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Wednesday, February 24, 2016

कलम से फ़क़त नाड़ा डालते पत्रकारों का युग

इजारबंद का मतलब होता है नाड़ा और सहाफ़ी माने पत्रकार. बाकी आप खुद समझदार हैं.


अब कलम से इजारबंद ही डाल
(हबीब जालिब की नज़्म 'सहाफ़ी से')

कौम की बेहतरी का छोड़ ख़्याल
फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल
तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल
बेजमीरी का और क्या हो मआल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

तंग कर दे गरीब पे ये ज़मीन
ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे ज़बीं
ऐब का दौर है हुनर का नहीं
आज हुस्न-ए-कमाल को है जवाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

क्यों यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात बात चले
क्यों सितम की सियाह रात ढले
सब बराबर हैं आसमान के तले
सबको रज़ाअत पसंद कह के टाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

नाम से पेश्तर लगाके अमीर
हर मुसलमान को बना के फकीर
कस्र-ओ-दीवान हो कयाम कयाम पजीर
और खुत्बों में दे उमर की मिसाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

आमीयत की हम नवाई में
तेरा हम्सर नहीं खुदाई में
बादशाहों की रहनुमाई में
रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

लाख होंठों पे दम हमारा हो
और दिल सुबह का सितारा हो
सामने मौत का नज़ारा हो
लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

Tuesday, October 28, 2014

मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामज़ादे क़िस्म के दलाल हैं - धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों के लिए कुछ मिनट का मौन

