कंकड़
ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त
एक दोषरहित जीव होता है
अपने ही जितना
अपनी सीमाओं को जानने वाला
उसकी गन्ध किसी भी चीज़ की याद नहीं दिलाती
वह डराता नहीं न इच्छा को जन्म देता है
उसकी ललक और ठण्डापन
न्यायसंगत और गरिमापूरित होते हैं
जब मैं उसे थामता हूं अपने हाथ में
मुझे महसूस होता है एक भारी पछतावा
और उसकी शरीफ़ देह
व्यापती है झूठी ऊष्मा से
-पालतू नहीं बनाए जा सकते कंकड़
आख़िर में वे देखेंगे हमें
एक स्थिर और बेहद साफ़ निगाह के साथ.
Monday, May 30, 2011
Sunday, May 29, 2011
गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ का परिवार - २
(पिछली पोस्ट से आगे)
मैं हमेशा सोचता था कि कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया तुम्हारे नानाजी से मेल खाता होगा....
नहीं, कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया मेरे नाना की मेरी इमेज से बिल्कुल उलट है. मेरे नाना गठीले थे, उनकी रंगत दमकभरी थी और मेरी याददाश्त में वे सबसे बड़े भोजनभट्ट थे. इसके अलावा, जैसा मुझे बाद में ज्ञात हुआ, वे एक भीषण स्त्रीगामी थे. दूसरी तरफ़ कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया देखने में जनरल राफ़ाएल उरिबे उरिबे जैसा है और उन्हीं का जैसा सादगीपूर्ण जीवन का हिमायती भी. मैंने उरिबे उरिबे को कभी नहीं देखा पर नानी बताती थीं कि वे एक दफ़े आराकाटाका आये थे और उन्होंने अपने दफ्तर में मेरे नाना और अन्य पूर्व-सैनिकों के साथ कुछ बीयर की बोतलें पी थीं. उनकी जो छवि मेरी नानी की मन में थी वह ‘लीफ़ स्टॉर्म’ में उस फ्रांसीसी डाक्टर के वर्णन से मेल खाती है जो कर्नल की पत्नी आदेलाइदा के मन में हैः वह कहती है कि जब वह उसे पहली बार देखती है उसे वह एक सिपाही जैसा नजर आता है. गहरे भीतर मुझे पता है कि उसे वह जनरल उरिबे उरिबे जैसा नजर आता था.
अपनी मां के साथ अपने सम्बंधों को तुम किस तरह देखते हो?
मेरी मां के साथ मेरे संबंधों की सबसे बड़ी ख़ासियत बचपन से ही उसकी गंभीरता रही है. संभवतः वह मेरे जीवन का सबसे गंभीर संबंध है. मुझे यक़ीन है कि एक भी ऐसी बात नहीं है जो हम एक दूसरे को न बता पाएं और ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर हम बात न कर सकें लेकिन हमारे दरम्यान हमेशा एक पेशेवर औपचारिकता जैसी रही है न कि अंतरंगता. इस बारे में बता पाना मुश्किल है पर यह ऐसा ही है. शायद ऐसा इस कारण भी था कि जब मैं नाना जी की मृत्यु के बाद अपने माता-पिता के साथ रहने गया तो मैं अपने बारे में सोच सकने लायक बड़ा हो चुका था. उनके लिये मेरे आने का मतलब यह रहा होगा कि उनके अनेक बच्चों के साथ (बाकी सारी मुझसे छोटे थे) एक बच्चा और आ गया है जिससे वह असल में बात कर सकती थीं और जो घरेलू समस्याओं का समाधान करने में उनकी सहायता करता. उनका जीवन कठोर और पुरुस्कारहीन था - कई दफ़े वे भीषण गरीबी में रही थीं. इसके अलावा हम बहुत लंबे समय तक एक छत के नीचे नहीं रहे क्योंकि कुछ साल बाद जब मैं बारह का था, पढ़ने के लिये मैं पहले बारान्कीया और फिर जि़पाकीरा चला गया. तब से हमारी मुलाकातें बहुत संक्षिप्त रही हैं, शुरू में स्कूल की छुट्टियों के वक्त और बाद में जब भी मैं कार्तागेना जाता हूं - वह भी साल भर में एक बार से ज़्यादा कभी नहीं होता और कभी भी दो सप्ताह से ऊपर नहीं. इसके कारण हमारा संबंध दूरीभरा हो गया है. इसने एक विशेष औपचारिकता का निर्माण भी किया है जिसके कारण हम एक दूसरे के साथ तभी खुल पाते हैं जब गंभीर होते हैं. हालांकि, पिछले बारह-एक सालों से, जब से मेरे पास साधन हैं, हर इतवार को एक ही समय पर मैं उन्हें टेलीफोन करता हूं, चाहे संसार के किसी भी हिस्से में होऊं. बहुत कम दफ़े जब मैं ऐसा नहीं कर पाया हूं, वह तकनीकी दिक्कतों के कारण हुआ है. ऐसा नहीं है कि मैं ‘अच्छा बेटा’ हूं जैसा कहा जाता है. मैं औरों से बेहतर नहीं हूं पर मैं ऐसा इसलिये करता हूं कि मैंने हमेशा सोचा है कि इतवार को टेलीफ़ोन करना हमारे संबंधों की गंभीरता है हिस्सा है.
क्या यह सच है कि तुम्हारे उपन्यासों की चाभी उन्हें आसानी से मिल जाती है?
हां, मेरे तमाम पाठकों में सबसे अधिक ‘इंन्स्टिंक्ट’ और निश्चय ही सबसे अधिक सूचनाएं उन्हीं के पास होती हैं और वे मेरी किताबों के चरित्रों के पीछे के वास्तविक लोगों को पहचान लेती हैं. यह आसान नहीं है क्योंकि मेरे तकरीबन सारे पात्र कई अलग-अलग लोगों और थोड़ा बहुत ख़ुद मेरे हिस्से की बनी पहेलियों जैसे होते हैं. इस बाबत मेरी मां की विशेष प्रतिभा इस बात में वैसी ही है जैसे किसी पुराशास्त्री को उत्खनन के दौरान पाई गई चन्द हड्डियों की मदद से किसी प्रागैतिहासिक जीव का पुनर्निर्माण करना होता है. जब वे मेरी किताबें पढ़ती हैं तो स्वतः ही उन सारे हिस्सों को मिटा देती हैं जो मैंने जोड़े होते हैं और वे उस मुख्य हड्डी को, उस केंद्रबिंदु को पहचान लेती हैं, जिसके इर्द-गिर्द मैंने अपने पात्र का सृजन किया होता है. कभी-कभी जब वे पढ़ रही होती हैं आप उन्हें कहते हुए सुन सकते हैं, "ओह बेचारा मेरा कोम्पाद्रे , तुमने उसे एक वास्तविक पैंज़ी के फूल में बदल दिया है", मैं उन्हें कहता हूं कि वह पात्र उनके कोम्पाद्रे जैसा नहीं है, लेकिन ऐसा मैं यूं ही कहने के लिये कह देता हूं क्योंकि वे जानती हैं कि मैं जानता हूं कि वे जानती हैं.
