ईराकी मूल की कवयित्री दून्या मिख़ाइल की दो और कविताएं प्रस्तुत है. लम्बे समय से युद्ध की विभीषिकाएं झेल रहे अरब समाज, विशेषतः उसकी स्त्रियों का दर्द दून्या की रचनाओं में सतत उपस्थित रहता है. आधुनिक समय के युवा रचनाकारों की सूची में ख़ासा बड़ा नाम मानी जाने वाली दून्या अब निर्वासन में अमेरिका में रहती हैं.
हड्डियों का झोला
क्या तक़दीर है!
उसे मिल गई हैं उसकी हड्डियां.
खोपड़ी भी है झोले में
झोला उस स्त्री के हाथ में
बाक़ी झोलों की तरह
बाक़ी कांपते हाथों की तरह.
उसकी हड्डियां, हज़ारों हड्डियों की तरह
सामूहिक कब्रिस्तान में
उसकी खोपड़ी, दूसरी किसी भी खोपड़ी की तरह नहीं.
दो आंखें या दो गड्ढे
जिनसे कितना सारा देखा था उसने’
दो कान
जिनकी मदद से वह सुनता था उस संगीत को
जो उसकी अपनी कहानी कहता था,
एक नाक
जिसने कभी नहीं जाना साफ़ हवा को
एक मुंह, किसी गर्त की मानिन्द खुला हुआ,
वह तब वैसा नहीं था जब उसने उसे चूमा था
वहां, ख़ामोशी में
इस जगह नहीं
जहां सवालों के साथ खोदी जाती हैं
शोरभरी खोपड़ियां हड्डियां और धूल:
ये सारी मौतें मरने का क्या मतलब है
इस जगह में जहां अन्धेरा खेलता है इस सारी ख़ामोशी के साथ?
अपने प्यारों से अब मिलने का क्या मतलब है
इन तमाम खोखली जगहों पर?
मौत के मौक़े पर
वापस लौटाना अपनी मां को
मुठ्ठीभर हड्डियां
जो उसने दी थीं तुम्हें
जन्म के मौक़े पर?
बिना जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र के निकल जाना
क्योंकि तानाशाह आपके प्राण लेते वक़्त
कोई रसीद नहीं देता?
तानाशाह के पास एक दिल भी है
एक ग़ुब्बारा जो कभी फूलता ही नहीं.
उसकी एक खोपड़ी भी है, ख़ासी विशाल
किसी भी और खोपड़ी से अलहदा.
उसने अपने आप ही हल कर लिया गणित का एक सवाल
जिसने एक मौत को गुणा किया लाखों से
ताकि उत्तर निकले मातृभूमि.
तानाशाह एक बड़ी त्रासदी का निर्देशक है.
उसके श्रोता भी हैं
तालियां पीटने वाले श्रोता,
जब तक कि खड़खड़ाने न लगें हड्डियां -
झोले में हड्डियां,
पूरा झोला आख़िरकार उसके हाथों में है
उसकी निराश पड़ोसन की तरह नहीं
जिसे अभी नहीं मिला है उसका झोला.
सर्वनाम
वह खेलता है ट्रेन-ट्रेन
वह खेलती है सीटी-सीटी
दोनों दूर निकल जाते हैं
वह खेलता है रस्सी-रस्सी
वह खेलती है पेड़-पेड़
दोनों झूला झूलते हैं
वह खेलता है सपना-सपना
वह खेलती है पंख-पंख
दोनों उड़ जाते हैं
वह खेलता है जनरल-जनरल
वह खेलती है जनता-जनता
वे युद्ध की घोषणा कर देते हैं.
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Wednesday, March 30, 2011
Tuesday, March 29, 2011
हम भगवान को ई-मेल कर देंगे
ईराकी मूल की कवयित्री दून्या मिख़ाइल का नाम आप लोगों के लिए नया नहीं है. यहां उनकी कुछेक कविताएं आप पढ़ चुके हैं. अंग्रेज़ी और अरबी दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लिखने वाली दून्या इधर के दोएक दशकों में अरब संसार में उपजी असाधारण कवियों की जमात में जगह पाने की सच्ची हक़दार हैं. उन्हीं की अनुमति से अभी मैंने उनकी एक पुस्तक का अनुवाद समाप्त किया है. पेश है उनकी एक कविता -
एक ज़रूरी कॉल
यह एक ज़रूरी कॉल है
अमेरिकी सैनिक लिन्डी के लिए
कि वह तुरन्त अपने वतन लौट जाए.
वह दिल में एक खतरनाक वायरस
की बीमारी से ग्रस्त है.
वह गर्भवती है
और धंस रही है गहरे कीचड़ में.
वह धंसती जाती है गहरे और भी गहरे
जब वह सुनती है: "बहुत बढ़िया!"
जल्दी करो, लिन्डी,
अब वापस चली जाओ अमेरिका.
फ़िक्र न करो,
तुम्हारी नौकरी कहीं नहीं जा रही.
