Thursday, July 9, 2009

अभी तो सुबह के माथे का रंग काला है, अभी फ़रेब न खाओ बड़ा अन्धेरा है



रात का अजब बखत है. काम सारा निबट चुका. नींद हज़ारों मील दूर. न नशे की न किसी याद की फ़रियाद. बस बाबा मेहदी हसन ख़ान साहेब की लोरी. आ जाएगी कमबखत नींद भी. इस लोरी को याद रखियो. ग़ज़ल जाने किसकी राग जाने कौन सा ... बस आया चाहती है नींद ...

Wednesday, July 8, 2009

कर्नल गद्दाफ़ी पर ओरियाना फ़ल्लाची का हमला



(पिछली पोस्ट से जारी)

त्रिपोली, लीबिया, सोलह दिसम्बर १९७९

ओरियाना फ़ल्लाची: कर्नल, मैं चाहती हूं कि आपकी एक प्रोफ़ाइल तैयार करूं और मैं इसे एक तरह का मुकदमा चलाकर तैयार करना चाहूंगी, एक तरह का आरोपपत्र पेश करते हुए ताकि आपको समझ में आ सके कि आप को दुनिया में इतना कम पसन्द क्यों किया जाता है. वैसे क्या आपको मालूम है या मालूम था कि दुनिया में आपको किस कदर नापसन्द किया जाता है.

गद्दाफ़ी: मुझे वे लोग पसन्द नहीं करते जिन्हें लोग पसन्द नहीं किया करते हैं और वे भी जो स्वतन्त्रता के विरोध में हैं ...

ओरियाना फ़ल्लाची: मगर ज़रा देखिये न आपके बारे में क्या-क्या कहा जाता है ... हम्म्म, कहां से शुरू करें? सम्भवतः उस ख़ूनी अपराधी ईदी अमीन से आपकी दोस्ती. लोग पूछते हैं "कर्नल इस तरह के लोगों के दोस्त कैसे हो सकते हैं?"

गद्दाफ़ी: क्योंकि अमीन इज़राइल के विरोध में हैं. क्योंकि वे पहले अफ़्रीकी राष्ट्रपति हैं जिनके भीतर अपने देश से इज़राइलियों को लात मार कर बाहर निकालने की हिम्मत थी.

ओरियाना फ़ल्लाची: अगर अपने लोगों का कत्ल-ए-आम करने वाला एक तानाशाह सिर्फ़ इस वजह से कर्नल गद्दाफ़ी की दोस्ती का पात्र बन जाता है कि वह यहूदियों से नफ़रत करता है, तो कर्नल गद्दाफ़ी चालीस साल बाद पैदा हुए हैं. आपको तो तब पैदा होना चाहिये था जब हिटलर यहूदियों को मार रहा था. हां, हिटलर की और आपकी बहुत पक्की यारी जमती.

इस वार से तिलामिला कर बेबस गद्दाफ़ी यह कह कर रह गए: "अब हालात फ़र्क हैं. आज यहूदी फ़िलिस्तीनियों की धरती पर काबिज़ हैं."

इसी इन्टरव्यू में आगे जा कर मोअम्मर गद्दाफ़ी के राजनैतिक मैनिफ़ैस्टो का मखौल बताते हुए ओरियाना ने कहा था कि वह इतना छोटा है कि उनकी पाउडर पफ़ की डिबिया में अट जाएगा.

(अगली पोस्ट में ओरियाना के शानदार गद्य की एक बानगी)

एक थी ओरियाना फ़ल्लाची



इटली की ओरियाना फ़ल्लाची (२९ जून १९२९-१५ सितम्बर २००६) पत्रकारिता की दुनिया में विश्वविख्यात नाम है. बाद के दिनों में वे अपने महान और निडर राजनैतिक साक्षात्कारों के लिए जानी गईं. उन्होंने जिन बड़े नामों के इन्टरव्यू लिए उनमें दलाई लामा, हेनरी कीसिंगर, ईरान के शाह, अयातुल्ला खोमैनी, विली ब्रैन्ट, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, गद्दाफ़ी, फ़ेदेरिको फ़ेलिनी, यासिर अराफ़ात, आर्चबिशप मकारियोस, गोल्डा मेयर, इन्दिरा गांधी, स्यौन कोनरी और लेख वालेसा प्रमुख रूप से शामिल हैं. ओरियाना ने उपन्यास भी लिखे और इस्लामी राजनीति की विशेषज्ञ के तौर पर उन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली.

१९७२ में उन्होंने हेनरी किसिंगर का इन्टरव्यू लिया था. कीसिंगर ने उसमें स्वीकार किया था कि वियेतनाम युद्ध एक "व्यर्थ युद्ध" था. कीसिंगर ने अपनी तुलना एक ऐसे काउब्वाय से की थी जो अपने घोड़े पर सवार होकर अकेला एक वैगन ट्रेन का नेतृत्व करता है.

इस इन्टरव्यू की याद करते हुए बाद में कीसिंगर ने लिखा था: "प्रेस के किसी भी सदस्य के साथ हुआ वह मेरे जीवन का सबसे नष्टकारी साक्षात्कार था."

अयातुल्ला खोमैनी को उन्होंने खुलेआम तानाशाह कहा था और १९७९ में तेहरान में इन्टरव्यू की इजाज़त देने से पहले खोमैनी के सिपहसालारों ने उनसे अपना सिर चादर से ढंकने को कहा था. इन्टरव्यू के दौरान उन की बातचीत का एक टुकड़ा बहुत विख्यात हुआ:

ओरियाना फ़ल्लाची - मुझे अभी आपसे बहुत कुछ पूछना है. मिसाल के लिए इस चादर के बारे में जिसे आपसे साक्षात्कार लेने के लिए मुझे पहनने को कहा गया था. ईरानी की औरतों को इसे पहनना ज़रूरी है. मैं फ़कत इस पोशाक की बात नहीं कर रही, मैं तो उन चीज़ों की बात करना चाहती हूं जिनकी तरफ़ यह संकेत करती है. यानी उस भेदभाव की तरफ़ जिसे ईरान की महिलाओं को क्रान्ति के बाद झेलना पड़ रहा है. वे पुरुषों के साथ विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ सकतीं, न उनके साथ काम कर सकती हैं. उन्हें अपनी चादर ओढ़े हुए यह सब अलग से करना होता है. आप मुझे बताइये आप चादर पहनकर स्विमिंग पूल में कैसे तैर सकते हैं?

