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Saturday, November 1, 2014

जो सरदार की प्रतिमा की ऊंचाई नाप रहे हैं


पंकज श्रीवास्तव का यह पुराना लेख आईबीएन ब्लॉग से साभार लिया जा रहा है -

29 अक्टूबर (२०१३) को अहमदाबाद में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश का इतिहास कुछ और होता. उसी मंच पर मौजूद मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फौरन याद दिला दिया कि पटेल एक प्रतिबद्ध कांग्रेसी थे. सेक्युलर नेता थे. ये उस राजनीतिक युद्ध की बानगी है जो पटेल के नाम पर छिड़ा है. मोदी, दरअसल, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के उसी प्रचार को आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें बार-बार कहा जाता है कि सरदार पटेल, नेहरू से बेहतर नेता थे. यही नहीं पटेल को हिंदुत्व के दर्शन के करीब बताने की कोशिश भी होती है. आम चुनाव 2014 की आहट बढ़ने के साथ ये कोशिश तेज होती जा रही है.

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में पटेल की ऐसी प्रतिमा स्थापित करने का एलान किया है जो दुनिया में सबसे ऊंची होगी. अमेरिका की स्टैच्यू आफ लिबर्टी से भी ऊंची ये 182 मीटर की प्रतिमा गुजरात के नर्मदा जिले के सरदार सरोवर बांध के करीब स्थापित की जाएगी. 31 अक्टूबर को पटेल जयंती पर परियोजना का शिलान्यास हो भी चुका है. बीजेपी की ओर से इसका धुआंधार प्रचार जारी है. ऐसे मे ये जनना दिलचस्प है कि पटेल का बीजेपी की मूल प्रेरणा आरएसएस के प्रति क्या नजरिया था.

30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिरला हाउस में शाम की प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे महात्मा गांधी की छाती पर तीन गोलियां उतारी गईं. दुनिया भौंचक्की रह गई. खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले गांधी पर गोली किसी और ने नहीं, हिंदुत्व का दर्शन देने वाले विनायक दामोदर सावरकर के शिष्य और महासभा के कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने चलाई थी. गोडसे कभी आरएसएस का सक्रिय सदस्य था. गांधी की हत्या एक ऐसे हिंदू की हत्या थी जिसने सत्य को ही ईश्वर माना. जिसका धर्म मनुष्य और मनुष्य में भेद नहीं करता था. वे ईश्वर के साथ अल्लाह का नाम भी लेते थे. दोनों को एक समझते थे. लेकिन हिंदू गांधी के हत्यारों का आदर्श हिंदुत्व था. जिसके हिसाब से भारत के प्रति उनकी निष्ठा ही सच्ची हो सकती है जिनकी पितृभूमि और पवित्र भूमि, दोनों भारत में हों. इस परिभाषा से अल्पसंख्यक कभी देशभक्त नहीं हो सकते.

गांधी की हत्या ने दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया था जिसकी जिम्मेदारी गृह मंत्री के नाते सरदार पटेल के पास थी. तमाम तथ्यों को देखते हुए उन्होंने माना कि गांधी की हत्या में आरएसएस का भी हाथ है. और 4 फरवरी 1948 को पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया.

आरएसएस ने बेगुनाह बताते हुए इस पर आपत्ति जताई तो 11 सितंबर 1948 को पटेल ने आरएसएस के सरसंघचालक एम.एस.गोलवलकर को पत्र लिखा. उन्होंने लिखा- हिंदुओं को संगठित करना और उनकी सहायता करना एक बात है, लेकिन अपनी तकलीफों के लिए बेसहारा और मासूम पुरुषों, औरतों और बच्चों से बदला लेना बिल्कुल दूसरी बात.... इनके सारे भाषण सांप्रदायिक विष से भरे थे, हिंदुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए आवश्यक न था कि जहर फैले. इस जहर का फल अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी. सरकार व जनता की रत्तीभर सहानुभूति आरएसएस के साथ न रही बल्कि उनके खिलाफ ही गई. गांधी जी की मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया और मिठाई बांटी, उससे यह विरोध और भी बढ़ गया. इन हालात में सरकार को आरएसएस के खिलाफ कदम उठाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था.

आरएसएस और बीजेपी के लोगों का दावा है कि पटेल ने प्रतिबंध नेहरू के दबाव में लगाया था. लेकिन पटेल ने इस पत्र में लिखा कि गांधी जी की हत्या के बाद संघ वालों ने मिठाई बांटी. प्रतिबंध के अलावा कोई चारा नहीं था. जाहिर है, सरदार पटेल नेहरू की जुबान नहीं बोल रहे थे, अपना मन खोल रहे थे. बतौर गृह मंत्री उन्हें देशभर से खुफिया जानकारियां मिलती थीं.

यही नहीं सरदार पटेल ने 18 जुलाई 1948 को हिंदू महासभा के प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी एक पत्र लिखकर बताया कि प्रतिबंध के बावजूद आरएसएस बाज नहीं आ रहा है. उन्होंने लिखा-हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड संभव हो सका. मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी भाग षड्यंत्र में शामिल था. आरएसएस की गतिविधियां, सरकार और राज्य-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए स्पष्ट खतरा थीं. हमें मिली रिपोर्टं बताती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद वे गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं. दरअसल, समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली अधिक उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है.

