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Tuesday, December 2, 2014

देवेन वर्मा को श्रद्धांजलि - भाग दो


व्यक्तिगत जीवन:

जब मेरी साली प्रीती गांगुली का पिछले दिसम्बर में देहांत हुआ था तो मुझे बहुत सारे सहानुभूति सन्देश मिले क्योंकि अखबारों ने रिपोर्टिंग की थी कि मेरी पत्नी का देहांत हो गया है. अशोक कुमार की दूसरी बेटी रूपा गांगुली से मेरा विवाह हुआ है जिन्होंने फिल्मों में कभी काम नहीं किया.

मैंने अशोक कुमार के साथ कई फ़िल्में कीं और मुझे वह अच्छा लगा करता था – इनमें प्रमुख थीं “धर्मपुत्र’, ‘गुमराह’ और ‘आज और कल’. वे अक्सर डिनर के लिए मुझे घर बुला लिया करते थे और इसी सिलसिले में मेरी उस परिवार से पहचान हुई.

रूपा और मैं एक दूसरे को पसंद करते थे और शादी करना चाहते थे और जब मैंने अशोक कुमार से उसका हाथ माँगा तो उन्होंने मुझ पर निगाह डालकर कहा “इस बारे में सोचेंगे”.

हमारी शादी में दो साल लगे. उनका कहना था रूपा छोटी है और कि हम बाद में फैसला करेंगे – वे जानबूझकर देर कर रहे थे क्योंकि अशोक कुमार की बड़ी बेटी भारती ने एक गुजराती डॉ. पटेल से ब्याह रचा लिया था.

हमारी सगाई के मौके पर किशोर कुमार ने परफॉर्म किया था. हमारी शादी मुम्बई के नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ़ इण्डिया में हुई.

‘अंगूर’ की गड़बड़ियां:

‘अंगूर’ दो दिनों और एक रात की कहानी है लेकिन इसकी रिपीट वैल्यू बड़ी से बड़ी ब्लॉकबस्टर्स से ज्यादा है. वीडियोज में इसने सबसे ज्यादा कमाई की क्योंकि इसकी कॉमेडी नकली और शोरभरी नहीं बल्कि विश्वसनीय है.

दोनों जुड़वां (फिल्म में देवेन वर्मा का डबल रोल है) कैरेक्टर एक सी पोशाक पहनते हैं, और कहीं किसी तरह का इसमें कोई परिवर्तन पूरी फिल्म में नहीं है.

जब मैंने फिल्म को डब किया तो गलती से मैंने ‘स’ का उच्चरण दो पात्रों के लिए दो तरह से कर दिया था. डबिंग के बाद मैं अमेरिका चला गया.

फिल्म तैयार थी और किसी ने भी इसका नोटिस नहीं लिया था. जब रिलीज़ होने वाला था, गुलज़ार ने इसे पकड़ा और ध्यान दिलाया कि दोनों कैरेक्टर्स के बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए. सो मुझे न्युयोर्क में ट्रंक कॉल कर वापस बुलाया गया.

मेरे वापस आने पर सारी रात डायलॉग्स दोबारा डब किये गए. ज़रा सी बात के लिए मुझे अमेरिका से वापस बुलाया गया. गुलज़ार काम को लेकर बेहद सख्त थे.

आज भी दोनों भाइयों में फर्क देखे जा सकते हैं. एक की आस्तीनें चढी रहती हैं जबकि दूसरा पूरी बांहों में रहता है. कहीं कहीं दोनों बहादुर पूरी बांहों में दीखते हैं. हमने फिल्म के रिलीज़ हो जाने के बाद इन गलतियों को देखा लेकिन चुप रहना ही उचित था क्योंकि इस बात पर किसी का ध्यान गया ही नहीं.

सबसे ज्यादा मज़ा कि फिल्म में आया:

मुझे ’दीदार-ए-यार’ करने में बहुत मजा आया लेकिन फिल्म फ्लॉप हो गयी. इसका निर्माण जीतेंद्र ने किया था. मुझे यह रोल पसंद आया था. यहाँ तक कि आलोचकों ने भी इसे सराहा था.

पूरी फिल्म भर मुझे चेहरे में कोई भी एक्सप्रेशंस नहीं लाने थे. काम मुश्किल था क्योंकि मुझे ऐसे डायलॉग्स बोलने थे जिनमें मैं रिएक्ट करता हूँ लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं लाने होते थे.

इस इंडस्ट्री में आपको इस आधार पर फ़िल्में मिलती हैं कि आपने क्या कर के दिखाया है. एक हिट का मतलब हुआ लोग आपको देख चुके हैं. वहीं ऐसा भी होता है कि आपका काम अच्छा होता है और फिल्म हफ्ते भर से ऊपर नहीं चलती यानी दर्शकों ने आपको नहीं देखा.