अयातुल्ला खोमैनी- इस का आपसे कोई मतलब नहीं है. हमारी परम्पराओं को आपसे कोई सरोकार नहीं. अगर आप को यह इस्लामी पोशाक पसन्द नहीं है तो आप को इसे पहनने को कोई मजबूरी नहीं है चूंकि यह युवा स्त्रियों और सम्मानित महिलाओं के वास्ते है

ओरियाना फ़ल्लाची - आपकी बड़ी मेहरबानी है इमाम साहब! सो मैं इस बेवकूफ़ीभरे मध्ययुगीन चीथड़े को अभी उतार फेंकती हूं.

इस के बाद ओरियाना फ़ल्लाची ने वाक़ई अपनी चादर हतप्रभ इमाम के सामने उतार डाली थी.

(अगली पोस्ट में पढ़िये ओरियाना फ़ल्लाची ने मोअम्मर गद्दाफ़ी की कैसे क्लास लगाई थी)

Tuesday, July 7, 2009

थोड़ा और बड़ा हुआ हमारा कुनबा



मुनीश शर्मा लम्बे समय से ब्लॉगजगत में मौजूद हैं - खूब उम्दा और अकल्पनीय सब्जेक्ट्स पर लिखते हैं. उनके कमेन्ट्स भी आमतौर पर पोस्ट्स को समृद्ध करते हैं. मेरे दोस्त हैं. हमने बढ़िता वक़्त साथ गुज़ारा है. कई दफ़ा.



रंगनाथ सिंह से रू-ब-रू परिचय नहीं मगर हर बात को तर्किकता की सान पर कसने के हिमायती इस नौजवान, अक्लमन्द साथी की यहां कबाड़ख़ाने पर लम्बे समय से दरकार थी. उनके कमेन्ट्स ने कबाड़ख़ाने पर इधर चली बहसों को अर्थवान दिशाएं दिखलाने में बहुत साहस और धैर्य का परिचय दिया है.

मुझे प्रसन्नता है कि इन दोनों ने कबाड़ी बनना स्वीकार किया.

इन दोनों की तरफ़ से खूब सारा मानीख़ेज़ कबाड़ यहां देखने को मिलेगा, ऐसी मेरी कामना भी है और आशा भी.

ख़ुशआमदीद भाइयो!

Homosexual behaviour widespread in animals according to new study

Homosexual behaviour is a nearly universal phenomenon in the animal kingdom, according to a new study.


Louise Gray, Environment Correspondent

The pairing of same sex couples had previously been observed in more than 1,000 species including penguins, dolphins and primates.
However, in the latest study the authors claim the phenomenon is not only widespread but part of a necessary biological adaptation for the survival of the species.
They found that on the Hawaiian island of Oahu, almost a third of the Laysan albatross population is raised by pairs of two females because of the shortage of males. Through these 'lesbian' unions, Laysan albatross are flourishing. Their existence had been dwindling before the adaptation was noticed.
Other species form same-sex bonds for other reasons, they found. Dolphins have been known engage in same-sex interactions to facilitate group bonding while male-male pairings in locusts killed off the weaker males.
A pair of "gay" penguins recently hatched an egg at a German zoo after being given the egg that had been rejected by its biological parents by keepers.
Writing in Trends in Ecology & Evolution, Dr Nathan Bailey, an evolutionary biologist at California University, said previous studies have failed to consider the evolutionary consequences of homosexuality.
He said same homosexual behaviour was often a product of natural selection to further the survival of the species.
Dr Bailey said: "It's clear same-sex sexual behaviour extends far beyond the well-known examples that dominate both the scientific and popular literature – for example, bonobos, dolphins, penguins and fruit flies.
"Same-sex behaviours – courtship, mounting or parenting – are traits that may have been shaped by natural selection, a basic mechanism of evolution that occurs over successive generations," he said.
"But our review of studies also suggests that these same-sex behaviours might act as selective forces in and of themselves।"

(The Telegraphs, London)

Monday, July 6, 2009

"गे" को हिंदी में क्या कहते हैं


राजेश जोशी की पोस्ट और अभिषेक मिश्रा की टिप्पणी ने सोचने के लिए उकसाया। मसला बहुत जरूरी है बात होनी चाहिए।

अपने जैविक उत्स या प्रवृत्ति के रूप में गे-पंथ का पश्चिम से कुछ लेना-देना नहीं है। रामपुर के कबूतर (?) अपने यहां पाए जाते हैं (जो किस्सों में एक पंख से उड़ते हैं), पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में संपन्न लोगों द्वारा हाथी (?) पालने की परंपरा है। किसी नमकीन या कड़ियल, गबरू लौंडे के पीछे अपनी सारी जमीन जायदाद लुटा देने के किस्से भारत के हर कोने में मिलते हैं। अलाउद्दीन खिलजी के बेटे मुबारक शाह और उस जैसे गे-रसिकों के ढेरों किस्से सल्तनत काल और मुगल काल के इतिहास में बिखरे पड़े हैं। इमरजेंसी के दिनों में जब जेलों संघियों और समाजवादियों की भरमार थी तब एक नारा आया था- बोल जमूरे क्या देखा, नेता के ऊपर नेता देखा। यह नारा जिस क्वियर-कर्म पर फोकस था, वह बदस्तूर आज भी समाज के हर कोने अंतरे में जारी है। प्राकृतिक-अप्राकृतिक या अपना पार्टनर चुनने की आजादी की बहस बेकार है क्योंकि बहस करके, आप उस मजे को रत्ती भर भी हिला नहीं सकते जो गे और लेस्बियन एक दूसरे से पाते हैं।