दरअसल, संघ परिवार की ओर से पेश की गई हिंदूराष्ट्र की अवधारणा सरदार पटेल को कभी रास नहीं आई. वे भारत को हिंदू पाकिस्तान बनाने के सख्त खिलाफ थे. उन्होंने साफ कहा था कि, “भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इस देश में मुसलमानों के भी उतने ही अधिकार हैं जितने की एक हिन्दू के हैं. हम अपनी सारी नीतियां और आचरण वैसा नहीं कर सकते जैसा पाकिस्तान कर रहा है. अगर हम मुसलमानों को यह यकीन नहीं दिला पाये की यह देश उनका भी है तो हमें इस देश की सांस्कृतिक विरासत और भारत पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं.”

1925 में गठित आरएसएस का गांधी की हत्या तक न कोई संविधान था और न सदस्यता रसीद. पटेल ने मजबूर किया कि वो संविधान बनाये और खुद को सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखे. 11 जुलाई 1949 प्रतिबंध हटाने का एलान करने वाली भारत सरकार की विज्ञप्ति में कहा गया है-आरएसएस के नेता ने आश्वासन दिया है कि आरएसएस के संविधान में, भारत के संविधान और राष्ट्रध्वज के प्रति निष्ठा को और सुस्पष्ट कर दिया जाएगा. यह भी स्पष्ट कर दिया जाएगा कि हिंसा करने या हिंसा में विश्वास करने वाला या गुप्त तरीकों से काम करनेवाले लोगों को संघ में नहीं रखा जाएगा. आरएसएस के नेता ने यह भी स्पष्ट किया है कि संविधान जनवादी तरीके से तैयार किया जाएगा. विशेष रूप से, सरसंघ चालक को व्यवहारत: चुना जाएगा. संघ का कोई सदस्य बिना प्रतिज्ञा तोड़े किसी भी समय संघ छोड़ सकेगा और नाबालिग अपने मां-बाप की आज्ञा से ही संघ में प्रवेश पा सकेंगे. अभिभावक अपने बच्चों को संघ-अधिकारियों के पास लिखित प्रार्थना करने पर संघ से हटा सकेंगे...इस स्पष्टीकरण को देखते हुए भारत सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि आरएसएस को मौका दिया जाना चाहिए.'

इस विज्ञप्ति से साफ है कि संघ पर किस तरह के आरोप थे और भारत सरकार को उसके बारे में कैसी-कैसी सूचनाएं थीं. लेकिन प्रतिबंध हटाना शायद लोकतंत्र का तकाजा था और इसके सबसे बड़े पैरोकार तो प्रधानमंत्री नेहरू ही थे. पटेल को नेहरू के बरक्स खड़ा करने की कोशिशों के बीच ये पड़ताल भी जरूरी है कि दोनों नेता एक दूसरे के प्रति क्या राय रखते थे. भारत की आजादी का दिन करीब आ रहा था. मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी. 1 अगस्त 1947 को नेहरू ने पटेल को लिखा-

“कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं. इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं.”

जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा - “आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद. एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता. आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी. आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है. हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है. आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं.”

पटेल की ये भावनाएं सिर्फ औपचारिकता नहीं थी. अपनी मृत्यु के करीब डेढ़ महीने पहले उन्होंने नेहरू को लेकर जो कहा वो किसी वसीयत की तरह है. 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा – “अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी. अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफादार सिपाही नहीं हूं.”

साफ है, पटेल को नेहरू की जगह पहला प्रधानमंत्री न बनने पर नरेंद्र मोदी जैसा अफसोस जता रहे हैं, वैसा अफसोस पटेल को नहीं था. वे आरएसएस नहीं, गांधी के सपनों का भारत बनाना चाहते थे. पटेल को लेकर नरेंद्र मोदी के अफसोस के पीछे एक ऐसी राजनीति है जिसे कम से कम पटेल का समर्थन नहीं था.

बहरहाल, पटेल की विरासत पर बीजेपी के दावे के साथ कुछ ऐसे सवाल भी खड़े हो जाते हैं जिसका जवाब संघ परिवार नहीं देना चाहता. संघ परिवार कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग लगातार करता है. लेकिन सरदार पटेल ने 15 अगस्त 1947 को ऐसे भारत के नक्शे को स्वीकार किया था जिसमें कश्मीर था ही नहीं. जब विवाद बढ़ा तो पटेल ने शुरुआत में 'कश्मीर के झंझट से दूर रहने की ही नसीहत दी थी.' यही नहीं, वे संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को दी गई विशेष रियायतों के न सिर्फ समर्थक थे, बल्कि शर्तें तय करने में उनकी अहम भूमिका थी.