संन्यास क्यों?

मेरा विश्वास है कि अगर आपने मेहनत की है, तो जीवन में उसका सिला आपको ज़रूर मिलना चाहिए. मैंने इंडस्ट्री में बहुत काम किया है और मुझे आराम करना था सो मैंने सन्यास के लिया.

संन्यास लेने का एक और कारण रहा. जब मैं अपनी अंतिम फिल्म कर रहा था, मैंने पाया कि नई पीढ़ी अपने साथ एक नया स्टाइल और पॉप कल्चर ले कर आई है जिसके हम हिस्से नहीं रह गए थे.

मेरा मूड बिगड़ जाता था जब सेट पे असिस्ट करने वाली एक नौजवान युवती मुंह में सिगरेट लगाए मेरे पास अगर अपनी उंगलियाँ चटखाते हुए कहती “चलिए साब आपको बुलाया है.”

हमें अच्छे व्यवहार की आदत रही थी. नौजवान पीढ़ी के पास वह तहजीब नहीं है और बहुत सारा ऐटीट्यूड है. मैं उन्हें दोष नहीं दे सकता – नई पीढ़ी इसी तरह होती है. सो अगर आप इससे ख़ुश नहीं हैं तो आपने काम करना बंद कर देना चाहिए, मैं औरों से बदलने को नहीं कह सकता.

रिटायर होने से पहले मैंने पुणे में एक बंगला खरीदा और १९९३ में यहाँ आ गया.

आज की फ़िल्में और कलाकार:

टेलीविजन कल्चर के साथ, कोई भी बुरा एक्टर लम्बे समय तक इंडस्ट्री में बना नहीं रह सकता.
अगर स्टार्स के बच्चे बुरे एक्टर हैं तो अब वे स्क्रीन पर राज नहीं कर सकते.

सिर्फ अच्छे एक्टर ही अच्छा कर सकते हैं. जैसे गोविंदा है, जो किसी स्टार की संतान नहीं है. लेकिन रंधीर कपूर नहीं रह सका जो कि राज कपूर जैसी हस्ती का बेटा था.

इसने फिल्मों के सिस्टम को सहायता दी है. लोग नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकरों के काम को पसंद करते हैं. ‘विक्की डोनर’ मुझे सबसे अच्छी फिल्म लगी. वह मेरे तरह की फिल्म थी. मुझे वह इसलिए अच्छी लगी कि वह एक विश्वसनीय कॉमेडी थी.

‘राउडी राठौर’ जैसी फिल्मे भी चल निकलती हैं जिनमें जीपें उडती हैं और हीरो की लात खा कर विलेन हवा में पन्द्रह फीट उछलता है. आखीर बॉस तो ऑडीएन्स ही होती है.

पुणे में मेरे दोस्त है जो छोटे थियेटरों के मालिक हैं मैं उन्हें फोन करता हूँ और उन्हें बताता हूँ कि मैंने किस फिल्म के बारे में सुना है और किसे मैं देखना चाहता हूँ. तब वे १०-१५ लोगों के लिए शो की व्यवस्था कर देते हैं.

‘विक्की डोनर’ मेरी हॉल में देखी आख़िरी फिल्म है. लेकिन मैं टीवी में फ़िल्में देखता रहता हूँ.
फिल्म इंडस्ट्री के हर क्षेत्र में अथाह टेलेंट छिपा हुआ है.

आज रणबीर कपूर सबसे अच्छा एक्टर है. उसके भीतर अलग तरह के रोल कर सकने का माद्दा और आत्मविश्वास है.

जब आप इंडस्ट्री में अच्छा कर रहे होते हैं और आपको गूंगे बहरे का रोल मिलता है (बर्फी) और जहां आपको बोलने को एक लाइन भी नहीं मिलने वाली और आप तब भी उस रोल को स्वीकार कर लेते हैं ... ऐसा करने के लिए आपके भीतर आत्मविश्वास होना चाहिए.

अभिनेत्रियाँ भी इवौल्व कर रही हैं. दीपिका पादुकोण मुझे शुरू में पसंद नहीं आई थी पर अब देखता हूँ उसके काम में निखार आता जा रहा है.

मेरे ख़याल से ‘भेजा फ्राई’ में विनय पाठक की भूमिका हाल के समय में किसी भी कॉमेडीयन का सबसे अच्छा काम है.   

आज लोग फिल्मे इस लिए करते हैं कि अगर उनकी फिल्मे च्छा कर गईं तो उन्हें काफी सारे विज्ञापन करने को मिलेंगे.

सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धा गायन के क्षेत्र में है क्योंकि एक हिट गाने के मतलब हुआ बहुत सारे शोज़ के कॉन्ट्रैक्ट्स.

