Wednesday, January 3, 2018

एक किताब के अनुवाद की कहानी



ठीकठीक याद नहीं पड़ता विन्सेन्ट वान गॉग की कला से पहला साक्षात्कार कब हुआ था लेकिन उसके ब्रश के गाढ़े, जल्दीबाज़ी में से लगाए गए स्ट्रोक्स याददाश्त में तुरन्त दर्ज़ हो गए होंगे. शायद यही वजह रही होगी कि बारहवीं कक्षा पास करते न करते इरविंग स्टोन की लिखी उसकी जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' मेरी सर्वप्रिय पुस्तकों की लिस्ट में सबसे ऊपर आ गई - आएन रैन्ड की 'फ़ाउन्टेनहैड' से भी ऊपर जिसका विद्रोही वास्तुशिल्पी नायक हावर्ड रोर्क साथ के लड़कों का हीरो बना रहा.

कुछ ही वर्षों के बाद पॉकेटमनी से बचाए गए पैसों की बदौलत मेरे संग्रह में विन्सेन्ट वान गॉग की पेन्टिंग्स वाली चार-पांच मोटी कॉफ़ी टेबल बुक्स आ चुकी थीं . 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' दो या तीन बार और पढ़ी जा चुकी थी - हालांकि पढ़ने का शऊर तब भी नहीं आया था.

विन्सेन्ट सम्भवतः एक स्वप्नदृष्टा, रोमान्टिक और अतिसंवेदनशील चित्रकार के ही तौर पर मेरे भीतर बना रहता यदि उन्हीं दिनों मुझे उसके और उसके छोटे भाई थियो के बीच चले अद्वितीय और ऐतिहासिक पत्र-व्यवहार 'द लैटर्स ऑफ़ विन्सेन्ट वान गॉग' की सूरत में न मिले होते. पत्रों की तरतीब बताती है कि ये 1872 से लिखे जाने शुरू हुए थे और विन्सेन्ट की मृत्यु के कुछ दिन पहले तक लिखे जाते रहे. 1872 में विन्सेन्ट कुल उन्नीस साल का था और थियो पन्द्रह का.

इन पत्रों से विन्सेन्ट की जो छवि उभरती है वह ऐसे सहृदय व्यक्ति की है जो प्रेम से लबालब भरा हुआ था, दूसरों की हर ज़रूरत का भरसक ध्यान रखने की कोशिश करता था, जो एक विनम्र पारिवारिक व्यक्ति बना रहना चाहता था और जिसके भीतर कला के इतिहास और समकालीनता की गहरी समझ थी.

1872 और 1873 में लिखे गए उसके शुरुआती पत्र उसकी कला-मर्मज्ञता की बेहतरीन मिसालें हैं. दीगर है कि तब तक यही तय था कि भविष्य में दोनों भाइयों ने यूरोप भर मैं फैले वान गॉग परिवार के कला-व्यवसाय का प्रबन्धन सम्हालना था. विन्सेन्ट ने सपने में भी शायद नहीं सोचा था कि एक दिन वह चित्रकार बनने वाला है. बीस जुलाई 1873 को लन्दन की गूपिल्स गैलरी में बैठा वह अपने प्यारे भाई को लिखता है -

"शुरू शुरू में मुझे अंग्रेज़ों की कला पसन्द नहीं आई; उसकी आदत डालनी पड़ती है. लेकिन यहां कई सारे अक्लमन्द कलाकार हैं. उनमें से एक हैं मिलाइस जिन्होंने 'द हैगनॉट' और 'ओफ़ीलिया' जैसी पेन्टिंग्स बनाई हैं. ये ख़ूबसूरत कलाकृतियां हैं. फिर बोटन हैं जिनकी 'प्योरिटन्स गोइंग टु चर्च' हमारी गैलरी में है; मैंने उनकी बनाई बेहतरीन कलाकृतियां देखी हैं. पुराने कलाकारों में एक लैन्डस्केप आर्टिस्ट था - कॉन्स्टेबल. वह करीब तीस साल पहले तक जीवित था; उसका काम शानदार है; उसका काम शानदार है - वह मुझे डायज़ और डॉबिन्जी की याद दिलाता है. फिर रेनॉल्ड्स और गेन्सबरो हैं जिनकी ख़ूबी सुन्दर स्त्रियों के पोर्ट्रेट्स हैं और टर्नर. उसकी एन्ग्रेविंग्स शायद तुमने देखी हैं."

पत्र में आगे वह थियो को नए फ़्रांसीसी चित्रकारों से परिचित कराता है. ऐसे ढेरों पत्रों का सिलसिला है जो करीब सत्रह साल चला. अपने काम के प्रति विन्सेन्ट वान गॉग कितना सचेत और ईमानदार था, इन पत्रों से जाना जा सकता है.