तो फिर संघ के पटेल प्रेम की वजह क्या है. जानकार मानते हैं कि संघ खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताता है, लेकिन हकीकत ये है कि स्वतंत्रता संग्राम में उसने भाग नहीं लिया. ऐसे में उसके पास ऐसे नायक नहीं जो अंग्रेजी साम्राज्यवाद से टकारते हुए पूरे भारत में सम्मानित हुए हों. जिनके जरिये राष्ट्रीय भावना जगाई जा सके. अब इस कमी को पटेल के जरिये पूरा करने की कोशिश की जा रही है.

कांग्रेस कार्यसमिति ने जून 1934 में प्रस्ताव पारित किया था कि कांग्रेस सदस्य, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग और आरएसएस से कोई संबंध नहीं रखेंगे. पटेल ने ये शपथ जीवन भर निभाई. लेकिन उनकी मौत के 63 साल बाद अगर आरएसएस ही उनसे संबंध जोड़ने मे जुटा है तो पटेल इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं. वैसे भी, किसी महापुरुष को उसके विचारों से दूर करके सिर्फ मूर्ति में तब्दील करना, हिंदुस्तान की पुरानी रवायत है. यही वजह है कि सबसे ज्यादा मूर्तियां गौतम बुद्ध की मिलती हैं जो मूर्तिपूजा के सख्त खिलाफ थे. कुछ ऐसा ही हाल गांधी का भी हुआ है. चौराहे-चौराहे गांधी जी की प्रतिमाएं हैं, लेकिन उनकी राह चलने वाले ढूंढे नहीं मिलते. और अब यही सलूक सरदार पटेल के साथ हो रहा है. जो सरदार की प्रतिमा की ऊंचाई नाप रहे हैं, वे उनके विचारों की गहराई में भी उतरेंगे, ऐसी कोई उम्मीद नहीं है.


Sunday, September 23, 2012

गांधी, नेहरू और भारत के बारे में नेरुदा

यह पोस्ट ब्लॉग बेतरतीब विचार से साभार ली गई है.



यह हिस्सा चिली के ख्यात और पूरी दुनिया के अपने कवि पाब्लो नेरुदा की पुस्तक ‘संस्मरण’ (जिसका अनुवाद अभी पूरा किया) में है . अधिकांश लोग इससे परिचित हैं, फिर भी एक बार फिर पढ़ लेने लायक है . यह सभी जानते हैं कि पाब्लो भारत से, उसकी आजादी की कामना से, उसके लोगों से गहराई से जुड़े थे . आजाद होने पर यहां आकर उन्होंने जो देखा और सहा उसे एक शब्द में उन्होंने ‘शिट’ शब्द में बयान किया . हिंदी में ‘गंद’ शब्द उसके पूरे गतार्थों को व्यक्त नहीं करता क्योंकि वैसी जुगुप्सा नहीं पैदा करता . ऐसी ठेस इस देश ने अपने कितने प्रेमियों को लगाई होगी, इसके कोई रिकार्ड नहीं हैं.

चित्र १ - आज़ादी से पहले

भारत में एक कांग्रेस

यह एक गौरव का दिन है . हम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की काग्रेस में उपस्थित हैं . अपनी मुक्ति के लिए संघर्षरत एक देश . पूरा हाल हजारों प्रतिनिधियों से भरा था . मैं गांधी से मिला, आंदोलन के दूसरे नेता मोतीलाल नेहरू से भी . और उनके शानदार युवा पुत्र जवाहर लाल नेहरू से भी जो हाल ही में लंदन से लौटे हैं . नेहरू आजादी के पक्ष में है जबकि गांधी पहले कदम के रूप में केवल स्वायत्तता चाहते हैं . गांधीः एक बुद्धिमान लोमड़ी की तरह तेज, व्यावहारिक आदमी . राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी, कमेटियों के उस्ताद, चालाक रणनीति बाज, अदम्य . लोगों का रेला उनके पैरों को हाथ लगाता और श्रद्धा से ‘गांधी जी !’ गांधी जी !’ कहता हुआ . वे लापरवाही से जवाब देते हुए और बिना चश्मा उतारे हंसते हुए . वह संदेश उठाते और उन्हें पढ़ते, टेलीग्राम का जवाब देते . बिना किसी प्रयास के . वह एक ऐसा संत है जो अपने मन की बात नहीं खोलता . नेहरूः उनकी क्रांति के उद्‍घोषक .

कांग्रेस में एक महान हस्ती थे सुभाष चंद्र बोस – प्रचंड जननेता, प्रखर साम्राज्यवाद-विरोधी, अपने देश के आकर्षक व्यक्तित्व .१९१४ के महायुद्ध में जापानी आक्रमण के समय उन्होंने ब्रिटिश के विरुद्ध आक्रामकों का साथ दिया . बहुत साल बाद, भारत में एक मित्र ने मुझे बताया कि कैसे सिंगापुर का किला फतह किया गया – ‘हमारे हथियार जापानी आक्रमणकारियों की तरफ तने थे . अचानक हमने अपने से पूछा, क्यों ? हमारे सैनिकों ने एकदम पाला बदल लिया और अपनी बंदूकें अंग्रेजी सेनाओं की तरफ कर दीं . यह बहुत आसान था . जापानी आक्रमणकारी तो केवल फौरी तौर पर थे, जबकि अंग्रेज तो यहां हमेशा काबिज रहना चाहते थे .”

