
बिल्लियों जैसी होती हैं भाषाएं
आपको चाहिये उन्हें ग़लत तरीके से न सहलाएं
बादल आते हैं समुद्र से
रेगिस्तान से गर्म हवा
पेड़ झुकते हैं हवा में
और चारों हवाओं से पत्थर उड़ते हैं
चारों हवाओं तलक. वे पत्थर फेंकते हैं 
इस धरती को फेंकते हैं एक दूसरे पर
लेकिन धरती वापस गिरती है धरती पर.
इसके पत्थर, इसकी मिट्टी -
आप इससे छुटकारा पा ही नहीं सकते.
वे मुझ पर पत्थर फेंकते हैं
पत्थर फेंकते हैं
सन १९३६ में १९३८ में १९४८ में १९८८ में
सेमाइट पत्थर फेंकते हैं सेमाइटों पर 
और एन्टी सेमाइट पत्थर फेंकते हैं
एन्टी सेमाइटों पर
दुष्ट पत्थर फेंकते हैं और उदारजन
पापी लोग पत्थर फेंकते हैं और फुसलाने वाले
भूगर्भवेत्ता पत्थर फेंकते हैं और दार्शनिकगण
गुर्दे और पित्ताशय पत्थर फेंकते हैं
सिरों के पत्थर
माथों के पत्थर और दिलों के पत्थर
पुरातत्ववेत्ता पत्थर फेंकते हैं और महाशैतान
चीखते मुंह के आकार के पत्थर
आपकी आंख की नाप के पत्थर
चश्मे की जोड़ी जैसे
बीता हुआ वक्त पत्थर फेंकता है भविष्य पर
और वे सारे के सारे गिरते हैं वर्तमान के ऊपर.
रोते हुए पत्थर और हंसते हुए कंकड़
यहां तक कि ईश्वर ने भी पत्थर फेंके थे बाइबिल के मुताबिक
यूरिम और तूमिम को भी फेंका गया था
और वे जा चिपके थे न्याय की तश्तरी पर
और हैरड ने फेंके थे
उसके बाद जो निकल कर सामने आया वह एक मन्दिर था

उफ़, पत्थरों की उदासी की कविता!
उफ़, पत्थरों पर फेंकी गई कविता!
उफ़, फेंके ग पत्थरों की कविता!
क्या इस धरती पर एक भी ऐसा पत्थर है 
जिसे कभी फेंका न गया हो
न बनाया गया हो न पलटा गया हो
जो कभी किसी दीवार पर से न चीखा हो
और जिसे किसी भवन निर्माता ने अस्वीकार न किया हो
जिसे कभी न धरा गया हो किसी कब्र के ऊपर 
जिसके ऊपर कभी न लेटे हों प्रेमीजन
और जिसे कभी किसी बुनियाद में तब्दील न किया गया हो

कृपा करके अब और पत्थर मत फेंको
तुम धरती को हटा रहे हो
इस पवित्र
सम्पूर्ण खुली धरती को
तुम उसे समुद्र में डाल रहे हो 
जबकि समुद्र उसे नहीं चाहता
समुद्र कहता है "ना मेरे भीतर नहीं"

मेहरबानी करके नन्हे पत्थर फेंको
सीपियों के जीवाश्म फेंको
कंकड़ फेंको
मिगदाल त्सादेक की खदानों से न्याय और अन्याय को फेंको
मुलायम पत्थर फेंको
मीठे ढेले फेंको
चूने के पत्थर फेंको
मिट्टी फेंको
समुद्रतट की रेत फेंको
लोहे की जंग फेंको
मिट्टी फेंको
हवा फेंको
कुछ मत फेंको
जब तक कि तुम्हारे हाथ थक न जाएं
और युद्ध भी थक जाए
और यह भी हो कि शान्ति थक जाए
और बनी रहे.  

Monday, November 11, 2013

एक घेरा बिना अन्त और बिना ईश्वर का


येहूदा आमीखाई की कुछ कविताओं के अनुवाद आप इन दिनों लगातार पढ़ रहे हैं. इस क्रम में में आज में उनकी एक कविता रीपोस्ट कर रहा हूँ.

बम का व्यास

- येहूदा आमीखाई


तीस सेन्टीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव पड़ता था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए, ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ़ एक और बड़ा घेरा है - दर्द और समय का
दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जिसे दफ़नाया गया शहर में
वह रहनेवाली थी सौ किलोमीटर से आगे कहीं की
वह बना देती है घेरे को और बड़ा
और वह अकेला शख़्स जो समुन्दर पार किसी 
देश के सुदूर किनारों पर
उसकी मृत्यु का शोक कर रहा था -
समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में

और अनाथ बच्चों के उस रुदन का तो मैं
ज़िक्र तक नहीं करूंगा
जो पहुंचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक 
और उससे भी आगे
और जो एक घेरा बनाता है बिना अन्त 
और बिना ईश्वर का.

