इक़बाल बानो की विश्वविख्यात कम्पोज़ीशन में क़ैद फैज़
साहब की उससे भी विख्यात नज़्म –
हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है जो लोह-ए-अज़लमें लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां रुई की तरह उड़ जाएँगे हम महक़ूमों के पाँव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा,मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएँगे सब ताज उछाले जाएँगे सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का जो ग़ायब भी है हाज़िर भी जो मंज़र भी है नाज़िरभी उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
इक़बाल बानो की मृत्यु पर कल मैंने एक पोस्ट लगाई थी.
असल में कबाड़ख़ाने पर उन पर पहले से प्रकाशित एक पोस्ट को दुबारा लगाया था. आज शाम को हमारे आदरणीय श्री असद ज़ैदी ने फ़ोन पर इस बाबत मेरी एक ग़लती को रेखांकित करते हुए स्व. इक़बाल बानो के बारे में कुछेक बातें बतलाईं और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की उस नज़्म का ज़िक्र भी किया जिसे सुनाते हुए वे अपने सुनने वालों को रुला दिया करती थीं.
इक़बाल बानो पर एक विस्तृत पोस्ट लिखनी ही थी सो आज ही सही. बड़े भाई असद ज़ैदी की नज़्र.
इक़बाल बानो का ताल्लुक रोहतक से था. बचपन से ही उनके भीतर संगीत की प्रतिभा थी जिसे उनके पिता के एक हिन्दू मित्र ने पहचाना और उनकी संगीत शिक्षा का रास्ता आसान बनाया. इन साहब ने इक़बाल बानो के पिता से कहा: "बेटियां तो मेरी भी अच्छा गा लेती हैं पर इक़बाल को गायन का आशीर्वाद मिला हुआ है. संगीत की तालीम दी जाए तो वह बहुत नाम कमाएगी."
मित्र के इसरार पर उनकी संगीत शिक्षा का क्रम दिल्ली में शुरू कराया गया - दिल्ली घराने के उस्ताद चांद ख़ान की शागिर्दी में. इक़बाल बानो ने दादरा और ठुमरी सीखना शुरू किया. उस्ताद की सिफ़ारिश पर ही बाद में उन्हें ऑल इन्डिया रेडियो के लिए गाने के मौके मिले.
वे १९५० के आसपास पाकिस्तान चली गईं जहां १९५२ में मुल्तान के इलाके के एक ज़मींदार ने इस वायदे पर सत्रह साल की इक़बाल बानो से निकाह रचा लिया कि उनकी संगीत यात्रा पर कोई रोक नहीं आने दी जाएगी.
यह वायदा उनके पति ने १९८० तक अपने इन्तकाल तक बाकायदा निभाया. पति की मृत्यु के बाद वे लाहौर आ गईं.
ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल के लिए उनकी आवाज़ बेहद उपयुक्त थी और उन्होंने अपने जीवन काल में एक से एक बेहतरीन प्रस्तुतियां दीं.
मरहूम इन्कलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की नज़्म "हम देखेंगे" की रेन्डरिंग को उनके गायन कैरियर का सबसे अहम मरहला माना जाता है. ज़िया उल हक़ के शासन के चरम के समय लाहौर के फ़ैज़ फ़ेस्टीवल में उन्होंने हजारों की भीड़ के आगे इसे गाया था.
इस प्रस्तुति ने ख़ासी हलचल पैदा की थी और सैनिक शासन ने इस वजह से उन्हें काफ़ी परेशान भी किया. लेकिन उनके इस कारनामे ने उन्हें पाकिस्तान में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय बना दिया था.
२००३ के बाद से उनकी तबीयत नासाज़ चल रही थी और उन्होंने महफ़िलों में गाना तकरीबन बन्द कर दिया.
२१ अप्रैल २००९ को उनका देहान्त हो गया.
फ़ैज़ साहब की इस नज़्म के इक़बाल बानो द्वारा गाये जाने के पीछे यह विख्यात है कि ख़ुद फ़ैज़ साहब इसे उनकी आवाज़ में सुनकर रो दिये थे.
ख़ास तौर पर आदरणीय असद ज़ैदी जी की फ़रमाइश पर प्रस्तुत है यह अलौकिक, एक्सक्लूसिव रचना:
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
हम देखेंगे
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी
उट्ठेगा अनल - हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
(यहां से डाउनलोड करें: http://www.divshare.com/download/7170033-48d)
उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैं इसी ब्लॉग से कभी उन पर लगाई गई एक पोस्ट को दोबारा लगा रहा हूं.
इक़बाल बानो का नाम ग़ज़ल प्रेमियों में विशिष्ट स्थान रखता है. भारतीय मूल की इस बेहतरीन पाकिस्तानी गायिका ने बहुत सारी ग़ज़लों को स्वरबद्ध किया है. मिर्ज़ा ग़ालिब की संभवतः सबसे लम्बी ग़ज़ल है "मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए". मुझे याद पड़ता है किसी किताब या पत्रिका में मैंने फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' साहब का एक लम्बा लेख देखा था इस ग़ज़ल के बारे में. हमारे गुलज़ार साहब का बनाया, भूपिन्दर का गाया गीत "दिल ढूंढता है" इसी ग़ज़ल के एक शेर से 'प्रेरित' है.
इक़बाल बानो ने इस कालजयी ग़ज़ल के चन्द शेर गाये हैं. लुत्फ़ उठाइए.
मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए जोश-ए-कदः से बज़्म चराग़ां किये हुए
करता हूं जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़गां किये हुए
फिर पुरसिस-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़ सामान-ए-सद-हज़ार नमकदां किये हुए
मांगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस ज़ुल्फ़-ए-सियह रुख़ पे परीशां किये हुए
चाहे है फिर किसी को मुकाबिल में आरज़ू सुरमे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़गां किये हुए
इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह चेहरा फ़रोग़-ए-मै से गुलिस्तां किये हुए
ग़ालिब हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ां किये हुए
इक़बाल बानो का नाम ग़ज़ल प्रेमियों में विशिष्ट स्थान रखता है. पाकिस्तानी मूल की इस बेहतरीन गायिका ने बहुत सारी ग़ज़लों को स्वरबद्ध किया है. मिर्ज़ा ग़ालिब की संभवतः सबसे लम्बी ग़ज़ल है "मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए". मुझे याद पड़ता है किसी किताब या पत्रिका में मैंने फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' साहब का एक लम्बा लेख देखा था इस ग़ज़ल के बारे में. हमारे गुलज़ार साहब का बनाया, भूपिन्दर का गाया गीत "दिल ढूंढता है" इसी ग़ज़ल के एक शेर से 'प्रेरित' है.
इक़बाल बानो ने इस कालजयी ग़ज़ल के चन्द शेर गाये हैं. लुत्फ़ उठाइए.
मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए जोश-ए-कदः से बज़्म चराग़ां किये हुए
करता हूं जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़गां किये हुए
फिर पुरसिस-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़ सामान-ए-सद-हज़ार नमकदां किये हुए
मांगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस ज़ुल्फ़-ए-सियह रुख़ पे परीशां किये हुए
चाहे है फिर किसी को मुकाबिल में आरज़ू सुरमे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़गां किये हुए
इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह चेहरा फ़रोग़-ए-मै से गुलिस्तां किये हुए
ग़ालिब हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से बैठे हैं हम तहया-ए-तूफ़ां किये हुए