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Wednesday, August 21, 2013

जहाँ वे खड़े थे सबसे ज्यादा मज़बूती से, वहां से भी मिटा दिए गए उनके नामोनिशान


आदरणीय अग्रज श्री अफ़लातून ने डॉ दाभोलकर की हत्या की सिहरन को महसूस करते हुए अपने ब्लॉग पर पांच साल पहले लगाई गयी एक महत्वपूर्ण कविता की याद अपनी फेसबुक वॉल पर दी. उसे यहाँ पोस्ट करना आवश्यक लगा मुझे. अफ़लातून जी का आभार. -

बामियान में बुद्ध

-राजेन्द्र राजन

निश्चिन्त होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से
अपनी बंदूकों , तोपों , बचे हुए विस्फोटकों
और अट्टहासों के साथ
अपनी समझ और हुकूमत के बीच
कि उनके मुल्क की ज़मीन पर
उसके इतिहास में
अब कहीं नहीं हैं बुद्ध
जहाँ वे खड़े थे सबसे ज्यादा मज़बूती से
वहां से भी मिटा दिए गए उनके नामोनिशान
अब कोई नहीं था उस सुनसान जगह में
जहां पत्थर भी कुछ कहते जान पड़ते थे
वहां हर शब्द था डरा हुआ
हर चीज़ खा़मोश थी दहशत से दबी हुई
बस हवा में एक सामूहिक अट्टहास था बेखौ़फ़
जो बामियान के पहाड़ों को रह-रह कर सुनाई देता था

तप रही थी ज़मीन तप रहा था आसमान
पहाड़ के टूटने की आवाज़
धरती की दरारों में समा गयी थी
हवा में भर गयी बारूद की गंध
सब दिशाओं में फैल गयी थी
तीन दिन बाद जब वहां कोई नहीं था
हर तरफ़ डरावना सन्नाटा था वहां नमूदार हुआ
लंबी नाक और चौड़ी टोड़ी वाला एक पठान
वह तपती ज़मीन पर नंगे पांव बढ़ा उस तरफ़
तीन दिन पहले जहां पर्वताकार बुद्ध थे
और अब एक बड़ा-सा शून्य था
उस ख़ाली अंधेरी जगह के पास जाकर वह रुक गया
कुछ पल खामोश रह कर उसने सिर झुका कर कहा-
क्षमा करें भगवन् ! हमें क्षमा करें !

बुद्ध ने आवाज़ पहचानी
यह ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां होंगे
फिर वे अपनी कोमल संयत गंभीर आवाज़ में बोले-
आप अवश्य आएंगे , मैं जानता था भंते !
कृपया इधर चले आएं इधर छाया में
आपके पांव जल रहे होंगे

सकुचाए लज्जित-से ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां
बुद्ध के और निकट गए
फिर सुना
किसी क्षमा करने का अधिकारी मैं नहीं
जो क्षमा कर सकते थे अब नहीं हैं
वे विलुप्त पथिक अक्षय शांति के खोजी
जिनकी खोज और साधना के स्मारक नष्ट किए गए

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां की आवाज़ अब भी नम थी :
यहां जो हुआ उससे पीड़ा हुई होगी भगवन !

पीड़ा नहीं
दुख हुआ है भंते
जब कोई सृजन विध्वंस के उन्माद का शिकार होता है
दुख होता है
पर पीड़ा का प्रश्न नहीं
जब मैं शरीर में था एक दिन अंगुलिमाल गरजा था :
रुक जाओ भिक्षुक
वहीं रुक जाओ
पर मैं रुका नहीं
जैसे कुछ हुआ न हो मेरे कदम आगे बढ़े निष्कंप
जो कंप सकता था वह मेरे भीतर से विदा हो चुका था
अब तो वह शरीर भी नहीं

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां थोड़ा सहज हुए
बुद्ध ने उनकी आंखों में झांका :
यह क्या, आपकी आंखें गीली क्यों हैं भंते ?
मुल्क की हालत ठीक नहीं है भगवन्
बरसों से हर तरफ़
ख़ून से सने हाथ दिखाई देते हैं
मारकाट जैसे रोज़ का धन्धा है
सब किसी न किसी नशे में डूबे हैं
होश का एक क़तरा भी खोजना मुश्किल है
डर का ऐसा पहरा है कि कि कोई कुछ बोलता नहीं
कोई कुछ सुनता नहीं
जो बोलते हैं मारे जाते हैं
अभी तीन रोज़ पहले यहां जो हुआ उससे
इत्तिफ़ाक़ न रखने वाले चार युवक पकड़ लिए गए
सुना है उन्हें सरेआम फांसी पर लटकाया जाएगा

कुछ पल के लिए एक स्तब्ध मौन मे डूब गए बुद्ध
जैसे ढाई हजार साल बाद
नए सिरे से हो रहा हो दुख से सामना
फिर सोच में डूबा उनका प्रश्न उभरा -
और , स्त्रियों की क्या दशा है भंते

उनका हाल बयान नहीं किया जा सकता भगवन्
वे पशुओं से भी बदतर हालत में जीती हैं
डर और गुलामी और सज़ा की नकेल से बंधी हैं वे