भड़ास फ़ॉर मीडिया चलाने वाले यशवंत सिंह की फेसबुक वॉल से साभार यह ज़रूरी पोस्ट एक सामान्य वक्तव्य नहीं, आने वाले अंधेरों की टोह लेने और सचेत नागरिकों को कुछ आवश्यक तथ्यों से अवगत कराने का एक ईमानदार प्रयास है. यशवंत को सलाम!
दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों के लिए कुछ मिनट का मौन
मैं आज के दिन को मीडिया के लिहाज से शर्मनाक दिन कहूंगा. पत्रकारिता के छात्रों को कभी पढ़ाया जाएगा कि २५ अक्टूबर २०१४ के दिन एक बार फिर भारतीय राजनीति के आगे पत्रकारिता चरणों में लोट गई. धनिकों की सत्ता भारी पड़ गई जनता की आवाज पर. कभी इंदिरा ने भय और आतंक के बल पर मीडिया को रेंगने को मजबूर कर दिया था. आज मोदी ने अपनी 'रणनीति' के दम पर मीडिया को छिछोरा साबित कर दिया. दिवाली मिलन के बहाने मीडिया के मालिकों, संपादकों और रिपोर्टरों के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देश, विदेश, समाज और नीतियों पर कोई बातचीत नहीं हुई. सिर्फ मोदी बोले. कलम को झाड़ू में तब्दील हो जाने की बात कही. और, फिर सबसे मिलने लगे. जिन मसलों, मुद्दों, नारों, आश्वासनों, बातों, घोषणापत्रों, दावों के नाम पर सत्ता में आए उसमें से किसी एक पर भी कोई बात नहीं की.
सुधीर चौधरी सेल्फी बनाने लगे. दीपक चौरसिया हालचाल बतियाने लगे. रिपोर्टरों में तो जैसे होड़ मच गई सेल्फी बनाने और फोटो खिंचाने की. इस पूरी कवायद के दौरान कोई पत्रकार ऐसा नहीं निकला जिसने मोदी से जनता का पत्रकार बनकर जनहित-देशहित के मुद्दों पर सवाल कर सके. सब गदगद थे. सब पीएम के बगल में होने की तस्वीर के लिए मचल रहे थे. जिनकी सेल्फी बन गई, उन्होंने शायद पत्रकारिता का आठवां द्वार भेद लिया था. जिनकी नहीं बन पाई, वो थोड़े फ्रस्ट्रेट से दिखे. जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, एक बार भी पूरी मीडिया के सामने नहीं आए और न ही सवाल जवाब का दौर किया. शायद इससे पोल खुलने, ब्रांडिंग खराब होने का डर था. इसीलिए नया तरीका निकाला गया. ओबलाइज करने का. पीएम के साथ फोटो खिंचाने भर से ओबलाइज हो जाने वाली भारतीय मीडिया और भारतीय पत्रकार शायद यह आज न सोच पाएं कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर डाला लेकिन उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा.
जी न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने पीएम के साथ सेल्फी बनाई. इंडिया न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया का प्रधानमंत्री ने हालचाल पूछा. महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली से कराह रही देश की जनता का हालचाल यहां से गायब था. दिवाली की पूर्व संध्या पर सुसाइड करने वाले विदर्भ के छह किसानों की भयानक 'सेल्फी' किसी के सामने नहीं थी. सबके सब प्रधानमंत्री से मिलने मात्र से ही मुस्करा-इतरा रहे थे, खुद को धन्य समझ रहे थे.
रजत शर्माओं और संजय गुप्ताओं जैसे मीडिया मालिकों के लिए पत्रकारिता पहले से ही मोदी परस्ती रही है, आज भी है, कल भी रहेगी. इनके यहां काम करने वालों से हम उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वो कोई सवाल करेंगे. खासकर तब जब ये और इन जैसे मीडिया मालिक खुद उपस्थित रहे हों आयोजन में. सुभाष चंद्राओं ने तो पहले ही भाजपा का दामन थाम रखा है और अपने चैनल को मोदी मय बनाकर पार्टी परस्त राष्ट्रीय पत्रकारिता का नया माडल पेश किया है. अंबानियों के आईबीएन7 और ईटीवी जैसे न्यूज चैनलों के संपादकों से सत्ता से इतर की पत्रकारिता की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते हैं. कुल मिलाकर पहले से ही कारपोरेट, सत्ता, पावर ब्रोकरों और राजनेताओं की गोद में जा बैठी बड़ी पूंजी की पत्रकारिता ने आज के दिन पूरी तरह से खुद को नंगा करके दिखा दिया कि पत्रकारिता मतलब सालाना टर्नओवर को बढ़ाना है और इसके लिए बेहद जरूरी है कि सत्ता और सिस्टम को पटाना है. होड़ इस बात में थी कि मोदी ने किसको कितना वक्त दिया. मोदी ने कहा कि हम आगे भी इसी तरह मिलते जुलते रहेंगे. तस्वीर साफ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कभी कोई कड़ा बड़ा सवाल नहीं पूछा जा सकेगा. वो जो तय करेंगे, वही हर जगह दिखेगा, हर जगह छपेगा. वो जो इवेंट प्लान करेंगे, वही देश का मेगा इवेंट होगा, बाकी कुछ नहीं.
ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरियों और फिक्सर पत्रकार दीपक चौरसियाओं से हमें आपको पहले भी उम्मीद न थी कि ये जन हित के लिए पत्रकारिता करेंगे. दुखद ये है कि पत्रकारिता की पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने इन्हीं निगेटिव ट्रेंड्स को अपना सुपर आदर्श मान लिया है और ऐसा करने बनने की ओर तेजी से अग्रसर हैं. यह खतरनाक ट्रेंड बता रहा है कि अब मीडिया में भी दो तरह की मीडिया है. एक दलाल उर्फ पेड उर्फ कार्पोरेट उर्फ करप्ट मीडिया और दूसरा गरीब उर्फ जनता का मीडिया. ये जनता का मीडिया ही न्यू मीडिया और असली मीडिया है. जैसे सिनेमा के बड़े परदे के जरिए आप देश से महंगाई भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते, उसी तरह टीवी के छोटे परदे के जरिए अब आप किसी बदलाव या खुलासे या जन पत्रकारिता का स्वाद नहीं चख सकते. दैत्याकार अखबारों जो देश के सैकड़ों जगहों से एक साथ छपते हैं, उनसे भी आप पूंजी परस्ती से इतर किसी रीयल जर्नलिज्म की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इनके बड़े हित बड़े नेताओं और बड़े सत्ताधारियों से बंधे-बिंधे हैं. दैनिक जागरण वाले अपने मालिकों को राज्यसभा में भेजने के लिए अखबार गिरवी रख देते हैं तो दैनिक भास्कर वाले कोल ब्लाक व पावर प्रोजेक्ट पाने के लिए सत्ताओं से डील कर अखबार उनके हवाले कर देते हैं.
ऐसे खतरनाक और मुश्किल दौर में न्यू मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. न्यू वेब में वेब मीडिया शामिल है. सोशल मीडिया समाहित है. न्यूज पोर्टल और ब्लाग भी हैं. मोबाइल भी इसी का हिस्सा है. इन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी. कार्पोरेट मीडिया, जिसका दूसरा नाम अब करप्ट मीडिया या पेड मीडिया हो गया है, इसको एक्सपोज करते रहना होगा. साथ ही, देश के सामने खड़े असल मुद्दों पर जनता की तरफ से बोलना लिखना पड़ेगा. अब पत्रकारिता को तथाकथित महान पत्रकारों-संपादकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. ये सब बिक चुके हैं. ये सब चारण हो गए हैं. ये सब कंपनी की लायजनिंग फिट रखने और बिजनेस बढ़ाने के प्रतिनिधि हो गए हैं. इतिहास बताता है कि इंदिरा ने मीडिया से झुकने को कहा था तो मीडिया वाले रेंगेने लगे थे. अब कहा जाएगा कि मोदी ने मीडिया को मिलन के बहाने संवाद के लिए कहा तो मीडिया वाले सेल्फी बनाने में जुट गए.
फेसबुक पर वरिष्ठ और युवा कई जनपक्षधर पत्रकार साथियों ने मीडिया की इस घिनौनी और चीप हरकत का तीखा विरोध किया है. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी  लिखते हैं : ''जियो मेरे पत्रकार शेरो! क्या इज्जत कमाई है, क्या सेल्फियाँ चटकाई हैं!''
कई मीडिया हाउसों में काम कर चुके आध्यात्मिक पत्रकार मुकेश यादव लिखते हैं: ''सवाल पूछने की बजाय पीएम साब के साथ सेल्फी लेने के लिए पत्रकारों, संपादकों में होड़ मची है! शर्मनाक! धिक्कार! निराशा हुई! सवाल के लिए किसकी आज्ञा चाहिए जनाब?''
सोशल एक्टिविस्ट और युवा पत्रकार मोहम्मद अनास कहते हैं: ''लोकतंत्र में संवाद कभी एक तरफा नहीं होता। एक ही आदमी बोले बाकि सब सुने। साफ दिख गया लोकशाही का तानाशाही में कन्वर्जन। मनमोहन ने एक बार संपादकों को बुलाया था, सवाल जवाब हुए थे। कुछ चटुकारों और दलालों ने पत्रकारिता को भक्तिकाल की कविता बना डाला है। वरना करप्टों, झूठों और जनविरोधियों के लिए पत्रकार आज भी खौफ़ का दूसरा नाम है।''
कई अखबारों में काम कर चुके जोशीले पत्रकार राहुल पाण्डेय सोशल मीडिया पर लिखते हैं :
''आज पत्रकारों के सेल्‍फी समारोह के बाद पि‍छले साल का कहा मौजूं है .. आप भी गौर फरमाएं
पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।
करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं''
वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार विनोद शर्मा लिखते हैं : ''Facebook flooded with selfies of media persons with our PM. A day to rejoice? Or reflect?''
कई अखबारों में काम कर चुके पत्रकार आशीष महर्षि लिखते हैं : ''हे मेरे देश के महान न्‍यूज चैनलों और उसके कथित संपादकों, प्रधानमंत्री ने आपको झुकने के लिए कहा तो आप रेंगने लगे। क्‍या देश में मोदी के अलावा कोई न्‍यूज नहीं है। ये पब्‍लिक है, सब जानती है ... हमें पता है कि मोदी की न्‍यूज के बदले आपको क्‍या मिला है ...''
वरिष्ठ पत्रकार अरुण खरे लिखते हैं : ''मीडिया ने कलम को झाड़ू में बदल दिया –मोदी. मोदी जी आपने इस सच से इतनी जल्दी परदा क्यों उठा दिया. कुछ दिन तो मुगालते में रहने देते देश को.''
फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार धर्मेन्द्र गुप्ता लिखते हैं : ''जिस तरह से मीडिया के चम्पादक आज मोदी के साथ सेल्फी खिंचवा कर के उस को ब्रेकिंग न्यूज बना रहे है उस से लगता है की अब लड़ाई भ्रष्ट राजनीतिको के साथ भ्रस्ट मीडिया के खिलाफ भी लड़नी होगी.''
फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार धनञ्जय सिंह बताते हैं एक किस्सा : ''एस.सहाय जी स्टेट्समैन के संपादक हुआ करते थे,उनके पास इंदिरा जी के यहाँ से कोई आया सूट का कपड़ा लेकर की खास आपके लिए प्रधानमंत्री ने भेजा है,साथ में टेलर का पता भी था. उन्होंने धन्यवाद के साथ उसे लौटा दिया. कुछ समय बाद प्रधानमंत्री ने बंगले पर संपादकों को डिनर दिया. सहाय जी के अलावा बाकी सभी क्रांतिकारी संपादक एक जैसे सूट में थे ... सब एक दूसरे की तरफ फटी आँखों से देखने लगे ... इंदिरा जी का अलग ही स्टाइल था ... समय बदला है अब तो खुद ही सब दंडवत हुए जा रहे हैं ... हाँ सहाय जी के घर रघु राय की उतारी एक तस्वीर दिखती थी की संसद की सीढ़ियों के पास एक भिखारी कटोरा लेकर खड़ा है (शायद तब सिक्योरिटी इतनी नहीं रही होगी) ... सहाय जी के पास अंतिम समय में खटारा फिएट थी और वो अपने बच्चों के लिए भी 'कुछ भी' छोड़ कर नहीं गए.''
संपादक और साहित्यकार गिरीश पंकज इन हालात पर एक कविता कुछ यूं लिखते हैं :

