Wednesday, October 29, 2014

एक थी अमृता

लेडी श्रीराम कॉलेज के इतिहास विभाग की वेबसाईट पर छपे इस लेख को बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा मालविका शरद ने तैयार किया है. मित्र आशुतोष बरनवाल के आग्रह पर इसका हिन्दी तर्जुमा कबाड़ख़ाना के पाठकों के वास्ते लगाया जा रहा है. मालविका आशुतोष के इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सहपाठी रहे जनाब शरद मेहरोत्रा की सुपुत्री हैं. शाबास मालविका!  

कैनवस पर एक अनवरत संधान : अमृता शेरगिल


-मालविका शरद

सैल्फ पोर्ट्रेट
एक ऐसे समय में जब भारत परस्पर विरोधाभासी विचारधाराओं के भंवर में डूब-उतरा रहा है - वेंडी डॉनिजर की किताब को प्रकाशक बाज़ार से हटा लेते हैं, समलैंगिक संबंधों का दुबारा से पुनः - अपराधीकरण कर दिया जाता है और क्रिकेट राष्ट्रवाद पर राष्ट्रदोह के आरोप चस्पां होते हैं, ऐसे में जब हम बिलकुल उपयुक्त भारतीय-पनको खोजने निकलते हैं तो यह आवश्यक हो जाता है कि हम इतिहास से उन नामों को बाहर निकाल कर लाएं जिन्होंने भारतीय कला में क्रांति करने का प्रयास किया और जिन्होंने चित्रकारी की अपनी विशिष्ट शैली से खोज के नए मापदंड और पहचान की नई सुनिश्चितता कायम की.  

अमृता शेरगिल एक ऐसा ही नाम है. अमृता शेरगिल ने अपने चित्रों में डिजाइन के पाश्चात्य सिद्धांतों और भारतीय रंगों की विशुद्धता के सम्मिश्रण से भारतीय कला का परिचय आधुनिकतावाद से कराया. सात वर्षों (१९३४-४१) के दौरान बनाई गयी अपनी कोई एक सौ पचास पेंटिंग्स के लिए उन्होंने अजंता और केरल के भित्तिचित्रों और मिनिएचर स्कूल से प्रेरणा ग्रहण की.

अमृता अमृतसर के एक कुलीन सिख उमराव सिंह महाराज और हंगारी मूल की मेरी एन्तोइनेत गोटेस्मान-बाकाटे की पहली संतान थीं. अमृता के माता-पिता की पहली मुलाकात लाहौर में हुई थी जब मैरी महाराजा रणजीत सिंह की पोती राजकुमारी बाम्बा की सहयात्री बनकर भारत आई थीं. अमृता का जन्म बुडापेस्ट में ३० जनवरी १९१३ को हुआ. बहुत छोटी उम्र से ही अमृता ने पेंटिंग में  दिलचस्पी दिखलाना शुरू कर दिया था.  उन्हें जो भी कागज़ मिलता वे उस पर कुछ बना देतीं या फिर दीवारों पर ही. रंग उन्हें आकर्षित करते थे. परिवार १९२४ में शिमला आ बसा. अमृता स्वाभाव से ही बाग़ी क़िस्म की थीं और उन्होंने शिमला के जीज़स एंड मैरी कान्वेंट स्कूल की प्रार्थना में होने वाली अनिवार्य अटेंडेंस का घोर विरोध किया. उन्होंने स्वयं को नास्तिक घोषित किया और जब स्कूल की मुखिया को इसका पता चला उन्होंने अमृता को १९२४ में ही तुरंत स्कूल से निकाल दिया. उसके बाद अमृता ने अपना समय पेंटिंग करते या पियानो बजाते हुए बिताया.