पश्चिम से एक उच्चताबोध लिए एक नकचढ़ी भाषा आई, जिसमें उस रणनीति का खाका है जिस पर चलते हुए भारत में भी गे-पंथ के आंदोलन को विकसित होना है। अपने यहां जो हो रहा है वह पश्चिम में चालीस साल पहले हो चुका है, जो पश्चिम कर रहा है, बहुत संभव है कि दस साल बाद अपने यहां हो। देश चलाने वाले वाकई सुपर पावर और उदार लोकतंत्र के मेकअप में दिखने के लिए एक से एक करतब कर रहे हैं। वरना धारा 377 का वह विवादास्पद हिस्सा भारतीय संविधान का उल्लंघन करता है, यह फैसला संविधान लागू होने के उनसठ साल बाद क्यों आया। क्यों नहीं जैसे कुछ जातियों को क्रिमिनल ट्राइब के ब्रिटिश वर्गीकरण से निकाला गया, गे-कर्म को भी अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। अगर धारा-377 विक्टोरियन नैतिकता से प्रभावित थी, तो खुद ब्रिटेन ने जब इस नैतिकता को गुडबॉय करते हुए 1967 में सेक्सुअल आफेन्सेज एक्ट पास किया तो अपने यहां भी इसका परीक्षण किया गया। बात इतनी थी कि जो अपनी सेक्सुअल हैबिटस में अल्पसंख्यक हैं, उन्हें भी समानता की अवधारणा में जगह मिलनी चाहिए और उन्हें अपराधी नहीं माना जाना चाहिए लेकिन हाईकोर्ट ने जरा अति-उत्साह में अंबेडकर, नेहरू और सोनिया गांधी सबको विचारधारात्मक तौर पर गे लोगों के समर्थन में खड़ा कर दिया है। कानून की विसंगति का आपरेशन ठीक किया लेकिन एनस्थिसिया जरा चालू किस्म का लगा कर किया।

फैसला अपनी जगह ठीक है। कोई कारण नहीं होना चाहिए लेखक विक्रम सेठ जो अपने गे-पन को लेकर काफी संवेदनशीलता से बात करते हैं, वे कभी भी अपराधी करार दिए जाने के डर में जिएं। कोई समलैंगिक नहीं चाहेगा कि आस्कर वाइल्ड की तरह उसे प्रताड़ित किया जाए और वह मारा-मारा फिरे या जिम्बाब्बे के राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे की तरह ताने झेले। बिल्कुल गे लोगों को गरिमा के साथ निर्भय जीने का अधिकार है। लेकिन....

लेकिन वह भाषा आती है और विचार स्रोत आता है जिससे उर्जा लेकर एनजीओ और इंटरनेशनल एजेंसिया भारत में गे-पंथ का धर्म चक्र प्रवर्तन करने में लगे हुए हैं। इस आंदोलन का भविष्य झिलमिल दिखाई दे रहा है।

मिसाल के तौर पर 1967 में जब सेक्सुअल ऑफेन्सेज एक्ट पास किया गया तब ब्रिटेन में स्वैच्छिक समलैंगिकता के सहमत-असहमत होने की उम्र 21 साल रखी गई थी लेकिन 2000 में हाउस आफ लार्डस और ईसाई चर्चों के तीव्र विरोध के बावजूद इसे 16 साल कर दिया गया।
वहां अब गे शादियों को और बच्चे गोद लेने को वैधानिक करने की मांग हो रही है।
स्कूलों के पाठ्यक्रम में बताया जाए कि पुरूष-स्त्री संबध प्राकृतिक (नेचुरल आर्डर आफ सोसाइटी) नहीं हैं। यह मांग भी की जा रही है।

इस फैसले के बाद आंदोलनी गे भाई लोगों, उन गे लोगों का जीना हराम कर रखा है जो इसे निजी मामला रखना चाहते हैं। वे दबाव डाल रहे हैं कि तुम कैसे गे हो कि अदालत ने तुम्हारे पक्ष में है और तुम बिल में घुस कर पुच्च-पुच्च कर रहे हो। 1974 में गे-लिबरेशन फ्रंट ने निजता के आग्रह के ही कारण ईएम फोस्टर को भी नीच और घटिया-गे (downcast gay) घोषित किया था। यह मुहिम में समाज से थोड़ी सी सहिष्णुता और अपने समायोजन की अबोध मांग के साथ शुरू हुई है, वह आने वाले दिनों में आक्रामक होने वाली है।

इस पर वाकई बहस होनी है तो अपनी भाषा में होनी चाहिए। सबसे पहले तय होना चाहिए कि गे और क्वियर होना, हिंदी, बांग्ला, तमिल या पंजाबी में क्या होता है। जब तक एनजीओ बाज अपनी जबान में बात नहीं करते यह आंदोलन पश्चिम की लाइन पर ही चलेगा। उन लोगों को जो कर्म वही करते हैं लेकिन "गे" का मतलब नहीं जानते, पता ही नहीं चल पाएगा कि इतना गदर उन्हीं के अधिकारों के लिए मचा हुआ है।

मैं भी गे हुआ, तू भी गे हुआ !

आज से मैं गे हुआ. ये घोषणा दिल्ली हाईकोर्ट के क्रांतिकारी फ़ैसले के बाद की है. क्योंकि अगर तू गे है तो प्रोग्रेसिव है. अन्यथा नहीं. अगर तू गे है तो सैंसिटिव है. अन्यथा नहीं. अगर तू गे है तो तेरा जनतंत्र पर यक़ीन है, वगर्ना तू फ़ासीवादी है.

मै न इंसैंसिटिव हूँ. न मैं जनतंत्र पर शक करता हूँ और न ही मैं फ़ासीवादी हूँ. अब मेरे पास एक ही चारा बचा है कि मैं ख़ुद को गे डिक्लेअर कर दूँ. कैसा है? इसमें बुराई भी क्या है?

अब तू अगर गे है तो ऐश कर. अब तक लास एंजेलस या सिनसिनाट्टी में रहने वाला तेरा पार्टनर ही ऐश करता था. अब तू भी कर. दिल्ली और बंबई में रहकर भी ऐश कर. मैं अब कुछ ही दिन में दिल्ली और आसपास के गाँवो-क़स्बों में गे परेड का आयोजन करना चाहूँगा. मैं नहीं करूँगा तो कोई और करेगा. तू भी आएगा ना? ये अपनी नई लिबरेशन है आफ़्टर आल.

आख़िर तू ही सपने देखता था ना कि हिंदुस्तान एक दिन सुपर पावर होएगा? तूने ही तो कहा था कि यार सरकार का काम कोई ब्रेड बनाना या स्टील बनाना नहीं है. कितनी सुपर-डुपर बात थी. आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और यहाँ तक कि जापान को भी वेस्टर्न कंट्री मानते हैं कि नहीं. अगर इंडिया वेस्टर्न हो रहा है तो इतनी हायतौबा क्यों? अशोक राव कवि कितना इंक़लाबी था कि पिछली सदी में ही खुल्लेआम कहता था कि मुझे ट्रक़ ड्राइवर कित्ते पसांद हैं. (अरे वही अशोक राव कवि जिसने गाँधी को सनकी बनिया कहा था... हाहाहाहाहाह !!!)