'' पत्रकारिता का सेल्फ़ीकरण
-----------
कई बार सोचता हूँ
बिलकुल सही समय पर
मर गए पत्रकारिता के पुरोधा,
नहीं रहे तिलक और गांधी,
नहीं रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर
गणेश शंकर विद्यार्थी भी
हो गए शहीद
राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी
का भी हो गया अवसान।
आज ये ज़िंदा होते तो
खुद पर ही शर्मिन्दा होते
पत्रकारिता की झुकी कमर
और लिजलिजी काया देख कर
शोक मनाते
शायद जीते जी मर जाते
सुना है कि दिल्ली में
'सेल्फिश' पत्रकारिता अब
'सेल्फ़ी ' तक आ गयी है
हमारी खुदगर्ज़ी
हमको ही खा गयी है''
जो भक्त लोग हैं, उन्हें मोदी की हर स्टाइल पसंद है. वे मोदी की कभी बुराई नहीं करते और मीडिया की कभी तारीफ नहीं करते. इन्हें ऐसी ही चारण मीडिया चाहिए, जिसे गरिया सकें, दुत्कार सकें और लालच का टुकड़ा फेंक कर अपने अनुकूल बना सकें. सवाल उन लोगों का है जो आम जन के प्रतिनिधि के बतौर मीडिया में आए हैं. जिन्होंने पत्रकारिता के नियम-कानून पढ़े हैं और मीडिया की गरिमा को पूरे जीवन ध्यान में रखकर पत्रकारिता की. क्या ये लोग इस हालात पर बोलेंगे या मीडिया बाजार के खरबों के मार्केट में अपना निजी शेयर तलाशने के वास्ते रणनीतिक चुप्पी साधे रहेंगे. दोस्तों, जब-जब सत्ता सिस्टम के लालचों या भयों के कारण मीडिया मौन हुई या पथ से विचलित हुई, तब तब देश में हाहाकार मचा और जनता बेहाल हुई. आज फिर वही दौर दिख रहा है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सब वह कहें, वह बोलें जो अपनी आत्मा कहती है. अन्यथा रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं क्योंकि पैसा तो दोनों से ही मिलता है और दोनों ही धंधा है. असल बात विचार, सरोकार, तेवर, नजरिया, आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान है. जिस दिन आपने खुद को बाजार और पूंजी के हवाले कर दिया, उस दिन आत्मा तो मर ही गई. फिर आप खुद की लाश ढोकर भले इनसे उनसे मिलते रहें, यहां वहां टहलते रहें, पर कहा यही जाएगा कि ''मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामजादे किस्म के दलाल हैं, पत्रकारिता में तो आप सिर्फ इसलिए हैं ताकि आप अपनी हरमजदई और दलाली को धार दे सकें''.
शायद मैं कुछ ज्यादा भावुक और आवेश में हो रहा हूं. लेकिन यह भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को पत्रकारिता में ले आई. ये भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को कारपोरेट और करप्ट मीडिया में देर तक टिका नहीं पाई. यह भावुकता और आवेश ही
तो भड़ास फ़ॉर मीडिया  जैसा बेबाक पोर्टल शुरू करने को मजबूर कर गया और इस न्यू मीडिया के मंच के जरिए सच को पूरे ताकत और पूरे जोर के साथ सच कहने को बाध्य करता रहा जिसके नतीजतन अपन को और अपन जैसों को जेल थाना पुलिस कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाने पड़े और अब भी यह सब क्रम जारी है. शरीर एक बार ही ठंढा होता है. जब सांसें थम जाती हैं. उसके पहले अगर न भावुकता है और न ही आवेश तो समझो जीते जी शरीर ठंढा हो गया और मर गए. मुझे याद आ रहे हैं पत्रकार जरनैल सिंह. सिख हत्याकांड को लेकर सवाल-जवाब के क्रम में जब तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने लीपापोती भरा बयान दिया तो तुरंत जूता उछाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. जरनैल सिंह अब किसी दैनिक जागरण जैसे धंधेबाज अखबार के मोहताज नहीं हैं. उनकी अपनी एक शख्सियत है. उन्होंने किताब लिखी, चुनाव लड़े, दुनिया भर में घूमे और सम्मान पाया. मतलब साफ है कि जब हम अपने दिल की बात सुनते हैं और उसके हिसाब से करते हैं तो भले तात्कालिक हालात मुश्किल नजर आए, पर आगे आपकी अपनी एक दुनिया, अपना व्यक्तित्व और अपनी विचारधारा होती है.
करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकार की लंबाई चौड़ाई सिर्फ टीवी स्क्रीन तक पर ही दिखती है. उसके बाहर वह लोगों के दिलों में बौना है. लोगों के दिलों से गायब है. उनका कोई नामलेवा नहीं है. अरबों खरबों कमा चुके पत्रकारों से हम पत्रकारिता की उम्मीद नहीं कर सकते और यह नाउम्मीदी आज पूरी तरह दिखी मोदी के मीडिया से दिवाली मिलन समारोह में. बड़ी पूंजी वाली करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के बैनर तले कलम-मुंह चला रहे पत्रकारों से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपनी लंबी-चौड़ी सेलरी को त्यागने का मोह खत्म कर सके. इसी कारण इनकी 'सेल्फी पत्रकारिता' आज दिखी मोदी के मीडिया मिलन समारोह में.
आज राजनीति जीत गई और मीडिया हार गया. आज पीआर एजेंसीज का दिमाग सफल रहा और पत्रकारिता के धुरंधर बौने नजर आए. आइए, मीडिया के आज के काले दिन पर हम सब शोक मनाएं और कुछ मिनट का मौन रखकर दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों की मर चुकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे दें.
(इस पोस्ट के उपसंहार के तौर पर महान शायर हबीब जालिब की एक नज़्म यहाँ लगाने का लालच आ रहा है, जिसे कबाड़ख़ाने पर एकाधिक बार पोस्ट किया जा चुका है :
अब कलम से इजारबंद ही डाल 