सुभाष बोस को गिरफ्तार किया गया, मुकदमा चला और विद्रोह का दोषी पाया गया . भारत में ब्रिटिश कोर्ट ने उन्हें मृत्युदंड की सजा दी . इसके विरोध में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा . आखिरकार बहुत सी कानूनी लड़ाइयों के बाद उनके वकील – जो स्वयं नेहरू थे – ने उनके लिए राज्यक्षमा ले ली . उसके बाद वह एक लोकप्रिय नायक बन गए .

चित्र २ – आजादी के बाद

एक बार फिर भारत यात्रा

सन १९५० में मुझे एक बार फिर भारत जाना पड़ा . पैरिस में जूलियट क्यूरी ने मुझे एक खास मिशन पर जाने के लिए कहा . मुझे नई दिल्ली जाना था और अलग-अलग तरह के राजनीतिक विचारों वाले लोगों से संपर्क करना था और भारत में शांति के आंदोलन को मजबूत करने की संभावनाएं तलाशनी थीं .

जूलियट क्यूरी शांति के आंदोलन के सभापति थे . उन्हें चिंता थी कि भारत में शांति आंदोलन का असर होगा या नहीं, हालांकि भारत हमेशा से ही एक शांतिप्रिय देश के रूप में प्रसिद्ध रहा है . उसके प्रधानमंत्री नेहरू स्वयं शांति के पक्षधर माने जाते थे .

जूलियट क्यूरी ने मुझे दो पत्र दिए . एक बंबई में किसी वैज्ञानिक के लिए और दूसरा प्रधानमंत्री के लिए, जिसे मुझे खुद देना था . मुझे इस पर अचंभा हुआ कि इतने आसान काम के लिए मुझे इतनी दूर भेजा जा रहा है . शायद उस देश से मेरे स्थाई प्रेम के कारण ऐसा किया गया, जहां मैंने अपनी जवानी के अनेक वर्ष बिताए थे . या शायद इसलिए कि उसी साल मुझे पाब्लो पिकासो और नाजिम हिकमत के साथ ही शांति का पुरस्कार मिला था .

मैंने बंबई के लिए विमान लिया . मैं भारत तीस साल बाद जा रहा था . वह अब उपनिवेश नहीं था, बल्कि स्वतंत्र गणराज्य था, गांधी और कांग्रेस का सपना, जिसकी १९१८ में हुई पहली कांग्रेस में मैं उपस्थित था . उन दिनों के मेरे उन दोस्तों में शायद ही कोई जीवित हो जिन्होंने एक भाई की तरह अपने संघर्षों की कहानियां मुझे सुनाई थीं .

मैं विमान से उतर सीधे कस्टम की ओर गया . वहां से मुझे एक होटल में जाना था और वैज्ञानिक रमन को पत्र देकर नई दिल्ली जाना था . मैंने अपने मेजबानों पर निर्भर होने की जगह अपना इंतजाम खुद किया था . बहुत देर हो गई लेकिन मेरा सामान नहीं आया . मैंने देखा कि कस्टम के अधिकारी जैसे कई लोग मेरे सामान की गहराई से जांच कर रहे थे . मैंने बहुत जांच-पड़तालें देखी थीं लेकिन ऐसी नहीं . मेरा सामान कोई ज्यादा नहीं था – एक मझौले आकार का सूटकेस जिसमें मेरे कपड़े और चमड़े का थैला जिसमें मेरे गुसल की चीजें थीं . लेकिन मेरी पेंटों, निक्करों, जूतों को बाहर निकाल कर पांच लोगों द्वारा जांचा गया . एक-एक जेब को तलाशा गया . रोम में अपने कपड़ों को गंदा होने से बचाने के लिए मैंने अपने जूतों को अपने होटल के कमरे में पड़े एक पुराने अखबार में लपेट दिया था . शायद उस अखबार का नाम ‘ऑसरवेटोर रोमानो’ था . उन्होंने अखबार के पन्ने को एक मेज पर फैला लिया, फिर रोशनी के सामने करके उसे देखा, फिर उसे बड़ी सावधानी से तहाकर रखा गया जैसे वह कोई बहुमूल्य दस्तावेज हो और अंत में मेरे कुछ कागजातों के साथ उसे अलग रख दिया गया . मेरे जूतों की अंदर तक जांच की गई मानो वे किसी महान जीवाश्म के सैंपल हों .

यह खोजबीन दो घंटों तक जारी रही . उन्होंने मेरे कागजों का एक बड़ा सा बंडल बना लिया (पासपोर्ट, पतों की डायरी, प्रधानमंत्री के नाम पत्र, और अखबार का पेज) और उन्हें मेरी आंखों के सामने लाख से सील कर दिया गया . तब मुझे बताया गया कि अब मैं अपने होटल जा सकता हूं .

अपने चिलीयन धैर्य को पूरी संकल्पशक्ति से बनाए रखकर मैंने कहा कि मेरे पहचान के कागजातों के बिना कोई होटल मुझे नहीं रखेगा और कि मेरा आने का मकसद प्रधानमंत्री को वह पत्र देना है जिसे उन्होंने अपने पास रख लिया है .

