Showing posts with label चित्र. Show all posts
Showing posts with label चित्र. Show all posts

Thursday, December 17, 2009

छत पर शाम : कुछ छवियाँ कुछ शब्द



कल शाम छत पर गपशप करते और मूँगफलियों के जरिए धूप का आनंद लेते - लेते मोबाइल से कुछ तस्वीरें ली हैं । आइए साझा करते हैं :


******



*******



*********

**********

*******
तो ऐसे आती है शाम
ऐसे उतरता है सूरज का तेज
ऐसे घिरता है अँधियारा
ऐसे आती है रात।
ऐसे लौटते हैं विहग बसेरों की ओर
ऐसे ही नभ होता है रक्ताभ
ऐसे ही देखती हैं आँखें सुन्दर दृश्य
फिर भी कम नहीं होता है कुरुपताओं का कारोबार।

Sunday, June 14, 2009

रतनपुर की कुछ तस्वीरें

इस बार कई सालों के बाद रतनपुर (छतीसगढ़) जाना हो सका .
प्रस्तुत हैं वहाँ ली गईं कुछ तस्वीरें


छूटी पढ़ाई - लिखाई - खेल
देखो बच्चा बेच रहा है बेल


थोड़ा यथार्थ - थोड़ी माया
जल में देवस्थल की छाया
ऊँचाई -ऊपर से ही शहर
दीखता है भला - सुन्दर

ऊपर शिखर पर ईश्वर
नीचे मनुष्यों का घर

सड़क के किनारे की सूनी दुकान
ग्राहक देवता ! आ जाओ सिरीमान

Saturday, May 30, 2009

एक सितारा यह भी

इससे पहले कि सौन्दर्य बन जाए स्वाद
आओ तुम्हें दिल में कर लें आबाद !

Sunday, April 26, 2009

गिरगिट जी के संग लुकाछिपी के रंग

एक हैं गिरगिट जी। ये साहब शकल - सूरत , भाव - भंगिमा से कुछ 'कवी' टाइप के जीव लग रहे है... और कई इनों से इस नाचीज को ठग रहे हैं .....
ये सब जगह पाए जाते हैं, हमारे आसपास और हमारी हिन्दी भाषा के मुहावरों की दुनिया में भी। पारखी नजर के स्वामी इन्हें इंसानों की फितरत में भी देख लेते हैं। अगर कभी एकांत में अपने से बतियाने का मौका मिले तो इन्हें खुद के भीतरी तह में भी देखा जा सकता है। किस्से -कहानियों में तो इनकी मौजूदगी आम है। इस समय इनकी बहार है और ये सबसे कहते फिर रहे हैं - कहो ना प्यार है !
एक गिरगिट जी हमारे घर के नन्हें बगीचे में कुछ दिनों से विश्राम किए हुए हैं।नाम -गाम पूछने पर आँखें मटकाते हैं और गरदन हिलाते हैं। अभी दोपहरी में जब हल्के बादल छाए हैं तब हमने इनका शिकार करने की जुगत भिड़ाई और गोली बंदूक तो अपने पास है नहीं , बरछी ,गँड़ासा ,कटार भी नहीं किन्तु कैमरा तो है , सो कर डाला शिकार। ल्यो जी ! आप भी मिलो इन प्यारे- न्यारे गिरगिट जी से.....
काम से आराम
पत्तों के बिछौने पर
पल भर विश्राम !
यह जो कनेर का तना है
फिलहाल
यही अपना घर बना है
रात की रानी की झाड़
दे रही है
धूप -घाम से आड़

सोचो
सोचने में क्या जाता है
खर्च धेला नहीं
मजा भरपूर आता है
क्या है उस पार ?
शायद नफरत
शायद प्यार
जी में उमड़ रही है शायरी
पास न कागज - न कलम
हाय किस्मत ! हाय री !

Friday, January 23, 2009

किस खेत की मूली ?

कौन कहता है कि मामूली मूली
आती है केवल खाने के काम ,
जब न हो कोई शील्ड या ट्राफी
तो यह बन जाती है ईनाम !!

Tuesday, December 9, 2008

चंडाक से हिमालय

अभी ५ और ६ दिसंबर को 'पहा़ड़' के रजत जयंती कार्यक्रमों की एक कड़ी में शामिल होने के सिलसिले में पिथौरागढ़ जाना हुआ। पहाड़ी रास्ते का कठिन सफर थका देने वाला रहा। अभी तक वहाँ की थकान से उबर नहीं पाया हूँ। पिथौरागढ़ के पास में एक बड़ी प्यारी जगह है चंडाक -छोटी , शांत , सुरम्य जगह।यहाँ लोग ( आशुतोष उपाध्याय , विपिन बिहारी शुक्ला , वाई०डी० भट्ट और मैं ) लारी बेकर साहब का घर तलाशने की जुगत में जम कर भटके। एक ऊँची पहाड़ी दिखी तो उस पर भी गिरते - पड़ते चढ़ लिए। ऊपर पहुँच कर सारी थकावट दूर - हिमालय की विराटता के आगे कोई नही ,कुछ भी बड़ा नहीं।प्रस्तुत हैं इसी यात्रा की कुछ तस्वीरें -


बादल , बर्फ , पहाड़ और ( टावर भी )


देवदार के गलियारे के सन्नाटे को तोड़ते हुए

भवन और भूधर

बलिष्ठ पहाड़ों की बलिष्ठ देह