कौम की बेहतरी का छोड़ ख़्याल
फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल
तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल
बेजमीरी का और क्या हो मआल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

तंग कर दे गरीब पे ये ज़मीन
ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे ज़बीं
ऐब का दौर है हुनर का नहीं
आज हुस्न-ए-कमाल को है जवाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

क्यों यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात बात चले
क्यों सितम की सियाह रात ढले
सब बराबर हैं आसमान के तले
सबको रज़ाअत पसंद कह के टाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

नाम से पेश्तर लगाके अमीर
हर मुसलमान को बना के फकीर
कस्र-ओ-दीवान हो कयाम कयाम पजीर
और खुत्बों में दे उमर की मिसाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

आमीयत की हम नवाई में
तेरा हम्सर नहीं खुदाई में
बादशाहों की रहनुमाई में
रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

लाख होंठों पे दम हमारा हो
और दिल सुबह का सितारा हो
सामने मौत का नज़ारा हो
लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल

अब कलम से इजारबंद ही डाल

*सहाफ़ी : पत्रकार, इजारबंद: नाड़ा )

Wednesday, April 30, 2014

वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था - हबीब जालिब और उनकी शायरी – अंतिम


अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ साथ अपने देश में अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए जनरल ज़िया ने १९८४ में एक जनमत संग्रह कराने का फैसला किया. इस संग्रह में ज़िया को ९५% वोट मिले अलबत्ता कुल वोटरों में से सिर्फ १०% ने मताधिकार का प्रयोग किया. दुनिया भर के दबाव के कारण जनरल ज़िया को १९८५ में चुनाव कराने पड़े. नामित सलाहकारों की नीति से वापस लौटते हुए अलबत्ता नए प्रधान मंत्री को सत्ता सौंपने से पहले संसद को इस बात को मानने पर पर राजी कर लिया कि उनके सारे पिछले कार्य में सत्तापलट भी शामिल था, संवैधानिक थे. जनरल ज़िया किंगमेकर राष्ट्रपति के रूप में अपनी स्थिति में खासे मज़बूत आने लगे थे जब १९८८ में एक हवाई जहाज़ दुर्घटना में उनकी मौत हो गयी.
१९८४ के जनमत संग्रह को लेकर हबीब जालिब ने ज़िया उल हक़ का मज़ाक उड़ाते हुए अपनी मशहूर नज़्म ‘रेफरेंडम’ लिखी. सुनिए उन्हीं की आवाज़ में –



पाकिस्तान में लोकतंत्र दोबारा स्थापित हुआ. जालिब साहब जेल से रिहा हुए. भुट्टो की बेटी बेनजीर प्रधानमंत्री चुनी गईं. जालिब ने इस परिघटना का स्वागत किया और बेनजीर को अपना सहयोग देने की घोषणा की. यह अलग बात है कि बेनजीर ने अमेरिका से नजदीकियां बढ़ाईं और अपने पिता की नीतियों को दरकिनार कर दिया. इस बात को लेकर जालिब बेनजीर के विरोधी हो गए. उनका स्वास्थ्य भी ढलान पर था. जेल में बिठाये गए मुश्किल दिनों ने उनपर अपन असर दिखाना शुरू कर दिया था.
१२ मई, १९९३ को जालिब का इंतकाल हुआ.  सरकार ने उनके अंतिम संस्कार का खर्चा उठाने की पेशकश की. परिवार वालों ने साफ़ मना कर दिया. १९९६ और उसके बाद २००९ में जालिब को मरणोपरांत सम्मानित करना चाहा पर उनके परिवार वालों ने इस सहायता को लेने से भी मना कर दिया.  यह उसकी कविता की ताकत थी क़ि उसके कवि मित्र क़तील शिफ़ाई ने इस हिरावल शायर को इस तरह याद किया-

हो सकता है जालिब की कविता को विशुद्धतावादी उनके समकालीनों से एक पायदान पीछे आंकते रहें पर अवाम के इस शायर को जितनी शिद्दत से दुनिया भर में उनके चाहने वाले याद करते हैं और याद करते रहेंगे, वह उनके समकालीनों के लिए सदियों तक रश्क का बाइस रहेगा.

उनके प्रिय मित्र और शायर क़तील शिफाई ने उन्हें यूं अपनी श्रद्धांजलि दी- 

अपने सारे दर्द भुलाकर औरों के दुःख सहता था
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था
आखिरकार चला ही गया वो रूठ के हम फरजानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था

Tuesday, April 29, 2014

ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना - हबीब जालिब और उनकी शायरी – 8