अमृता के मामा एर्विन बाकाटे, जो स्वयं एक चित्रकार थे, ने अमृता की प्रतिभा को पहचाना और सलाह दी कि उसकी शिक्षा पेरिस से सबसे अच्छे कला विद्यालयों में होनी चाहिए. अमृता का दाखिला एकेडेमी दे ला ग्रांदे शॉमीयरे इंस्टीट्यूट में १९२९ में हो गया. अन्य छात्रों की अपेक्षा उनकी ड्राइंग अलग होती थीं क्योंकि वे उस समय प्रचलित मानकों के हिसाब से एकदम शुद्ध और सही नहीं होती थीं और उनमें प्रकृतिवाद के प्रति एक विचलन नज़र आता था. लेकिन जल्द ही अमृता इंस्टीट्यूट से उकता गईं. उनका अदम्य उत्साह और पेंटिंग की काबिलियत प्रोफ़ेसर लूसियन सिमोन का ध्यान खींचने में कामयाब रहे और उन्होंने उनका दाखिला एक प्रमुख संस्था एकोले नॅशनल देस बोस आर्ट में करवाने में सहायता की. अमृता का विशेष रुझान मानव-आकृति को पेंट करने में था और उन्होंने बहुत सारी मॉडल-पेंटिंग की. उन्होंने पेन्सिल और चारकोल की मदद से सैकड़ों पुरुष व स्त्री न्यूड्स बनाए. चित्रकला उन तक नैसर्गिक रूप से पहुँची थी और उन्होंने स्वयं लिखा, “मुझे लगता है कि मैंने पेंटिंग कभी शुरू की ही नहीं, कि मैंने हमेशा ही पेंट किया है. और ऐसा मैंने एक सुनिश्चितता के साथ किया है, एक गहरे यकीन के साथ कि मुझे एक पेंटर बनना है और कुछ भी नहीं.एकोले नॅशनल देस बोस आर्ट में अमृता ने तीन साल बिताये और १९३०-३२ के दरम्यान ६० से अधिक पेंटिंग्स बनाईं; उनमें स्टिल लाइफ कम्पोजीशंस थीं और लैंडस्केप लेकिन अधिकाँश आयल माध्यम में बनाए गए सेल्फ-पोर्ट्रेट्स थे. कुछ लोगों का कहना है कि इतने अधिक सैल्फ-पोर्ट्रेट उनके आत्ममुग्ध स्वाभाव की तरफ संकेत करते हैं. वे हमेशा हवा में जीती थीं और दोयम दर्जे का काम उनसे बर्दाश्त नहीं होता था.
अमृता के चित्रों की विषयवस्तु मुख्यतः पेरिस की तड़क भड़क नहीं बल्कि उसकी ग्लैमराइज्ड ज़िन्दगी का अँधेरा और उदास पहलू था. अमृता की १९३३ की पेंटिंग द प्रोफेशनल मॉडलका विषय फेफड़े की तपेदिक से ग्रस्त एक बुढ़ाती हुई मॉडल थी. पेंटिंग में मॉडल की छातियाँ ढुलकी हुई है और उसकी पीठ झुक गयी है लेकिन उसकी आँखों में एक मासूम चमक है जो उसकी बढ़ती आयु और उपेक्षा के पीछे ज़िम्मेदार उसके आसपास फ़ैली हुई उदासी के बावजूद उसके भीतर बचीखुची जीवन्तता को दर्शाती है. खिंचे हुए हाथ पैरों वाली अमृता की शैली के अलावा इसमें पिकासो का प्रभाव भी नज़र आता है.  



पोर्ट्रेट ऑफ़ अ यंग मैन
इस दौर की अन्य उल्लेखनीय पेंटिंग्स में पोर्ट्रेट ऑफ़ अ यंग मैन’ (१९३०, जिसके लिए उन्हें १९३१ में एकोले में एक इनाम हासिल हुआ),  उसकी अच्छी मित्र और सहपाठी मेरी लुईस चैस्नी का पोर्ट्रेट मेरी लुईस’ (१९३२) और उसी साल बनाई गयी पेंटिंग यंग गर्ल्सशामिल है जिसके लिए १९३३ में उन्हें ग्रैंड सैलून से स्वर्ण पदक हासिल हुआ. १९३१ में उन्होंने टार्सोशीर्षक से एक उत्तेजक पेंटिंग बनाई थी जिसके लिए अमृता ने स्वयं अपनी निर्वस्त्र पीठ को बतौर मॉडल इस्तेमाल किया था.

टार्सो
यह पेंटिंग ग्रैंड सैलून की वार्षिक कला प्रदर्शनी में १९३२ में प्रदर्शित की गयी और कला समीक्षकों की तरफ से इसे सराहना और विवाद दोनों प्राप्त हुए. सो एक तरह से कहा जा सकता है कि ख़ास तौर पर निर्भया बलात्कार काण्ड के बाद आजकल लगातार चल रहे बहस-मुबाहसों को ध्यान में रखते हुए जिनमें खुद की अपनी देह के आधार पर स्त्री की पहचान और स्त्री के अपने शारीरिक अंगों पर अधिकारों के मायनों की बात होती है, हम कह सकते हैं कि अमृता ने यह झंडा १९३० के दशक में ही फहरा दिया था जब उन्होंने अपनी निर्वस्त्र पीठ की पेंटिंग बनाई जो उस समय को देखते हुए एक साहसपूर्ण कृत्य था.