(जारी)
मैं हमेशा सोचता था कि कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया तुम्हारे नानाजी से मेल खाता होगा....
नहीं, कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया मेरे नाना की मेरी इमेज से बिल्कुल उलट है. मेरे नाना गठीले थे, उनकी रंगत दमकभरी थी और मेरी याददाश्त में वे सबसे बड़े भोजनभट्ट थे. इसके अलावा, जैसा मुझे बाद में ज्ञात हुआ, वे एक भीषण स्त्रीगामी थे. दूसरी तरफ़ कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया देखने में जनरल राफ़ाएल उरिबे उरिबे जैसा है और उन्हीं का जैसा सादगीपूर्ण जीवन का हिमायती भी. मैंने उरिबे उरिबे को कभी नहीं देखा पर नानी बताती थीं कि वे एक दफ़े आराकाटाका आये थे और उन्होंने अपने दफ्तर में मेरे नाना और अन्य पूर्व-सैनिकों के साथ कुछ बीयर की बोतलें पी थीं. उनकी जो छवि मेरी नानी की मन में थी वह ‘लीफ़ स्टॉर्म’ में उस फ्रांसीसी डाक्टर के वर्णन से मेल खाती है जो कर्नल की पत्नी आदेलाइदा के मन में हैः वह कहती है कि जब वह उसे पहली बार देखती है उसे वह एक सिपाही जैसा नजर आता है. गहरे भीतर मुझे पता है कि उसे वह जनरल उरिबे उरिबे जैसा नजर आता था.
अपनी मां के साथ अपने सम्बंधों को तुम किस तरह देखते हो?
मेरी मां के साथ मेरे संबंधों की सबसे बड़ी ख़ासियत बचपन से ही उसकी गंभीरता रही है. संभवतः वह मेरे जीवन का सबसे गंभीर संबंध है. मुझे यक़ीन है कि एक भी ऐसी बात नहीं है जो हम एक दूसरे को न बता पाएं और ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर हम बात न कर सकें लेकिन हमारे दरम्यान हमेशा एक पेशेवर औपचारिकता जैसी रही है न कि अंतरंगता. इस बारे में बता पाना मुश्किल है पर यह ऐसा ही है. शायद ऐसा इस कारण भी था कि जब मैं नाना जी की मृत्यु के बाद अपने माता-पिता के साथ रहने गया तो मैं अपने बारे में सोच सकने लायक बड़ा हो चुका था. उनके लिये मेरे आने का मतलब यह रहा होगा कि उनके अनेक बच्चों के साथ (बाकी सारी मुझसे छोटे थे) एक बच्चा और आ गया है जिससे वह असल में बात कर सकती थीं और जो घरेलू समस्याओं का समाधान करने में उनकी सहायता करता. उनका जीवन कठोर और पुरुस्कारहीन था - कई दफ़े वे भीषण गरीबी में रही थीं. इसके अलावा हम बहुत लंबे समय तक एक छत के नीचे नहीं रहे क्योंकि कुछ साल बाद जब मैं बारह का था, पढ़ने के लिये मैं पहले बारान्कीया और फिर जि़पाकीरा चला गया. तब से हमारी मुलाकातें बहुत संक्षिप्त रही हैं, शुरू में स्कूल की छुट्टियों के वक्त और बाद में जब भी मैं कार्तागेना जाता हूं - वह भी साल भर में एक बार से ज़्यादा कभी नहीं होता और कभी भी दो सप्ताह से ऊपर नहीं. इसके कारण हमारा संबंध दूरीभरा हो गया है. इसने एक विशेष औपचारिकता का निर्माण भी किया है जिसके कारण हम एक दूसरे के साथ तभी खुल पाते हैं जब गंभीर होते हैं. हालांकि, पिछले बारह-एक सालों से, जब से मेरे पास साधन हैं, हर इतवार को एक ही समय पर मैं उन्हें टेलीफोन करता हूं, चाहे संसार के किसी भी हिस्से में होऊं. बहुत कम दफ़े जब मैं ऐसा नहीं कर पाया हूं, वह तकनीकी दिक्कतों के कारण हुआ है. ऐसा नहीं है कि मैं ‘अच्छा बेटा’ हूं जैसा कहा जाता है. मैं औरों से बेहतर नहीं हूं पर मैं ऐसा इसलिये करता हूं कि मैंने हमेशा सोचा है कि इतवार को टेलीफ़ोन करना हमारे संबंधों की गंभीरता है हिस्सा है.
क्या यह सच है कि तुम्हारे उपन्यासों की चाभी उन्हें आसानी से मिल जाती है?
हां, मेरे तमाम पाठकों में सबसे अधिक ‘इंन्स्टिंक्ट’ और निश्चय ही सबसे अधिक सूचनाएं उन्हीं के पास होती हैं और वे मेरी किताबों के चरित्रों के पीछे के वास्तविक लोगों को पहचान लेती हैं. यह आसान नहीं है क्योंकि मेरे तकरीबन सारे पात्र कई अलग-अलग लोगों और थोड़ा बहुत ख़ुद मेरे हिस्से की बनी पहेलियों जैसे होते हैं. इस बाबत मेरी मां की विशेष प्रतिभा इस बात में वैसी ही है जैसे किसी पुराशास्त्री को उत्खनन के दौरान पाई गई चन्द हड्डियों की मदद से किसी प्रागैतिहासिक जीव का पुनर्निर्माण करना होता है. जब वे मेरी किताबें पढ़ती हैं तो स्वतः ही उन सारे हिस्सों को मिटा देती हैं जो मैंने जोड़े होते हैं और वे उस मुख्य हड्डी को, उस केंद्रबिंदु को पहचान लेती हैं, जिसके इर्द-गिर्द मैंने अपने पात्र का सृजन किया होता है. कभी-कभी जब वे पढ़ रही होती हैं आप उन्हें कहते हुए सुन सकते हैं, "ओह बेचारा मेरा कोम्पाद्रे , तुमने उसे एक वास्तविक पैंज़ी के फूल में बदल दिया है", मैं उन्हें कहता हूं कि वह पात्र उनके कोम्पाद्रे जैसा नहीं है, लेकिन ऐसा मैं यूं ही कहने के लिये कह देता हूं क्योंकि वे जानती हैं कि मैं जानता हूं कि वे जानती हैं.
