Friday, August 4, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - पच्चीस



हल्द्वानी के दो लौंडों द्वारा पूरी जीप बुक करा कर बागेश्वर पहुँचने का समाचार सूबेदार ने शहर में यथासंभव प्रसारित कर दिया. कत्यूर बाज़ार में होटल और दुकान के लिए साग-सुल्फा खरीद कर लौट रहा बचेसिंह इस बाबत सूचित हो सकने से पहले ही अस्थाई वी आई पी का दर्ज़ा प्राप्त कर चुका था. होटल के बाहर सुदूर पहाड़ी कस्बे के जीवन की एकरसता से अघाए आठ-दस नगरवासी कुछ दिलचस्प देखने-घटने की प्रतीक्षा करते छोटा-मोटा मज़मा सजा चुके थे. होटल के स्टाफ के दो-तीन सदस्य सलाहकार बने हुए इस मजमे को इतनी जानकारी दे चुके थे कि उक्त लौंडे बचिया अर्थात बचेसिंह से मिलने की मंशा रखते हैं. बचेसिंह जैसे बेमतलब इंसान से मिलने पूरी जीप बुक करा कर भी कोई बागेश्वर आ सकता है फिलहाल वार्ता इस विषय पर चल रही थी. लोग अपने विचार प्रकट करते जाते और कनखियाँ होटल के भीतर चाय पी रहे परमौत और गिरधारी लम्बू पर लगाए रहते. दूर से बचेसिंह के नमूदार होते ही सम्मलेन तितरबितर हो गया और बचदा आ गया बचदा!कहता हुआ एक छोकरा-बैरा होटल की ओर लपका ताकि घटनाक्रम में अपनी उपस्थिति के महत्व को दर्ज़ करवा सके.

बचेसिंह ने इस बात की तस्दीक की वह नवीन लाल अर्थात नब्बू डीयर को अच्छी तरह जानता था और यह भी कि वह पिछले हफ्ते भर से बिस्तर में पड़ा हुआ था. समय, काल और परिस्थिति के मुताबिक़ बचिया, बचदा और बचेसिंह के नामों से संबोधित किया जाने वाला पैंतालीस-चालीस की ज़द में आया हुआ बचेसिंह पहली निगाह में पचास-पचपन का लगता था. जीवन ने उसे इतनी लातें मारी थीं कि वह कैसी भी खबर से उत्साहित या हतोत्साहित नहीं होता था. परमौत और गिरधारी के साथ बातें करते हुए भी उसके भीतर कुछ विशेष हलचल नहीं हुई और उसने इतना भर जाना कि इन लोगों का नब्बू से कुछ ज़रूरी काम रहा होगा. वह बिना किसी तरह की दिलचस्पी ज़ाहिर किये होटल के बाहर रखे उनके सामान की तरफ देखने लगा. परमौत और गिरधारी ने उस से गाँव की लोकेशन वगैरह जाननी चाही और कहा कि वे फ़ौरन से पहले नब्बू डीयर के पास पहुँचना चाहते थे. उनके इस आग्रह ने पहली बार बचेसिंह के मन में उनके लिए थोड़ी सम्वेदना पैदा की और उसने पूछा - "मल्लब ये सामान भी ले जाओगे अपने साथ?"

"हाँ फिर ..." गिरधारी बोला.

"झिंगेड़ी मल्लब नहीं भी होगा तो यहाँ से चार मैल तो होगा ..." मैल से उसका अभिप्राय मील से था "... पैदल ही जाना हुआ ... गाँव हुआ ... जैसा कहते हो आप लोग फिर ..." अपनी बात को हवा में टांग कर वह फिर से सामान को देखने लगा. कुछ पल सोचने के बाद उसने प्रस्ताव दिया कि यदि वे लोग एक-डेढ़ घंटा प्रतीक्षा कर सकें तो वह स्वयं उन्हें नब्बू के गाँव ले चलेगा. तीन जने होंगे तो बोझा ले जाने में आराम होगा. वह खुद नब्बू के अगले वाले गाँव में रहता था और वहां से रोज़ बागेश्वर आना-जाना करता था. गिरधारी लम्बू और परमौत के पास और कोई चारा भी न था. 

