Monday, June 20, 2011

ऐ इश्क हम तो अब तेरे क़ाबिल नहीं रहे

आज फिर आबिदा :







कुछ इस अदा से आज वो पहलूनशीं रहे 
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे 
या-रब किसी की राज़-ए-मुहब्बत की ख़ैर हो 
दस्त ए जुनूँ रहे न रहे आस्तीं रहे 
दर्द-ए-ग़म-ए-फ़िराक के ये सख्त मरहले
हैराँ हूँ मैं के फिर भी तुम इतने हसीं रहे 
जा और कोई ज़ब्त की दुनिया तलाश कर 
ऐ इश्क हम तो अब तेरे क़ाबिल नहीं रहे 
अल्लाह रे चश्म-ए-यार की मौजिज़ बयानियाँ 
हर इक को है गुमाँ के मुख़ातिब हमी रहे
इस इश्क की तलाफ़ी ए माफ़ात देखना 
रोने की हसरतें हैं जब आंसू नहीं रहे 

Sunday, June 19, 2011

उसने जब कहा...

यह साल मजाज की भी जन्मशती है...उस आवारा शायर की जिसने हुस्नो इश्क के साथ इन्कलाब के भी गीत गाये...जिसने सबका तो इलाज किया बार खुद अपना इलाज न कर सका...शराब ने लील लिया उसे...लेकिन क्या सिर्फ शराब ने? सच तो यह है कि हम अपने शायरों की कद्र ही नहीं जानते......फैज़ अहमद फैज़ उनके बारे में लिखते हैं- "मजाज़ की इन्कलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है. आम इंकलाबी शायर इन्कलाब को लेकर गरजते हैं,सीना कूटते हैं इन्कलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते. वे इन्कलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते." वह पहचानता था...इससे ज्यादा क्या लिखूं उस पर ... बस उसकी कुछ नज्में...कुछ गजलें पेश कर रहा हूँ...

१-उसने जब कहा मुझसे गीत एक सुना दो ना

उसने जब कहा मुझसे गीत एक सुना दो ना
सर्द है फिजा दिल की, आग तुम लगा दो ना

क्या हसीं तेवर थे, क्या लतीफ लहजा था
आरजू थी हसरत थी हुक्म था तकाजा था

गुनगुना के मस्ती में साज़ ले लिया मैं ने
छेड़ ही दिया आख़िर नगमा-ऐ-वफ़ा मैंने

यास का धुवां उठा हर नवा-ऐ-खस्ता से
आह की सदा निकली बरबत-ऐ-शिकस्ता से

२- अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?
अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?

मैने माना के तुम इक पैकर-ए-रानाई हो
चमन-ए-दहर में रूह-ए-चमन आराई हो
तलत-ए-मेहर हो फ़िरदौस की बरनाई हो
बिन्त-ए-महताब हो गर्दूं से उतर आई हो
मुझसे मिलने में अब अंदेशा-ए-रुसवाई है
मैने खुद अपने किये की ये सज़ा पाई है
ख़ाक में आह मिलाई है जवानी मैने
शोलाज़ारों में जलाई है जवानी मैने
शहर-ए-ख़ूबां में गंवाई है जवानी मैने
ख़्वाबगाहों में गंवाई है जवानी मैने
हुस्न ने जब भी इनायत की नज़र ड़ाली है
मेरे पैमान-ए-मोहब्बत ने सिपर ड़ाली है
उन दिनों मुझ पे क़यामत का जुनूं तारी था
सर पे सरशरी-ओ-इशरत का जुनूं तारी था
माहपारों से मोहब्बत का जुनूं तारी था
शहरयारों से रक़ाबत का जुनूं तारी था
एक बिस्तर-ए-मखमल-ओ-संजाब थी दुनिया मेरी
एक रंगीन-ओ-हसीं ख्वाब थी दुनिया मेरी
क्या सुनोगी मेरी मजरूह जवानी की पुकार
मेरी फ़रियाद-ए-जिगरदोज़ मेरा नाला-ए-ज़ार
शिद्दत-ए-कर्ब में ड़ूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मै के खुद अपने मज़ाक़-ए-तरब आगीं का शिकार
वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहां से लाऊँ
अब मै वो जज़्बा-ए-मासूम कहां से लाऊँ

३-जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
मगर वो आज भी बर्हम नहीं है

बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना,
तेरी ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म नहीं है

बहुत कुछ और भी है जहाँ में,
ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है

मेरी बर्बादियों के हम्नशिनों,
तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है

अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं,
अभी तो आँख भी पुर्नम नहीं है

'मज़ाज़' एक बादाकश तो है यक़ीनन,
जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है