(जारी)
एक गीत ताकि नष्ट न हों हम
एक गीत ताकि नष्ट न हों हम
ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त
वे जो समुद्री यात्रा पर निकले भोर के वक्त
लेकिन जो लौटेंगे नहीं कभी
वे छोड़ गए अपने निशान एक लहर पर -
एक सीप गिरी समुद्र के तल में
पत्थर में बदल गए होंठों जैसी सुन्दर
वे जो चले एक रेतीली सड़क पर
लेकिन नहीं पहुंच सके किवाड़दार खिड़कियों तक
अलबत्ता उन्होंने तब तक देख लिया था छत को -
उन्हें शरण मिल चुकी है हवा की एक घंटी के भीतर
लेकिन वे जो अपने पीछे छोड़ जाते हैं फ़कत
चन्द किताबों से ठण्डा पड़ गया एक कमरा
एक खाली दवात और सफ़ेद काग़ज़
वास्तव में वे पूरी तरह नहीं मरे हैं
उनकी फुसफुसाहट सफ़र करती है वॉलपेपर के झुरमुट के पार
उनका ऊंचा सिर अब भी रहता है छत पर
हवा से बना हुआ था उनका स्वर्ग
और पानी चूने और मिट्टी से, हवा का एक फ़रिश्ता
अपने हाथों चूरचूर करेगा शरीर को
उन लोगों को
ले जाया जाएगा इस संसार के चरागाहों से ऊपर से.
Saturday, May 28, 2011
ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त की सलाहें
१. जब दिमाग़ आपको दग़ा देने लगे, अपना हौसला बनाए रखो. आख़िर में सिर्फ़ यही महत्वपूर्ण होता है.
२. एक शिल्पी ने क्रूरता की गहराई तक जा कर जांच करनी चाहिए.
३. जंगलों में आग लगी हो तो आपको ग़ुलाबों के लिए अफ़सोस नहीं करना चाहिए.
कुरजां का स्वागत कीजिए....

जयपुर से निकली कुरजां पिछले दिनों ग्वालियर तक आ पहुंची और खबर है कि अब वह राजस्थान से पूरे हिंदुस्तान में फैल रही है...सात समंदर पार की यह पंक्षी प्रेमचंद गांधी ने ठेठ हिन्दुस्तानी ठाठ के साथ भेजी है, शताब्दी वर्ष का होना खडी बोली हिन्दी और हिन्दुस्तानी की विरासत के धीरे-धीरे प्रौढ़ होते जाने की सूचना दे रहा है और साथ में उन चिंताओं और चुनौतियों की ओर भी संकेत कर रहा है जो अपने लगभग एक सदी के इतिहास में इसके सामने आ खडी हुई हैं.
अगर एक पंक्ति में कहूँ तो कुरजां की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सेलीब्रेटेड त्रयियों या चतुष्टयों से आगे जाकर उनको भी भरपूर सम्मान देती है जो इस आयोजन काल में भी अलक्षित रह गए. इसीलिए इसमें शमशेर, नागार्जुन, अज्ञेय, केदार, के साथ-साथ उपेन्द्र नाथ अश्क, गोपाल सिंह नेपाली, भुवनेश्वर, भगवत शरण उपाध्याय,राधाकृष्ण हैं तो उर्दू के फैज़, असरार उल हक मजाज, नून मीम राशिद, अंग्रेजी के अहमद अली, राजस्थानी के कन्हैया लाल सहल, गुजराती के उमा शंकर जोशी, कृष्ण लाल श्रीधरणी, भोगी लाल गांधी, तेलगु के श्री श्री के साथ रविन्द्र नाथ टैगोर को उनके प्रसिद्द उपन्यास 'गोरा' के सौ साल पूरे होने के बहाने आत्मीयता से याद किया गया है. 'दुसरे गोलार्द्ध' से जेस्लो मिलोज को भी याद किया गया है तो संगीत के महान उस्तादों विष्णु नारायण भातखंडे, मल्लिकार्जुन मंसूर और उस्ताद अब्दुल रशीद खान के साथ फिल्मों की दुनिया से हमारे अपने दादामुनि अशोक कुमार और जापान के युग प्रवर्तक फिल्मकार अकीरा कुरासोवा को भी शिद्दत से याद किया गया है.
अंग्रेजी से एक कहावत उधार लूं तो Last but not the least है महिला दिवस पर लिखा मनीषा कुलश्रेष्ठ का आलेख. मनीषा ने लीक से हटकर एक बेहद विचारोत्तेजक लेख लिखा है जो पत्रिका के आगामी अंको के तेवर की ओर संकेत करता है.
अब फकत २८१ पन्नों में इतना कुछ समेटना आसान कतई नहीं लेकिन फिर भी यह पत्रिका आम के साथ-साथ 'खास' पाठकों के लिए भी भरपूर सामग्री उपलब्ध कराती है. अज्ञेय पर एक लंबे साक्षात्कार को छोड़ दें तो आमतौर पर विगलित भक्तिभाव नहीं दिखता. प्रियंकर पालीवाल का वि ना भातखंडे पर लिखा आलेख और केदार पर हिमांशु पंड्या का आलेख मुझे अंक की उपलब्धि लगे. फैज़ पर कुछ पाकिस्तानी लेखकों/पत्रकारों द्वारा जुटाई गयी सामग्री अंक को और समृद्ध करती है.
बहरहाल, विस्तार से फिर कभी...अभी तो कुरजां की टीम को बधाई और आप सबसे इस पत्रिका को पढ़ने की गुजारिश....
पत्रिका की कीमत है १०० रुपये और इसे भाई प्रेमचंद गांधी से 09829190626 पर फोन या prempoet@gmail.com पर मेल करके मंगाया जा सकता है. अगर ग्वालियर के आसपास हों तो मुझसे ले लें.
गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ का परिवार - १
प्लीनीयो आपूलेयो मेन्दोज़ा की पुस्तक "अमरूद की ख़ुशबू" से गाबो के परिवार के बारे में जानिए -
मेरे भीतर सबसे स्पष्ट और निरंतर स्मृति लोगों की बनिस्बत उस मकान की है आराकाटाका में जिसके भीतर मैं अपने नाना-नानी के साथ रहा था. यह लगातार आने वाला एक स्वप्न है जिसे मैं आज भी देखता हूं. और अपने पूरे जीवन में हर दिन में जब भी जागता हूं मुझे अनुभूति होती है, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक, कि मैंने सपने में देखा है कि मैं सपने में उस घर के भीतर था. ऐसा नहीं है कि मैं वापस वहां गया होऊं; किसी भी उम्र में, या बिना किसी विशेष वजह के - पर मैं तो वहीं हूं - जैसे मैंने उसे कभी छोड़ा ही नहीं था. आज भी मेरे सपनों में रात समय का वह निषेध बनी हुई है जिसने मेरे पूरे बचपन को घेरा हुआ था. यह एक बेकाबू झुरझुरी थी जो हर शाम जल्दी शुरू होकर मेरे नींद को कोंचती रही थी जब तक कि मैं दरवाजे़ की दरार से भोर का होना नहीं देख लेता था. मैं बहुत ठीक-ठाक इसके बारे में नहीं बता सकता पर मेरे ख़्याल से वह निषेध इस तथ्य में निहित था कि रात के समय मेरी नानी के सारे प्रेत और आत्माएं साकार हो जाया करते थे. कुछ उस तरह का हमारा सम्बंध था. एक तरह का अदृश्य धागा जो हमें परामानवीय संसार से बांधे रखता था. दिन के समय मेरी नानी का जादुई संसार मुझे सम्मोहित किये रखता था - मैं उसमें डूबा रहता था, वह मेरा संसार था. लेकिन रात को वह मुझे भयभीत करता था. आज भी, जब मैं दुनिया के किसी हिस्से के किसी अजनबी होटल में अकेला सोया होता हूं, मैं अक्सर डरा हुआ जागता हूं, अंधेरे में अकेला होने के भय से हिला हुआ, और शांत होकर वापस सो जाने में हमेशा मुझे कुछ मिनट लगते हैं. वहीं मेरे नानाजी, नानी के अनिश्चितता भरे संसार में संपूर्ण सुरक्षा का प्रतिनिधित्व किया करते थे. उनके होने पर मेरी सारी चिंताएं गायब हो जाती थीं. मुझे दोबारा वास्तविक संसार के ठोस धरातल पर खड़े होने का बोध होता था. अजीब बात यह थी कि मैं अपने नाना जैसा होना चाहता था - यथार्थवादी, बहादुर, सुरक्षित - लेकिन नानी के संसार में झांकने का निरंतर लालच मुझे वहीं ले जाया करता था.
अपने नाना के बारे में मुझे बतलाओ. कौन थे वो? उनके साथ तुम्हारा कैसा रिश्ता था?
कर्नल निकोलास रिकार्दो मारकेज़ मेहीया - यह उनका पूरा नाम था - एक ऐसे शख़्स थे जिनके साथ संभवतः मेरी सबसे बढि़या बनती थी और जिनके साथ मेरी आपसी समझदारी सबसे ज़्यादा थी. लेकिन करीब पचास साल बाद पलटकर देखता हूं तो लगता है कि उन्होंने संभवतः कभी भी इस बात का अहसास नहीं किया. पता नहीं क्यों पर इस अहसास ने, जो पहली बार मुझे किशोरावस्था में हुआ था, मुझे बहुत खिन्न किया है. यह बहुत कुंठित करने वाला होता है क्योंकि यह एक लगातार बनी रहने वाली कचोट के साथ जीने जैसा है जिसे साफ़-सपाट कर लिया जाना चाहिए था पर वह अब नहीं हो सकेगा क्योंकि मेरे नाना की मौत तब हो चुकी थी जब मैं आठ साल का था. मैंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा क्योंकि उस वक्त मैं आराकाटाका से बहुत दूर था, और मुझे यह समाचार नहीं दिया गया हालांकि जहां मैं रह रहा था उस घर के लोगों को मैंने इस बाबत बात करते हुए सुना. जहां तक मुझे याद पड़ता है, मुझ पर इस समाचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, तो भी एक वयस्क के तौर पर जब भी मेरे साथ कुछ भी विशेषतः अच्छी घटना होती है तो मुझे अपनी प्रसन्नता सम्पूर्ण नहीं लगती क्योंकि मैं चाहता हूं कि मेरे नाना उसे जान पाते. इस तरह से एक वयस्क के तौर पर मेरी तमाम ख़ुशियों पर इस एक कुंठा का कीड़ा लगा रहता है, और ऐसा हमेशा होता रहेगा.
क्या तुम्हारी किसी किताब का कोई चरित्र उनके जैसा है?
‘लीफ़ स्टॉर्म’ का बेनाम कर्नल एकमात्र चरित्र है जो मेरे नानाजी से मिलता-जुलता है. असल में वह पात्र उनके व्यक्तित्व और आकृति की बारीक प्रतिलिपि है. हालांकि यह एक व्यक्तिगत सोच है क्योंकि उपन्यास में कर्नल का बहुत वर्णन नहीं है और संभवतः पाठकों के मन में बनने वाली छवि मेरी सोच से फ़र्क हो सकती है. मेरे नानाजी के एक आंख गंवाने की घटना किसी उपन्यास का हिस्सा बनने के लिहाज से अतिनाटकीय हैः वे अपने दफ्तर की खिड़की से एक सफेद घोड़े को देख रहे थे जब उन्हें अपनी बांई आंख में कुछ महसूस हुआ; उन्होंने अपना हाथ उस पर रखा और बिना किसी दर्द के उनकी बांई आंख की रोशनी चली गई. मुझे इस घटना की याद नहीं है पर बचपन में मैंने इसके बारे में बातें सुनी थीं और हर दफ़े आखिर में मेरी नानी कहा करती थीं, "उनके हाथ में आंसुओं के अलावा कुछ नहीं बचा." ‘लीफ़ स्टॉर्म’ के कर्नल में यह शारीरिक कमी बदल दी गई है - वह लंगड़ा है. मुझे पता नहीं मैंने उपन्यास में यह लिखा है या नहीं पर एक बात मेरे दिमाग़ में हमेशा थी कि उसका लंगड़ापन एक युद्ध की चोट का परिणाम था. इस शताब्दी के शुरूआती वर्षों में कोलंबिया में हुए ‘हज़ार दिनी युद्ध’ के दौरान क्रांतिकारी सेना में मेरे नाना ने कर्नल की पदवी हासिल की थी. उनकी सबसे स्पष्ट स्मृति मेरे लिए इसी तथ्य से सम्बंधित है. उनके मरने से ठीक पहले उनके बिस्तर पर उनका निरीक्षण करते हुए एक डॉक्टर ने (मुझे पता नहीं क्यों) उनके पेड़ू के पास एक घाव का निशान देखा था. "वो एक गोली थी" मेरे नाना बोले. उन्होंने मेरे साथ गृहयुद्ध के बारे में अक्सर बातचीत की थी और उन्हीं के कारण उस इतिहास-काल में मेरी दिलचस्पी पैदा हुई जो मेरी सारी किताबों में आता है लेकिन उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया था कि वह घाव एक गोली का परिणाम था. जब उन्होंने डॉक्टर को यह बात बताई, मेरे लिये वह एक महान गाथा के प्रकट होने जैसा था.