“हम होटल वालों से बात करेंगे, वे आपको रहने देंगे . जहां तक कागजों की बात है हम उन्हें कुछ समय बाद आपको वापस कर देंगे .”

यह वही देश था जिसकी आजादी का संघर्ष मेरी युवावस्था के अनुभव का हिस्सा था . मैंने अपना सूटकेस और मुंह एक साथ बंद किया . मेरे मन में केवल एक ही शब्द गूंजा – गंद !

होटल में मैं प्रोफैसर बाएरा से मिला तो उन्हें अपने साथ हुई घटना के बारे में बताया . वह एक अच्छे हिंदू थे . उन्होंने इस घटना को गंभीरता से नहीं लिया . उनका अपने देश के प्रति दृष्टिकोण बहुत ही सहनशीलता का था और यह भी कि अभी हम निर्माण की अवस्था में हैं . जबकि मुझे उस व्यवहार में जानबूझकर तंग करने की बात नजर आई, जिस व्यवहार की मैं एक नव स्वतंत्र देश से अपेक्षा नहीं कर सकता था .

जूलियट क्यूरी के जिन मित्र के नाम मैं वह पत्र लाया था वे भारत में परमाणु भौतिकी के निदेशक थे . उन्होंने मुझे अपने प्रतिष्ठान को देखने के लिए बुलाया और बताया कि हम प्रधानमंत्री की बहन के साथ दोपहर का भोजन करेंगे . जीवन भर मेरा भाग्य ऐसा ही रहा है और आज भी वैसा ही है . एक हाथ मेरी पसली में घूंसा मारता है और दूसरा मुझे फूलों की डलिया देता है .

आणविक शोध संस्थान उन साफ, चमकदार स्थानों में था जहां पुरुष-स्त्री झक्क सफेद कपड़ों में बहते पानी की तरह बरामदों में आ-जा रहे थे, औजारों, ब्लैकबोर्डों के बीच से अपना रास्ता बनाते . मैं उस वैज्ञानिक व्याख्या को कुछ हद तक ही समझ पाया लेकिन वहां जाना इस मायने में अच्छा रहा कि उससे पुलिस के हाथों हुए अपमान के धब्बे कुछ कम हो गए . मुझे धुंधली सी याद है कि मैंने एक शीशे के बर्तन में पारे जैसा कुछ देखा था . इस धातु से ज्यादा आश्चर्यजनक क्या हो सकता है जो अपनी ऊर्जा पशु जीवन के रूप में दिखाता है . उसका संचरण, द्रव्य के रूप में उसका रूपांतरण मुझे हमेशा आश्चर्यचकित करता है .

मैं नेहरू की बहन का नाम भूल गया हूं जिनके साथ हमने उस दिन दोपहर का भोजन खाया था . मेरे भद्दे मजाक उनकी उपस्थिति से ऊखड़ गए . वह बहुत सुंदर महिला थीं और एक आकर्षक अभिनेत्री जैसी वेशभूषा में थीं . सोने और मोतियों ने उनकी खूबसूरती को और बढ़ा दिया था . मुझे वह पसंद आईं . इस तरह की भद्र महिला को अपने हाथों से खाते देखना विरोधाभासी सा अनुभव था जब वह अपनी सोने से भरी उंगलियों को चावल और दाल में भिगो रही थी . मैंने उन्हें बताया कि मैं उनके भाई और विश्व शांति के दोस्त से मिलने दिल्ली जा रहा हूं . उनका कहना था कि उसके विचार से भारत के सब लोगों को इस आंदोलन का साथ देना चाहिए .

उस दिन दोपहर बाद मेरे कागजों का बंडल मुझे होटल में मिल गया . दोमुही पुलिस ने मेरे सामने लगाई सील को खोला होगा और उन सब कागजों के फोटो लिए होंगे, मेरे धोबी के बिलों के साथ . मुझे मालुम हुआ कि जिन लोगों के पते मेरी डायरी में थे, उन सबके घर जाकर पुलिस ने पूछताछ की थी . उनमें एक रिकार्डो गिराल्डे की विधवा भी थी जो उस समय मेरी साली थी . यह उथली औरत उस समय ब्रह्मविद्यावादी थी और उसका एक शौक एशिया के दर्शन थे . वह भारत के एक सुदूर के गांव में रहती थी . क्योंकि उसका नाम मेरी पतों की डायरी में था इसलिए पुलिस ने उसे बहुत तंग किया .

जिस दिन मैं दिल्ली आया उसी दिन राजधानी के छः-सात गण्यमान लोगों से मिला . भयंकर गर्मी से बचने के लिए हम एक छतरी के नीचे बैठे . वे सब लेखक, दार्शनिक, हिंदू और बौद्ध पुजारी थे . ऐसे भारतीय लोग जो बिना बनावट के देखने में अत्यंत सरल थे . सब इस बात से सहमत थे कि शांति के समर्थक हमारे देश की प्राचीन परंपराओं की भावना के अनुरूप काम कर रहे हैं . फिर भी उन्होंने बुद्धिमत्ता पूर्ण सलाह दी कि इसमें किसी भी तरह की कट्टरता या नेतागिरी की प्रवृत्तियों को तूल नहीं दिया जाना चाहिए . इस आंदोलन की नेतागिरी कम्युनिस्टों या बौद्धों या मध्यवर्गों को नहीं लेनी चाहिए . कहने का मतलब यह कि सब लोगों को उसमें सहयोग करना चाहिए . मैं उनकी बातों से सहमत था .

