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Tuesday, December 11, 2012

भर्तृहरि की कवितायेँ – १०



वैराग्यशतक का यह पद सं. १०६ धीरेश सैनी की फेसबुक दीवार पर जनाब-ऐ-अव्वल असद जैदी के हवाले से पोस्ट किया गया था. पोस्ट पर आई एक टिप्पणी में कैफ़ी आजमी साहब की वक्त ने किया क्या हसीं सितम ...को उद्धृत किया गया. असद जी ने भर्तृहरि और कैफ़ी साहब के दरम्यान किसी हॉटलाइन के मौजूद होने का ज़िक्र किया और हिन्दी तर्जुमा भी उपलब्ध कराया - 

यूयं वयं वयं यूयमित्यासीन्मतिरावयोः ।
किं जात मधुना मित्र येन यूयं यूयं वयं वयम् ।।


तुम हम थे और हम तुम थे  
यह हमारी और तुम्हारी बुद्धि थी। 
आज क्या हो गया कि हे मित्र! 
तुम तुम हो और हम हम हैं।

Thursday, November 22, 2012

मेरा वोट लिए बग़ैर भी आप मेरे सांसद हैं

असद जैदी की एक और प्रासंगिक कविता


हिंदू सांसद 

आपका पानी बेस्वाद 
आपका खाना खराब 
आपकी ज़बान गलीज़ 
आपकी बोली अजीब 
आपकी पोशाक नकली
आपका घर बेहूदा
आपका बाहर बेकार
आपकी रूह लापता
आपका दिल मुर्दार
आपका जिस्म आपसे बेजार
आपका नौकर भी है आपसे नाराज़ 

मेरा वोट लिए बग़ैर भी आप
मेरे सांसद हैं
आपको वोट दिए बग़ैर भी
मैं आपकी रियाया हूँ

अचानक आमने सामने हो जाने पर
हम करते हैं एक दूसरे को
विनय पूर्वक नमस्कार

Wednesday, November 21, 2012

समाज से खिसक कर परिवार मे छुप जाऊं, कहला दूं घर पर नहीं हूँ


असद जैदी की यह कविता अचानक मुझे अपने बड़े काम की लगने लगी है. क्या मालूम आपको भी लगे. अनिल यादव के लफ़्ज़ों में कहूं – “चचा सलाम!”

व्याख्या का काम 

क्या करूं व्याख्या का काम इतना आन पड़ा है
हकलाने के अलावा मैं और कर भी क्या सकता हूँ

इतनी ही मेरी मनुष्यता है बस कि
एकाध और मनुष्य के बैठने की जगह साफ कर दूं

मरखनी गाय के पास मंडराते शैतान
बच्चे का कान खींच दूं
कहूं : अबे मुर्गी के, क्या घर से फालतू है ?

भतीजे से कहूं बंबई न जाए -- वोह बड़ी
भयानक जगह है

समाज से खिसक कर परिवार मे छुप जाऊं
कहला दूं घर पर नहीं हूँ
कब आएंगे पता नहीं
बतला कर नहीं गए