(जारी)
मेरे भीतर सबसे स्पष्ट और निरंतर स्मृति लोगों की बनिस्बत उस मकान की है आराकाटाका में जिसके भीतर मैं अपने नाना-नानी के साथ रहा था. यह लगातार आने वाला एक स्वप्न है जिसे मैं आज भी देखता हूं. और अपने पूरे जीवन में हर दिन में जब भी जागता हूं मुझे अनुभूति होती है, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक, कि मैंने सपने में देखा है कि मैं सपने में उस घर के भीतर था. ऐसा नहीं है कि मैं वापस वहां गया होऊं; किसी भी उम्र में, या बिना किसी विशेष वजह के - पर मैं तो वहीं हूं - जैसे मैंने उसे कभी छोड़ा ही नहीं था. आज भी मेरे सपनों में रात समय का वह निषेध बनी हुई है जिसने मेरे पूरे बचपन को घेरा हुआ था. यह एक बेकाबू झुरझुरी थी जो हर शाम जल्दी शुरू होकर मेरे नींद को कोंचती रही थी जब तक कि मैं दरवाजे़ की दरार से भोर का होना नहीं देख लेता था. मैं बहुत ठीक-ठाक इसके बारे में नहीं बता सकता पर मेरे ख़्याल से वह निषेध इस तथ्य में निहित था कि रात के समय मेरी नानी के सारे प्रेत और आत्माएं साकार हो जाया करते थे. कुछ उस तरह का हमारा सम्बंध था. एक तरह का अदृश्य धागा जो हमें परामानवीय संसार से बांधे रखता था. दिन के समय मेरी नानी का जादुई संसार मुझे सम्मोहित किये रखता था - मैं उसमें डूबा रहता था, वह मेरा संसार था. लेकिन रात को वह मुझे भयभीत करता था. आज भी, जब मैं दुनिया के किसी हिस्से के किसी अजनबी होटल में अकेला सोया होता हूं, मैं अक्सर डरा हुआ जागता हूं, अंधेरे में अकेला होने के भय से हिला हुआ, और शांत होकर वापस सो जाने में हमेशा मुझे कुछ मिनट लगते हैं. वहीं मेरे नानाजी, नानी के अनिश्चितता भरे संसार में संपूर्ण सुरक्षा का प्रतिनिधित्व किया करते थे. उनके होने पर मेरी सारी चिंताएं गायब हो जाती थीं. मुझे दोबारा वास्तविक संसार के ठोस धरातल पर खड़े होने का बोध होता था. अजीब बात यह थी कि मैं अपने नाना जैसा होना चाहता था - यथार्थवादी, बहादुर, सुरक्षित - लेकिन नानी के संसार में झांकने का निरंतर लालच मुझे वहीं ले जाया करता था.
अपने नाना के बारे में मुझे बतलाओ. कौन थे वो? उनके साथ तुम्हारा कैसा रिश्ता था?
कर्नल निकोलास रिकार्दो मारकेज़ मेहीया - यह उनका पूरा नाम था - एक ऐसे शख़्स थे जिनके साथ संभवतः मेरी सबसे बढि़या बनती थी और जिनके साथ मेरी आपसी समझदारी सबसे ज़्यादा थी. लेकिन करीब पचास साल बाद पलटकर देखता हूं तो लगता है कि उन्होंने संभवतः कभी भी इस बात का अहसास नहीं किया. पता नहीं क्यों पर इस अहसास ने, जो पहली बार मुझे किशोरावस्था में हुआ था, मुझे बहुत खिन्न किया है. यह बहुत कुंठित करने वाला होता है क्योंकि यह एक लगातार बनी रहने वाली कचोट के साथ जीने जैसा है जिसे साफ़-सपाट कर लिया जाना चाहिए था पर वह अब नहीं हो सकेगा क्योंकि मेरे नाना की मौत तब हो चुकी थी जब मैं आठ साल का था. मैंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा क्योंकि उस वक्त मैं आराकाटाका से बहुत दूर था, और मुझे यह समाचार नहीं दिया गया हालांकि जहां मैं रह रहा था उस घर के लोगों को मैंने इस बाबत बात करते हुए सुना. जहां तक मुझे याद पड़ता है, मुझ पर इस समाचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, तो भी एक वयस्क के तौर पर जब भी मेरे साथ कुछ भी विशेषतः अच्छी घटना होती है तो मुझे अपनी प्रसन्नता सम्पूर्ण नहीं लगती क्योंकि मैं चाहता हूं कि मेरे नाना उसे जान पाते. इस तरह से एक वयस्क के तौर पर मेरी तमाम ख़ुशियों पर इस एक कुंठा का कीड़ा लगा रहता है, और ऐसा हमेशा होता रहेगा.
क्या तुम्हारी किसी किताब का कोई चरित्र उनके जैसा है?
‘लीफ़ स्टॉर्म’ का बेनाम कर्नल एकमात्र चरित्र है जो मेरे नानाजी से मिलता-जुलता है. असल में वह पात्र उनके व्यक्तित्व और आकृति की बारीक प्रतिलिपि है. हालांकि यह एक व्यक्तिगत सोच है क्योंकि उपन्यास में कर्नल का बहुत वर्णन नहीं है और संभवतः पाठकों के मन में बनने वाली छवि मेरी सोच से फ़र्क हो सकती है. मेरे नानाजी के एक आंख गंवाने की घटना किसी उपन्यास का हिस्सा बनने के लिहाज से अतिनाटकीय हैः वे अपने दफ्तर की खिड़की से एक सफेद घोड़े को देख रहे थे जब उन्हें अपनी बांई आंख में कुछ महसूस हुआ; उन्होंने अपना हाथ उस पर रखा और बिना किसी दर्द के उनकी बांई आंख की रोशनी चली गई. मुझे इस घटना की याद नहीं है पर बचपन में मैंने इसके बारे में बातें सुनी थीं और हर दफ़े आखिर में मेरी नानी कहा करती थीं, "उनके हाथ में आंसुओं के अलावा कुछ नहीं बचा." ‘लीफ़ स्टॉर्म’ के कर्नल में यह शारीरिक कमी बदल दी गई है - वह लंगड़ा है. मुझे पता नहीं मैंने उपन्यास में यह लिखा है या नहीं पर एक बात मेरे दिमाग़ में हमेशा थी कि उसका लंगड़ापन एक युद्ध की चोट का परिणाम था. इस शताब्दी के शुरूआती वर्षों में कोलंबिया में हुए ‘हज़ार दिनी युद्ध’ के दौरान क्रांतिकारी सेना में मेरे नाना ने कर्नल की पदवी हासिल की थी. उनकी सबसे स्पष्ट स्मृति मेरे लिए इसी तथ्य से सम्बंधित है. उनके मरने से ठीक पहले उनके बिस्तर पर उनका निरीक्षण करते हुए एक डॉक्टर ने (मुझे पता नहीं क्यों) उनके पेड़ू के पास एक घाव का निशान देखा था. "वो एक गोली थी" मेरे नाना बोले. उन्होंने मेरे साथ गृहयुद्ध के बारे में अक्सर बातचीत की थी और उन्हीं के कारण उस इतिहास-काल में मेरी दिलचस्पी पैदा हुई जो मेरी सारी किताबों में आता है लेकिन उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया था कि वह घाव एक गोली का परिणाम था. जब उन्होंने डॉक्टर को यह बात बताई, मेरे लिये वह एक महान गाथा के प्रकट होने जैसा था.
