Sunday, November 3, 2013

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी


रेशमा जी की आज लाहौर में मृत्यु हो गई. उनके नाम के आगे ‘मृत्यु’ शब्द लगाना बहुत खटक रहा है. लम्बा अरसा नहीं बीता, उस्ताद खानसाहेब मेहदी हसन के जाने पर जैसा खोखल सीने में पैदा हुआ था, आज भी उस से कम कुछ नहीं घटा है.

फ़िलहाल उन्हें सुनते हैं. इब्न-ए-इंशा साहेब की ग़ज़ल-



 देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां
हम से है तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियां

अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तेरा उसूल मियां
हम क्यों छोड़ें इन गलियों के फेरों का मामूल मियां

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है,
 जग में हुए हो रुसवा भी
इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें,
 बाक़ी बात फ़िज़ूल मियां

अब तो हमें मंज़ूर है ये भी,
 शहर से निकलें रुसवा हों
तुझ को देखा,
 बातें कर लीं, मेहनत हुई वसूल मियां

(दश्त-ए-तलब:
 इच्छा का जंगलमामूल: दिनचर्यानाका: चुंगीमहसूल: चुंगी पर वसूला जाने वाला टैक्स)


1 comment:

Kuldeep Thakur said...

आप को पावन पर्व दिवाली की ढेरों शुभकामनाएं...
आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 04/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
सूचनार्थ।



धरा मानव से कह रही है...
दोनों ओर प्रेम पलता है...