देवेन वर्मा का आज तड़के देहांत



बॉलीवुड के सीनियर कैरेक्टर आर्टिस्ट, निर्देशक और निर्माता देवेन वर्मा का आज तड़के किडनी फेल हो जाने और हार्ट अटैक के कारण देहांत हुआ. सतत्तर साल के देवेन वर्मा को तमाम हिट फिल्मों में उनके जीवंत और गुदगुदाने वाले अभिनय के लिए याद किया जाएगा.

उन्हें कबाड़खाने की श्रद्धांजलि देता हुआ मैं पिछले साल रेडिफ़ डॉट कॉम पर छपे उनके एक इंटरव्यू के कुछ हिस्से पेश कर रहा हूँ. इंटरव्यू पैट्सी एन ने लिया था.

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छियत्तर साल के देवेन वर्मा पुणे में कल्याणीनगर के अपने बंगले में बैठे बहुत चुस्त और चंगे नज़र आते हैं. ग्यारह बजे के तय इंटरव्यू के लिए वे 10:15 बजे तैयार बैठे हैं.

उन्होंने १४९ फिल्मों में काम किया और उनके सहभिनेताओं में बॉलीवुड के सबसे नामचीन कलाकार शमिल थे. उनकी सबसे विख्यात फिल्मों में अंगूर’, ‘रंग बिरंगी’, ‘चोरी मेरा काम’, ‘अंदाज़ अपना अपनाऔर बेमिसालशामिल हैं.

शुरुआती साल:

मेरे पिता बलदेव सिंह वर्मा चांदी के कारोबारी थे. फिर एक दोस्त के साथ वे फिल्म वितरण के क्षेत्र में प्रविष्ट हुए. मेरी माँ एक गृहिणी थीं. मेरी चार बहनें हैं.

हम अपनी बड़ी बहन के कारण पुणे शिफ्ट हुए. वह माटुंगा के जी.एन. खालसा कॉलेज में पढ़ती थी. उन दिनों मुम्बई में काफ़ी दंगे हुआ करते थे. वह डॉक्टर बनना चाहती थी सो हम यहाँ आ गए. उसने नौरोजी वाडिया कॉलेज फॉर आर्ट्स एंड साइंस में दाखिला ले लिया. मैंने भी पंचगनी के एक स्कूल में पढाई खत्म करने के बाद इसी कॉलेज में पढ़ना जारी रखा. कॉलेज के दिनों में मैं नाटकों और युवा महोत्सवों में भाग लेता था.

स्नातक की पढाई के बाद मैंने मुम्बई में कानून की पढाई शुरू की जिससे मैं छः महीने में ही उकता गया. 
मेरी सबसे बड़ी बहन पुणे के एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल हो गयी, दूसरी डॉक्टर बनने के बाद मुम्बई में प्रैक्टिस कर रही थी. तीसरी बहन स्कूल प्रिंसिपल है जबकि चौथी ह्यूस्टन में टेक्सस यूनिवर्सिटी में विदेशी छात्रों वाले विभाग की इंचार्ज है.

पहला ब्रेक:

मैन्स्तेज शोज़ कर रहा था और एक ड्रामा ग्रुप का सदस्य था. (अभिनेता) जॉनी व्हिस्की और मैंने स्टेज पर सबसे पहले फिल्म कलाकारों की नक़ल करना शुरू किया था.  

मैं नार्थ इंडिया पञ्जाबे एसोशिएयेशन में एल वन-एक्ट शो कर रहा था और बी.आर. चोपड़ा दर्शकों में थे. उन्होंने मुझे धर्मपुत्र’ (१९६१) के लिए साइन कर लिया. मुझे महीने के छः सौ रूपये मिलने लगे.

धर्मपुत्रके बाद मैं स्टेज शोज़ करने विदेश चला गया. धर्मपुत्रफ्लॉप हुई. मैं मॉरीशस में था जब शशि कपूर ने मुझे एक चिठ्ठी लिख कर बताया फिल्म फ्लॉप हो गयी है और कोई नहीं जानता ऐसा क्यों हुआ.
जब मैं मुम्बई लौटा, एवीएम स्टूडियो के ए.वी. मैय्प्पन ने मुझे १५०० रूपये प्रतिमाह के ठेके पर रख लिया. मुझे मद्रास में रहना पड़ता था जहां मुझे अभिनय की ट्रेनिंग दी जाती थी.

इसी बीच मेरी एक और फिल्म गुमराह’ (१९६३) रिलीज़ हुई. इस में मैंने अशोक कुमार के नौकर का रोल किया था. यह कॉमिक रोल था जिसे लोगों ने पसंद किया.