लेखक-चिकित्सक और मेरे पुराने मित्र चिली के राजदूत डॉ. युआन मारिन मुझे रात के भोजन के समय मिलने आए . इधर- उधर की बातें करने के बाद उन्होंने बताया कि वह पुलिस के मुखिया से मिले थे . राजनयिकों से जिस शांत तरीके से अधिकारीगण बात करते हैं उसमें उन्होंने राजदूत को बताया कि मेरी कारगुजारियां भारतीय सरकार के लिए चिंता का विषय हैं और वह चाहते हैं कि मैं जल्दी ही देश से चला जाऊं . मैंने राजदूत को बताया कि मेरी कुल गतिविधि होटल के बगीचे में छः-सात लोगों से बात करना थी जिनके विचारों से सरकार पहले ही परिचित होगी . जहां तक मेरे यहां रुकने की बात है, प्रधानमंत्री को जूलियट क्यूरी का पत्र देने के बाद मैं उस देश में एक मिनट भी नहीं रहना चाहूंगा जो अपने प्रति सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति से बिना किसी कारण के इस बदतमीजी से पेश आता है .

मेरे राजदूत चिली में समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में एक थे . लेकिन अब उनके रवैये में काफी नरमी आ गई थी . यह उम्र के कारण भी हो सकता है और राजनयिक सेवा के कारण भी . उन्होंने भारतीय सरकार के बेहूदा रवैये का विरोध नहीं किया और मैंने भी उनसे किसी समर्थन की उम्मीद नहीं की . हम सहृदयता से विदा हुए – उन्हें मेरी यात्रा के कारण उन पर आन पड़ी भारी जिम्मेदारी से मुक्ति की राहत मिली होगी . जहां तक मेरा सवाल है मेरे उनकी संवेदनशीलता और मित्रता के सारे भ्रम हमेशा के लिए टूट गए .

नेहरू ने अगली सुबह अपने दफ्तर में मिलने का समय दिया . वह उठे और चेहरे पर बिना किसी स्वागत मुस्कान के भाव के मुझसे हाथ मिलाया . उनका चेहरा इतनी बार छप चुका है कि उसे बताने की कोई जरूरत नहीं है . काली, ठंडी आंखें भावशून्य रूप में मुझे देख रही थीं . तीस साल पहले स्वाधीनता के एक बड़े प्रदर्शन में उनसे और उनके पिता से मेरा परिचय कराया गया था . मैंने इसका जिक्र किया लेकिन इससे उनके चेहरे में कोई फर्क नहीं आया . वह हां-हूं में सब बातों का जवाब देते रहे और अपनी ठंडी आंखों से मुझे घूरते रहे .

मैंने उनके मित्र जूलियट क्यूरी का पत्र उन्हें दिया . उन्होंने कहा कि उनके मन में फ्रेंच वैज्ञानिक क्यूरी के लिए बहुत सम्मान है और फिर वे पत्र पढ़ने लगे . उसमें क्यूरी ने मेरा परिचय भी दिया था और मेरे काम में नेहरू से मदद करने के लिए कहा था . उन्होंने उसे पढ़ा और पढ़कर वापस लिफाफे में रख लिया और बिना कुछ कहे फिर मुझे देखने लगे . मुझे अचानक लगा कि मेरी उपस्थिति उनमें एक तरह की वितॄष्णा जगा रही है . यह भी मुझे लगा कि पीतवर्ण का यह आदमी जरूर किसी बुरे शारीरिक, राजनीतिक, या मानसिक अनुभव से गुजर रहा है . उन्हें देखकर लगता था कि उनमें उंचा होने, शक्तिशाली होने का गुमान है . ऐसा सख्त आदमी जो केवल आदेश देने का आदी है लेकिन नेता होने के गुणों से वंचित है . मुझे याद आया कि उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू एक मालदार जमींदार थे और न केवल अपनी राजनीतिक सूझबूझ से उन्होंने कांग्रेस आंदोलन की मदद की थी बल्कि धन से भी . मैंने सोचा कि मेरे सामने बैठा आदमी शायद फिर से अपनी जमींदारी भूमिका में आ गया है और मुझे उसी हिकारत से देख रहा है जैसे जमींदार अपने नंगे पांव किसान को देखते हैं .

“वापस पैरिस जाकर मैं प्रोफैसर जूलियट क्यूरी को क्या बताऊं ?”

“ मैं उनके पत्र का उत्तर दे दूंगा,” उन्होंने रूखेपन से कहा .

