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Tuesday, May 31, 2011

चित्रकार का संसार अच्छा होता है

ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त की कविता


जब ईश्वर ने संसार बनाया
उसने शिकन डाली अपनी भौंहों पर
हिसाब लगाया हिसाब लगाया हिसाब लगाया
यही वजह है कि दुनिया निर्दोष है
और रहने लायक नहीं

इसके बजाय चित्रकार का संसार
अच्छा होता है
ग़लतियों से भरा हुआ
आंख जाती है
एक रंग से दूसरे तक
एक फल से दूसरे तक
बुदबुदाती है आंख
आंख मुस्कराती है
याद रखती है

आंख कहती है इसे सहा जा सकता है
अगर इसके भीतर
जाया जा सकता तो
जहां चित्रकार था
बिना पंखों के
खटारा चप्पलों में
"वर्जिल" के बिना
जेब में धरे बिल्ली
एक दयालु फ़न्तासी
और एक हाथ
जो बिना जाने
सही बनाता है दुनिया को.

Monday, May 30, 2011

कंकड़

कंकड़

ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त

एक दोषरहित जीव होता है

अपने ही जितना
अपनी सीमाओं को जानने वाला

उसकी गन्ध किसी भी चीज़ की याद नहीं दिलाती
वह डराता नहीं न इच्छा को जन्म देता है

उसकी ललक और ठण्डापन
न्यायसंगत और गरिमापूरित होते हैं

जब मैं उसे थामता हूं अपने हाथ में
मुझे महसूस होता है एक भारी पछतावा
और उसकी शरीफ़ देह
व्यापती है झूठी ऊष्मा से

-पालतू नहीं बनाए जा सकते कंकड़
आख़िर में वे देखेंगे हमें
एक स्थिर और बेहद साफ़ निगाह के साथ.

Sunday, May 29, 2011

एक गीत ताकि नष्ट न हों हम


एक गीत ताकि नष्ट न हों हम

ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त

वे जो समुद्री यात्रा पर निकले भोर के वक्त
लेकिन जो लौटेंगे नहीं कभी
वे छोड़ गए अपने निशान एक लहर पर -

एक सीप गिरी समुद्र के तल में
पत्थर में बदल गए होंठों जैसी सुन्दर

वे जो चले एक रेतीली सड़क पर
लेकिन नहीं पहुंच सके किवाड़दार खिड़कियों तक
अलबत्ता उन्होंने तब तक देख लिया था छत को -

उन्हें शरण मिल चुकी है हवा की एक घंटी के भीतर

लेकिन वे जो अपने पीछे छोड़ जाते हैं फ़कत
चन्द किताबों से ठण्डा पड़ गया एक कमरा
एक खाली दवात और सफ़ेद काग़ज़

वास्तव में वे पूरी तरह नहीं मरे हैं
उनकी फुसफुसाहट सफ़र करती है वॉलपेपर के झुरमुट के पार
उनका ऊंचा सिर अब भी रहता है छत पर

हवा से बना हुआ था उनका स्वर्ग
और पानी चूने और मिट्टी से, हवा का एक फ़रिश्ता
अपने हाथों चूरचूर करेगा शरीर को
उन लोगों को
ले जाया जाएगा इस संसार के चरागाहों से ऊपर से.

Saturday, May 28, 2011

ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त की सलाहें


१. जब दिमाग़ आपको दग़ा देने लगे, अपना हौसला बनाए रखो. आख़िर में सिर्फ़ यही महत्वपूर्ण होता है.

२. एक शिल्पी ने क्रूरता की गहराई तक जा कर जांच करनी चाहिए.

३. जंगलों में आग लगी हो तो आपको ग़ुलाबों के लिए अफ़सोस नहीं करना चाहिए.

सचमुच किसी भी और देश से बेहतर है जीना स्वर्ग में


स्वर्ग से रपट

ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त

स्वर्ग में हफ़्ते में तीस घन्टे नियत हैं काम के
तन्ख़्वाहें ऊंची हैं कीमतें लगातार घटती जाती हैं
शारीरिक श्रम थकाता नहीं (कम गुरुत्व के कारण)
लकड़ी फाड़ने में टाइप करने से ज़्यादा मेहनत नहीं लगती
सामाजिक पद्धति सुस्थिर है और बुद्धिमान हैं शासक
सचमुच किसी भी और देश से बेहतर है जीना स्वर्ग में

शुरू में इसे फ़र्क होना था
चमकीले आभामण्डल और अमूर्तन के स्तर
लेकिन वे ठीकठीक अलग नहीं कर सके
आत्मा को उसके शरीर से सो वह यहां पहुंची
चर्बी की एक बूंद और मांसपेशी के एक धागे के साथ
ज़रूरी था इसके परिणामों से रू-ब-रू होना
परम के एक कण में मिलाना मिट्टी का एक कण
सिद्धान्त से एक और प्रस्थान, आख़िरी प्रस्थान
जिसे सिर्फ़ जॉन ने पहले देख लिया था - देह में ही होगा तुम्हारा मोक्ष