४- ख्वाबे सहर
मेहर सदियों से चमकता ही रहा अफलाक पर,
रात ही तारी रही इंसान की अदराक पर।
अक्ल के मैदान में जुल्मत का डेरा ही रहा,
दिल में तारिकी दिमागों में अंधेरा ही रहा।
आसमानों से फरिश्ते भी उतरते ही रहे,
नेक बंदे भी खुदा का काम करते ही रहे।
इब्ने मरियम भी उठे मूसाए उमराँ भी उठे,
राम व गौतम भी उठे, फिरऔन व हामॉ भी उठे।
मस्जिदों में मौलवी खुतवे सुनाते ही रहे,
मन्दिरों में बरहमन श्लोक गाते ही रहे।
एक न एक दर पर जबींए शौक घिसटती ही रही,
आदमियत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही।
रहबरी जारी रही, पैगम्बरी जारी रही,
दीन के परदे में, जंगे जरगरी जारी रही।
अहले बातिन इल्म के सीनों को गरमाते ही रहे,
जहल के तारीक साये हाथ फैलाते ही रहे।
जहने इंसानी ने अब, औहाम के जुल्मान में,
जिंदगी की सख्त तूफानी अंधेरी रात में।
कुछ नहीं तो कम से कम ख्वाबे सहर देखा तो है,
जिस तरफ देखा न था अब तक उधर देखा तो है।


Friday, June 17, 2011

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा


खिचड़ी विप्लव देखा हमने

बाबा नागार्जुन

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात

सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है

वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक

लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!

Thursday, June 16, 2011

रोहित उमराव के कैमरे से चन्द्रग्रहण

कल रात/ आज सुबह हुए दुर्लभ चन्द्रग्रहण की विभिन्न छवियों को अपने कैमरे में कैद किया है कबाड़ी रोहित उमराव ने.


*फ़ोटो पर क्लिक कर बड़े आकार में देखें.

Tuesday, June 14, 2011

हम भारत के लोग और हमारा एक नागरिक हुसैन

मेरी कतिपय व्यक्तिगत समस्याओं के कारण भाई शिवप्रसाद जोशी द्वारा भेजा गया यह आलेख मैं थोड़ी देर से लगा रहा हूं. उस के लिए क्षमाप्रार्थी हूं.


एक नागरिक हुसैन
-शिवप्रसाद जोशी

दिल्ली में बहुत साल पहले हुसैन अपनी कोयला सीरिज की पेंटिग्स लेकर आए थे. कोयला बंबई की मसाला फिल्म थी जिसके नायक शाहरूख खान और नायिका माधुरी दीक्षित थी. माधुरी को उस दौरान हुसैन पेंटिग्स में ला रहे थे. कोयला फिल्म से भी उन्होंने इंप्रेशन उतारे थे. मीडिया के लिए ये दिलचस्प घटना थी. धडाधड कवरेज हो रही थी. उसी दौरान हुसैन से बातचीत का मौका मिला जी न्यूज के लिए. हुसैन का अपना एक ठाठ था. वो उस पांचसितारा होटल में पांव पर पांव रखे बैठे थे. अपने चिरपरिचित अंदाज में. कला पर मेरे कुछ सवालों के अटपटेपन पर उन्होंने लगभग डपटते हुए कहा था कि पेंटिग्स को और ध्यान से देखो सीखो. हालांकि वे पेंटिग्स पॉप्युलर खांचे की थीं पर हुसैन की वो छवि दिमाग से नहीं जाती. वो एक ऐसे देहाती लगते थे एक ऐसे हलवाहे जिसे कह दिया गया हो कि ये महंगी पोशाक पहनो ये महंगी कार रखो ये महंगा साजोसामान रखो और लंबे बालों नंगे पांवों एक लंबी कूची के साथ टहलो और स्टाइलिश बन जाओ.

हुसैन की पर्सनैलिटी का ये ठेठ ग्राम्य शेड ही होगा कि कूची भी उनके हाथ में खेतीबाडी के किसी औजार की तरह लगती थी. उनके हाथ लंबे फैले हुए और रूखे से थे, नसें उभरी हुई थीं और उन्हें देखकर लगता था कि जैसे वो भी कोई लैंडस्केप का टुकडा हो. उनमें एक अटपटापन था एक ऊबडखाबड टैक्सचर एक टेढामेढापन.