द लैटर्स' पढ़ने के बाद विन्सेन्ट के प्रति श्रद्धा और बढ़ी. फिर किसी ने कहीं से लाकर 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' फ़िल्म की वीडियो कैसेट लाकर दी. 1956 में बनी इस अमरीकी फ़िल्म में मशहूर कलाकारों कर्क डगलस और एन्थनी क्विन ने क्रमशः विन्सेन्ट वान गॉग और पॉल गोगां की भूमिकाएं की हैं. सच तो यह है कि किताब के आगे फ़िल्म कहीं नहीं ठहरती गोकि कर्क डगलस और एन्थनी क्विन का काम बेमिसाल है. जाहिर है फ़िल्म देखने के बाद किताब एक बार और पढ़ी गई.

1999 में एक शानदार डॉक्यूमेन्टरी हाथ लगी - डच ऑस्ट्रेलियाई मूल के फ़िल्मकार पॉल कॉक्स की 'द लाइफ़ ऐन्ड डैथ ऑफ़ विन्सेन्ट वान गॉग'. कैमरा उन तमाम जगहों पर जाता है जहां विन्सेन्ट ने चित्र बनाए थे - खेत, झोपड़े, शराबख़ाने, गिरजाघर वगैरह, मानो कलाकार की रचनाप्रक्रिया में प्रवेश करने की कोशिश की जा रही हो. कैमरा अचानक स्टिल होता है और लैन्डस्केप विन्सेन्ट की पेन्टिंग में तब्दील हो जाता है.

विन्सेन्ट वान गॉग को समझने के लिए इन के अलावा एक और ज़रूरी फ़िल्म है 'विन्सेन्ट एन्ड थियो'. रॉबर्ट आल्टमान द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में टिम रॉथ ने विन्सेन्ट की भूमिका निभाई है. पके गेहूं का एक शानदार खेत है जो अपना चित्र बनाए जाने की मांग कर रहा है. विन्सेन्ट के सामने एक खाली कैनवस है पर उसे जैसे लकवा मार गया है और वह पहली और आखिरी बार हार मान लेता है. फिर आपको दिखता है सड़ गए दांतों वाला अपने भाई की गोद में मर रहा चीथड़ा हो चुका विन्सेन्ट वान गॉग. इन्हीं दिनों मैंने विन्सेन्ट को समर्पित डॉन मैक्लीन का गाया गीत 'स्टारी नाइट' सुना जिसके बोल यूं हैं:

... Now I understand what you tried to say to me
How you suffered for your sanity
How you tried to set them free
They would not listen, they did not know how
Perhaps they will listen now ...

इसके अलावा अकीरा कुरोसावा की 'ड्रीम्स' सीरीज़ में विन्सेंट पर बनी दस-बारह मिनट की अलौकिक फिल्म, जिससे मेरा परिचय आदरणीय मंगलेश डबराल ने कराया, भी अपना काम कर चुकी थी.

'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' को हिन्दी में अनूदित करने का विचार पहले कभी इसलिए नहीं आया था कि मुझे पक्का यकीन था किसी न किसी ने यह कार्य कर ही दिया होगा. हो सकता है किया भी हो पर मेरे किसी भी परिचित को इस बारे में अधिक जानकारी न थी. 2001-2002 की अपनी वियेना यात्रा के दौरान मुझे वहां के लियोपॉल्ड म्यूज़ियम में उन दिनों विशेष रूप से प्रदर्शित की जा रही विन्सेन्ट वान गॉग के चित्रों की प्रदर्शनी देखने का सुअवसर मिला.

लियोपॉल्ड म्यूज़ियम में ख़ासतौर पर 'स्टारी नाइट' श्रृंखला की तीन-चार पेन्टिंग्स को घंटों तक देखने के अनुभवकी स्मृति से अब भी झुरझुरी सी उठती है. कागज़ पर या फ़िल्म में देखी हुई उसकी पेन्टिंग्स को अपनी आँखों के सामने देखने का अनुभव पहले तो चमत्कृत करता है लेकिन काफ़ी देर तक उन्हें देखने के बाद आपको इस अज़ीम कलाकार के जीवन के सारे पड़ाव याद आते हैं - द हेग, लन्दन, बोरीनाज की कोयला खदानें, ज़ुन्डर्ट, उसके माँ-बाप, थियो, पेरिस, तुलूस लौत्रेक, पॉल गोगां, आर्लेस और सां रेमी का वह जंगल जहां आख़िरकार उसने अपने सीने में गोली मार ली थी.

इतना सुन्दर आदमी और ऐसे अकल्पनीय दर्द से भरा उसका जीवन जिसमें वह किसी स्त्री से सच्चा प्रेम नहीं पा सका. सम्भवतः लियोपॉल्ड म्यूज़ियम की वह दोपहर 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' के त्वरित अनुवाद का जरिया बनीं मैंने तय कर लिया था कि भारत लौटते ही इस कार्य को अंजाम दे दिया जाना है.