एक गम्भीर कुत्ते ने देखा था आदमियों को हंसते


बहुत दिन हुए जब किसी ने पूछा था

-येहूदा आमीखाई

बहुत दिन हुए जब किसी ने पूछा था
कौन रहता था इन मकानों में, और कौन बोला था यहाँ आख़िरी बार; कौन
भूल गया था अपना ओवरकोट इन मकानों में
और कौन यहीं रह गया था. (क्यों नहीं गया वह यहाँ से?)
कोंपलों वाले पेड़ों के बीच एक मरा हुआ पेड़ खड़ा है,
मरा हुआ एक पेड़.
यह एक पुरानी गलती है, जिसे कभी समझा नहीं गया,
और मुल्क के एक छोर पर; किसी और के समय की
शुरुआत. एक नन्ही खामोशी.
और देह और नर्क का पागलपन.
और एक अंत का अंत जो फुसफुसाहटों में टहला करता है,
हवा गुजरी थी इस जगह से होकर
और एक गम्भीर कुत्ते ने देखा था आदमियों को हंसते.   

Sunday, November 10, 2013

बयालीस सालों में फाड़ा हुआ कागज़ है मेरी ज़िन्दगी


वह जानती है

- येहूदा आमीखाई

मैं जानता हूँ कि वह जानती है.
वे सोचते हैं कि वह नहीं जानती, जानती है वैसे
अलबत्ता.

इस खेल में फटता जाता है मेरा दिल
और रात में इसका खून सुनता है कराहों को
जैसे मेरे जीवन के बयालीस सालों के आरपार
फाड़ा जा रहा काग़ज़ रो रहा हो.

घर के अहाते में,
चौड़ी बेल के नीचे,
हिन्नोम की घाटी में,
एक बूढ़ी औरत ने एक बार मुझे बताया था:
“उसका सिर बर्फ़ की तरह सफ़ेद पड़ गया था
क्योंकि उसे भीतर से जलाया गया था!”
मैं भूल जाता हूँ वह क्या कह रही है
या किस से कह रही है –

बयालीस सालों में फाड़ा हुआ कागज़ है मेरी ज़िन्दगी.

Saturday, November 9, 2013

तुम उसे ढंकते हो स्वर्ग जैसे एक कम्बल से


चंद्रमा था मैं

-येहूदा आमीखाई

बहुत उदास है मेरा बच्चा.

जो भी उसे पढ़ाता हूँ मैं
प्रेम का भूगोल
दूरी की वजह से
न सुनी जा सकने वाली अजनबी आवाज़ें –
रात अपना नन्हा पलंग मेरी तरफ झुलाता है मेरा बच्चा
मैं कौन हूँ?
विस्मृति से अधिक.
भुला दी जाती है ख़ुद भाषा ही.
और जब तक वह समझेगा कि मैंने क्या किया
मैं हो चुका होऊंगा मृतकों जैसा.

क्या कर रहे हो तुम हमारे शांत बच्चे के साथ?
तुम उसे ढंकते हो स्वर्ग जैसे
एक कम्बल से, बादलों की परतों से –
मैं चन्द्रमा हो सकता था.

क्या कर रहे हो अपनी उदास उँगलियों से?
तुम उन्हें पहनाते हो दस्ताने
और बाहर चले जाते हो.


चंद्रमा था मैं.

Friday, November 8, 2013

मुझे याद आ रहा है एक गीत जो चला गया ...


नेत्र- परीक्षण

- येहूदा आमीखाई

थोड़ा पीछे जाओ. बाईं आँख बंद करो,
अभी भी?
थोड़ा और पीछे जाओ. दीवार आगे चली गयी है,
क्या दिख रहा है तुम्हें?
क्या पहचानने में आ रहा है धुंधलेपन में?
मुझे याद आ रहा है एक गीत जो चला गया ...
अब? अब क्या दिख रहा है तुम्हें?
अभी भी? – हर समय.
मुझे छोड़कर मत जाओ. प्लीज़. प्लीज़.
तुम नहीं जा रहे हो न?
नहीं जा रहा.
एक आँख बंद करो. जोर से बोलो.
सुनाई नहीं दे रहा – मैं अभी से जा चुका दूर,
क्या पहचानने में आ रहा है? अब क्या दिख रहा है तुम्हें?
एक उदास आँख बंद करो.
हां.
अब दूसरी उदास आँख बंद करो. हां.
देख सकता हूँ अब.