दिल्ली से पुलिस हेडर्क्वार्टर्स के बाहर 1992 का वो प्रदर्शन याद है जिसमें सुंदर मुखड़ों वाली सुकन्याएँ घोषणा कर रही थीं कि उन्हें लड़कों से नफ़रत हैं और लड़कियों से प्यार? कित्ते डरा करते थे हम लोग यार.... डेमाक्रेसी में रहने के बावजूद तू अपने पार्टनर को चुम्मा नहीं दे सकता था. उसकी बाँह में बाँह डालकर घूम नहीं सकता था. साउण्ड्स लाइक सो, सो, लास्ट सेंचुरी.

नाउ तो इंडिया हैज़ चेन्ज़्ड ए लाट, यार !! तेरी बात भी सुनी जाएगी. दिल्ली हाईकोर्ट इज़ रियली, रियययली, रिययययली रिवाल्यूशनरी.

(उम्मीद है कि एक बहस छिड़ेगी. अगर नहीं छिड़ी तो भी क्या. भारत तो वर्ल्ड पावर बन ही रहा है.)

Saturday, July 4, 2009

एक अलग क़िस्म की तीर्थ यात्रा

तुंगनाथ से लौटते हुए हम एक अद्वितीय जंगल को देखने गए. रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग जाने वाले रास्ते में नगरासू से थोड़ा आगे जाने पर दाईं तरफ़ को कोटमल्ला नाम की जगह के लिए एक संकरा रास्ता कटता है। यहीं है वह जंगल.

इस जंगल में मैं दो बार पहले भी जा चुका हूं. पिछले तीन सालों में वहां जाने वाली कच्ची सड़क बाकायदा बन चुकी है और वहां पहुंचने में अब पहले से आधा समय लगता है. पिछली दफ़ा वहां जाने के बाद मैंने एक दूसरे ब्लॉग के लिए एक पोस्ट लिखी थी. थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ उसी को आगे पढ़िये.

उत्तराखण्ड के गढ़वाल इलाके में रूद्रप्रयाग जिले के एक छोटे से गांव में रहते हैं जगत सिंह चौधरी और ‘जंगली’ के नाम से जाने जाते हैं। ‘जंगली’ के जंगल तक पहुंचने के लिए रूद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग की तरफ जाने पर कोटमल्ला नाम की जगह के लिए एक संकरा रास्ता कटता है. आगे जाकर यह रास्ता कच्चा और पथरीला हो जाता है। करीब बीस किलोमीटर तक चलने के बाद हरियाली देवी का मंदिर आता है। एक तरह से यह नाम बहुत विडंबनापूर्ण है। पूरा इलाका एकदम सूखा हुआ है और बंजर से लगते पहाड़ों पर चीड़ के सिवा कुछ नज़र नहीं आता।

इसी मन्दिर से करीब एक किलोमीटर दूर पथरीली सड़क पर लगा एक विनम्र सा साइनबोर्ड आपका स्वागत करता है : ‘जंगली का जंगल’। इस जंगल में घुसते ही ठंडक महसूस होती है और आप अपने को तमाम तरह के पेड़ों के बीच पाते हैं। जंगली जी से मिलने को आपको बहुत इंतज़ार नहीं करना पड़ता। वे अपने जंगल में ही कहीं होते हैं।

पिछली यात्रा के दौरान ली गई जगतसिंह 'जंगली' की तस्वीर


करीब पचपन साल के इस शख्स की आंखों की आग को पहचानने के लिए पहले आप को इस दुर्लभ जंगल की दास्तान सुननी होगी। 1967 में कुल सत्रह की उम्र में जगतसिंह फौज में चले गए। फिर शादी परिवार वगैरह। गांव की स्त्रियों का जीवन बहुत कष्टप्रद था : घर से दो मील नीचे से पानी लाना, फिर दिन भर चारे और ईंधन की खोज में रूखे जंगलों में भटकना।

जगत सिंह को अपना पूरा बचपन याद था जिसमें दिन रात खटती रहने वाली एक मां होती थी : बच्चों के लिए उसके पास ज़रा भी वक्त नहीं होता था। अब शादी के बाद वे देख रहे थे कि उनकी पत्नी भी वैसा ही जीवन बिताने को अभिशप्त है।

इसी दौरान 1974 में मृत्युशैया पर पड़े जगतसिंह के दादाजी ने उनसे वचन लिया कि वे गांव के ऊपर स्थित उनकी साठ नाली यानी करीब पौने दो एकड़ ज़मीन की देखभाल करेंगे। इस पूरी बंजर ज़मीन पर सिर्फ एक पेड़ था। इस इकलौते पेड़ को उसकी उम्र के कारण आज भी सबसे अलग पहचाना जा सकता है।

जगत सिंह ने बरसातों में कुछ पौधे रोपे और जाड़ों में छुट्टी लेकर घर आए और बच गए पौधों की देखभाल में जुट गए। अगली बरसातों में उन्होंने कुछ और पौधे रोपे और यह क्रम चल पड़ा। चार पांच साल में उस बंजर में इतनी हरियाली हो गई कि घर की औरतों को चारे और ईंधन की समस्या नहीं के बराबर रह गई।

इधर जगत सिंह का स्वाध्याय जारी था और 1980 में उन्होंने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लिया। फौज की नौकरी छोड़कर उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना पूरा समय अपने जंगल को देंगे। रिटायरमेन्ट के बाद मिली फंड की रकम का ज्यादातर पैसा उन्होंने तमाम प्रजातियों के पेड़ों की पौध वगैरह में झोंक दिया। पच्चीस सालों की अथक मेहनत और फौलादी इरादों का परिणाम यह हुआ कि उनके जंजल में करीब सौ प्रजातियों के तकरीबन बीस हजार पेड़ हैं। यह फकत जंगल नहीं है : यह जगतसिंह चौधरी का जीवन है और उनकी प्रयोगशाला भी जिसमें उन्होंने तमाम हैरतअंगेज कारनामों को अंजाम दिया।