पत्रकार हसन अली के साथ हबीब जालिब

उत्तर पश्चिमी सूबों और बलूचिस्तान के इलाके में चल रहे पृथकतावादी आंदोलनों से भुट्टो जिस तरह निबटे, उससे उन्हें बहुत नुकसान पहुंचा. इन दोनों क्षेत्रों में गैर-पीपीपी सरकारें चल रही थीं. भुट्टो ने इन राज्यों पर भी अपना अधिकार जमाने की कोशिश की. इस वजह से १९७४ में राज्य सेना और पाकिस्तानी सेना में संघर्ष की स्थिति पैदा हो गयी. बलूच लड़ाकों के के लिए ईराक़ी इमदाद और जासूसी की बातें आम होने से भुट्टो बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने बलूचिस्तान की सरकार बर्खास्त कर दी. केंद्रीय सरकार के इस फैसले के बड़े दूरगामी प्रभाव हुए. एक नवजात लोकतंत्र का ऐसा हश्र देखकर हबीब जालिब ने अपना विरोध प्रकट किया. जल्द ही जालिब अपने पुराने दोस्त ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के आदेश पर जेल में थे. यह अलग बात है कि दोनों की दोस्ती बनी रही. लेकिन जालिब भुट्टो के शासन में पाकिस्तान की बदहाली पर कलम चलाते रहे. १९७७ के चुनावों में चीज़ें त्रासद तरीके से बिगड़ गईं. विरोधियों ने भुट्टो पर चुनाव में धांधली करने के आरोप लगाए और दोनों पक्षों के बीच की समझौता वार्ताओं के दौर भी विफल रहे. भुट्टो ने शहरों में मार्शल लॉ लगा दिया. क़ानून और व्यवस्था की हालत दिन-ब-दिन बिगडती गयी. 4 जुलाई १९७७ को जनरल जिया उल हक़ ने फ़ौजी कार्रवाई कर भुट्टो का तख्ता पलट दिया. पाकिस्तान एक दफ़ा फिर से सेना की तानाशाही के अधीन था. सैन्य सत्ता ने कट्टरपंथियों के साल तालमेल बढ़ाना शुरू किया और उन सब नेताओं पर नकेल कसना भी जिनसे उसे किसी भी तरह का ख़तरा था. १९७९ में भुट्टो पर मुकद्दमा चला और झूठे इलज़ाम लगाकर उन्हें फांसी पर चढा दिया गया. इन बातों ने जालिब को झकझोर कर रख दिया –
तोड़ा है कहाँ जादू उसका
एक नारा बन गया है लहू उसका
वो शख्स हुकूमत करता था
लड़ता था अपने जैसों से
हम से तो मुहब्बत करता था ...
ज़िया उल हक़ की सत्ता ने नागरिक अधिकारों पर सेंसरशिप थोप दी. उन्होंने कट्टरपंथियों को पटा लिया और बाकायदा इस्लामी क़ानून संहिता लागू कर दी. वामपंथ का रुझान रखने वाले नेता या तो निर्वासन में चले गए या उन्हें गुप्तचर सेवाओं द्वारा ठिकाने लगा दिया गया. इनमें पाकिस्तानी कम्यूनिस्ट पार्टी के सेक्रेटरी जनरल नज़ीर अब्बासी शामिल थे. ज़िया सरकार ने सार्वजनिक जीवन के हर पहलू को अपने दमन का शिकार बनाया. कवियों को हिदायात जारी की गईं कि वे किस तरह की शायरी लिखें.     
ऐसे में हबीब जालिब ने लिखा-
ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
पत्थर को गुहर, दीवार को दर, कर्गस को हुमा क्या लिखना

इक हश्र बपा है घर घर में, दम घुटता है गुंबद-ए-बेदर में
इक शख्स के हाथों मुद्दत से रुसवा है वतन दुनिया भर में
ऐ दीदा-वरो इस ज़िल्लत को क़िस्मत का लिखा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

ये अहल-ए-हशम, ये दारा-ओ-जिस्म, सब नक्श बर-आब हैं ऐ हमदम
मिट जाएँगे सब परवरदा-ए-शब, ऐ अहल-ए-वफ़ा रह जाएँगे हम
हो जाँ का ज़ियाँ पर क़ातिल को मासूम अदा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

लोगों पे ही हम ने जाँ वारी, की हम ने उन्हीं की ग़म-ख़ारी
होते हैं तो हों ये हाथ क़लम, शा'इर न बनेंगे दरबारी
इब्लीस-नुमा इंसानों की ऐ दोस्त सना क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

हक़ बात पे कोड़े और ज़िन्दां, बातिल के शिकंजे मैं है ये जाँ
इंसां हैं कि सहमे बैठे हैं, खूँ-ख़ार दरिन्दे हैं रक्साँ
इस ज़ुल्म-ओ-सितम को लुत्फ़-ओ-करम, इस दुख को दवा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

हर शाम यहाँ शाम-ए-वीराँ, आसेब-ज़दा रस्ते गलियाँ
जिस शहर की धुन में निकले थे वो शहर दिल-ए-बर्बाद कहाँ
सहरा को चमन, बन को गुलशन, बादल को रिदा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारो
विरसे में हमें ये ग़म है मिला, इस ग़म को नया क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया, सरसर को सबा, बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

(अगली क़िस्त में समाप्य)

Monday, April 28, 2014

गाने चलो, वरना थाने चलो - हबीब जालिब और उनकी शायरी – 7

लोकतंत्र में समाजवाद को जज़्ब करने के वायदे के साथ भुट्टो सत्ता पर काबिज़ हुए थे. जालिब भुट्टो के अच्छे दोस्त थे और भुट्टो को वाम-लोकतांत्रिक समझा जाता था. उस समय पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का नारा कुछ इस तरह था – “इस्लाम हमारा धर्म है, लोकतंत्र हमारी नीति, समाजवाद हमारी अर्थव्यवस्था. सारी सत्ता जनता की.” राष्ट्रपति के रूप में भुट्टो ने एक ऐसे पाकिस्तान का वायदा किया था जो “शोषणमुक्त” होगा. उन्होंने सारे उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, भूमि-सुधार के प्रयास शुरू किये,  ट्रेड यूनियनों को उनके हक़ दिलाए, सेना की ताकत कम कर दी, मार्शल लॉ को अवैध घोषित किया और नया संविधान लिखने की तैयारी शुरू कर दी.
इस संविधान को १९७३ में स्वीकार किया गया. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भुट्टो ने अमेरिका पर पाकिस्तान की निर्भरता को कम करने के इरादे से रूस के साथ सम्बन्ध बनाने शुरू किये. सोवियत सहायता के रूप में पाकिस्तान को तकनीकी सलाह औए स्टील प्लांट मिले. एक चतुर राजनेता के तौर पर भुट्टो ने अपनी आन्तरिक स्थिति को सुदृढ़ करना शुरू किया. उन्हें पता था कि जालिब का साथ उन्हें मज़बूत करेगा. एक बार एक सभा के दौरान भुट्टो ने जालिब से कहा कि वे उनकी पार्टी के सदस्य बन जाएं. जालिब ने जवाब दिया – “क्या आपने कभी सुना है कि समुन्दर नदियों में गिरते हैं?” यह उस दौर की बात है जब भुट्टो अपनी सफलता के चरम पर सवार थे.
एक बार फिर से ईरान के शाह का आगमन हुआ और एक प्रहसन के तौर पर इतिहास ने अपने आप को दोहराया. इस बार शाह भुट्टो के लरकाना स्थित पैतृक घर पर व्यक्तिगत मेहमान की तौर पर रहे. एक और अभिनेत्री को शाह के सामने नाचने को कहा गया. इस से सारे पाकिस्तान में वबाल उठ खड़ा हुआ. ऐसे में जालिब ने लिखा-
“लरकाने चलो,
वरना थाने चलो
अपने होठों की लाली लुटाने चलो
वरना थाने चलो
गाने चलो
वरना थाने चलो

ये मेरे जो वज़ीर हैं
ये सभी बेज़मीर हैं.”