सामान वहीं छोड़ वे बागेश्वर भ्रमण पर निकल गए. सरयू नदी के तीर बसे इस नगर के पेचीदा लगने वाले जुगराफिये को समझने-समझने में ही उन्हें डेढ़ घंटा बीत गया. शाम ढलने को थी सो वे वापस अपने ठिकाने पहुंचे जहां शाम की पाली की कैजुअल लीव लेकर उन्हें नब्बू डीयर के गाँव झिंगेड़ी ले चलने को बचेसिंह तत्पर बैठा था. " ... मैं समझ रहा था कहीं भबरी तो नहीं गए आप लोग ..." कहते हुए उसने सामान से भरे दोनों कट्टे अपनी पीठ पर लादने का उपक्रम शुरू ही किया था कि परमौत बोला - "अरे कोई डोटियाल-होटियाल कर लेते हैं बचदा ... छोड़ो इस को ..."

बचेसिंह ने प्रतिवाद नहीं किया और सामान नीचे रख दिया. उसकी सपाट बुद्धि ने उसे बताया कि जो आदमी पूरी जीप बुक कर  सकता है उसके पास डोटियाल को देने को दस-पंद्रह रुपए भी होंगे ही.

"... एक घंटा लग जाएगा हाँ ... मल्लब पैदल रस्ता हुआ ..." यात्रा प्रारम्भ हुई. डोटियाल अर्थात नेपाल से काम की तलाश में आए एक लड़के को अपनी रफ़्तार से चलने और झिंगेड़ी में रिपोर्ट करने का आदेश देकर बचेसिंह उनके साथ चलने लगा. बचेसिंह कम बोलता था और पूछे जाने पर ही जवाब देता था. अलबत्ता नगर की सीमा समाप्त होने से पहले उसने पूछ लिया - "कुछ सामान-हामान और तो लेना नहीं लेना हुआ आप लोगों ने ... वहां कुच्छ नहीं मिलने वाला हुआ ... गाँव हुआ ..."

परमौत और गिरधारी ने एक दूसरे पर एक निगाह डाली और तय किया कि उन्हें कुछ और खरीदारी नहीं करनी है. उन्हें देखकर आख़िरी चेतावनी जैसी देते हुए बचेसिंह ने दोहराया - "मल्लब बीड़ी-सिरगट-पान-तमाकू कुच्छ ढंग का नहीं मिलने वाला हुआ हाँ वहां ..."

इस जोर देकर कहे गए 'कुच्छ नहीं' से बचेसिंह का अभिप्राय अब जाकर परमौत की समझ में आया और उन्होंने वापस बाज़ार का रुख कर इमरजेंसी के हिसाब के लिए बीड़ी-सिरगट-पान-तमाकू अर्थात एक बोतल समझ ली. शहर छोड़ते ही उनके चारों तरफ केवल सुन्दर प्रकृति थी. परमौत और गिरधारी लम्बू एक युग के बाद किसी पहाड़ी रास्ते पर पैदल चल रहे थे और उनके क़दमों में लम्बे सफ़र के बावजूद उत्साह बना हुआ था. परमौत का बैग बचेसिंह ने जिद करके ले लिया था. अपने बीमार सखा और उसके परिवार की बाबत उन्होंने बचेसिंह से थोड़ी बहुत जानकारियां हासिल कीं. पिताजी को लकवे का दौरा पड़ने के बाद नब्बू डीयर  और उसकी माँ दोनों को गाँव वापस आना पड़ा था.