और कुछ नहीं,

Thursday, October 31, 2013

मुझे खोजना ही होगा प्रत्यक्षदर्शियों को


प्रत्यक्षदर्शियों को बुलाना

-येहूदा आमीखाई

कब रोया था मैं आख़िरी दफ़ा?
आ गया है प्रत्यक्षदर्शियों को बुलाने का समय.
जिन्होंने देखा था मुझे रोते हुए आख़िरी दफ़ा
कुछ मर चुके उनमें से.
ख़ूब सारे पानी से धोता हूँ आँखें
ताकि एक बार और देख सकूं संसार को
गीलेपन और दर्द के पीछे से.
मुझे खोजना ही होगा प्रत्यक्षदर्शियों को,
कुछ अरसा पहले मैंने पहली दफ़ा महसूस किया
अपने दिल में खुभी हुई सुईयों को.
मैं भयभीत नहीं हूँ
मैं करीब करीब घमंड से भरा हुआ हूँ, एक लड़के की तरह
जो पाता है पहले बाल अपनी काँखों पर
अपनी टांगों के बीच.

Wednesday, October 30, 2013

पर्याप्त समय नहीं रहा मेरे पास कभी


एक दफ़ा मेरी माँ ने मुझे कहा था

-येहूदा आमीखाई

एक दफ़ा मेरी माँ ने मुझे कहा था
फूलों के साथ न सोया करूँ कमरे में
तब से मैं कभी नहीं सोया फूलों के साथ
अकेला सोता हूँ, उनके बगैर.

बेशुमार थे फूल
मगर पर्याप्त समय नहीं रहा मेरे पास कभी.
और जिन लोगों को मैं प्यार करता था
वे अभी से धकेल रहे ख़ुद को मेरे जीवन से दूर, जैसे नावें
अपने किनारों से दूर जातीं.
   
माँ ने कहा था
फूलों के साथ न सोया करूँ.
नींद नहीं आएगी.
नींद नहीं आएगी, मेरे बचपन वाली अम्मा.

वह जंगला जिसे मैं थाम लेता था
जब घसीटा जाता था मुझे स्कूल ले जाने को
कब का जल चुका.
लेकिन मेरे हाथ, थामे हुए
अब भी

थामे हुए उसी को.

Tuesday, August 18, 2009

आदमी को रहना होता है अपने जीवन के भीतर

येहूदा आमीखाई की यह कविता मेरी इज़राइली दोस्त दानीएला गीतातूश ने येरूशलम से आज ही भेजी है हिब्रू से अंग्रेज़ी में अनूदित कर के. और इत्तेफ़ाक यह है कि आज ही मैंने आमीखाई की प्रेम कविताओं पर यहां एक पोस्ट लगाई है. दानीएला से मेरी मुलाकात पिछले साल फ़ोर्ट कोचीन की पुरानी येहूदी बसासत मट्टनचेरी में हुई थी. येहूदा आमीखाई का जीवन और उसकी कविता ही हमारी बातचीत और उसके बाद की दोस्ती का आधार बने थे. दानीएला के मुताबिक यह कविता आमीखाई के जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हुई थी.



एक आदमी अपने जीवन में

पहला मन्दिर तोड़ा जाता है
और दूसरा मन्दिर तोड़ा जाता है
लेकिन आदमी को रहना होता है
अपने जीवन के भीतर.

यह ठीकठीक वैसा नहीं है
जैसा मुल्कों के साथ हुआ
जो यहां से चले गए उस जगह
निर्वासन में.

यह ठीकठीक वैसा नहीं है
जैसा हुआ पिता परमेश्वर के साथ
जो आराम से चढ़ गए
और भी महान ऊंचाइयों तलक.

एक आदमी अपने जीवन में
पुनर्जीवित करता है
अपने मृतकों को अपने पहले स्वप्न में
और दफ़नाता है उन्हें दूसरे एक आदमी अपने जीवन में

पहला मन्दिर तोड़ा जाता है
और दूसरा मन्दिर तोड़ा जाता है
लेकिन आदमी को रहना होता है
अपने जीवन के भीतर.

यह ठीकठीक वैसा नहीं है
जैसा मुल्कों के साथ हुआ
जो यहां से चले गए उस जगह
निर्वासन में.

यह ठीकठीक वैसा नहीं है
जैसा हुआ पिता परमेश्वर के साथ
जो आराम से चढ़ गए
और भी महान ऊंचाइयों तलक.

एक आदमी अपने जीवन में
पुनर्जीवित करता है
अपने मृतकों को अपने पहले स्वप्न में
और दफ़नाता है उन्हें दूसरे में.

(फ़ोटो: इज़राइल के एक ध्वस्त सिनागॉग के पत्थर)

गोल उम्मीदों का चांद लुढ़क रहा है बादलों के बीच



येहूदा आमीखाई का नाम कबाड़ख़ाने के पाठकों के लिए अपरिचित नहीं है. उनकी कई कविताएं यहां पहले भी प्रस्तुत की जा चुकी हैं. युद्ध और विस्थापन और इन से जुड़ी त्रासदियां येहूदा की कविता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. पाठक 'बम का व्यास' शीर्षक कविता को अभी शायद न भूले हों और 'मेरे समय की अस्थाई कविता' को भी.

