Monday, July 24, 2017

मकसद काम से नहीं बल्कि कल्पनाओं से पैदा होता है


बे-काम दुनिया में जीवन का अर्थ
- युवाल नोह हरारी
(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

जिस तरह टेक्नोलॉजी नौकरियों को निगल रही है, उसे देखते हुए भविष्य में हमारे पास करने को क्या रह जाएगा? चर्चित पुस्तक 'सेपियंस' के लेखक युवाल नोह हरारी इस तरह उपजे 'बे-काम वर्ग' और जीवन के मकसद की नई खोज का जायजा ले रहे हैं.

आज दिखाई पड़ने वाली ज्यादातर नौकरियां आगामी चंद दशकों में नहीं रहेंगी. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) तमाम किस्म के कामों में जिस तरह इंसानों को पीछे छोड़ रही है, उसे देखते हुए लगता है कि अधिकांश पेशों में यह उन्हें बेदखल कर डालेगी. संभव है कई नए पेशे उभर के आएं - जैसे आभासी दुनिया के डिजाइनर. लेकिन इन पेशों के लिए ऊंचे स्तर की रचनात्मकता व बौद्धिक लचीलेपन की ज़रूरत होगी. यह अभी साफ़ नहीं है कि 40 साल का बेरोजगार टैक्सी ड्राइवर या बीमा एजेंट खुद को इस किस्म के पेशों के लिए दोबारा तैयार कर पाएगा या नहीं. (किसी बीमा एजेंट द्वारा डिजाइन किए गए आभासी संसार की कल्पना कीजिए!). मान लीजिए एक पूर्व-बीमा एजेंट किसी तरह खुद को आभासी दुनिया के डिजायनर के रूप में ढाल लेता है. मगर प्रगति की रफ़्तार इतनी तेज़ होगी कि एक दशक के भीतर उसके सामने खुद को फिर किसी नयी भूमिका के लिए तैयार करने की चुनौती खड़ी हो जाएगी.
मूल समस्या नई नौकरियों को पैदा करने की नहीं है. मूल समस्या ऐसी नौकरियों के सृजन की है जिसमें इंसान मशीनी अल्गोरिदम पर भारी पड़ते हों. परिणामस्वरूप, सन 2050 तक ऐसे लोगों का नया वर्ग पैदा हो जाएगा जो बेकाम (अनुपयोगी) होंगे. ऐसे लोग जो न केवल बेरोजगार होंगे बल्कि किसी रोजगार लायक भी नहीं होंगे.
जो टेक्नोलॉजी इंसानों को बे-काम बनाती है, संभव है वही न्यूनतम आय की किसी वैश्विक योजना के तहत उन्हें खिलाने और जिंदा रखने में काम आए. मगर उसके बाद असल समस्या ऐसे लोगों को व्यस्त और संतुष्ट रखने की होगी. लोगों को उद्देश्यपूर्ण गतिविधियों में लगाए रखना पड़ता है. वर्ना खाली दिमाग शैतान का घर समझिए. बेकाम लोगों का समूचा वर्ग दिन-भर करेगा क्या?
इस सवाल का एक जवाब हो सकता है कंप्यूटर गेम्स. आर्थिक तौर पर अनुपयोगी हो चुके लोग ज्यादातर समय 3 डी वर्चुअल रियलिटी गेम्स खेलते हुए बिता सकते हैं. इसमें उन्हें बाहर की "वास्तविक दुनिया" के मुकाबले ज्यादा रोमांच व भावनात्मक संतुष्टि मिलेगी. सच कहें तो यह एक बहुत पुरानी आजमाई हुई तरकीब है. पहले भी हम ऐसे वर्चुअल रियलिटी गेम्स की खोज कर चुके हैं. इन्हें हम "मजहब" या "धर्म" के नाम से जानते हैं.