बुद्ध असमंजस में डूबे रहे कुछ पल
कि आगे कुछ पूछें या न पूछें
फिर उन्होंने पूछा :
और किसान किस हालत में हैं भंते

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां की अनुभव पकी आंखों में
गांवों के रोजमर्रा चित्र तैर गए :
फसलें सूख रही हैं भगवन्
किसानों की कोई नहीं सुनता
फ़ाक़ाकशी की छाया लोटती है मेहनतकश घरों में
हुक्मरान हथियार खरीदने के अलावा और कुछ नहीं करते

बुद्ध और ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के बीच एक सन्नाटा
खिंच गया
बुद्ध को चिंतित देख शर्म की ज़मीन पर खड़े बूढ़े पठान ने कहा :
भारत आपके लिए ठीक जगह है भगवन्

नहीं भंते
हथियारों के पीछे पागल हैं वहां के शासक भी
बहुत छद्म और पाखंड है वहां
मानवता के संहार का उपाय कर
वे कहते हैं : मैं मुस्करा रहा हूं

इसके बाद ख़ामोश रहे दो दुख
सहसा ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां का ध्यान हटा
उन्होंने सूखे आसमान की तरफ़ नज़र फ़िराई
लगा जैसे किसी बाज के फड़फड़ाने की आवाज़ आई हो
मगर चुँधियाती धूप में कुछ दिखाई नहीं पड़ा
फिर उनका ध्यान लौटा उस जगह
जो तीन दिन पहले हमेशा के लिए ख़ाली हो गई थी
वहां न बुद्ध के होने का स्वप्न था न उनके शब्दों का अर्थ
ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां खड़े थे अकेले
बामियान के पथरीले सन्नाटे में.

Tuesday, September 18, 2012

जैसे एक छोटा-सा टापू है जनसंख्या के इस गरजते महासागर में



राजेन्द्र राजन की यह कविता जनाब अफ़लातून के ब्लॉग समाजवादी जनपरिषद से साभार ली गई है. इसे यहाँ पोस्ट करने की अनुमति देने को अफ़लातून जी का शुक्रिया.

मनुष्यता के मोर्चे पर

मैं जितने लोगों को जानता हूँ
उनमें से बहुत कम लोगों से होती है मिलने की इच्छा
बहुत कम लोगों से होता है बतियाने का मन
बहुत कम लोगों के लिए उठता है आदर-भाव
बहुत कम लोग हैं ऐसे
जिनसे कतरा कर निकल जाने की इच्छा नहीं होती
काम-धन्धे, खाने-पीने, बीवी-बच्चों के सिवा
बाकी चीजों के लिए
बन्द हैं लोगों के दरवाजे
बहुत कम लोगों के पास है थोड़ा-सा समय
तुम्हारे साथ होने के लिए
शायद ही कोई तैयार होता है
तुम्हारे साथ कुछ खोने के लिए

चाहे जितना बढ़ जाय तुम्हारे परिचय का संसार
तुम पाओगे बहुत थोड़े-से लोग हैं ऐसे
स्वाधीन है जिनकी बुद्धि
जहर नहीं भरा किसी किस्म का जिनके दिमाग में
किसी चकाचौंध से अन्धी नहीं हुई जिनकी दृष्टि
जो शामिल नहीं हुए किसी भागमभाग में
बहुत थोड़े-से लोग हैं ऐसे
जो खोजते रहते हैं जीवन का सत्त्व
असफलताएं कर नहीं पातीं जिनका महत्त्व
जो जानना चाहते हैं हर बात का मर्म
जो कहीं भी हों चुपचाप निभाते हैं अपना धर्म
इने-गिने लोग हैं ऐसे
जैसे एक छोटा-सा टापू है
जनसंख्या के इस गरजते महासागर में

और इन बहुत थोड़े-से लोगों के बारे में भी
मिलती हैं शर्मनाक खबरें जो तोड़ती हैं तुम्हें भीतर से
कोई कहता है
वह जिन्दगी में उठने के लिए गिर रहा है
कोई कहता है
वह मुख्यधारा से कट गया है
और फिर चला जाता है बहकती भीड़ की मझधार में
कोई कहता है वह काफी पिछड़ गया है
और फिर भागने लगता है पहले से भागते लोगों से ज्यादा तेज
उसी दाँव-पेंच की घुड़-दौड़ में
कोई कहता है वह और सामाजिक होना चाहता है
और दूसरे दिन वह सबसे ज्यादा बाजारू हो जाता है
कोई कहता है बड़ी मुश्किल है
सरल होने में

इस तरह इस दुनिया के सबसे विरल लोग
इस दुनिया को बनाने में
कम करते जाते हैं अपना योग
और भी दुर्लभ हो जाते हैं
दुनिया के दुर्लभ लोग

और कभी-कभी
खुद के भी काँपने लगते हैं पैर
मनुष्यता के मोर्चे पर
अकेले होते हुए

सबसे पीड़ाजनक यही है
इन विरल लोगों का
और विरल होते जाना

एक छोटा-सा टापू है मेरा सुख
जो घिर रहा है हर ओर
उफनती हुई बाढ़ से

जिस समय काँप रही है यह पृथ्वी
मनुष्यो की संख्या के भार से
गायब हो रहे हैं
मनुष्यता के मोर्चे पर लड़ते हुए लोग.