आमीखाई की प्रेम कविताएं अपनी ताज़गी और एक ठोस इरोटिसिज़्म की वजह से चमत्कृत करने से ज़्यादा हैरान करती हैं. प्रेम के बारे में बात करते हुए वे एक कविता में पहले भी साफ़ कर चुके हैं कि:

मेरे प्रेम भी नापे जाते हैं युद्धों से
मैं कह रहा हूं यह गुज़रा दूसरे विश्वयुद्ध के बाद
हम मिले थे छह दिनी युद्ध के एक दिन पहले
मैं कभी नहीं कहूंगा '४५-'४८ की शान्ति के पहले
या '५६-'५७ की शान्ति के दौरान


आज इसी मूड की कुछ कविताएं पढ़िये मेरे प्रियतम कवियों में शुमार येहूदा आमीखाई की :


एक स्त्री के लिए कविताएं

.

तुम्हारा शरीर है सफ़ेद रेत
जिसके ऊपर बच्चे कभी नहीं खेले हैं
तुम्हारी आंखें दुःखभरी और सुन्दर हैं
जैसे स्कूली किताबों में फूलों के चित्र होते हैं

तुम्हारे बाल झूलते हैं
केन की वेदी के धुंए की तरह

मुझे अपने भाई की हत्या करनी है
मेरे भाई ने करनी है मेरी हत्या

२.

हम दोनों के साथ घटी बाइबिल की सारी गाथाएं
और चमत्कार
जब हम साथ थे

ईश्वर की शान्त ढलान पर
हम कुछ देर कर सके आराम

गर्भ ही हवा चली हमारे लिए हर जगह
हमारे पास समय था

३.

घुमक्कड़ों के घुमक्कड़पन जैसा दुखी है मेरा मन
मेरी आशाएं विधवा हैं
मेरे अवसरों का कभी विवाह नहीं होगा

हमारा प्यार एक अनाथालय में
पहने हुए है अनाथ बच्चों की पोशाकें

दीवार से टकरा कर रबर की गेंद
वापस आती है हाथों में

सूरज वापस नहीं आता
हम दोनों एक छलावा हैं

४.

सारी रात तुम्हारे ख़ाली जूते
तुम्हारे बिस्तर के बग़ल में चीख़ते रहे

तुम्हारा दायां हाथ तुम्हारे ख़्वाब से नीचे झूलता रहा
तुम्हारे बाल हवा की फटी हुई किताब में से
रात को पढ़ रहे थे

हिलते हुए परदे
विदेशी महाशक्तियों के राजदूत

५.

अगर तुम अपना कोट उतारोगी
तो मुझे दूना करना होगा अपना प्यार

अग्र तुम गोल, सफ़ेद हैट पहनोगी
मुझे उन्नत करना होगा अपना रक्त

जहां तुम प्यार करती हो
उस कमरे से सारा फ़र्नीचर हटाना होगा

सारे पेड, सारे पहाड़, सारे महासागर ...
बहुत संकरी है दुनिया

६.

ज़ंजीर से बंधा चांद
निश्शब्द रहता है बाहर

जैतून की शाखाओं में उलझा चांद
ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाता

गोल उम्मीदों का चांद
लुढ़क रहा है बादलों के बीच

७.

जब तुम मुस्कराती हो
गंभीर विचार थक जाते हैं
रात भर तुम्हारी बग़ल में मूक खड़े रहते हैं पहाड़
रेत जाति है सुबह तुम्हारे साथ-साथ समुद्र-तट तक

जब तुम भली होती हो मेरे साथ
दुनिया के सारे भारी उद्योग ठप्प पड़ जाते हैं.

८.

घाटियां हैं पहाड़ों के पास
और मेरे पास विचार

वे फैलते जाते हैं वहां तक
जहां कोहरा है और कोई रास्ता नहीं

बन्दरगाह पर पीछे मस्तूल खड़े थे
मेरे पीछे ईश्वर की शुरुआत होती है
रस्सियों और सीढ़ियों के साथ
टोकरों और क्रेनों के साथ
चिरंतनता और अनंत के साथ

वसंत ने ढूंढा हमें
चारों ओर के पत्थर पहाड़ के बाटों जैसे हैं
जिनसे तौला जाता है हमारा प्रेम

तीखी घास सुबकी
उस अन्धेरे स्थान में जहां हम छिपा करते हैं
वसंत ने ढूंढा हमें.

(येहूदा की प्रेम कविताओं पर कबाड़ख़ाने में यह पोस्ट भी देखिए: प्रेम की स्मृतियां)