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Thursday, January 7, 2016

शब्दों के समाजशास्त्र में साहेब, साहिब, साहिबा

आम बोलचाल में साहब का अर्थ मान्यवर, श्रीमान या महोदय की तरह होता है. अपने से बड़े, वरिष्ठ और सम्माननीय व्यक्ति को भी साहब कहा जाता है. साहब का सायबा रूप संगी, हमजोली, सहचर को सही ढंग से अभिव्यक्त करता है. दरअसल अंग्रेजी की प्रसिद्ध टर्म फ्रैंड, फ़िलास्फर, गाइड का समन्वय है अरबी का साहिब. दरअसल स्वामी, मालिक, सर्वशक्तिमान जैसे रूढ़ अर्थों में हिन्दी में साहब शब्द का प्रयोग बहुत कम होता है. साहब वह है जो पढ़ा-लिखा है. उच्चाधिकारी है. आदरणीय है. हिन्दी में साहिब का स्त्रीवाची साहिबा होता है जबकि मराठी में साहेबीण. फ़ारसी में साहिब का साहेब रूप प्रचलित है जबकि तुर्कीश में यह साहिप हो जाता है. मराठी ने फ़ारसी के साहेब को अपनाया. यह साहेब शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के लिए इस क़दर रूढ़ हो गया कि कई प्रगतिशील खुद को साहब कहलाना पसंद करते हैं, पर जैसे ही उन्हें साहेब कहा जाए तो बिदकते हैं. यह शब्दों का समाजशास्त्र है. हिन्दी में संग, साथ के लिए सोहबत शब्द भी खूब इस्तेमाल होता है. अरबी/उर्दू में यह सुहबत है. सुहबत की रिश्तेदारी भी साहिब से है क्योंकि दोनों का मूल साद-हा-बा अर्थात ص/ح/ب ही है जिसमें संगत का भाव है. दुनियाभर के तमाम धर्मों में संगत का बड़ा महत्व है. ज़रूरी नहीं कि साथी कोई व्यक्ति ही हो. संगत के आध्यात्मिक अर्थ हैं. पुस्तकों से लेकर विचारों तक का साथ मनुष्य के जीवन को उत्कर्ष की ओर ले जाता है. यह साथ पथप्रदर्शक होता है. बाइबल, गीता, कुरान अपने अपने धर्मों की पथप्रदर्शक ही हैं. सिख धर्म के प्रमुख ग्रन्थ के साथ साहिब शब्द तो सब कुछ साफ-साफ कह रहा है. ग्रन्थ ही साहिब अर्थात पथप्रदर्शक हैं. वैसे संगी का एक अर्थ जोड़ीदार भी होता है इसलिए सोहबत में संगत के साथ साथ स्त्री-पुरुष का मेल, समागम-सम्भोग जैसे भाव भी हैं. आज से क़रीब सत्तर साल पहले तक साहब से बने करीब साहब से बने दर्जनों युग्मपद हिन्दुस्तानी में प्रचलित थे जैसे साहिबे-आलम, साहिबे-दौलत, साहिबे-नसीब आदि. मद्दाह साहब के कोश में इस तरह के अस्सी से ज़्यादा युग्मपदों का इंदराज है.

Wednesday, October 24, 2007

सफर से कबाड़खाने तक .

साहबान , हम तो यूं उकताए से बैठे थे:

कोई दोस्त है रकीब है

तेरा
शहर कितना अजीब है...

यूं कोसने वाली नस्ल के हम नहीं हैं मगर मायूसी में खिसियाने लगते हैं। यही कोई चार महिने पहले इधर कबाड़ की दुकान खोली थी ।
शब्दों के सफर का बोर्ड भी लटका दिया। उधर से सरे राह पंडित अभय तिवारी गु़ज़रे तो अपनी दुकान पर भी हमारे कबाड़ का सैम्पल लगा दिया। हम तो प्रसन्न भए पर बेनामियों को रंज हो गया। ये क्या शब्द -वब्द ? बडे़ लोग कर गए है सब। लीद वीद हटाने जैसा कछु कछु बोलने लगे। हमे तो भई शौक है सो लिख रहे हैं। उधर से अब पंडित अशोक पांडे भी टकरा गए । अब अपने कबाड़खाने का माल आपके कबाड़खाने में डाल रहे हैं , हो सकता है ग्राहकी ज्यादा हो जाए :)

पेश है फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की चंद रुबाइयां -

किस प्यार से दे रही है मीठी लोरी
हिलती है सुडौल बांह गोरी-गोरी
माथे पे सुहाग आंखों मे रस हाथों में
बच्चे के हिंडोले की चमकती डोरी


किस प्यार से होती है ख़फा बच्चे से
कुछ त्योरी चढ़ाए मुंह फेरे हुए
इस रूठने पे प्रेम का संसार निसार
कहती है कि जा तुझसे नहीं बोलेंगे


है ब्याहता पर रूप अभी कुंवारा है
मां है पर अदा जो भी है दोशीज़ा है
वो मोद भरी मांग भरी गोद भरी
कन्या है , सुहागन है जगत माता

Monday, October 22, 2007

नए कबाड़ी का स्वागत

कबाड़खाने में आज एक बहुत शानदार कबाडी का आगमन हुआ है। अजित वडनेरकर जी का ब्लॉग ' शब्दों का सफर ' मुझे व्यक्तिगत रुप से हिन्दी का सबसे समृद्ध और श्रमसाध्य ब्लॉग लगता रहा है। उन से बहुत प्रभावित हूँ मैं। हालांकि उन से मेरी कोई मुलाक़ात वैसे नहीं है पर उनके काम को देख कर मुझे अच्छा लगा। कुछ दिन पहले मैंने उन्हें यहाँ भी कुछ उम्दा कबाड़ भेजने की दरख्वास्त की थी। मुझे आशा नहीं थी कि वे मेरे न्यौते को स्वीकार करेंगे। लेकिन आज वे यहाँ आ गए हैं और कबाड़खाना अपने को और अधिक समृद्ध देख कर प्रसन्न है। अजित भाई, तहे दिल से आपका शुक्रिया और कबाड़ी जमात में शामिल होने पर बधाई। कबाड़खाने के बाक़ी सम्मानित सदस्यों से मेरा अनुरोध है कि 'शब्दों का सफर' एक बार ज़रूर करें। फिर आप बार बार उस सफर का रुख करेंगे : मेरी ग्रांटी हैगी।