वे मानते हैं कि किसी पेड़ को लगा देने के बाद उसे काटने का हमारा कोई अधिकार नहीं। लेकिन इसके बदले वे उस पेड़ से विनम्रतापूर्वक मांग करते हैं कि वह भी उन्हें कुछ दे। सो आप देखते हैं कि चीड़ के पेड़ों पर सोयाबीन की लताएं चढ़ी हुई हैं और बांज के पेड़ों पर बारहमासा हरे चारे की। अपने जंगल से वे साल में दो कुन्तल सोयाबीन उगा लेते हैं।

इस जंगल में खेती करने का उनका ढंग निराला है : वे ‘गड्ढा यंत्र’ का इस्तेमाल करते हैं। करीब छह फीट, लम्बे तीन फीट चौड़े और डेढ़ फीट गहरे गडढे कई स्थानों पर खोदे गए हैं। इन गड्ढों में मिट्टी को समानान्तर मेड़ों की शक्ल में बिछाया गया है। दो मेड़ों के बीच खरपतवार गिरती रहती है। मेड़ों के ऊपर मूली, प्याज, आलू और टमाटर वगैरह उगाए जाते हैं। फसल कटने के बाद मेड़ों के बीच इकठ्ठा खरपतवार खाद में बदल चुकी होती है। अगली फसल के लिए अब मेड़ों को खाली जगह में खिसका दिया जाता है। तीखी ढलान वाले पहाड़ी इलाके में पानी को बहने से बचाने और ज़मीन को लगातर उपजाऊ बनाते जाने का यह तरीका नायाब है।

तीस साल पहले जिस धरती की कोई कीमत नहीं थी चौधरी साहब की लगन और मेहनत ने उस ज़मीन पर कुछ इंच की उपजाऊ मिट्टी की परत बिछा दी। अपने घर के लिए अन्न और सब्जी इसी जंगल से उगा लेने वाले जगत सिंह चौधरी ने कई अनूठे प्रयोग किए। सबसे पहले तो उन्होंने तमाम स्थापित ‘वैज्ञानिक’ सत्यों को गलत साबित किया। करीब ढाई हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस जंगल में उन्होंने ऐसी ऐसी प्रजातियां उगाई हैं कि एकबारगी यकीन नहीं होता। आम, पपीता, असमी बांस के साथ साथ वे देवदार और बांज भी उगा चुके हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस ऊंचाई पर इन पेड़ों का उगना असंभव है। आप उनसे इसका रहस्य पूछेंगे तो वे किंचित गर्व से आपसे कहेंगे कि वे अपने जंगल में कुछ भी पैदा कर सकते हैं। आप पूछेंगे ‘कैसे’ तो एक निश्छल ठहाका गूंजेगा “क्योंकि जंगली पागल है।”

तो आप देखते हैं कि एक चट्टान पर आंवले का पेड़ फलों से लदा हुआ है। एक जगह पानी के तालाब के पास हजारों की तादाद में मगही पान की बेलें हैं। छोटी और बड़ी इलायची की झाड़ियों पर बौर आ रहे हैं। कहीं बादाम उग रहा है और कहीं पर हंगेरियन गुलाबों की क्यारियां हैं। अपने इस्तेमाल की चाय भी वे यहीं उगाते हैं। तमाम तरह के पहाड़ी फलों के पेड़ भी हैं। जंगल का एक हिस्सा बेहद आश्चर्यजनक है : जंगली जी यहां दुर्लभ हिमालयी जड़ी बूटिया उगाते हैं। वजदन्ती, हत्थाजड़ी और सालमपंजा जो दस हजार फीट से ऊपर ही पाई जाने वाली औषधीय प्रजातियां हैं यहां बाकायदा क्यारियों में उगाई जाती हैं। यह उनका नवीनतम प्रयोग है जिसमें वे भारत के गरीब पहाड़ी कृषक वर्ग के लिए चमकीले भविष्य का सपना संजोए हैं। वे चाहते हैं कि पहाड़ के किसान अपनी ज़मीन पर जड़ी बूटियां उगाएं। “एक नाली ज़मीन से साल में एक लाख रूपए तक कमा पाना संभव है” वे बहुत विश्वास से कहते हैं।

पिछले दशक में उनकी मेहनत का नतीजा यह निकला कि उनके जंगल में पानी के दो स्रोत फूट पड़े जिनसे अब उनके गांव भर की पानी की दिक्कत दूर हो गई है। मुझे अपना गांव याद आता है जहां बहने वाली गगास नदी पिछले तीन सालों से गर्मियां आते ही सूख जाती है। सरकार की तुगलकी योजना यह है कि बागेश्वर में बहने वाली पिंडर का पानी गगास तक लेकर आया जाए। पेड़ उगा कर पानी के स्रोतों को जिन्दा करने की कोई नहीं सोचता। शुरू शुरू में जगतसिंह चौधरी को पागल और सनकी कहा जाता था। वन विभाग के अफसरों ने उनका मजाक उड़ाया। सरकार ने उनके जंगल के बिल्कुल नजदीक एक कृषि प्रयोगशाला स्थापित करने के लिए लाखों की रकम एक इमारत बनाने पर फूंकी। उसमें कोई काम नहीं हुआ और वह खंडहर में तब्दील होती जा रही थी जब बबालटलाई की नीयत से इस इमारत को गढ़वाल मंडल विकास निगम को सौंप दिया गया। फ़िलहाल उसमें हरियाली देवी के मन्दिर आने वाले यात्री-श्रद्धालुओं के ठहरने हेतु गैस्ट हाउस बना दिया गया है।

आठ-नौ साल पहले तत्कालीन उत्तरांचल के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला इस जंगल को देखने आए और उनकी अनुशंसा पर जगतसिंह चौधरी को प्रतिष्ठित वृक्षमित्र सम्मान मिला। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने उन पर एक संक्षिप्त आलेख छापा। रूद्रप्रयाग के तत्कालीन जिलाधिकारी रमेश कुमार सुधांशु ने अपने स्तर से भरसक जंगली जी की सहायता की। लेकिन जगतसिंह चौधरी के जंगल को बतौर मॉडल देखे और प्रचारित किए जाने की आवश्यकता पर कोई गौर नहीं किया गया।

दरअसल ‘जंगली’ को शायद इस सब की अब उतनी दरकार भी नहीं रह गई लगती। रोज सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक अपने जंगल और अपने पौधों के बीच काम में लगे रहने वाले जगतसिंह चौधरी का बेटा और भतीजा उनके साथ रहकर प्रकृति के तमाम रहस्यों को सीख रहे हैं। मेहनत करना उनमें सबसे बड़ा रहस्य है।

