एक हैं गिरगिट जी। ये साहब शकल - सूरत , भाव - भंगिमा से कुछ 'कवी' टाइप के जीव लग रहे है... और कई इनों से इस नाचीज को ठग रहे हैं .....
ये सब जगह पाए जाते हैं, हमारे आसपास और हमारी हिन्दी भाषा के मुहावरों की दुनिया में भी। पारखी नजर के स्वामी इन्हें इंसानों की फितरत में भी देख लेते हैं। अगर कभी एकांत में अपने से बतियाने का मौका मिले तो इन्हें खुद के भीतरी तह में भी देखा जा सकता है। किस्से -कहानियों में तो इनकी मौजूदगी आम है। इस समय इनकी बहार है और ये सबसे कहते फिर रहे हैं - कहो ना प्यार है !
एक गिरगिट जी हमारे घर के नन्हें बगीचे में कुछ दिनों से विश्राम किए हुए हैं।नाम -गाम पूछने पर आँखें मटकाते हैं और गरदन हिलाते हैं। अभी दोपहरी में जब हल्के बादल छाए हैं तब हमने इनका शिकार करने की जुगत भिड़ाई और गोली बंदूक तो अपने पास है नहीं , बरछी ,गँड़ासा ,कटार भी नहीं किन्तु कैमरा तो है , सो कर डाला शिकार। ल्यो जी ! आप भी मिलो इन प्यारे- न्यारे गिरगिट जी से.....

काम से आराम
पत्तों के बिछौने पर
पल भर विश्राम !

यह जो कनेर का तना है
फिलहाल
यही अपना घर बना है

रात की रानी की झाड़
दे रही है
धूप -घाम से आड़

सोचो
सोचने में क्या जाता है
खर्च धेला नहीं
मजा भरपूर आता है

क्या है उस पार ?
शायद नफरत
शायद प्यार

जी में उमड़ रही है शायरी
पास न कागज - न कलम
हाय किस्मत ! हाय री !