(जारी)
सचमुच किसी भी और देश से बेहतर है जीना स्वर्ग में
स्वर्ग से रपट
ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त
स्वर्ग में हफ़्ते में तीस घन्टे नियत हैं काम के
तन्ख़्वाहें ऊंची हैं कीमतें लगातार घटती जाती हैं
शारीरिक श्रम थकाता नहीं (कम गुरुत्व के कारण)
लकड़ी फाड़ने में टाइप करने से ज़्यादा मेहनत नहीं लगती
सामाजिक पद्धति सुस्थिर है और बुद्धिमान हैं शासक
सचमुच किसी भी और देश से बेहतर है जीना स्वर्ग में
शुरू में इसे फ़र्क होना था
चमकीले आभामण्डल और अमूर्तन के स्तर
लेकिन वे ठीकठीक अलग नहीं कर सके
आत्मा को उसके शरीर से सो वह यहां पहुंची
चर्बी की एक बूंद और मांसपेशी के एक धागे के साथ
ज़रूरी था इसके परिणामों से रू-ब-रू होना
परम के एक कण में मिलाना मिट्टी का एक कण
सिद्धान्त से एक और प्रस्थान, आख़िरी प्रस्थान
जिसे सिर्फ़ जॉन ने पहले देख लिया था - देह में ही होगा तुम्हारा मोक्ष
बहुत कम लोग ईश्वर को देख पाते हैं
वह उन लोगों के लिए है जिनमें १०० फ़ीसदी आत्मा होती है
बाकी लोग सुनते हैं चमत्कारों और बाढ़ों के बारे में विज्ञप्तियों को
किसी दिन हर कोई देखेगा ईश्वर को
ऐसा कब होगा कोई नहीं जानता
फ़िलहाल हर शनिवार दोपहर को
मिठास के साथ बजते हैं साइरन
और फ़ैक्ट्रियों से पहुंचते हैं दिव्य श्रमिकों तक
अपनी बांहों के नीचे अटपटे ढंग से दबाए वे लादे चलते हैं अपने पंख वायोलिनों की तरह.
Friday, May 27, 2011
ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त की दो और कविताएं
१. पागल औरत
उसकी जलती निगाह मुझे किसी आलिंगन की तरह बांधे रहती है.
वह सपनों में मिलाए हुए शब्द बड़बड़ा रही है.
वह मुझे पास बुलाती है.
तुम ख़ुश होओगे अगर तुम यक़ीन करोगे
और हांक ले जाओगे अपनी गाड़ी को एक सितारे तलक.
बादलों को अपना दूध पिलाते समय वह भली होती है;
लेकिन जब शान्ति उसे छोड़कर चली जाती है,
वह समुन्दर किनारे भागा करती है
और हवा में लहराती है अपनी बांहें.
उसकी आंखों में प्रतिविम्बित होते मुझे दिखाई पड़ते हैं दो फ़रिश्ते -
उड़ी रंगत वाला, अनिष्टकारी फ़रिश्ता विडम्बना का,
प्रेम करने वाला स्कित्ज़ोफ्रेनिया का फ़रिश्ता.
२. नन्हा क़स्बा
दिन के वक़्त फल होते हैं और समुन्दर,
रात के वक़्त सितारे और समुन्दर.
दि फ़ियोरी स्ट्रीट चेरी के रंगों का एक शंकु है.
दोपहर.
हरी छायादार जगहों पर अपनी सफ़ेद छड़ी पटकता है सूरज.
सदाबहार के एक बग़ीचे में बैल गाते हैं छायाओं के लिए एक गीत. उ
स पल मैंने फ़ैसला किया था अपने प्यार का इज़हार करने का.
समुन्दर थामे रहता है अपनी शान्ति
और नन्हा क़स्बा फूलता जाता है अंजीर बेच रही लड़की की छाती की तरह.
अली "फ़र्का" तूरे का संगीत
अली इब्राहीम "फ़र्का" तूरे (अक्टूबर 31, 1939 – मार्च 7, 2006) माली देश के रहने वाले गायक और गिटारिस्ट थे. अफ़्रीकी महाद्वीप से निकले सबसे विख्यात संगीतकारों में शुमार होने वाले अली पारम्परिक माली संगीत और अमेरिकी ब्लूज़ के बड़े फ़नकार थे. प्रख्यात फ़िल्मकार मार्टिन स्कोरसेसे ने अली फ़र्का तूरे की संगीत परम्परा को "ब्लूज़ का डी.एन.ए." कहा था. रोलिंग स्टोन्स की सौ सर्वकालीन महानतम गिटारिस्टों की सूची में भी इस बड़े संगीतकार को जगह मिली थी.
नाइजर नदी के किनारे उत्तर-पूर्वी माली के टिम्बकटू इलाके के एक गांव कनाऊ में जन्मे अली अपनी माता के दसवें बेटे थे. बाकी नौ अपना शैशव भी पूरा नहीं कर सके थे. इस बाबत एक साक्षात्कार में अली ने कहा था "मुझे अली इब्राहीम नाम दिया गया था पर अफ़्रीका में यह परम्परा है कि अगर परिवार में बच्चे असमय मर जा रहे हों तो अगेल शिशु को बेहद अटपटा सा नाम दे दिया जाता है." तो उनके माता-पिता द्वारा छांटे गए नाम "फ़र्का" का मतलब होता था - गधा. मज़ाकिया लहज़े में अली आगे कहते हैं - "मैं एक बात साफ़ कर दूं. मैं वो गधा हूं जिसकी कोई सवारी नहीं कर सकता."
आज सुनिए उनका एक बेहद प्रसिद्ध गीत. इस गीत को अंग्रेज़ी फ़िल्म "अनफ़ेथफ़ुल" में भी इस्तेमाल किया गया है. मेरे पास इधर अली "फ़र्का" तूरे का काफ़ी संगीत इकठ्ठा हुआ है. यह उनके संगीत की पहली प्रस्तुति है.