चारेक सौ पन्नों की किसी प्रिय किताब के अनुवाद का ज़िम्मा उठाने का मतलब था कि यदि अनुशासन के साथ काम न किया गया तो किताब कुछ साल भी ले सकती थी या शायद अधूरी रह जानी थी. चूंकि यह कार्य मैं अपनी मर्ज़ी से विन्सेन्ट वान गॉग के प्रति अपने आदर के कारण कर रहा था सो किसी प्रकाशक वगैरह की मांगों या घुड़कियों का भय नहीं होने वाला था.

अनुवाद प्रारम्भ करना शुरू करने वाले दिन की स्मृति अब भी बिल्कुल ताज़ा है. मेरा दिल चकनाचूर था और भयानक हताश मनःस्थिति में नैनीताल से हल्द्वानी आ रहा था. नैनीताल से करीब सात-आठ किलोमीटर आगे नैनागांव नाम की एक जगह है. छोटा सा गांव है और गांव के बग़ल में एक हरी पहाड़ी. इस पहाड़ी पर पेड़ बहुत कम हैं लेकिन उस पर उगी रहने वाली घास साल भर में पता नहीं कितने रंग बदला करती है. मैं बचपन से ही उस हरी पहाड़ी के सम्मोहन से बंधा हुआ था. अब तो वह मेरे लिए और भी ज़्यादा ज़रूरी हो गई है. मेरे साथ एक दोस्त भी था. मोटरसाइकिल रोकी गयी और पता नहीं किस आवेश में मैंने अपने दोस्त से कहा कि मैं पहाड़ी पर चढ़ने जा रहा हूं. उसकी समझ में ज़्यादा नहीं आया पर उसने भी साथ चढ़ने की इच्छा जताई. काफ़ी तीखी चढ़ाई के बाद हल्का सा ढाल था और फ़िर एक छोटा सा मैदान. तीनेक बच्चे अपने खेलकूद में लगे हुए थे. एक औरत गेहूं के एक ढेर को साफ़ कर रही थी. एक आदमी बन्दगोभियों से लदी एक टोकरी लेकर उसी पहाड़ी पर उतर रहा था. मैं काफ़ी देर तक इस पूरे दृश्य को देखता रहा.

दो बजे तक हम हल्द्वानी पहुंच गए. हम दोनों में इस बारे में कोई आज तक कभी कोई वार्तालाप नहीं हुआ.

मुझे याद है मई का महीना था और मरम्मत के वास्ते आधे घर का फ़र्श उखड़ा हुआ था. फ़र्श खुदे कमरों का सामान बाकी कमरों में ठूंस दिया गया था. खूब गर्मी पड़ रही थी और पत्थर की घिसाई की कर्कश आवाज़ से घर भरा हुआ था. करीब आधे घन्टे में इस पागलपन के बीच मैंने 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' खोज निकाली. किसी एक कमरे में लिखने-बैठने को छः-आठ फुट जगह बनाई और आधी रात के बाद तक उसका अनुवाद करता रहा. उसके बाद अगले दिन से मैंने अपने ऊपर नियम यह लागू किया कि ठेकेदार-मज़दूरों को सुबह ही सारी ज़रूरी हिदायात देने के बाद पिछले दिन से ज़्यादा काम करके ही सोना है. तब मुझे कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखना नहीं आता था. जाहिर है उंगलियां टूट जाया करती थीं पर एक पागलपन सा सवार रहता था. मुझे अब तक नहीं पता क्या कैसे होता गया पर पूरी किताब के अनुवाद का पूरा पहला ड्राफ़्ट उसी कोने में उन्नीस दिन में पूरा हुआ.

काम पूरा करके मैं उसी शाम वापस उसी पहाड़ी पर गया. न बच्चे खेल रहे थे, न कोई स्त्री गेहूं साफ़ कर रही थी न कोई आदमी बंदगोभियों की टोकरी लादे चढ़-उतर रहा था. बहुत देर तक बैठा रहा. उस पहाड़ी का हरा रंग ज़्यादा समझ में आ रहा था और अहसास हो रहा था जैसे दिल से टनों बोझा उतर गया.


फिर मेरी बेपरवाही के चलते वह पाण्डुलिपि सालों तक वैसी की वैसी धरी रही. एक बार वीरेन डंगवाल और आनन्द स्वरुप वर्मा हल्द्वानी मेरे घर आए तो मैंने इस बारे में उन्हें बताया. वीरेनदा के कहने पर उसे एक बार और ठीक करने की प्रक्रिया चल ही रही थी कि संवाद प्रकाशन ने विश्व साहित्य के अनुवाद की अपनी योजना के लिए उसे मांगा और कुछ महीनों बाद वह किताब विन्सेन्ट के सेल्फ़ पोर्ट्रेट के क्लोज़ अप वाले आवरण के साथ दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में पढ़ने वालों के लिए आ चुकी थी.

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

वाह

विकास नैनवाल said...

रोचक....

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’अंधियारे में शिक्षा-ज्योति फ़ैलाने वाले को नमन : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

अनूप शुक्ला said...

बहुत खूब । इसको पढना है इसी साल ! :)