पिछले एकाध दशक से इस देश में आई पर्यावरण चेतना के परिप्रेक्ष्य में यह कदाचित संभव है कि ‘जंगली’ का जंगल आने वाले दशकों में किसी तीर्थ का रूप ले ले। यह बिल्कुल संभव है। इंशाअल्लाह।

जसोली स्थित हरियालीदेवी का मन्दिर

जंगल का बोर्ड अब भी वैसा ही है

जंगली का संकल्प

आमतौर पर पहाड़ में नहीं उगता यह बांस

पहले यहां सिर्फ़ धूल थी और प्यास

जय भोले बाबा की

चारा देता है चीड़ का यह पेड़

ये सारी जड़ी बूटियां उगाते हैं जगतसिंह यहां

च्यूरा का पौधा

तुंगनाथ से कुछ तस्वीरें

इधर अचानक तुंगनाथ जाने का कार्यक्रम बन गया.

हमने रूट लिया रानीखेत-कर्णप्रयाग-नन्दप्रयाग-चमोली-गोपेश्वर-मण्डल-चोप्ता-तुंगनाथ- मस्तूरा-रुद्रप्रयाग-गौचर-कोटमल्ला-गौचर-गैरसैण-रानीखेत.

बताया जाता है कि क़रीब साढ़े बारह हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर अवस्थित तुंगनाथ दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मन्दिर है. तुंगनाथ जाने के लिए आपको पहले चोप्ता पहुंचना होता है जहां हमारे कबाड़ी अनिल यादव भी इधर चन्द दिन बिता कर आए हैं. चोप्ता से फ़क़त साढ़े तीन किलोमीटर की चढ़ाई आपको तुंगनाथ पहुंचाती है.

यात्रा की तफ़सीलात बाद में देता हूं फ़िलहाल कुछ तस्वीरें देखिये.

होम फ़ार्म हैरिटेज रानीखेत के तालाब में खिला कमल

मेहलचौरी के पास आगरचट्टी में सड़क किनारे खिले अर्जुना के पेड़

गोपेश्वर में गोपीनाथ का मन्दिर

मण्डल से चोप्ता के रास्ते घना जंगल

तुंगनाथ के रास्ते

तुंगनाथ के रास्ते

तुंगनाथ के रास्ते

तुंगनाथ के रास्ते

कोहरे में ढंका तुंगनाथ मन्दिर

तुंगनाथ धाम

Friday, July 3, 2009

एक दहकती हुई लक़ीर मेरे भीतर बुझती-सी

कल की पोस्ट को जारी रखते हुए सुशोभित सक्तावत की दो और कविताएं प्रस्तुत हैं. कवि-अनुवादक सुशोभित इन्दौर में रहते हैं.

अंतराल के भंवर से बचते हुए

उठी हुई बांहों जैसे पेड़ों पर
लदा लस्‍त-पस्‍त आकाश
उजाले की बर्छियों से छिदा
दु:ख की देह पर घाव सुख का मुंह खोलता-सा
सुई की आंख से झांकती हुई चाह

अपने क़ाबू के बाहर होने की ऐन सरहद पर
ज़ब्‍त करते ख़ुद को खिलखिलाहट के परदे के पीछे
मांस की एक नदी रुकती है और डूबते हैं स्‍पर्श के पत्‍थर
दीवार के उस तरफ़ जा गिरी आंख को
खड़खड़ाहट के बीच सुनने की कोशिश करते कान चौकन्‍ने
और बू उठती है जल रहे फ़ोटोग्राफ़्स से
रंगीन तस्‍वीरों का एक
रासायनिक भपका

दिन के तपते हुए पहाड़ पर तुम
जलने से बचा रही होती हो अंगुलियां
देह पर उगे कांटों को सहलाते
चाक़ू पर चलने की
चौकस देहभाषा के साथ
तमाम मशगूलियतों के एकदम बीचोबीच
नज़र में रखती उस एक भंवर को
जो हर चीज़ के बीच से घर्राती गुज़र जाती है
अंगुलियों के अंतराल में

और एक चिहुंक की उड़ती हुई चि‍डि़या
एक ख़ास लहज़ेदार स्‍वर, खिलखिलाहट, हंसी
चेहरे पर चस्‍पा चेहरा उतारने की
रोज़मर्राई वर्जिश के दौरान
औचक ढूंढते एक चाभी गुमी हुई
जबकि सिर हिलाते सैकड़ों ताले
हंसते हुए हर तरफ़

फिर भी सुख का घाव जब भी खोलता मुंह
ज़ब्‍त कर लेती हो तुम शब्‍दों को चबाते और निगलते पत्‍थर
तमाम कटे हुए पेड़ों को बजाती हो वायलिन की तरह
और चल पड़ती है ठहरी नदी भी
भंवरों को ग़र्क करती
अपने ही-
पानी में

हासिल की हद के सरासर बाहर...

नींद में सुनता हूं कोई बारिश,
और उसकी बजती हुई लय!
आगे फैलाता हूं सूखे हाथ
आंखें- गुम जाती है
बारिश्‍ा के इतने सुदूर बयाबां में...

आइने में खोलता हूं धूप की खिड़की!
और आकाश की निलाई को
कतरता हूं ऐनबीच.
बेहद सर्द वह सीसे का आकाश.
और यह- धूप का धोखा!
सर्द, बेहद सर्द!

एक दहकती हुई लक़ीर मेरे भीतर बुझती-सी-
जिसके कोई शक्‍़ल थी!

शायद, उधर-
कोई गुंजाइश
सतरों के बीच धरी हुई
इस सुब्‍ह- गुंजाइश वो
ख़त्‍म होती ख़ुद पर
सांस के हर बल के साथ
खुलती... और खुलती जाती!

और मैं, छूट जाता हूं बहुत पीछे
हर दफ़े बिन छुए, जो कुछ
अंतरालों के बीच की खाइयों में
दबा-छिपा है
इतना क़रीब...
क़रीबतरीन-
के हासिल तक कर सकने की हद के
सरासर बाहर!

अब जबके- तमाम आलम जागा हुआ मुझ पर
अपनी नींद में.
मेरे पास
कुछ नहीं-
कुछ धुंधले वहमों के सिवा
जो महज़ सिताइशों के सिले हैं
और यह-
धूप की बंद होती हुई खिड़की!

