Wednesday, April 30, 2014

वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था - हबीब जालिब और उनकी शायरी – अंतिम


अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ साथ अपने देश में अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए जनरल ज़िया ने १९८४ में एक जनमत संग्रह कराने का फैसला किया. इस संग्रह में ज़िया को ९५% वोट मिले अलबत्ता कुल वोटरों में से सिर्फ १०% ने मताधिकार का प्रयोग किया. दुनिया भर के दबाव के कारण जनरल ज़िया को १९८५ में चुनाव कराने पड़े. नामित सलाहकारों की नीति से वापस लौटते हुए अलबत्ता नए प्रधान मंत्री को सत्ता सौंपने से पहले संसद को इस बात को मानने पर पर राजी कर लिया कि उनके सारे पिछले कार्य में सत्तापलट भी शामिल था, संवैधानिक थे. जनरल ज़िया किंगमेकर राष्ट्रपति के रूप में अपनी स्थिति में खासे मज़बूत आने लगे थे जब १९८८ में एक हवाई जहाज़ दुर्घटना में उनकी मौत हो गयी.
१९८४ के जनमत संग्रह को लेकर हबीब जालिब ने ज़िया उल हक़ का मज़ाक उड़ाते हुए अपनी मशहूर नज़्म ‘रेफरेंडम’ लिखी. सुनिए उन्हीं की आवाज़ में –



पाकिस्तान में लोकतंत्र दोबारा स्थापित हुआ. जालिब साहब जेल से रिहा हुए. भुट्टो की बेटी बेनजीर प्रधानमंत्री चुनी गईं. जालिब ने इस परिघटना का स्वागत किया और बेनजीर को अपना सहयोग देने की घोषणा की. यह अलग बात है कि बेनजीर ने अमेरिका से नजदीकियां बढ़ाईं और अपने पिता की नीतियों को दरकिनार कर दिया. इस बात को लेकर जालिब बेनजीर के विरोधी हो गए. उनका स्वास्थ्य भी ढलान पर था. जेल में बिठाये गए मुश्किल दिनों ने उनपर अपन असर दिखाना शुरू कर दिया था.
१२ मई, १९९३ को जालिब का इंतकाल हुआ.  सरकार ने उनके अंतिम संस्कार का खर्चा उठाने की पेशकश की. परिवार वालों ने साफ़ मना कर दिया. १९९६ और उसके बाद २००९ में जालिब को मरणोपरांत सम्मानित करना चाहा पर उनके परिवार वालों ने इस सहायता को लेने से भी मना कर दिया.  यह उसकी कविता की ताकत थी क़ि उसके कवि मित्र क़तील शिफ़ाई ने इस हिरावल शायर को इस तरह याद किया-

हो सकता है जालिब की कविता को विशुद्धतावादी उनके समकालीनों से एक पायदान पीछे आंकते रहें पर अवाम के इस शायर को जितनी शिद्दत से दुनिया भर में उनके चाहने वाले याद करते हैं और याद करते रहेंगे, वह उनके समकालीनों के लिए सदियों तक रश्क का बाइस रहेगा.

उनके प्रिय मित्र और शायर क़तील शिफाई ने उन्हें यूं अपनी श्रद्धांजलि दी- 

अपने सारे दर्द भुलाकर औरों के दुःख सहता था
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था
आखिरकार चला ही गया वो रूठ के हम फरजानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था

2 comments:

Pankaj Kumar said...

bahut hi rochak safar raha!! shukriya sajha karne ke liye.

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत खूब ।