(जारी)

Sunday, April 27, 2014

नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्ज़ा ढिठाई से - हबीब जालिब और उनकी शायरी – 6


निश्चित ही, चीज़ें मरम्मत किये जाने की हदें पार कर चुकी थीं. नागरिक असंतोष बढ़ता बढ़ता गृहयुद्ध में तब्दील हुआ और इसका अंत १९७१ के भारत पाकिस्तान युद्ध में हुआ. पूर्वी पाकिस्तान इतिहास बन गया और बांग्लादेश अस्तित्व में आया. पश्चिमी पकिस्तान में नागरिक असंतोष और बढ़ा और अफवाहें फैलने लगीं कि युवतर सैन्य अफसरों ने सत्तापलट की तैयारी कर ली है. २० दिसम्बर १९७१ को जनरल याह्या खान को मजबूर होकर सत्ता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को सौंपनी पड़ी. पिछले १४ सालों में वे लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए पहले पाकिस्तानी नेता थे. ऐसा लगने लगा था कि हबीब जालिब अब आराम कर सकते थे. 

जालिब पाकिस्तान के धर्मगुरुओं के हमेशा खिलाफ रहते थे. वे समझ गए थे कि अधिकाँश धर्मगुरु सामन्तवाद के समर्थक हैं क्योंकि इसी में लोगों का शोषण और उनकी बेहतरी शामिल थी. इसी थीम पर उनकी नज़्म है – ‘मौलाना’. सुनिए लाल बैंड द्वारा प्रस्तुत यही रचना -


बहुत मैंने सुनी है आपकी तक़रीर मौलाना
मगर बदली नहीं अब तक मेरी तक़दीर मौलाना

खुदारा सब्र की तलकीन अपने पास ही रखें
ये लगती है मेरे सीने पे बन कर तीर मौलाना

नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्ज़ा ढिठाई से
यही है ज़ुर्म मेरा और यही तक़सीर मौलाना

हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें और खुदा जाने
सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना

ज़मीनें हो वडेरों की, मशीनें हों लुटेरों की
ख़ुदा ने लिख के दी है आपको तहरीर मौलाना

करोड़ों क्यों नहीं मिलकर फ़िलिस्तीं के लिए लड़ते
दुआ ही से फ़क़त कटती नहीं ज़ंजीर मौलाना

(तलकीन –उपदेश, तक़सीर- पाप)

(जारी)

Saturday, April 26, 2014

वो कहाँ है, के जिन्हें नाज़ अपने तईं था - हबीब जालिब और उनकी शायरी – 5


१९६५ के राष्ट्रपति चुनाव पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे. अयूब खान को अपनी जीत का पक्का यक़ीन था. लोकतांत्रिक विपक्ष सिद्धांत और धर्म के आधार पर विभाजित था. मोहम्मद अली ज़िन्ना की बहन फ़ातिमा ज़िन्ना के राजनीति में प्रवेश करते ही सारी समीकरण बदल गयी. उन्हें मादर-ए-मिल्लत यानी राष्ट्रमाता के नाम से जाना जाता था. जल्द ही वे एक ऐसा केंद्र बन गईं जिनके चारों तरफ़ तमाम लोकतांत्रिक शक्तियां इकठ्ठा हो गईं. हबीब जालिब ने भी उत्साह के साथ उनके साथ जाना स्वीकार किया. कहा जाता है कि उन दिनों चुनावी सभाओं में लोग फ़ातिमा ज़िन्ना के भाषण और जालिब साहब की कविता सुनने जाया करते थे. बेहद संवेदनशील होते थे ये जलसे जिनमें अयूब खान का खुला विरोध किया जाता था. अपनी विशिष्ट शैली में जालिब ने लिखा – “माँ के पाँव तले जन्नत है; इधर आ जाओ.”
चुनाव जीतने के लिए अयूब खान ने एड़ी चोटी का जोर लगा रखा था. धर्मगुरुओं से पूछा जाता था कि क्या एक इस्लामी राष्ट्र का नेतृत्व कोई औरत कर सकती है? प्रेस और छात्रों को बड़े इनामात के वायदे किये जा रहे थे. अप्रत्यक्ष चुनावों का मतलब था कि उनमें आसानी से धांधली की जा सकती थी. जैसी कि उम्मीद थी अयूब खान चुनाव जीत गए. वोट उन्हें अलबत्ता ६४% ही मिले. चीज़ों की बढती कीमतों और भारत से १९६५ युद्ध में मिली पराजय के बाद अयूब खान को सत्ता छोडनी पड़ी और उनकी जगह एक और तानाशाह जनरल याह्या खान सत्तासीन हुए. याह्या खान अयूब खान से किसी भी तरह अलहदा न थे और उन्होंने देश पर मार्शल लॉ लगा दिया. वे जो समझते थे कि हबीब जालिब की अयूब खान से कोई जाती दुश्मनी थी, उन्हें बहुत निराश होना पड़ा क्योंकि यह शायर किसी भी तरह की तानाशाही के खिलाफ था. दस साल की पाबंदी के बाद हबीब जालिब को मुर्री में एक मुशायरे में कवितापाठ का न्यौता मिला. इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया कि जालिब महफ़िल न लूटने पाएं. उन्हें दिलावर फ़िगार के तुरंत बाद कवितापाठ करना था. दिलावर को अपनी हास्य कविता के कारण शहंशाह-ए-ज़राफ़त का खिताब मिला हुआ था. सोचा ये गया था कि दिलावर की अपार लोकप्रियता के बाद जालिब की कविता श्रोताओं पर ख़ास असर नहीं डाल सकेगी. नियत समय पर जालिब उठे और उन्होंने याह्या खान का चित्र खेंचना शुरू किया –
“तुमसे पहले वो जो एक यहाँ तख़्त नशीं था
उसको भी अपना खुदा होने का इतना ही यकीं था
कोई ठहरा हो जो लोगो कि तो बताओ
वो कहाँ है, के जिन्हें नाज़ अपने तईं था.”
मार्शल लॉ हटाया गया और १९७० में आम चुनाव हुए. एक आदमी-एक वोट के आधार पर हुए इन चुनावों ने पाकिस्तान को और गहरे संकट में धकेल दिया. अवामी लीग ने मुजीब-उर-रहमान के नेतृत्व में १६७ सीटें जीतीं जबकि जुल्फिकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने ८१. भुट्टो ने मुजीब को प्रधानमंत्री मानने से इनकार कर दिया. मुजीब की भरी जीत की वजह उनका चुनावी घोषणापत्र था जिसमें पूर्वी पाकिस्तान को अधिक स्वायत्तता देने की बात कही गई थी. इसमें अलग करेंसी, अलग सेना और अलग पुलिस की बात की गयी थी. याह्या खान ने दुबारा से मार्शल लॉ लगा दिया और अवामी लीग को देशद्रोह के आरोप में प्रतिबंधित कर दिया. इसके बाद जनरल टिक्का खान को पूर्वी पाकिस्तान का सैन्य प्रशासक बना दिया गया. सेना ने ऑपरेशन सर्चलाईट चला कर विरोधियों को चिन्हित करने और ख़त्म करने का काम शुरू कर दिया. मानवाधिकारों के भीषण हनन के इस दौर में करीब तीन लाख पूर्वी पाकिस्तानी नागरिक मारे गए. पश्चिमी पाकिस्तान में हबीब जालिब उन बहुत कम लोगों में थे जिन्होंने इस सैन्य कार्रवाई का विरोध किया. उन्होंने लिखा –
“मोहब्बत गोलियों से बो रहे हो
ज़मीन का चेहरा खून से धो रहे हो
गुमां तुमको कि रस्ता कट रहा है
यकीं मुझको कि मंजिल खो रहे हो.”