क़ैदख़ाने हर जगह हैं
बड़े-बड़े छेदों वाले क़ैदख़ाने
और विराट कांप,
और लगातार-लगातार कौंधें,
और थरथराहटें जो
बिना किसी ज़ुबान के
ब्रह्माण्ड में भेज रहे हैं सन्देश.
फ़िक़्र न करो,
तुम्हें ज़बरन कोई नहीं कहेगा
चिड़ियों को दाना डालने को
जब तुम लादे होगी एक बन्दूक.
जब तुम युद्ध में पहने जाने वाले बूटों में होओगी
कोई भी विवश नहीं करेगा तुम्हें
पर्यावरण के लिए काम करने को.
फ़िक्र मत करो,
हम भगवान को ई-मेल कर देंगे
और उसे बता देंगे
कि बर्बर ही थे
इकलौता समाधान.
फ़िक्र मत करो
बीमारी की छुट्टी ले लो
और आज़ाद करो अपने शिशु को
अपनी देह से,
लेकिन उन हैबतनाक तस्वीरों को
छिपाना मत भूलना,
कीचड़ में तुम्हारे नाचने की तस्वीरें.
उन्हें बच्चे या बच्ची की निगाहों से
दूर ही रखना.
छिपा लेना उन्हें प्लीज़
तुम नहीं चाहोगी कि तुम्हारी सन्तान चिल्ला कर कहे -
क़ैदी नंगे हैं ...
[लिन्डी: लिन्डी इंग्लैण्ड (ऊपर आप उसकी तस्वीर देख सकते हैं), अबू ग़रेब जेल कांड में शामिल सात सैन्य अफ़सरों में एक. तस्वीरों में वह अन्य अमेरिकी सिपाहियों के साथ ईराक़ी क़ैदियों को यातना देती हुई पाई गई थी. यह अब तक साफ़ नहीं हो सका है कि इन लोगों ने पेन्टागन या व्हाइट हाउस के आदेशानुसार यह जघन्य काम किया था या नहीं.]
(*यह सम्भव है कि आपको यहां दून्या मिख़ाइल की कुछ और कविताएं लगातार पढ़ने को मिलती रहें.)
एक ज़रूरी कॉल
यह एक ज़रूरी कॉल है
अमेरिकी सैनिक लिन्डी के लिए
कि वह तुरन्त अपने वतन लौट जाए.
वह दिल में एक खतरनाक वायरस
की बीमारी से ग्रस्त है.
वह गर्भवती है
और धंस रही है गहरे कीचड़ में.
वह धंसती जाती है गहरे और भी गहरे
जब वह सुनती है: "बहुत बढ़िया!"
जल्दी करो, लिन्डी,
अब वापस चली जाओ अमेरिका.
फ़िक्र न करो,
तुम्हारी नौकरी कहीं नहीं जा रही.
क़ैदख़ाने हर जगह हैं
बड़े-बड़े छेदों वाले क़ैदख़ाने
और विराट कांप,
और लगातार-लगातार कौंधें,
और थरथराहटें जो
बिना किसी ज़ुबान के
ब्रह्माण्ड में भेज रहे हैं सन्देश.
फ़िक़्र न करो,
तुम्हें ज़बरन कोई नहीं कहेगा
चिड़ियों को दाना डालने को
जब तुम लादे होगी एक बन्दूक.
जब तुम युद्ध में पहने जाने वाले बूटों में होओगी
कोई भी विवश नहीं करेगा तुम्हें
पर्यावरण के लिए काम करने को.
फ़िक्र मत करो,
हम भगवान को ई-मेल कर देंगे
और उसे बता देंगे
कि बर्बर ही थे
इकलौता समाधान.
फ़िक्र मत करो
बीमारी की छुट्टी ले लो
और आज़ाद करो अपने शिशु को
अपनी देह से,
लेकिन उन हैबतनाक तस्वीरों को
छिपाना मत भूलना,
कीचड़ में तुम्हारे नाचने की तस्वीरें.
उन्हें बच्चे या बच्ची की निगाहों से
दूर ही रखना.
छिपा लेना उन्हें प्लीज़
तुम नहीं चाहोगी कि तुम्हारी सन्तान चिल्ला कर कहे -
क़ैदी नंगे हैं ...
[लिन्डी: लिन्डी इंग्लैण्ड (ऊपर आप उसकी तस्वीर देख सकते हैं), अबू ग़रेब जेल कांड में शामिल सात सैन्य अफ़सरों में एक. तस्वीरों में वह अन्य अमेरिकी सिपाहियों के साथ ईराक़ी क़ैदियों को यातना देती हुई पाई गई थी. यह अब तक साफ़ नहीं हो सका है कि इन लोगों ने पेन्टागन या व्हाइट हाउस के आदेशानुसार यह जघन्य काम किया था या नहीं.]
(*यह सम्भव है कि आपको यहां दून्या मिख़ाइल की कुछ और कविताएं लगातार पढ़ने को मिलती रहें.)
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