बहुत कम लोग ईश्वर को देख पाते हैं
वह उन लोगों के लिए है जिनमें १०० फ़ीसदी आत्मा होती है
बाकी लोग सुनते हैं चमत्कारों और बाढ़ों के बारे में विज्ञप्तियों को
किसी दिन हर कोई देखेगा ईश्वर को
ऐसा कब होगा कोई नहीं जानता

फ़िलहाल हर शनिवार दोपहर को
मिठास के साथ बजते हैं साइरन
और फ़ैक्ट्रियों से पहुंचते हैं दिव्य श्रमिकों तक
अपनी बांहों के नीचे अटपटे ढंग से दबाए वे लादे चलते हैं अपने पंख वायोलिनों की तरह.

Friday, May 27, 2011

ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त की दो और कविताएं


१. पागल औरत

उसकी जलती निगाह मुझे किसी आलिंगन की तरह बांधे रहती है.
वह सपनों में मिलाए हुए शब्द बड़बड़ा रही है.
वह मुझे पास बुलाती है.
तुम ख़ुश होओगे अगर तुम यक़ीन करोगे
और हांक ले जाओगे अपनी गाड़ी को एक सितारे तलक.
बादलों को अपना दूध पिलाते समय वह भली होती है;
लेकिन जब शान्ति उसे छोड़कर चली जाती है,
वह समुन्दर किनारे भागा करती है
और हवा में लहराती है अपनी बांहें.

उसकी आंखों में प्रतिविम्बित होते मुझे दिखाई पड़ते हैं दो फ़रिश्ते -
उड़ी रंगत वाला, अनिष्टकारी फ़रिश्ता विडम्बना का,
प्रेम करने वाला स्कित्ज़ोफ्रेनिया का फ़रिश्ता.

२. नन्हा क़स्बा

दिन के वक़्त फल होते हैं और समुन्दर,
रात के वक़्त सितारे और समुन्दर.
दि फ़ियोरी स्ट्रीट चेरी के रंगों का एक शंकु है.
दोपहर.
हरी छायादार जगहों पर अपनी सफ़ेद छड़ी पटकता है सूरज.
सदाबहार के एक बग़ीचे में बैल गाते हैं छायाओं के लिए एक गीत. उ
स पल मैंने फ़ैसला किया था अपने प्यार का इज़हार करने का.
समुन्दर थामे रहता है अपनी शान्ति
और नन्हा क़स्बा फूलता जाता है अंजीर बेच रही लड़की की छाती की तरह.

ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त की कविता

पोलिश कवि ज़्बिग्नियू हेर्बेर्त (29 अक्टूबर 1924 – 28 जुलाई 1998) एक पिछली सदी के बड़े कवि, निबन्धकार और नाटककार थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे ज़्यादा अनूदित किए गए ज़्बिग्न्यू हेर्बेर्त की औपचारिक शिक्षा अर्थशास्त्र और कानून में हुई थी. १९८६ में वे पेरिस चले गए जहां उन्होंने एक पत्रिका के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया. वे १९९२ में वापस पोलैण्ड आए. उनकी मृत्यु के दस साल बाद पोलिश सरकार ने निर्णय लिया कि सन २००८ को ज़्बिग्न्यू हेर्बेर्त के वर्ष के तौर पर मनाया जाएगा. उनकी एक कविता -


वास्तुशिल्प

एक कोमल मेहराब के ऊपर -
पत्थर की एक भौंह -

एक दीवार के
सुस्थिर माथे पर

प्रसन्न खुली खिड़कियों में
जहां जिरेनियम के बदले चेहरे हैं

जहां सख़्त आयत
सपना देखते दृष्टिकोण की सरहद तक पहुंचते है

जहां सतहों के एक शान्त खेत पर बहती है
एक आभूषण की वजह से जगी एक धारा

गति मिलती है स्थिरता से एक रेखा मिलती है एक पुकार से
कांपती अनिश्चितता सादगीभरी स्पष्टता

तुम हो वहां
वास्तुशिल्प
पत्थर और फ़न्तासी का कारनामा

तुम वहां निवास करते हो सौन्दर्य
एक मेहराब के ऊपर
एक आह जितने हल्के

एक दीवार पर
ऊंचाई के कारण ज़र्द

और एक खिड़की
कांच के एक चौखट के साथ आंसूभरे

स्पष्ट आकृतियों से आए एक भगौड़े
मैं तारीफ़ करता हूं तुम्हारे गतिहीन नृत्य की