एक साल पहले बागेश्वर से कुछ ही दूरी पर स्थित उसके ननिहाल में कप्तान मामा के खेतों में ए ग्रेड खड़िया की खान निकल आयी थी, हाल ही में जिसकी खुदाई का पट्टा उन्होंने इधर-उधर की जुगत से हासिल कर लिया था. उन्होंने सुन रखा था कि खड़िया और ख़ास तौर पर ए ग्रेड वाली खड़िया के काम में मोटा पैसा था. खड़िया की खुदाई शुरू होने के हफ्ते भर बाद जब फ़ौजी मामा को अपनी बहन के घर पर पड़ी विपदा की जानकारी मिली उन्होंने परिवार की भरसक मदद तो की ही, हल्द्वानी से लौटकर आये अपने इंटर पास भांजे यानी नब्बू को अपने पास बुला लिया कि खड़िया का काम देखने में उनकी मदद करे. महीने भर तक नब्बू ने वहां जाकर काम किया भी लेकिन नब्बू डीयर की झगड़ालू मामी के कोपभवन में चले जाने के कारण उन्हें नब्बू को वापस भेजना पड़ा. वहां से लौटने के बाद से ही नब्बू ने खटिया पकड़ ली थी.

खड़िया का नाम सुन कर गिरधारी लम्बू की दिलचस्पी में खासा इजाफा हुआ और उसने बचेसिंह से पूछा - "यार बचदा, मामू का कितने ट्रक माल जा रा होगा एवरेजन मल्लब एक महीने में हल्द्वानी ..."

"टरक-हरक का तो पता नहीं हो सैप लेकिन बुड़ज्यू ने दो ही म्हैने में खूब दल्ल-फल्ल कर दी है बल. खूब काजू-बादाम ले जा रहा बुड्ढा हर हफ्ते बागेश्वर बजार से ..."  

"एक गाड़ी में सब लगा-लुगू के पांच हज्जार बच रहे हैं बल यार परमौद्दा ... पांच हज्जार! ... समज रये हो ..." वह परमौत को भी इस वार्तालाप में शामिल करवाना चाहता था. "लॉटरी लग गयी यार नबदा के मामू की ... एक हमारे मामू हैं साले तीस साल से बेरोजगार हमारे घर में पड़े हुए हैं ..." गिरधारी लम्बू चाहता तो अपने नाकारा मामू की शान में पढ़े गए बासी पड़ चुके तमाम कसीदों को दुबारा से पढ़ सकता था लेकिन उसने खुद ही इस विषयांतर पर लगाम लगाई और वार्तालाप को वापस हिल्ले से लगा कर बोलना जारी रखा - "... अरे परमौद्दा यार वो मेहता नईं है मेहता! अरे वो सखावतगंज वाला ... जिसका बड़ा भाई तेरे परकास दाज्यू का दोस्त है ... देखा नहीं कैसी बड़ी बिल्डिंग खड़ी कर रखी है साली नैनताल रोड में दो साल में उसके बाप ने ... उनके वहां भी खड़िया निकल गयी थी बागेश्वर गाँव में बता रहे थे ... साला बड़े नोट चूट दिए खड़िया वालों ने यार ..."

इधर के दो-चार सालों में खड़िया के खेल के चक्कर में कैसे-कैसों के वारे-न्यारे हो चुकने की खबरें छिटपुट खबरें परमौत ने भी सुन रखी थीं और उसे भान था कि ऐसी सारी खबरों का उत्स बागेश्वर के इलाके में कहीं मौजूद था. उसने मुंडी झुकाए धीरे-धीरे अपने आगे चल रहे बेहद पराजित और दलिद्दर दिख रहे बचेसिंह को गौर से देखा जो गिरधारी लम्बू की बातों को सुनते हुए भी नितान्त असम्पृक्त बना हुआ बस चल रहा था. उसने नोटिस किया कि बचेसिंह जैसा दिख रहा था उसके बावजूद उसकी समूची देहभाषा में कुछ ऐसा था जो नब्बू डीयर की याद दिलाता था. उसने पंद्रह-बीस साल बाद के नब्बू डीयर की कल्पना करना शुरू किया तो उसे बचेसिंह दिखाई देने लगा. यह भयाक्रांत करने वाली छवि थी जिसे उसने दिमाग से झटक कर अलग किया और गिरधारी की बात सुनने लगा-          