(जारी)     

Friday, April 25, 2014

रक्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है - हबीब जालिब और उनकी शायरी – 4


 १९६५ में ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी पाकिस्तान के दौरे पर आये. शाह ने नवाब कालाबाग़ की मेहमाननवाजी में रहना पसंद किया जो उन दिनों तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान के गवर्नर थे. दस हज़ार एकड़ की रियासत के मालिक इस सामन्तवादी राजे ने फिल्म अभिनेत्री नीलोफ़र से आग्रह किया कि वे शाह के सामने अपना नाच पेश करें. नीलोफ़र के मना करने पर उन्हें पुलिस पकड़ कर नवाब के दरबार में ले आई. नीलोफ़र ने तब भी विरोध किया और जब उन्हें यातनाएं दी गईं तो उन्होंने आत्महत्या करने की भी कोशिश की. जब जालिब साहब को इस वाकये का पता चला उन्होंने नीलोफ़र को देखने हस्पताल जाते वक्त इस बहादुर औरत की शान में एक कविता लिखी. यह कविता बाद में एक फिल्म में बतौर गीत मशहूर हुई और इसे आवाज़ दी थी बादशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन ने. सुनिए -  



(जारी)

Thursday, April 24, 2014

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को मैं नहीं मानता - हबीब जालिब और उनकी शायरी - 3


हबीब अहमद पूर्वी पंजाब के होशियारपुर जिले में २४ मार्च १९२८ को जन्मे थे. उनकी पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में हुई. कविता में उनकी गहरी दिलचस्पी में उन्होने प्राचीन परम्परा के शायर जालिब देहलवी के नाम को इख्तियार किया. उनकी शुरुआती कविता रूमानी और प्रकृतिवादी थी. विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले आये जहां कराची के डेली इमरोज़ में उन्हें प्रूफरीडर की नौकरी मिल गयी. वे अक्सर मुशायरों में फैज़ अहमद फैज़ जैसे कवियों की रचनाओं का पाठ किया करने लगे. जल्द ही जालिब ने पाकिस्तानी वाम का रुख किया और कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ पकिस्तान और प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट के सदस्य बन गए. यह दौर था जब जनरल अयूब एक दूसरा ही रास्ता अख्तियार करने की तरफ बढ़ चुके थे.

अमेरिका से नज़दीकी और CENTO के साथ फ़ौजी संधि ने पाकिस्तानी सेना को आधुनिकतम हथियारों से लैस बना इया था. अमेरिकी सहायता प्राप्त करने के एवज में पकिस्तान अमेरिकी सेना को अपने सैन्य प्रयोगों के लिए आवश्यक इलाके खुशी खुशी उपलब्ध करवा रहा था. पेशावर का एयर स्टेशन अमेरिकियों को दे दिया गया जहां से वे रूस पर निगाह रख सकते थे. यह सुविधा पाकिस्तानी फौज तक को उपलब्ध नहीं थी. १९५९ में पकिस्तान के ऊर्जा एवं व्यापार मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी ऐसी ही सुविधा की इजाज़त माँगी जो उन्हें नहीं दी गयी. इससे विवाद पैदा हुआ और अंततः भुट्टो पहले अमेरिका और फिर अयूब के विरोधियों में शुमार होने लगे. अयूब खान का पूंजीवादी रुझान पाकिस्तान की ग्रामीण जनता के लिए महंगा पड़ने लगा था. समूचे देश की दौलत कुल बाईस परिवारों में सिमट कर रह गई. ये परिवार ही आपस में मिल जुलकर उद्योगों को चलाते थे और पाकिस्तान की आधी ज़मीन पर राज करते थे. इनमें पुराने रईस और सैन्य अफसरान के परिवार शामिल थे. अयूब खान की सत्ता का पहला उद्देश्य इन परिवारों के हितों की रक्षा करना था.

जालिब साहब ने एक जगह लिखा –

बीस खराने हैं आबाद!
और करोड़ों हैं नाशाद!
सद्र-ए-अयूब ज़िन्दाबाद!

तब तक जालिब को जेल जाने की आदत पद चुकी थी. १९६२ में अयूब खान एक नया संविधान ले कर आये जिसमें पाकिस्तान में राष्ट्रपति शासन प्रणाली की सिफारिश की गयी थी. सत्ता के समर्थकों जैसे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी मुहम्मद अली ने नए संविधान की तारीफ़ करते हुए उसकी तुलना फैसलाबाद की क्लॉक टावर से की. जालिब मानते थे यह खेल के नियमों को अपने पक्ष में रखने का खुला नाटक है.