ए.वी. मैय्प्पन ने मुझे मद्रास और मुम्बई के बीच एक को चुनने को कहा सो मैं एक साल बाद वापस मुम्बई आ गया. गुमराहके बाद मैंने मुमताज़ के अपोजिट क़व्वाली की रातमें काम किया. यह मुमताज़ की पहली फिल्म थी.

इसके बाद मैंने देवर’ (१९६६), अन्नपूर्ण’ (१९६६) साइन कीं और कुमकुम के अपोज़िट एक भोजपुरी फिल्म नैहर छूटल जाएभी. मैं साल में लगभग दो फिल्मे करता था. मुझे कोई जल्दी नहीं थी.

सेट्स पर शूटिंग:


हम लोकेशन पर कभी शूट नहीं करते थे. एक ही सेट पर पन्द्रह-पन्द्रह दिन शूट चलता था. फिर हम कुछ दिनों बाद वहां लौटा करते.

माहौल बहुत दोस्ताना हुआ करता. लोगों को साथ साथ रहना अच्छा लगता था. आज वैसी यारी-दोस्ती नज़र नहीं आती. लोग अलग-अलग दिन शूट किया करते हैं.

उन दिनों अफेयर्स का होना आम बात थी अलबत्ता कोई उन्हें बहुत तूल नहीं देता था. आज कलाकारों के बारे में सिर्फ यही खबर पढने को मिलती हैं कि किसका किसके साथ चक्कर चल रहा है.

जबहम कोई फिल्म देखा करते तो हम राज कपूर या दिलीप कुमार के अभिनय की तारीफें करते नहीं थकते थे. हम अभिनय की बातें करते थे. आज की पीढ़ी डांस और स्टंट को पसंद करती है - चीज़ों में इस कदर गिरावट आई है.

पहली हिट:

मेरे करियर ने १९७५ में 'चोरी मेरा काम' से उड़ान भरी. इस फिल्म के लिए मुझे फिल्मफेयर अवार्ड मिला. इस हिट के बाद मेरे पास ऑफर्स की भरमार हो गयी.

एक साथ १६ फ़िल्में करने का मेरा रेकॉर्ड है. एक समय था जब मैं रात को मुम्बई में इस्माइल श्रॉफ की 'आहिस्ता-आहिस्ता' कर रहा था, फिर तडके हैदराबाद जाकर जीतेंद्र की 'प्यासा सावन' में काम करता, शाम को चार बजे हैदराबाद से दिल्ली को निकालता जहां यश चोपड़ा 'सिलसिला' शूट कर रहे थे, फिर लौट कर मुम्बई इस्माइल श्रॉफ की 'आहिस्ता-आहिस्ता' के लिए.

इतनी फ़िल्में करने का कारण यह था कि मुझसे ना नहीं कहा जाता था. मैं इतने समय से इंडस्ट्री में था और मेरे इतने सारे दोस्त थे. मैं किसी को भी निराश नहीं करना चाहता था.

इस इंडस्ट्री में आप अपने टेलेंट के बूते दस साल जिंदा रह सकते हैं लेकिन आपका व्यवहार आपको जीवन भर यहाँ बनाए रखेगा. मैंने यहाँ 47 साल काम किया. अपने ससुर (अशोक कुमार) की मृत्यु के बाद मैंने संन्यास ले लिया था.

मेरी अंतिम फिल्म थी 'मेरे यार की शादी' अलबत्ता 'कलकत्ता मेल' सबसे बाद में रिलीज़ हुई. उस समय तक भी मैं बहुत सी फिल्मों में काम कर रहा था. ऐसा कोई समय नहीं रहा जब मेरे पास काम नहीं था.

मुझे तीन फिल्मफेयर अवार्ड्स हासिल हुए - चोरी मेरा काम, चोर के घर चोर और अंगूर के लिए. घर बदलते समय तीनों ट्राफियां मुझसे खो गईं. मेरी पत्नी को फेफड़े की बीमारी के ऑपरेशन के बाद प्रदूषण मुक्त जगह में रहने को कहा गया सो हम चेन्नई चले गए, जब दो साल बाद हम वापस मुम्बई आये तो ट्रांजिट में मेरे दो बैग खो गए.

निर्माता के तौर पर मेरी पहली फिल्म थी 'यकीन' (१९६९). मैंने आठ फ़िल्में बनांईं.

१९७१ में मैंने आशा पारेख और नवीन निश्चल को लेकर 'नादान' बनाई. फिर अशोक कुमार के साथ बड़ा कबूतर, अमिताभ बच्चन के साथ 'बेशर्म' (१९७८) और मिथुन चक्रवर्ती के साथ १९८९ में  'दानापानी'.
(बाकी हिस्सा जल्दी)