Thursday, July 1, 2010

कुछ जानिये ब्लॉगवाणी के संचालकों के बारे में

प्रतिबद्ध ब्लॉगर श्री अफ़लातून जी का यह आलेख उनके एक ब्लॉग पर कल प्रकाशित हुआ था. पिछले कई दिनों से ब्लॉगवाणी काम नहीं कर रहा है. और दुर्भाग्यवश इस बात के आसार हैं कि यह एग्रीगेटर अब सदा के लिए बन्द हो जाएगा. थोथी मानसिकता के शिकार हिन्दी ब्लॉगजगत के लिए यह कितना बड़ा नुकसान साबित होगा, यह तो आने वाला समय ही बतलाएगा.

अफ़लातून जी की पोस्ट पढ़ने से पहले मुझे नहीं मालूम था कि आधुनिक हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रकाशन की लाइफ़लाइन बन गए कृतिदेव फ़ॉन्ट्स ब्लॉगवाणी के संचालक श्री मैथिली शरण गुप्त व उनके पुत्र श्री द्वारा रचे गए थे.

कतिपय अवांछित कारणों से वे आहत हुए हैं इस बात का कबाड़ख़ाना की सारी टीम को अफ़सोस है. आशा है वे नई ऊर्जा से अपने महती कार्यों को जारी रखते हुए हिन्दी भाषा के विकास के अपने निःस्वार्थ कार्य में लगे रहेंगे.

अपने लेख को यहां छापने की अनुमति देने हेतु श्री अफ़लातून जी का धन्यवाद!


मैथिलीशरण गुप्त : ब्लॉगवाणी से पहले का योगदान



‘शिक्षा का है, क्यों यह हाल? दूर कलम से गई कुदाल’: श्रम और बुद्धि के कामों के बीच खाई को बढ़ाने वाली हमारी शिक्षा व्यवस्था के दुर्गुण को प्रकट करता है यह नारा। ’ पढ़ा-लिखा ’ होने का घमण्ड और गैर पढ़े-लिखे के गुणों के प्रति आंखे मूँद लेना , निहित है इस शिक्षा व्यवस्था में। ब्लॉगर-दिल-अजीज मैथिली गुप्त ’डिग्री की भिक्षा नहीं जीवन की शिक्षा’ में यक़ीन रखते हैं। इस बुनियादी यक़ीन को मैथिलीजी अमल में लाये हैं। उनके दोनों पुत्र औपचारिक उच्च शिक्षा से मुक्त रह कर अत्यन्त सफल रहे हैं।

बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद मैथिलीजी ने तरुणों को रोजगारपरक तालीम देने के लिए एक वोकेशनल स्कूल चलाया। जिन हूनरों से स्वरोजगार शुरु किए जा सकते हैं उनका प्रशिक्षण उस स्कूल में होता था। इन्टरनेट आने से पहले जब कम्प्यूटर आ चुके थे और डेस्कटॉप प्रकाशन की शुरुआत हो रही थी तब मैथिलीजी ने कृतिदेव और देवलिज़ (Devlys) नाम के फ़ॉन्ट निर्मित किए और उनके पेटेन्ट भी मैथिलीजी के नाम हैं। पिछले दिनों मैथिलीजी और सिरिल के दफ़्तर में जाने का फिर मौका मिला तब चाक्षुष इन तमाम पेटेंटों के प्रमाणपत्र देखे। कृतिदेव भारतीय भाषाओं में ऑफ़लाईन टाइपिंग का सर्वाधिक प्रयुक्त फ़ॉन्ट है। देवनागरी तथा मैथिली से मिलकर देवलिज़ बना। अंग्रेजी के हस्तलेखन की विभिन्न स्टाइलों का कम्प्यूटर के लिए इजाद भी आपने किया। भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटर पर प्रयोग के लिए किए गए योगदान को धन कमाने का जरिया न बनाने की मंशा शुरु से रही और ’ब्लॉगवाणी’ की सेवा भी इसीलिए मुफ़्त थी।

मैथिलीजी ’दिनमान’ की पत्रकारिता से प्रभावित रहे हैं। ’ब्लॉगवाणी’ के जरिए हजारों ब्लॉगरों की रचनात्मक अभिव्यक्ति और जनता की पत्रकारिता के प्रसार में सिरिल और मैथिलीजी ने योगदान दिया है जिसे भुलाना मुश्किल है। ’नारद’ के अवसान के समय व्यर्थ के विवाद में न पड़कर एक विकल्प देकर उन्होंने अपनी रचनात्मकता को प्रकट किया था।

हिन्दी चिट्ठेकारी में छिछली मानसिकता के साथ शुरु हुई कुछ गिरोहबन्दियां रचनात्मकता विरोधी रही हैं। उनका पराभव तय है। उतना ही तय है कि इस रचनात्मक परिवार का योगदान हिन्दी ब्लॉगजगत को भविष्य में भी मिलता रहेगा।