मैं कुछ मिनट तक चुप रहा . वे कुछ क्षण बहुत ही लंबे लगे . लगता था अब नेहरू के पास मुझसे करने के लिए कोई बात नहीं रह गई है . लेकिन उन्होंने कोई अधीरता नहीं दिखाई मानो मेरा वहां बने रहना उनके लिए कोई महत्व की बात नहीं थी . मुझे यह अहसास हुआ कि मैं इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति का समय बर्बाद कर रहा हूं .

मुझे लगा कि अपने मिशन के बारे में कुछ शब्द कहने चाहिएं . मैंने कहा कि दुनिया में जो शीत युद्ध चल रहा है वह कभी भी युद्ध में बदल सकता है . मैंने भयानक आणविक हथियारों का भी जिक्र किया . ऐसे में जो युद्ध नहीं चाहते उन सबके लिए एक साथ आना कितना जरूरी है .

वह अपने में खोए रहे जैसे मेरी बात सुनी ही न हो . कुछ क्षण के बाद उन्होंने कहा, “दोनों ही पक्ष एक दूसरे पर शांति के पक्ष में तर्क फेंक रहे हैं .”

“निजी तौर पर मेरा मानना है कि जो भी शांति की बात करता है या उसमें कुछ योगदान कर सकता है, उन्हें एक पक्ष में हो जाना चाहिए . हम किसी को अलग रखना नहीं चाहते, केवल उन लोगों को छोड़कर जो बदले और युद्ध की बातें करते हैं,” मैंने कहा .

उसके बाद देर तक खामोशी रही . मैंने समझ लिया कि बातचीत आगे नहीं बढ़ सकती . मैं उठ खड़ा हुआ और विदा लेने से पहले हाथ आगे बढ़ाया . उन्होंने चुपचाप हाथ मिलाया . जब मैं दरवाजे की तरफ जाने लगा तो उन्होंने कुछ मित्रता के अंदाज में कहा, “ क्या आपके लिए कुछ कर सकता हूं ? आपको कुछ चाहिए ?”

मैं प्रतिक्रिया करने में जरा धीमा हूं और मेरा दुर्भाग्य है कि मैं बहुत दुर्भावनापूर्ण नहीं हो सकता . लेकिन जीवन में पहली बार मैं आक्रामक हुआ, “ओह, हां ! मैं तो भूल ही गया था . मैं भारत में एक बार रहा लेकिन दिल्ली के इतना पास होते हुए भी ताजमहल देखने नहीं जा सका . यह वहां जाने का अच्छा मौका है अगर पुलिस ने मेरे शहर की सीमा छोड़ने के विरुद्ध या मेरे तुरत यूरोप लौटने के लिए सूचना जारी न कर दी हो . मैं कल वापस जा रहा हूं .”

अपनी इस प्रतिक्रिया के लिए अपने पर खुश होते हुए मैंने उनसे विदा ली . होटल मैनेजर स्वागत काउंटर पर मेरा इंतजार कर रहा था . “ आपके लिए एक संदेश है . उन्हें सरकारी दफ्तर से मुझे यह बताने के लिए फोन आया था कि मैं जब चाहे ताजमहल देखने जा सकता हूं .”

“ मेरा बिल तैयार करो”, मैंने कहा . “ मुझे अफसोस है कि मैं वहां नहीं जा सकता . मैं तुरत हवाई अड्डे जा रहा हूं और पैरिस के लिए पहला विमान पकड़ रहा हूं .”

पांच साल बाद मास्को में मुझे लेनिन वार्षिक शांति पुरस्कार की निर्णय-समिति में बैठने का मौका मिला . एक अंतर्राष्ट्रीय समिति जिसका मैं हिस्सा था . जब उस साल के पुरस्कार के लिए लोगों के नाम पर वोट करने का अवसर आया तो भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने नेहरू का नाम सुझाया . मेरे चेहरे पर हंसी की एक छाया घूम गई, जिसे वहां उपस्थित लोगों में से कोई नहीं समझ पाया . मैंने उनके पक्ष में मत दिया . अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार में नेहरू को विश्वशांति का प्रबल समर्थक कहा गया .

Thursday, December 18, 2008

दफ़न का स्थान आरक्षित कर रखा था ज़फ़र ने

'१८५७ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी और बहादुरशाह ज़फ़र' पुस्तक का जिक्र मैंने ब्लॉग 'आज़ाद लब' में पिछले दिनों किया था, उसकी भूमिका है यह. पुस्तक के संकलनकर्ता और संयोजक डॉक्टर विद्यासागर आनंद ने यह भूमिका लिखी है. आपकी प्रतिक्रिया हमारे इस ब्लॉग पर उत्साहवर्द्धक रही है. इसी भूमिका की यह दूसरी कड़ी है- विजयशंकर चतुर्वेदी)



पिछली कड़ी से आगे...

...स्वतंत्रता-दीप प्रज्ज्वलित रखने के लिए राष्ट्र को संगठित व अनुशासित रखना आवश्यक था अतः देश के राजनैतिक व धार्मिक पथ-प्रदर्शकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आन्दोलन को भारत के कोने-कोने तक फैला दिया. इनमें कुछेक तो भारत से बाहर के अन्य देशों तक चले गए तथा वहाँ स्वतंत्रता-आन्दोलन को सुदृढ़ बनाने हेतु सहायता प्राप्त करने के प्रयत्न किए.