"मैं तुम से कै रा हूँ  परमौद्दा अगर नबदा के मामू के खेत में थोड़ा भी ठीकठाक खड़िया निकल गयी ना ... और बचदा जैसा कह रहे हैं कि साली ए ग्रेड निकल रही है तो एक-आधा साल में समझ लो नबदा जो है राजा हो जाने वाला हुआ राजा ... इकलौता भाणिज हुआ अपने मामू का और मामू के मल्लब बच्चे-कच्चे हुए नहीं ... सब नबदा का ही हो जाने वाला हुआ लास्ट में ..."

इस बात से परमौत सहमत नहीं हुआ. उसने प्रतिवाद करते हुए कहा - "ऐसे भी साले दानी मालदार नहीं हो रहे नब्बू के मामू ... हफ्ते भर से लौंडा बीमार पड़ा है उसको हल्द्वानी नहीं ला सकते थे एक बार को यार ... अबे हल्द्वानी छोड़ साला अल्मोड़े ही ले आते ..."

परमौत के क्षोभ को समझते हुए गिरधारी ने सफाई दी - "बता तो रहे हैं बचदा ना कि अपने यहाँ बुला लिया था नबदा को बल ... अब वो वापिस आ गया तो कोई बात तो हुई होगी ना साली ... कुछ न कुछ पेंच लगा दिया होगा पैन्चो ... खुड़बुद्धि तो पैले ही से हुआ ..."

इस बार बचेसिंह ने प्रतिवाद किया - "ना सैप ना. ऐसा कुच्छ जो क्या हुआ ठैरा. नवीन तो भौत्ती होनहार लौंडा हुआ पूरे खानदान का ... वो जल्लाद औरत नहीं है उसकी मामी ... उसी ने किया रहा सब ... उसका तो ऐसा बताते हैं कि जहां जाती है वहां नरक बन जाने वाला हुआ ... नवीन तो बड़िया लौंडा हुआ ... सब की ह्यल्प करने वाला हुआ हर बखत ...  और मामू तो उस के और गजब हुए ... देवता जैसे हुए बिचारे.  उन्होंने तो कितनी बार कहा नवीन से बल कि नवीनौ बुरा मत मान बुड़िया के कुकाट का लेकिन बिचारा कब तक नहीं मानता ... अरे यहाँ बिचारे की अकेली बुड़िया इजा हुई... बाबू का टट्टी-पिसाप सब बिस्तरे में हुआ ... अब हप्ते में एक-दो बार तो घर आना हुआ ना उसने ... मामी कहने वाली हुई नौकरी करता है तो नौकर के जैसे रौ ... मल्लब एक म्हैने में एकी बार घर जा. बस हो गयी बात खत्तम! अरे सैप आप बताओ ... आप लोग तो समजदार लोग हुए. अरे ऐसे कोई नौकरी कराता है अपने भाणिज से ... मल्लब ... छोड़ आया बिचारा नौकरी-फौकरी जो भी हुआ ..."