पेरिस की बोहेमियन ज़िन्दगी में अमृता ने आसानी से खुद को ढाल लिया था और दरअसल उन्हें इसमें मज़ा आता था क्योंकि इससे उन्हें वांछित स्वतंत्रता मिलती थी और उनकी कलात्मक संवेदना को एक तरह की मुक्ति. पेरिस में १९३० का दशक सैक्सुअल एक्सप्लोरेशनका काल था और दूसरे और अपने दोनों लिंगों के लोगों के साथ गैर-पारम्परिक यौन संसर्ग के प्रयोग करना फैशनेबल माना जाता था. इस बात की अफवाह थी कि अमृता के अपनी सबसे अच्छी दोस्त और रूममेट मेरी लुईस चेस्नी के साथ समलैंगिक सम्बन्ध थे और हालांकि दोनों इससे इनकार करती थीं, अपनी माँ को लिखी एक चिठ्ठी में  अमृता ने कहा है कि वे पुरुषों के साथ सैक्स संबधोंके बारे में उनके विचारों को समझती हैं अलबत्ता उन्होंने यह अहसास भी कर लिया था कि सैक्स के प्रति उनकी बढ़ती चाह को कला के प्रति उनका उत्साह हरा नहीं सकता था, और वे आगे लिखती हैं कि जब भी समय आएगा मैं एक स्त्री के साथ कुछ करूंगी.अपने जीवन के विभिन्न दौरों में अमृता का सम्बन्ध कई पुरुषों से रहा और उनके जीवन भर उनके तमाम स्कैंडलनुमा अफ़ेयरचलते रहे.  

१९३४ के नवम्बर में अमृता भारत लौट आईं क्योंकि उन्हें लगता था कि केवल भारत में ही उनकी कला को नई प्रेरणा मिल सकती है. वे खुद को भारतीय संस्कृति में डुबो लेना चाहती थीं और उन्होंने केवल साड़ियाँ पहनना शुरू कर दिया. कुछ साल अमृतसर में अपने पैतृक घर में गुज़ारने के बाद वे भारत की यात्रा पर निकल पड़ीं. भारत की गरीबी और दुःख ने उन्हें गहरे प्रभावित किया और श्रमरत भारतीय गरीब उनकी सारे पेंटिंग्स की केन्द्रीय विषयवस्तु बन गए. वे उनके जीवन को चित्रों के माध्यम से व्याख्यायित करना चाहती थीं - उनके कार्य में दिखने वाला उनका धैर्य और समर्पण, उनकी आँखों की ख़ामोश छवियाँ जिन्होंने अमृता पर गहरा प्रभाव डाला, उनकी नोकदार भूरी देहें अमृता ने इन सबकी विवेचना अपने कैनवस पर की और अपनी एक ओरिजिनलशैली विकसित की.

१९३५ में उनकी कुछ पेंटिंग्स शिमला फाइन आर्ट्स सोसाइटी की वार्षिक प्रदर्शनी में दिखाई गईं. उनके कार्य की अगली प्रदर्शनी नवम्बर १९३६ में बंबई में हुई. बंबई से अमृता अजंता और एलोरा की गुफाएँ देखने गईं जिनकी सम्पन्नता और जीवन्तता से वे मंत्रमुग्ध हो गईं. उसके बाद उन्होंने दक्षिण का रुख किया और उनका कलाकार जीनियस मट्टनचेरी और पद्मनाभपुरम के भित्तिचित्रों से काफी उत्तेजित हुआ. दिसम्बर १९३७ में उन्होंने हैदराबाद में अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई. 

ब्रह्मचारी

ब्राइड्स टॉयलेट

एलिफेंट

हिल वीमेन

इन लेडीज़ एनक्लोज़र

साउथ इन्डियन विलेजर्स गोइंग टू अ मार्केट
प्रदर्शनी को देखने के बाद जवाहरलाल नेहरु इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अमृता को लिखा, “ मुझे आपके चित्र अच्छे लगे क्योंकि उनमें इतनी ज्यादा ताकत और समझ है.अमृता की नेहरु से पहली मुलाक़ात दिल्ली में हुई और कला-इतिहासकार यशोधरा डालमिया इसे इकलौती घटना मानती हैं जो अमृता के साथ उस वातावरण में घटी जो उन्हें पेंटिंग करने के लिहाज़ से ज़रा भी मुफ़ीद नहीं लगा था. अमृता और नेहरु के बीच काफी पात्र व्यवहार हुआ और उनकी कुछेक मुलाकातें भी हुईं लेकिन उन्होंने कभी भी नेहरु का पोर्ट्रेट नहीं बनाया. और जब एक नज़दीकी दोस्त, इकबाल सिंह ने उनसे पूछा कि उन्होंने नेहरु का पोर्ट्रेट कभी क्यों नहीं बनाया तो उनका उत्तर था कि वे नेहरु को कभी भी पेंट नहीं करेंगी क्योंकि नेहरू बहुत ज़्यादा सुदर्शन हैं.