मजहब अगर करोड़ों लोगों द्वारा एक साथ खेला जाने वाले बहुत बड़ा वर्चुअल रियलिटी गेम नहीं है तो फिर क्या है? इस्लाम और ईसाईयत जैसे मजहबों ने काल्पनिक नियम बनाए- जैसे "सूअर का मांस मत खाओ", "हर दिन एक ख़ास बार एक ही प्रार्थना दोहराओ", "अपने ही लिंग के किसी सदस्य के साथ सम्बन्ध मत बनाओ", आदि-इत्यादि. सिर्फ इंसानी कल्पनाओं में ही इस तरह के नियमों का अस्तित्व है. प्राकृतिक व्यवस्थाओं में कहीं भी किसी जादुई फार्मूले को दोहराने की ज़रूरत नहीं पड़ती. किसी भी प्राकृतिक नियम के तहत समलैंगिकता या सूअर का मांस खाने पर प्रतिबंध नहीं है. मुसलमान और ईसाई ज़िन्दगी भर अपने मनपसंद वर्चुअल रियलिटी गेम में पॉइंट कमाने का जतन करते रहते हैं. अगर आप दिन भर प्रार्थना करते हैं तो आपको पॉइंट मिलेंगे. अगर आप प्रार्थना करना भूल गए तो आप पॉइंट खोएंगे. अगर जीवन के अंत तक अच्छे पॉइंट बन जाते हैं तो मरने के बाद आप खेल के अगले लेवल (यानी जन्नत) तक पहुंच जाएंगे.
जैसा कि तमाम मजहब हमें बताते हैं, वर्चुअल रियलिटी को किसी अलग-थलग बक्से में बंद नहीं किया जा सकता. बल्कि भौतिक वास्तविकता के ऊपर इसका मुलम्मा चढ़ाया जा सकता है. अतीत में भी इंसानी कल्पनाओं व पवित्र पुस्तकों के जरिए ऐसा किया जा चुका है.
कुछ समय पहले मैं अपने छः वर्षीय भतीजे मतान के साथ पोकेमोन के शिकार पर निकला. हम सड़क पर नीचे उतर रहे थे, मतान अपने स्मार्टफोन पर नज़रें गड़ाए हुए था, जिस कारण वह हमारे आसपास मौजूद पोकेमोनों को देख पा रहा था. मुझे कहीं कोई पोकेमोन नज़र नहीं आया क्योंकि मेरे पास स्मार्टफोन नहीं था. तभी हमें सड़क पर दो और बच्चे दिखाई दिए. वे दोनों भी उसी पोकेमोन के पीछे पड़े थे और हम उनसे लगभग उलझ पड़े. इस बात ने मुझे अहसास कराया कि ठीक ऐसी ही परिस्थितियों में यहूदी और मुसलमान पवित्र शहर यरुसलम के लिए आपस में लड़ते हैं. जब आप यरुसलम की वस्तुगत सच्चाई पर गौर करते हैं, तो आपको सिर्फ पत्थर और इमारतें ही नज़र आती हैं. पवित्रता का कहीं कोई निशान नहीं है. लेकिन जैसे ही आप इस शहर को स्मार्टबुक्स (जैसे बाइबल और कुरआन) के नज़रिए से देखते हैं तो आपको हर जगह पवित्र स्थान और देवदूत ही देवदूत नज़र आने लगते हैं.
वर्चुअल रियलिटी गेम्स खेलते हुए जीवन में अर्थ की तलाश का मामला सिर्फ मजहबों तक सीमित नहीं है. यह तलब धर्मनिरपेक्ष विचारधाराओं और जीवन शैलियों में भी देखी जा सकती है. उपभोक्तावाद भी एक वर्चुअल रियलिटी गेम है. आप नई कार, महंगे ब्रांड्स खरीदकर और विदेशों में छुट्टियां बिताकर पॉइंट कमा सकते हैं. और अगर आपके बाकी लोगों से ज्यादा पॉइंट्स हैं तो आप कह सकते हैं कि आप गेम जीत गए हैं.
