Thursday, February 25, 2016

जीवन में विचार बंदरवा मारै कठिन गुलाटी


अभयारण्य
- संजय चतुर्वेदी

चिंतन में श्रृगाल परिपाटी,
हुआं-हुआं इत हुआं-हुआं उत फिर क्यों उम्मत बांटी
हर सियार का रंग अलग है तिरक चाल भन्नाटी
अलग तंज़ मुनफ़रिद किनाया चौकस कन्नी काटी
लेकिन सबकी एक वासना एक मलाई चाटी
ऊंचे सुर लम्बी लयकारी भई ज़िन्दगी नाटी
जीवन में विचार बंदरवा मारै कठिन गुलाटी.
(2016)


1 comment:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.02.2016) को "कर्तव्य और दायित्व " (चर्चा अंक-2264)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।