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Friday, November 19, 2010

आख़िरी रात रात और तारा दोनों होती है



राख़

वास्को पोपा (अनुवाद: सोमदत्त)

कुछ हुईं रातें कुछ तारे

हर रात जलाती अपना तारा
और नाचती काला नाच उसके इर्द-गिर्द
तारे के ख़ाक होने तक

फिर रातें होती हैं छिन्न-भिन्न
कुछ बन जातीं तारे
कुछ रही आती रातें

फिर जलाती है अपना तारा हर रात
और नाचती है काला नाच उसके इर्द-गिर्द
तारे के ख़ाक होने तक

आख़िरी रात रात और तारा दोनों होती है
ख़ुद को जलाती है
नाचती है काला नाच अपने ही इर्द-गिर्द


(चित्र: माकूच्कीना हूलिया की पेन्टिंग नाइट होरोस्कोप)

इस वक़्त एक हाथ पर हो रही है बारिश

खेल के बाद

वास्को पोपा (अनुवाद: सोमदत्त)



आख़िर में हाथ पकड़ते हैं पेट
फूट न जाय कहीं पेट हंसते हंसते
लेकिन पेट वहां हैई नहीं

एक हाथ बमुश्किल उठा पाता है ख़ुद को
पोछने के लिए ठंडा पसीना माथे से
लेकिन माथा भी गया

दूसरा हाथ जकड़ता है दिल की जगह
को कहीं दिल ही न उछल पड़े सीने से
दिल भी उड़नछू

दोनों हाथ लटक जाते हैं
गोद पर पड़े आलसी हाथ
कि गोद भी गायब

इस वक़्त एक हाथ पर हो रही है बारिश
दूसरे पर उग रहा है सब्ज़ा
अब और क्या कहूं मैं


[चित्र: नीदरलैण्ड के विख्यात चित्रकार हायरोनिमस बॉश (1450 – 1516) की एक कलाकृति]

Thursday, November 18, 2010

मेरी भंवर, क्या कसक रहा है तुझे


बातचीत

वास्को पोपा (अनुवाद: सोमदत्त)

पाल-पोस कर
क्यों त्याग देता है तटों को
क्यों ओ मेरे रक्त
भला क्यों भेजूं मैं तुझे
सूर्य

तू सोचता है चुम्मी लेता है सूर्य
तुझे मालूम नहीं कुछ भी
मेरी दफ़्न नदी

तू तक़लीफ़ पहुंचा रही है मुझे
समेट के ले जाते हुए मेरी लाठियां और पत्थर
मेरी भंवर, क्या कसक रहा है तुझे

तू नष्ट कर देगी मेरा निस्सीम चक्र
जिसका बनाना अब तक ख़त्म नहीं किया अपन ने
मेरे लाल अजदहे

बस आगे बह
ताकि उखड़ें न पांव साथ-साथ
बह जितनी दूर तक बह सकता है तू ओ मेरे रक्त

मेज़ पर

युगोस्लाविया के विश्वविख्यात कवि वास्को पोपा की कविताएं आज से कबाडख़ाने पर पढ़ना शुरू कीजिये. सारे अनुवाद सोमदत्त के हैं:



मेज़ पर

मेज़पोश तनता है
अनन्त तक
भुतही
छाया टूथपिक का पीछा करती है
गिलासों के खूनाखून पदचिन्हों का

सूरज ढांकता है हड्डियां
नए सुनहले गोश्त से

झुर्रीदार
अय्याशी फ़तेह करती है
गर्दन तोड़ टुकड़ों को

कल्ले उनींद के
फूट पड़े हैं सफ़ेद छाल के भीतर से