आप ऐतराज कर सकते हैं कि लोग वास्तव में अपनी कार या छुट्टियों का आनंद लेते हैं. यह वस्तुतः सच भी है. लेकिन धार्मिक लोगों को भी पूजा व कर्मकांड करने में सचमुच आनंद आता है और मेरा भतीजा भी पोकेमोन के शिकार में खूब आनंदित होता है. अंततः असली कार्रवाई हमेशा इंसानी दिमाग के भीतर ही होती है. क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि तंत्रिकाएं कंप्यूटर स्क्रीन पर आने वाले चित्रों को देखकर उत्तेजित होती हैं, या किसी कैरेबियाई रिजोर्ट की खिड़की से बाहर झाँकने पर या फिर मन की आँखों से दिखने वाले स्वर्ग को देखकर? सभी मामलों के मद्देनज़र जीवन का जो भी अर्थ हम निकालते हैं वह हमारे दिमाग का पैदा किया हुआ ही होता है. वास्तव में "वहां बाहर" कुछ नहीं होता. अब तक की ताज़ातरीन वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक़ इंसानी जीवन का कोई मकसद नहीं है. जीवन के बताए गए तमाम मकसद इंसानों द्वारा गढ़ी गई कोरी कल्पना मात्र हैं.
अपने अभूतपूर्व निबंध - डीप प्ले: बालीनीज कॉक फाइट (1973) में मानवशास्त्री क्लिप्फोर्ड गीर्त्ज़ बताते हैं कि किस तरह बाली द्वीप के लोग अपना ज्यादातर वक़्त और पैसा कॉकफाइट यानी मुर्गों की लड़ाइयों पर दांव लगाने में खर्च कर डालते हैं. दांव और लड़ाइयों का आयोजन भरपूर कर्मकाण्डों के साथ होता है. इनके नतीजों का भारी असर खेलने वालों व दर्शकों दोनों की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक हैसियत पर पड़ता है.
कॉकफाइट की लड़ाई बालीवासियों के लिए इतनी अहम है कि इंडोनेशिया की सरकार ने जब इस परम्परा को अवैध घोषित किया तो लोगों ने क़ानून को ठेंगा दिखाते हुए इसे खेला और गिरफ्तारी व भारी जुर्माना देना मंज़ूर किया. बालीवासियों के लिए कॉकफाइट्स "डीप प्ले" थीं- रचा गया ऐसा खेल जिसे इतने अर्थ प्रदान किए गए कि वह वास्तविकता में बदल गया. बाली का कोई मानवशास्त्री इसी तरह के तर्कों के साथ अर्जेंटीना के फुटबॉल या इजराइल के यहूदी धर्म के बारे में भी ऐसा ही निबंध लिख सकता है.
बेशक, इजरायली समाज का एक ख़ास दिलचस्प हिस्सा यह दिखाता है कि कार्य-विहीन दुनिया में संतोष के साथ कैसे रहा जाय. इजरायल में अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुष कभी काम नहीं करते. वे अपना पूरा जीवन पवित्र पुस्तकों को पढ़ने और धार्मिक कर्मकाण्डों में बिता देते हैं. वे और उनके परिवार कभी भूखे नहीं मरते हैं क्योंकि उनकी पत्नियां अक्सर घर चलाने के लिए काम करती हैं. इसके अलावा सरकार से भी उन्हें थोड़ी-बहुत इमदाद मिल जाती है. हालांकि उनका जीवन अमूमन ग़ुरबत में ही बीतता है, मगर सरकारी मदद मिल जाने से जीवन की बुनियादी ज़रूरतें तो पूरी हो ही जाती हैं.