Thursday, July 2, 2009

हर पत्‍थर एक नींद है और हर रूह है एक पत्‍थर


सुशोभित सक्‍तावत इस ब्लॉग से जुड़े सबसे नए कबाड़ी हैं. उनकी इन कविताओं को यहां लगाता हुआ मैं एक दुर्लभ क़िस्म की ख़ुशी का अनुभव कर रहा हूं.

ये एक बेचैन आदमी की कविताएं हैं. एक बेचैन आदमी जो अपनी निद्रारहित रातों की पहरेदारी करता हुआ उस रहस्य का अनुसंधान करता सा लगता है जो कि नींद है, रात है और मनुष्य का आदिमतम भय और उसकी रचनात्मकता का अजस्र स्रोत भी. सुशोभित के पास रंगों, स्पर्शों और खुशबुओं की शानदार समझ है जो उनकी सबसे बड़ी ताकत है.

सुशोभित की एकाध कविताएं कल भी लगाई जाएंगी.

बाहर...बाहर, बेख़ुदी के बाहर...

(नींद सबसे पवित्र दैवीय चीज़ है... जो अपराधी हैं, उन्‍हें नींद नहीं आया करती - फ्रांज़ काफ़्का)

नींद एक ठंडी आंच है
बहुत पीछे, परदों के भीतर, पकती कहीं
जैसे हल्‍का-सा रुदन
जैसे समुद्र के भीतर
सांरगी बजती हो
एक करुण राग
जो करुणतर होता जाता है
तो मिटता जाता है
मध्‍य से विलंबित में
धुलते-पुंछते

वो पानी और पत्‍थरों से उनकी काया छीनकर परछाइयों को सौंपती है
और किसी रूमाल की बेहद सफ़ेद तह में
छुपाकर रख देती है
बेचेहरा आवाज़ें
दिन के साये बुझते
पारे की सर्द परतों में...
नींद में होना अनेकानेक आइनों से घिरे होना है
जबके अंधेरे के कंधों से
भिड़तीं हों कुहनियां
शक्‍़लें पिघले शीशे की रौ में बेहती मिलें

नींद एक प्रार्थना है, एक पश्‍चाताप
अपराधियों को नींद नहीं आती
या जो सो नहीं पाते, वे गुनहगार हैं
गुनाहे-आदम के साझेदार
बाहवास, चौकन्‍ने-
गरचे हुशियार बहुत
बहुत-बहुत ख़ूब

उनींदेपन में धुंआ है
उचटेपन में रोशनी के नश्‍तर
होशमंदी ज्‍़यादती हुए जाती है अकसर
ख़ूब सारी होशमंदी, ख़ूब सारी हुशियारी
ख़ूब हिसाबो-हरकत
जबके हर हुशियारी के पीछे से
झांकते हैं तरेरी-सी नज़रों वाले मुंह-अंधेरे के प्रेत
जो रात के कुंए से पानी भरते हैं
जो पानी के परदों पर काढ़ते हैं मूंगों के क़शीदे
हरे को और गाढ़ा करते, बैंजनी को और पनीला
नींद के ख़ामोश-ख़फ़ीफ़ दरिया के भीतर

हर पत्‍थर एक नींद है
और हर रूह है एक पत्‍थर
जब तक के उसे फेंक न दिया जाए अतल में
हर सुबह, अतल के दूधिया दरवाज़ों से उठता है आलम
और बुलाता है ख़ुद को बाहवास
बेआवाज़ बारिशों के उन सायों से
जो न रुदन थे, न ठंडी आंच
बहरहाल, बहरसूरत
एक शै थी महज़,
सरकती हुई, हरवक्‍़त
बाहर...बाहर, बेख़ुदी के बाहर...

दो कोष्‍ठकों के बीच

जिधर लौटना होता है-
जिधर से उग जाता हूं हर बार
नाख़ूनों, दीवार पर सीलन के नक्‍़शों,
आवाज़ के हलक़ में अटकी आवाज़ों
या बीते बसंत के पेट में बजती
बारिश की तरह

दो कोष्‍ठकों के बीच-
जबकि दो कोष्‍ठक दो धब्‍बे हैं नींद के इर्द-गिर्द पसरे हुए
मेरी तरफ़ अपनी उगी जीभें हिलाते हैं अंधेरे के बीज
पटरियों से नापे जा रहे वक्‍़त में
चौहद्दे में अर्धनग्‍न-
खिड़की में रुके दौड़ते दृश्‍य में
ख़ुद को देखकर पहचानता हूँ,
शतरंज के खानों की आड़ी चाल में
और गुम जाता हूँ भूख और रफ़्तार की
निगलती हुई परतों के भीतर

जिधर जिंदगी की खोल है-
लीकें हैं अपनी जानी-पहचानी
और अपने घाव हैं

जिधर लौटना होता है-
चीज़ों की नींद में जागते हुए
संगीत और पत्‍थरों की स्‍मृति के साथ
तरतीबों से तय करते शर्तें या मुहलतें
उधेड़बुनों और ऊंघते हुए इलहामों की तरफ़
चश्‍मा पोंछते बार-बार ऊब की आरामकुर्सी में धंसते
या फीतों की नापजोख के दौरान ठहरते-बुदबुदाते
रेस्‍तरां की रोटियों की गंध के बीच

जिधर से उग जाता हूँ हर बार-
शहर की आंतों में रेंगता हुआ
शहर की सड़कों पर टाइप करता अपनी पदचाप
एक वापसी से दूसरी वापसी तक
ख़ामोश, स्थिर और आखिरकार संतुष्‍ट
रूमाल की तहें जमाता शिक़नें दुरूस्‍त करता
बाहर होता किसी आवाज़ की छांह से
नीले और लाल रंग के बाहर होता हुआ...