उनकी दक्षिण भारतीय त्रयी उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक थी. ब्राइड्स टॉयलेट’, ‘ब्रह्मचारीऔर साउथ इन्डियन विलेजर गोइंग टू मार्केटइस त्रयी की पेंटिंग्स थीं और ये एक कलरिस्ट के तौर पर उनके विकास को चिन्हित करती हैं.

ये सारी पेंटिंग्स उनके दक्षिण के अनुभव पर आधारित हैं. ब्राइड्स टॉयलेटऔर एक और मशहूर पेंटिंग फ्रूट वेंडर्सस्त्रियों के प्रति उनके सरोकारों को परिलक्षित करती हैं. फीकी पृष्ठभूमि में बैंगनी, गुलाबी, हरे, सफ़ेद और भूरे रंग इसे एक शानदार पेंटिंग बनाते हैं. ब्रह्मचारीभी इसी शैली में बनी है. ये सारी पेंटिंग्स, उनकी रेखाएं, रंग और उनके डिजाइन, सब में एक मज़बूत संवेदनात्मक महत्व है क्योंकि वे अमृता पर उनके दक्षिण भारत की यात्रा के कारण पड़े प्रभावों से उपजी थीं फूलों के चटख रंग, स्थानीय निवासियों के उकेरे गए से चेहरे और ग्रामीण जन की वेशभूषा की गरिमा. हिन्दू’ (नवम्बर १९३६) में लिखे एक लेख मॉडर्न इन्डियन आर्टमें अमृता कहती हैं, “भारतीय कला ने केवल मिथकों और रूमानियत की परम्परा से फल-फूल कर एक गलती की. मैं एक व्यक्तिवादी हूँ जो एक नई तकनीक का विकास कर रहा है जो विशुद्ध रूप से पारम्परिक भारतीय नहीं है लेकिन जिसकी आत्मा मूलतः भारतीय है.जिन अन्य पेंटिंग्स ने उन्हें एक असाधारण कलाकार बनाया उनमें शामिल हैं – ‘ऑन द टैरेस’, ‘चाइल्ड लाइफ’, ‘हिल वीमेन’, ‘पोर्ट्रेट ऑफ़ माई फ़ादर’, ‘विलेजर्स’, ‘एलिफेन्ट्स बेदिंग इन अ ग्रीन पूलऔर इन द लेडीज़ एनक्लोज़र’.  

५ दिसम्बर १९४१ को रहस्यमय परिस्थितियों में मात्र २८ साल की आयु में अमृता की मृत्यु हो गयी. उनकी मृत्यु का वास्तविक कारण आज तक नामालूम है अलबत्ता इस बाबत तमाम तरह के विचार और कयास लगाए जाते रहे हैं. नई दिल्ली की नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट में इस धूमकेतु सरीखी कलाकार की सौ से अधिक पेंटिंग्स प्रदर्शित हैं. उनके जीवन की जटिलता मिश्रित सभ्यताओं वाले माता-पिता, पेरिस में उनके स्कूल की पृष्ठभूमि, उनके प्रेम सम्बन्ध और उनकी उभयवृत्त सेक्सुअलिटी ने उन्हें लगातार नई चाक्षुष छवियाँ रचने पर विवश किया. उन्होंने कठिन परिस्थितियों से संघर्ष किया और ऐसे समय में जब बहुत कम स्त्रियाँ सार्वजनिक जगहों पर आ पाती थीं, एक स्त्री के तौर पर उनकी अपनी खोज, और भी उल्लेखनीय मानी जानी चाहिए. वे एक चमकीले और जीवंत पुच्छलतारे जैसी थीं जो किसी को इसका भान होने से पहले ही अदृश्य हो गईं, और अपने पीछे ऐसा काम छोड़ गईं जो उन्हें शताब्दी के प्रमुखतम कलाकारों के साथ पूर्व और पश्चिम के समागम के एक मुखर प्रतीक में स्थापित करता है जिसने कला को एक नवीन और महत्तर स्तर तक पहुंचा दिया. 

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मालविका शरद

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर पेंटिंग्स सुंदर आलेख !

Art Reader said...

कला जगत में अमर अमृता की छोटी पर कामयाब ज़िंदगी के इस सुन्दर प्रस्तुति के लिये धन्यवाद!
कृपया एकोले नॅशनल देस बोस को एकोल द बोजार लिखे (Ecole des Beaux-Arts)

Lakhvinder Brar said...

Amrita's art and her biography interesting.