इसे आप कामकाजी वैश्विक बुनियादी आय कह सकते हैं. हालांकि वे गरीब हैं और कभी काम नहीं करते, लेकिन तमाम सर्वेक्षणों में ये अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुष अपने जीवन में इजरायली समाज के अन्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा संतुष्ट होने का दावा करते हैं. जीवन संतुष्टि के वैश्विक सर्वेक्षणों में इजरायल यदि शीर्ष देशों में गिना जाता है, तो इसके लिए इन बेरोजगार डीप प्लेयरों के योगदान को धन्यवाद कहना होगा.
कार्य-विहीन दुनिया का नक्शा कैसा होगा इसे जानने के लिए आपको इजरायल जाने की कतई ज़रूरत नहीं. अगर आपके घर में कोई किशोर वय का बेटा है जिसे कंप्यूटर गेम्स का चस्का है तो आप खुद ही अपना प्रयोग कर सकते हैं. उसे कोक व पिज्ज़ा का उसका न्यूनतम कोटा मुहैया करा दें और काम करने व पितृवत देखरेख से जुड़े अपने तमाम आदेशों को स्थगित कर दें. आप देखेंगे कि वह कई-कई दिनों तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकलेगा और कंप्यूटर स्क्रीन से चिपका रहेगा. न तो वह स्कूल का होमवर्क करेगा और न ही घर का काम. स्कूल से बंक मारेगा, लंच-डिनर नहीं करेगा और हो सकता है नहाना और सोना भी छोड़ दे. इसके बावजूद वह बोर नहीं होगा और न ही उसे जीवन बेमतलब लगेगा. कम से कम कुछ समय के लिए तो आप यह मान ही सकते हैं.
इसलिए कार्य-विहीन दुनिया के बेकाम हो चुके वर्ग को जीवन के मकसद का अहसास कराने में वर्चुअल रियलिटी एक महत्वपूर्ण उपकरण बनने जा रही है. संभव है ये वर्चुअल रियलिटी कंप्यूटर के भीतर पैदा हो. यह भी हो सकता है कि यह किसी नए धर्म और विचारधारा की शक्ल में कंप्यूटर के बाहर पैदा हो. यह भी संभव है इन दोनों के संगम से कोई चीज़ तैयार हो. संभावनाएं असीमित हैं और पक्के तौर पर कोई नहीं जानता कि 2050 में हमें किस किस्म के डीप प्ले व्यस्त रखेंगे.
किसी भी हाल में, कार्य की समाप्ति का यह कतई मतलब नहीं कि मकसद का भी अंत हो जाएगा. क्योंकि मकसद काम से नहीं बल्कि कल्पनाओं से पैदा होता है. काम मकसद के लिए ज़रूरी है यह सिर्फ कुछ विचारधाराओं और जीवनशैलियों का ही दावा है. अठारहवीं सदी के ग्रामीण अंग्रेज जमींदार, आज के अति-रूढ़िवादी यहूदी और सभी युगों व संस्कृतियों के बच्चे बिना काम किये जीवन में ढेर सारा मकसद और मज़ा पाते रहे हैं. 2050 के लोग शायद ज्यादा गहरे डीप गेम्स को खेलने और इतिहास के किसी भी दौर से ज्यादा जटिल आभासी दुनिया को गढ़ पाने में कामयाब होंगे.
लेकिन सत्य का क्या होगा? वास्तविकता का क्या होगा? क्या हम ऐसी दुनिया में रहना चाहेंगे जहां अरबों लोग कल्पना लोक में डूबे हों, खुद के गढ़े उद्देश्यों में विश्वास रखते हों और काल्पनिक नियम-कानूनों का पालन करते हों? आप इसे पसंद करें या न करें, हम हजारों सालों से ऐसी ही दुनिया में रहते आ रहे हैं.

युवाल नोह हरारी यरूसलम स्थित हिब्रू यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. उनकी दो किताबें- सेपियंस: अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमनकाइंड और होमो डयूस: अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टुमारो काफी चर्चित रही हैं.
(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)