मृग के मरने की भी सबकी अलग--अलग कथाएं थीं
कबाड़ी चन्द्रभूषण ने अपनी यह कविता अपने ब्लॉग पहलू में लगाई थी. बाद में अनिल यादव ने इसे अपने हारमोनियम पर सजाया था. आज मैं इस उम्दा कविता को चन्दू भाई से इजाज़त लिए बिना आपके वास्ते प्रस्तुत कर रहा हूं -
मायामृग
हर किसी के पास अपनी--अपनी कहानियां थीं
सौंदर्य की, आकर्षण की, लगाव की, वासना की, स्खलन की
प्रणय की, संवाद की, टकराव की, संघर्ष की, युद्ध की
लेकिन तत्व उनका कमोबेश एक सा था
कान तक प्रत्यंचा ताने जब वे वन में घुसे
तो उनके सामने लहर सी डोलती एक सुनहरी छाया थी
और उनकी आंखें अपने तीर की नोक और लक्ष्य के बीच
बनने वाली निरंतर गतिशील रेखा पर थरथरा रही थीं
लक्ष्य चूकने का कोई भय नहीं था
वह तो जैसे खुद ही हजार सुरों में बोल रहा था-
मुझे मारो, मेरा संधान करो, वध करो मेरा
चाहे जैसे भी मुझे स्थिर करो, अपने घर ले जाओ वीर
उत्तेजना का दौर खत्म हुआ, वे सभी विजेता निकले
किसी ने व्हार्टन मारा, किसी ने कैंब्रिज का संधान किया
कोई जापान की तरफ निकला, मरीन बायलॉजिस्ट बनकर लौटा
तो कोई पुलिस कमिश्नर बना, वर्दी पर टांचे वही सुनहरापन
मृग के मरने की भी सबकी अलग--अलग कथाएं थीं
सभी का मानना था कि मरने से पहले वह कुछ बोला था
शायद ‘मां’, शायद ‘पापा’, शायद- 'अरे ओ मेरी प्रियतमा'
या शायद 'समथिंग ब्रोकेन, समथिंग रॉटन'
शाम ढले दरबार उठा, विरुदावली पूरी हुई
तो कोई भी उनमें ऐसा न था
जिसके पास भीषण दुख की कोई कथा नहीं थी
एक अदद बंद कोठरी जो हमेशा बंद ही रह गई
और खुली भी तो ऐसे समय
जब उसकी अंतर्कथा जानने के लिए
पुरानी परिचित बंद कोठरियां ही सामने रह गई थीं
मायामृग की सुनहरी झाईं एक बार फिर उनके सामने थी
क्षितिज पर रात की सियाही उसे अपने घेरे में ले रही थी
मायामृग
हर किसी के पास अपनी--अपनी कहानियां थीं
सौंदर्य की, आकर्षण की, लगाव की, वासना की, स्खलन की
प्रणय की, संवाद की, टकराव की, संघर्ष की, युद्ध की
लेकिन तत्व उनका कमोबेश एक सा था
कान तक प्रत्यंचा ताने जब वे वन में घुसे
तो उनके सामने लहर सी डोलती एक सुनहरी छाया थी
और उनकी आंखें अपने तीर की नोक और लक्ष्य के बीच
बनने वाली निरंतर गतिशील रेखा पर थरथरा रही थीं
लक्ष्य चूकने का कोई भय नहीं था
वह तो जैसे खुद ही हजार सुरों में बोल रहा था-
मुझे मारो, मेरा संधान करो, वध करो मेरा
चाहे जैसे भी मुझे स्थिर करो, अपने घर ले जाओ वीर
उत्तेजना का दौर खत्म हुआ, वे सभी विजेता निकले
किसी ने व्हार्टन मारा, किसी ने कैंब्रिज का संधान किया
कोई जापान की तरफ निकला, मरीन बायलॉजिस्ट बनकर लौटा
तो कोई पुलिस कमिश्नर बना, वर्दी पर टांचे वही सुनहरापन
मृग के मरने की भी सबकी अलग--अलग कथाएं थीं
सभी का मानना था कि मरने से पहले वह कुछ बोला था
शायद ‘मां’, शायद ‘पापा’, शायद- 'अरे ओ मेरी प्रियतमा'
या शायद 'समथिंग ब्रोकेन, समथिंग रॉटन'
शाम ढले दरबार उठा, विरुदावली पूरी हुई
तो कोई भी उनमें ऐसा न था
जिसके पास भीषण दुख की कोई कथा नहीं थी
एक अदद बंद कोठरी जो हमेशा बंद ही रह गई
और खुली भी तो ऐसे समय
जब उसकी अंतर्कथा जानने के लिए
पुरानी परिचित बंद कोठरियां ही सामने रह गई थीं
मायामृग की सुनहरी झाईं एक बार फिर उनके सामने थी
क्षितिज पर रात की सियाही उसे अपने घेरे में ले रही थी
ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त की कविता
पोलिश कवि ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त (29 अक्टूबर 1924 – 28 जुलाई 1998) एक पिछली सदी के बड़े कवि, निबन्धकार और नाटककार थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे ज़्यादा अनूदित किए गए ज़्बिग्न्यू हेर्बेर्त की औपचारिक शिक्षा अर्थशास्त्र और कानून में हुई थी. १९८६ में वे पेरिस चले गए जहां उन्होंने एक पत्रिका के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया. वे १९९२ में वापस पोलैण्ड आए. उनकी मृत्यु के दस साल बाद पोलिश सरकार ने निर्णय लिया कि सन २००८ को ज़्बिग्न्यू हेर्बेर्त के वर्ष के तौर पर मनाया जाएगा. उनकी एक कविता -
वास्तुशिल्प
एक कोमल मेहराब के ऊपर -
पत्थर की एक भौंह -
एक दीवार के
सुस्थिर माथे पर
प्रसन्न खुली खिड़कियों में
जहां जिरेनियम के बदले चेहरे हैं
जहां सख़्त आयत
सपना देखते दृष्टिकोण की सरहद तक पहुंचते है
जहां सतहों के एक शान्त खेत पर बहती है
एक आभूषण की वजह से जगी एक धारा
गति मिलती है स्थिरता से एक रेखा मिलती है एक पुकार से
कांपती अनिश्चितता सादगीभरी स्पष्टता
तुम हो वहां
वास्तुशिल्प
पत्थर और फ़न्तासी का कारनामा
तुम वहां निवास करते हो सौन्दर्य
एक मेहराब के ऊपर
एक आह जितने हल्के
एक दीवार पर
ऊंचाई के कारण ज़र्द
और एक खिड़की
कांच के एक चौखट के साथ आंसूभरे
स्पष्ट आकृतियों से आए एक भगौड़े
मैं तारीफ़ करता हूं तुम्हारे गतिहीन नृत्य की
वास्तुशिल्प
एक कोमल मेहराब के ऊपर -
पत्थर की एक भौंह -
एक दीवार के
सुस्थिर माथे पर
प्रसन्न खुली खिड़कियों में
जहां जिरेनियम के बदले चेहरे हैं
जहां सख़्त आयत
सपना देखते दृष्टिकोण की सरहद तक पहुंचते है
जहां सतहों के एक शान्त खेत पर बहती है
एक आभूषण की वजह से जगी एक धारा
गति मिलती है स्थिरता से एक रेखा मिलती है एक पुकार से
कांपती अनिश्चितता सादगीभरी स्पष्टता
तुम हो वहां
वास्तुशिल्प
पत्थर और फ़न्तासी का कारनामा
तुम वहां निवास करते हो सौन्दर्य
एक मेहराब के ऊपर
एक आह जितने हल्के
एक दीवार पर
ऊंचाई के कारण ज़र्द
और एक खिड़की
कांच के एक चौखट के साथ आंसूभरे
स्पष्ट आकृतियों से आए एक भगौड़े
मैं तारीफ़ करता हूं तुम्हारे गतिहीन नृत्य की
धरती के मौसमो, युवा रहो सदा
चेस्वाव मीवोश की एक कविता:
खिड़की
भोर के वक़्त मैंने खिड़की से बाहर निगाह डाली और सेब का एक युवा पेड़ देखा
अपनी चमक में पारदर्शी.