जनभावनाओं को कुंठित करते हुए १९६२ में यह संविधान लागू कर दिया गया. संविधान के अनुसार पाकिस्तानी अवाम प्रत्यक्ष लोकतन्त्र के लिए अभी अविकसित था सो उस पर परोक्ष रूप से एक कार्यवाहक राष्ट्रपति चुनने के का ‘विकल्प’ थोप दिया गया. जालिब ने इसे तानाशाही को वैध ठहराने वाला फैसला पाया और इसकी खिलाफत में अपनी मशहूर रचना ‘दस्तूर’ लिखी. इस कविता ने राष्ट्रगीत की सी सूरत अख्तियार कर ली थी और जालिब को अनेक जगहों पर इस कविता को पढ़ कर सुनाने के न्यौते मिलने लगे. ऐसे ही एक मौके पर जब किसी जलसे में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एस. ए. रहमान मुख्य अतिथि थे, जालिब से अनुरोध किया गया कि वे ‘दस्तूर’ न सुनाएं. जालिब पलटकर बोले “आप मेरे और मेरी ऑडीएंस के बीच खड़े नहीं हो सकते.” तत्कालीन पाकिस्तान में सेना और जनता के बीच लुकाछिपी का सा खेल चलता रहता था. इस कविता ने पाकिस्तानी जनता को कुछ मोर्चों पर जीतने के मौके उपलब्ध कराये.

सुनिए हबीब जालिब की आवाज़ में ‘दस्तूर’. रचना का पाठ नीचे दिया गया है. – 



दस्तूर


दीप जिसका महल्लात ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले
वो जो साए में हर हर मसलहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
क्यूँ डराते हो जिन्दाँ की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

तूमने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूँ
चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ
तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर

मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

(दस्तूर – संविधान, महल्लात – महल, तख़्त-ए-दार – फांसी का तख्ता, ज़िन्दां – जेल)

... जारी 

Wednesday, April 23, 2014

सद्र तू रहे सदा - हबीब जालिब और उनकी शायरी - 2


मज़ाक के मूड में जालिब कहते थे कि उन्हें सरकारें उन्हीं के दिए टैक्स के पैसों पर जेल में कैद किये रहती हैं. उन्हें कैद करने वाले समझते थे कि जालिब साहब अपने सबक सीखेंगे पर उन्होंने ताजिंदगी उन सबकों को सीखने से इनकार किया. एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी क्रांतिकारी कवि और तानाशाही के विरोधी के तौर पर उनकी हर जेल यात्रा ने उन्हें अधिक मज़बूत बनाया. वे हर बार जेल से अधिक जिद्दी, अधिक साहसी औए अधिक मज़बूत होकर बाहर निकलते थे. हर नए तानाशाह के आगमन के साथ उनकी शायरी में तंज़ का सुर और भी तीखा होता गया. उनकी किताबों पर बैन लगाया गया, उनकी किताबें ज़ब्त की गईं लेकिन उन्होंने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया और सतत रचनाशील बने रहे. चूंकि दुनिया में ऐसी कोई चीज़ नहीं जो उनके जीवन को सही सही परिभाषित कर पाती उन्होंने भी किसी तानाशाह या शासक के सिद्धांतों को नहीं माना. अपने तखल्लुस को सार्थक करते हुए वे अपने लक्ष्य के प्रति ज़िन्दगी भर वफादार बने रहे.

अयूब खान जब सत्तारूढ़ थे, पढ़े-लिखों में उनका सलाहकार बनने को फैशनेबल और फायदेमंद माना जाता था. इस से इस बात की गारंटी हो जाती थी कि आप पर कोई मुकदमे वगैरह नहीं चलेंगे और आपका जीवन बेहतर रहेगा. किसी बुद्धिजीवी को खरीदने के लिए यह कीमत देने को अयूब खान हमेशा तत्पर रहते थे. और कतार में लगे हुवों की तादाद खासी थी. हफीज़ जालंधरी इनमें शामिल थे. जालंधरी साहब ने ही पाकिस्तान का राष्ट्रगान लिखा था.

एक दफ़ा जालिब साहब की मुलाक़ात हफ़ीज़ जालंधरी से हुई. हफ़ीज़ जालंधरी ने टिप्पणी की कि अयूब साहब के सलाहकार के तौर पर उनका जीवन बेहद व्यस्त रहता है.

इस वाकये के बाद हबीब जालिब ने यह नज़्म लिखी थी. उनकी आवाज़ में सुनिए और पढ़िए –



मुशीर

मैंने उससे ये कहा
            ये जो दस करोड़ हैं
            जेहल का निचोड़ हैं
            इनकी फ़िक्र सो गई
            हर उम्मीद की किस
            ज़ुल्मतों में खो गई
             ये खबर दुरुस्त है
            इनकी मौत हो गई
            बे शऊर लोग हैं
            ज़िन्दगी का रोग हैं
            और तेरे पास है
            इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा

          तू ख़ुदा का नूर है
          अक्ल है शऊर है
          क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वज़ूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये शर पसंद हैं
इनकी खींच ले ज़बाँ
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा

            जिनको था ज़बाँ पे नाज़
            चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़
            चैन है समाज में
            वे मिसाल फ़र्क है
            कल में और आज में
            अपने खर्च पर हैं क़ैद
            लोग तेरे राज में
            आदमी है वो बड़ा
            दर पे जो रहे पड़ा
            जो पनाह माँग ले
            उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा

            हर वज़ीर हर सफ़ीर
            बेनज़ीर है मुशीर
            वाह क्या जवाब है
            तेरे जेहन की क़सम
            ख़ूब इंतेख़ाब है
            जागती है अफ़सरी
            क़ौम महवे ख़ाब है
            ये तेरा वज़ीर खाँ
            दे रहा है जो बयाँ
            पढ़ के इनको हर कोई
            कह रहा है मरहबा

मैंने उससे ये कहा

            चीन अपना यार है
            उस पे जाँ निसार है
            पर वहाँ है जो निज़ाम
            उस तरफ़ न जाइयो
            उसको दूर से सलाम
            दस करोड़ ये गधे
            जिनका नाम है अवाम
            क्या बनेंगे हुक्मराँ
            तू "यक़ीं" ये "गुमाँ"
            अपनी तो दुआ है ये
            सद्र तू रहे सदा

मैंने उससे ये कहा

(मुशीर - सलाहकार, ज़ुल्मतें - अँधेरे, मेहर-ए-सुभ-ए-नौ - नई सुबह का सूरज, शर पसंद - शरारतपसन्द. नोट- नज़्म के लिखे जाते वक़्त पाकिस्तान की आबादी दस करोड़ थी.)

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(जारी)