बारिश पर लिखता हूं विदा

बारिश और बसंत के बीच स्‍थगित
एक अधूरे चुंबन और अस्‍फुट कराह को
रेलवे प्‍लेटफ़ॉर्म की चिकनी सतह पर
भारी लगेज के नीचे कुचलाते सुनता हूं
और देखता हूं ख़ुद को एक खुलते चौराहे पर
हाथ हिलाते हवा के पारदर्शी ग़ुम्‍बद में

मैं तैरता हूं सफ़ेद झाग वाली धूप में
डूबती-उतराती इच्‍छाओं के शंख, सीपियां और घोंघे बीनते
समुद्र को चीरते चाक़ू की चमक में दाखि़ल होता हूं
एक सुरंग के भीतर भूमिगत नदी और
जुगनुओं की भिनभिनाती छतरी के ऐन नीचे
अलविदा कहता हूं तुम्‍हारी गंध तक को
एक पत्‍थर पर लिखता हूं विदा और
उछाल देता हूँ बारिश से धुले स्‍याही के धब्‍बों
जैसी चाह के नामालूम दर्रे में

भूरी नदी की देह में गड़ते पानी और
पिछले पतझर के गीले पत्‍तों-सी
कच्‍ची ईंटों वाली गंध के बीच
सुनते हुए प्‍यार की अंतिम प्रत्‍याशा
मैं तहस-नहस करता हूँ चंद्रमा की
घंटियों की खनकती ध्‍वनि
नींद में देखता हूँ बिना तारों वाला
एक तानपूरा बजता और तुम्‍हारी आँखों की सुरंग में
बंद होता एक पूरे का पूरा समुद्र

बारिश पर लिखता हूँ विदा और
बिखेर देता हूँ अधूरे चुंबन वाले चौराहे के
अधखुले आकाश में...

(चित्र: पॉल क्ली की पेन्टिंग 'अराउन्ड द फ़िश')

Wednesday, July 1, 2009

एक मछली, दो बातें


कलकत्ते में हिलसा या इलिश माछ पर इन दिनों बज्जर गिरा है। अंग्रेज इसे मैंगो फिश कहा करता था। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह आम के सीजन में इसकी आमद हुआ करती थी। एक बंगाली दोस्त ने बताया कि इस भरमार वाले समय में भी ५०० ग्राम का खोका (बच्चा)इलिश पांच-छह सौ रूपये किलो बिक रहा है।....और यह कोई नयी बात नहीं है।
मछुआरे अपनी परंपरा का पालन करते हुए आमतौर पर खोका इलिश नहीं पकड़ते। मछलियां जब तक प्रजनन की उम्र को न पहुंच जाएं उनका शिकार वर्जित है। दूसरी बात कि खोका इलिश में 'वह' स्वाद नहीं होता और कांटे बहुत होते हैं। स्वाद होता है दो से तीन किलो की हिलसा में। जब यह भाव मिल रहा है और नौदौलतिया खरीदारों की कोई कमीं नहीं है तो मछुआरे भी रूपये की तीन अठन्नी क्यों न बनाएं। हिलसा बंगाल का रास्ता भूल गई है सो वे भी अरंपरा-परंपरा छोड़ खोका पकड़ते भए पूर्वी भारत की संस्कृति का हिस्सा बन चुकी इस शानदार मछली के सफाए में अपना महती योगदान दे रहे हैं।
दुनिया के बड़े मछली निर्यातकों में से एक बांग्लादेश ने पिछले साल पश्चिम बंगाल को २१ लाख किलो इलिश माछ बेची थी लेकिन कीमत का टंटा हो गया। प. बंगाल चौदह रूपये किलो दे रहा था और ढाका वाले तेजी से वहां भी खत्म हो रही हिलसा की कीमत थोक में १७ रूपये किलो मांग रहे थे। खुदरा बाजार में पांच-छह सौ रूपये किलो और उस पर भी मारामारी को देखते हुए, यह सौदा बेहद सस्ता था लेकिन सरकारें अपनी ही चाल चलती है। इस या उस पार बांग्ला के किसी मंत्री या अफसर की धोती या पतलून में फाइल फंसी होगी। वैसे हिलसा का नदियों में घटना और कीमत का चढ़ना बीस साल पहले शुरू हो गया था।
हिलसा, प्रजनन के दिनों में समुद्र से धारा के विपरीत तैरते हुए नदियों में आती है। कुछ दशक पहले जब गंगा की यह दुर्गति नहीं हुई थी, हिलसा बंगाल की खाड़ी से निकल कर सुंदरबन डेल्टा होते कलकत्ता फलांग कर एक हजार किलोमीटर की लांग स्विम (बतर्ज लांग ड्राइव) करते हुए इलाहाबाद में नमूंदार हुआ करती थी। गंगा की इलिश स्वादिष्ट कि पद्मा की- इस पर बांग्ला साहित्य में लंबी चखचख हुई है। फरक्का बांध के बाद गंगा की एक धारा हुगली बन कर दक्षिण की तरफ निकल लेती है। एक धारा पद्मा का नाम लेकर दक्षिण-पूर्व दिशा में बांग्लादेश जाकर मेघना (ब्रह्मपुत्र) में मिल जाती है। मछुआरे या बंगाली भद्रलोक भी नदी किनारे खड़े होकर इलिश का नाम नहीं लेते। कहा जाता है इलिश के कान बहुत तेज होते हैं अपना नाम सुनकर यह उस इलाके से ही चंपत हो जाती है। झीसी या रिमझिम बारिश में यह सतह पर खिलवाड़ करने आती है इसी कारण बांग्ला में धीमी बारिश के लिए एक शब्द है इलिशगुड़ी बृष्टि।

पर्यावरण में बदलाव, सुंदरबन के मैंग्रूव वनों का सफाया, प्रजनन के इलाकों में जहाजों की बढ़ती आवाजाही और सारी नदियों में बढती सिल्ट के काऱण हिल्सा का यह हाल हुआ है। वैसे पूरे उत्तर-पूर्व, बंगाल और बांग्लादेश का इको सिस्टम चौपट हो रहा है। यही अपने यहां भी कई उलटबांसियों के रूप में सामने आ रहा है। आजकल दाल मंहगी है और मुर्गा सस्ता है।
पुनश्चः इलिश से जुड़ा एक और किस्सा। दूसरे विश्वयुद्ध के समय बर्मा से काफी अमीर बंगाली भाग कर कलकत्ता पहुंचे। वे बाजार में हिलसा के दाम पूछ कर खांटी गोरा साब वाले अंदाज में कहते थे, "डैम चीप।"
उन्हें आया देख कर मछली बेचने वाले घेर लेते थे। "मेरी मछली ले लो डैमची साहेब। मेरी मछली ले लो डैमची साहेब।" नए दौलतियों की प्रजाति का नाम ही डैमची साब पड़ गया।