और जब मैंने दोबारा बाहर निगाह डाली भोर पर, फलों से लदा सेब का एक पेड़
वहां खड़ा था.
शायद कई साल बीते होंगे पर मुझे ज़रा भी याद नहीं
क्या घटा था मेरी नींद में.
सर्दियां.
कलिफ़ोर्निया की सर्दियों की तीखी गन्धें,
सलेटीपन और ग़ुलाबीपन, एक तकरीबन पारदर्शी पूरा चन्द्रमा.
मैं आग में लकड़ियां डालता हूं, मैं पीता हूं और सोचता हूं.
"इवावा में" एक समाचार बताता है "सत्तर की आयु में
कवि अलेक्सान्दर रिम्कीएविक्ज़ की मृत्यु."
वह सबसे युवा था हमारे समूह में. मैंने उसे थोड़ा संरक्षण दिया था
ठीक जिस तरह मैं दूसरों को दिया करता था उनके लघुतर मस्तिष्कों के कारण.
अलबत्ता उनमें कई सदगुण थे जिन्हें मैं छू तक नहीं सकता था.
और अब मैं यहां हूं, शताब्दी के और अपने
अन्त तक पहुंचता हुआ. अपनी शक्ति पर गर्वित
अलबत्ता दृश्य की प्रांजलता से तनिक शर्मिन्दा.
रक्त में मिले हुए अवां-गार्द.
कल्पनातीत कलाओं की राख़.
कोलाहलों का एक संकलन.
मैंने इस पर अपना फैसला तय किया. अलबत्ता जांचा अपने आप को भी.
यह सदाचारी और भले लोगों का समय नहीं रहा है.
मैं जानता हूं कैसा होता है दैत्यों को जन्म देना
और उनमें पहचानना अपने आप को.
तुम, चन्द्रमा. तुम, अलेक्सान्दर, देवदार के लठ्ठों की आग.
पानी घेर रहे हैं हमें, एक नाम की मियाद होती है बस एक पल.
यह महत्वपूर्ण नहीं कि पीढ़ियां हमें अपनी स्मृति में धारण करेंगी या नहीं.
दुनिया के अप्राप्य अर्थ की खोज में शिकारी कुत्तों के साथ
बढ़िया था वह पीछा करना.
और अब मैं तैयार हूं भागते रहने को
जब सूरज उगेगा मृत्यु की सरहदों के उस पार.
मैं अभी से देख पा रहा हूं एक दिव्य वन में पर्वतश्रृंखलाएं
जहां, हर तत्व के परे, प्रतीक्षा करता है एक नया तत्व.
तुम, मेरे बाद के वर्षों के संगीत, मुझे
बुला रहे हैं एक आवाज़ और एक रंग जो और भी ज़्यादा सम्पूर्ण.
बुझो मत, आग. मेरे सपनों में चले आओ, प्रेम.
धरती के मौसमो, युवा रहो सदा.
खिड़की
भोर के वक़्त मैंने खिड़की से बाहर निगाह डाली और सेब का एक युवा पेड़ देखा
अपनी चमक में पारदर्शी.
और जब मैंने दोबारा बाहर निगाह डाली भोर पर, फलों से लदा सेब का एक पेड़
वहां खड़ा था.
शायद कई साल बीते होंगे पर मुझे ज़रा भी याद नहीं
क्या घटा था मेरी नींद में.
सर्दियां.
कलिफ़ोर्निया की सर्दियों की तीखी गन्धें,
सलेटीपन और ग़ुलाबीपन, एक तकरीबन पारदर्शी पूरा चन्द्रमा.
मैं आग में लकड़ियां डालता हूं, मैं पीता हूं और सोचता हूं.
"इवावा में" एक समाचार बताता है "सत्तर की आयु में
कवि अलेक्सान्दर रिम्कीएविक्ज़ की मृत्यु."
वह सबसे युवा था हमारे समूह में. मैंने उसे थोड़ा संरक्षण दिया था
ठीक जिस तरह मैं दूसरों को दिया करता था उनके लघुतर मस्तिष्कों के कारण.
अलबत्ता उनमें कई सदगुण थे जिन्हें मैं छू तक नहीं सकता था.
और अब मैं यहां हूं, शताब्दी के और अपने
अन्त तक पहुंचता हुआ. अपनी शक्ति पर गर्वित
अलबत्ता दृश्य की प्रांजलता से तनिक शर्मिन्दा.
रक्त में मिले हुए अवां-गार्द.
कल्पनातीत कलाओं की राख़.
कोलाहलों का एक संकलन.
मैंने इस पर अपना फैसला तय किया. अलबत्ता जांचा अपने आप को भी.
यह सदाचारी और भले लोगों का समय नहीं रहा है.
मैं जानता हूं कैसा होता है दैत्यों को जन्म देना
और उनमें पहचानना अपने आप को.
तुम, चन्द्रमा. तुम, अलेक्सान्दर, देवदार के लठ्ठों की आग.
पानी घेर रहे हैं हमें, एक नाम की मियाद होती है बस एक पल.
यह महत्वपूर्ण नहीं कि पीढ़ियां हमें अपनी स्मृति में धारण करेंगी या नहीं.
दुनिया के अप्राप्य अर्थ की खोज में शिकारी कुत्तों के साथ
बढ़िया था वह पीछा करना.
और अब मैं तैयार हूं भागते रहने को
जब सूरज उगेगा मृत्यु की सरहदों के उस पार.
मैं अभी से देख पा रहा हूं एक दिव्य वन में पर्वतश्रृंखलाएं
जहां, हर तत्व के परे, प्रतीक्षा करता है एक नया तत्व.
तुम, मेरे बाद के वर्षों के संगीत, मुझे
बुला रहे हैं एक आवाज़ और एक रंग जो और भी ज़्यादा सम्पूर्ण.
बुझो मत, आग. मेरे सपनों में चले आओ, प्रेम.
धरती के मौसमो, युवा रहो सदा.
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