इस लंबे स्वतंत्रता-आन्दोलन का उद्देश्य अंततः नब्बे वर्ष बाद १५ अगस्त १९४७ को तब जाकर प्राप्त हुआ, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहादुरशाह ज़फ़र के पूर्वजों के लाल क़िले से स्वतन्त्र भारत की घोषणा की. उस ऐतिहासिक दिवस से अब तक साठ वर्ष का (भूमिका लिखे जाते समय) समय बीत चुका है लेकिन खेद की बात है कि इस बीच भारत के राजनेताओं ने इस स्वतंत्रता-संग्राम में देश के बाहर व भीतर शहीद होने वाले जियालों के सम्मान को बढ़ावा देने में ढिलाई बरती और उन्हें वह स्थान नहीं दिया जिसके वे अधिकारी थे.

यहाँ अधिक अफ़सोस की बात यह है कि स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ज़फ़र के अवशेष भारत लाने का समर्थन किया था पर नामालूम कारणों से इस दिशा में कोई क़दम नहीं उठाया गया. १ से ७ अक्टूबर के साप्ताहिक 'हमारी ज़बान' नई दिल्ली में इस विषय पर पंडित नेहरू का एक नोट प्रकाशित हुआ जिसके अनुसार उन्होंने तत्कालीन गृह मंत्री पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त को लिखा था:-
"मौलाना साहब (आशय मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से है) की राय है कि बहादुरशाह ज़फ़र की लाश को रंगून से लाकर हुमायूं के मक़बरे में दफ़नाया जाए क्योंकि स्वयं उनकी भी अन्तिम इच्छा यही थी. मैं इस विषय में अपनी कैबिनेट के कुछ मंत्रियों से बात कर चुका हूँ और उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है."

नेहरू जी ने इसी नोट में आगे लिखा:-

"संभवतः बर्मा सरकार को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी. मैं इस सुझाव के विषय में आपकी प्रतिक्रया जानना चाहता हूँ, तत्पश्चात् हम इस मामले की और अधिक तफ़्तीश कर सकते हैं."

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहादुरशाह ज़फ़र की अन्तिम इच्छा का उल्लेख करते हुए हुमायूं के मक़बरे में दफ़न होने की इच्छा बताई है जो किसी भ्रम के कारण है वरना तथ्य यह है कि ज़फ़र ने अपने दफ़न के लिए क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के निकट ही अपने पूर्वजों के पहलू में अपने लिए एक स्थान आरक्षित किया हुआ था. मिर्ज़ा फ़रहतुल्ला बेग अपने बहुचर्चित लेख 'फूल वालों की सैर' (सन् १९३४) में लिखते हैं:-

'देहली के बादशाहों ने आप (हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी) के मज़ार के चारों ओर संगमरमर की जालियाँ, फर्श और दरवाज़े बनवा दिए. दीवारों पर काशानी ईंटों का काम करवाया तथा आसपास मस्जिदें अदि बनवाईं... एक ओर तो संगमरमर की छोटी मस्जिद है और उसके पहलू में अन्तिम समय के बादशाहों के कुछ मज़ार हैं. बीच में शाहआलम द्वितीय का मज़ार है और उसकी एक ओर अकबरशाह द्वितीय की क़ब्र का एक पहलू ख़ाली था, उसमें बहादुरशाह ज़फ़र ने अपना 'सरवाया' (सुरक्षित स्थान) रखा था. विचार था कि मरने के बाद बाप-दादा के पहलू में जा पड़ेंगे, यह क्या मालूम था कि वहाँ क़ब्र बनेगी, जहाँ पूर्वजों का पहलू तो दूर की बात, कोई फ़ातिहा पढ़ने वाला भी न होगा.' (मज़ामीन-ए-फ़रहत (द्वितीय) लेख 'बहादुरशाह ज़फ़र और फूल वालों की सैर', प्रकाशक सरफ़राज़ प्रेस लखनऊ, पृष्ठ ४२).

प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम के एक सौ पचास वर्षीय जश्न के अवसर पर बहादुरशाह ज़फ़र के लाल क़िले (जिसका प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम से निकट का सम्बन्ध रहा है) के समकालीन व्यवस्थापकों को इस विषय पर एक संदेश भेजा गया. इसके अतिरिक्त भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों और प्रवासी भारतीयों से भी हमने संपर्क साधा तथा बहादुरशाह ज़फ़र के अवशेष वापस अपने देश में लाने की मांग पर ध्यान देने का निवेदन किया. हमें इसकी ख़ुशी है कि अनेक लेखकों, शायरों, इतिहासकारों, पत्रकारों तथा बुद्धिजीवियों ने हमारे निवेदन को सहर्ष स्वीकारते हुए हमें अपनी रचनाएं भिजवायीं. इसके साथ ही उन्होंने हमारी इस मांग का समर्थन भी किया कि बहादुरशाह ज़फ़र के अवशेष विदेश से वापस अपने देश लाये जाएँ.


अगली कड़ी में जारी...