बचेसिंह द्वारा नवीनलाल उर्फ़ नब्बू डीयर की तारीफ़ में कहे गए इन निस्वार्थ शब्दों को सुनकर गिरधारी और परमौत दोनों को अच्छा तो लगा लेकिन उसके घर की हालत की जानकारी ने उन्हें मन ही मन हिला कर रख दिया. इस दोचित्तेपन में उन्होंने अपने आसपास का जायजा लेना शुरू किया. शाम गहराने लगी थी. बचेसिंह की तरह बागेश्वर में छोटे-मोटे काम करने वाले आसपास के गाँवों के लोग अपने घरों को जा रहे थे. एक मोड़ पर थोड़ी सी खाली-पसरी जगह को क्रिकेट और गुल्ली-डंडा के मैदान में तब्दील कर खेल रहे चीखते-चिल्लाते छोकरों की पुकारें बता रही थीं कि वे जल्द से जल्द अपने-अपने खेल समेटते घरों को लौटने की तैयारी में थे. किस्म-किस्म के संबोधनों से अपने मवेशियों को पुकारती औरतें-किशोरियां उन्हें हंकाती हुई ले जा रही थीं. अपनी ड्यूटी बजाने बजाने का आनंद लेते और बेमतलब भूंकते हुए उनके उतने ही किस्म के कुत्ते पीछे-पीछे रुकते-चलते आ रहे थे. इस दृश्य में एक ख़ास किस्म की रूमानियत थी जो काफी समय के बाद शहर से गाँव आ रहे आदमी को भयंकर तरीके से विह्वल बना देती हैं. नब्बू के घर के रास्ते लगे परमौत और गिरधारी के साथ भी ऐसा ही हुआ.

शहर से आया होने के नाते बचेसिंह उन्हें 'एनीवन फ्रॉम आउट ऑफ़ टाउन इज एन एक्सपर्ट' की तर्ज़ पर बड़ा-बुद्धिमान और रईस समझ रहा था. वहीं शहर से आये इन दो दोस्तों के भीतर बचेसिंह और अपने आसपास दिख रहे सभी लोगों के प्रति एक ख़ास किस्म की एक्स्टेम्पोर करुणा उपज रही थी और वे घंटे भर के पैदल सफ़र में गाँव के जीवन की सारी तकलीफों और जटिलताओं को न सिर्फ समझ लेना चाहते थे बल्कि उन सब के लिए 'कुछ करना है' की सार्वभौमिक फर्जी उदात्तता से भरते भी जा रहे थे.

भावनाओं की इसी ओवरडोज़ के चलते गिरधारी ने बचेसिंह से, जो पिछले पांच मिनट से चुप हो गया था, पूछा - "तुम्हारे बच्चे-हच्चे कां हुए बचदा ... मल्लब यहीं हुए गाँव में ... स्कूल पड़ते होंगे ना?"

अगले पंद्रह मिनट तक बचेसिंह ने अपनी आत्मकथा का एब्रिज्ड एडीशन पेश किया जिसने उक्त ओवरडोज़ को डबल बनाने का काम किया. दस साल पहले बचेसिंह की पत्नी चौथी बच्ची के जन्म के बाद भगवान की प्यारी हो गयी थी. परिशिष्ट के तौर पर उक्त पत्नी और इन चारों बच्चियों के संक्षिप्त जीवनवृत्त भी सुनाए गए और होटल में छः सौ रुपये की पगार से जैसे-तैसे काटे जा रहे कठिन जीवन के विवरणों को इस ब्रह्मवाक्य से समाप्त किया गया कि होना तो वही है जो रामचन्द्र जी ने एडवांस में रच रखा है अर्थात संसार एक मिथ्या है जिसमें अपने हिस्से का कष्ट झेलते चले जाने में ही मनुष्य का इकलौता कर्तव्य है.

एक जुगाड़ साइनबोर्ड बता रहा था कि झिंगेड़ी गाँव आ गया था और इसके पहले कि इस अतीव त्रासद एकालाप के बाद परमौत और गिरधारी किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देते, एक खतरनाक ढाल वाली पगडंडी पकड़ते हुए बचेसिंह ने उन्हें एक छोटा झटका सा दिया जिसके लिए उस क्षण उनकी भावनात्मक तैयारी शून्य थी - "जरा आराम से आना हाँ हो सैप ... बस ये नीचे वाला हुआ नवीन का घर!"  

(जारी)   

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत बढ़िया।

Pushpendra Dwivedi said...

waah bahut khoob bahut badhiyaa lekh

DOI said...

बच दा ओ बच दा..