वे ऐसी किसानी धज और काया वाले हुसैन 21वीं सदी के मध्य के दशकों में देश से दूर कर दिए गए और कतर की नागरिकता लेने के लिए विवश किए गए, हिन्दुस्तान लौटना चाहते रहे पर मजहबी हुडदंगियों और धर्म और निंदा से भय खाते रहने वालों की एक भरीपूरी बिरादरी की अश्लीलता ने ये मुराद पूरी न होने दी. बाबाओं और ध्वज पताकाओं और विजय जुलूसों, ललकारों, बात बात पर गांधी और भगत सिंह के नामों को फुलाते हुंकारों, इधर न जाने मध्यवर्गीय नाकारापन के किस कोने से उठीं और एक झटके में सिविल सोसायटी कहलाई जा रही गदगद जमातों, नकली किस्म के अनशनों, नाना किस्म की प्रेस कॉफ्रेंसों भगवा और न जाने कौन से साजिश भरे रंगों से लोटती पोटती घबराती उखडती सरकारों उनके नुमायंदों सौदेबाज गुटों नक्कालों की रंगीनियों और रंगबाजियों के बीच सहसा तमाम रंगों से ऊपर उठता हुआ एक रंग फनां हो गया. एक कोने पर हुसैन के छाते रखे हुए हैं. उन्हें खोलने की अब जुर्रत भी न होगी किसी की. सारे रंग उन छातों ने सोख लिए हैं.


हुसैन बाहर नहीं रहना चाहते थे. उनकी जिंदगी थ्रू द आईज ऑफ पेंटर सरीखी थी जो उनकी एक फिल्म का नाम है. 1967 में बनी इस फिल्म को बर्लिन फिल्मोत्सव में गोल्डन बियर अवार्ड मिला था. कतर की नागरिकता लेकर रहने भले लगे थे लेकिन वे एक जगह रहते कहां थे. पर उनका मन देश पर अटका हुआ था. देश के लिए उनकी तडप उनकी वेदना ने उन्हें कमजोर करना शुरू कर दिया था. वो हैरान थे कि आखिर उनके और उनकी कला के बीच में कहां से आ गए वे लोग कौन हैं जो तय करने लगते थे कि कौन देश में रहेगा कौन नहीं. वे हैरान थे कि उन्हें किस आसानी से, किस सामरिक खुराफात के साथ बाहर ठेल दिया गया.
हुसैन के अभिनेत्री प्रेम और पेंटिग्स की चर्चा और विवाद तो खूब चटखारेदार शोरशराबे और हिंसक ढंग से होते रहे हैं लेकिन उनकी रचनाशीलता की वास्तविकता से परहेज करने की टेंडेंसी बनी रही है. ये जानने की कोशिश कोई नहीं करता कि कैसे हुसैन ने राममनोहर लोहिया के सुझाव पर रामायण सीरीज की पेंटिग्स बनाई थीं. उनकी कला के संरक्षक बद्री विशाल पित्ती के बारे में कितने लोग जानते हैं. कैसे उनकी कुछ पेंटिग्स विश्व कला में धरोहर जैसी हैं. कैसे वो अकेले भारतीय पेंटर हैं जिनकी कला में समूची भारतीयता, समूची भारतीय आत्मा रचीबसी है. आखिर इस बात पर कोई चर्चा क्यों नहीं होती कि हुसैन क्योंकर समस्त भारतीयता को उकेरने वाले सबसे अग्रणी चित्रकार हैं. सबसे आगे और हमेशा. वैसा कोई और हो नहीं सकता. हुसैन के लिए देश में रहना दूभर कर दिया गया था और देश से बाहर रहना उनके लिए दूभर था. वो गांव देहात के बेटे थे. उनकी कला इस देश की मिट्टी और तहजीब में घुली मिली थी. हिंदू हिंदू चिल्लाने वाली जमात क्या अब अपने कपडे फाडेगी कि हुसैन वहीं चले गए हैं जहां तमाम आराध्य रहते बताए जाते हैं.

नवउदारवाद के राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक जुनूनों के आगे नतमस्तक हो जाने वाली सरकारें हुसैन को देश वापस नहीं बुला पाईं. केंद्र सरकार की कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि हुसैन के खिलाफ जो अजीबोगरीब मुकदमे पूरे देश भर में न जाने कहां कहां दर्ज हैं उन्हें रद्द कराए, कोर्ट में दलीले दें और अपने सबसे बडे चित्रकार देश के सबसे बुजुर्ग रचनाधर्मी को मान सम्मान दे पाए. अब तो बहुत देर हो चुकी है. हुसैन के साथी, प्रशंसक, शिष्य एक ऐसे अचंभे में दिखते हैं जिसका कोई जवाब नहीं सूझता, जो सच्ची मार्मिक टिप्पणियां आई हैं वे ऐसी हैं कि आप उनमें रोने रोने को हो उठने की हिचकी बंधी हुई महसूस कर सकते हैं. एक ऐसी उमडघुमड से भरी हिचकी जिसमें उलझन आवेग रेला और एक खीझ है. इस मोमेंटम को समझना बहुत मुश्किल है.
अब जैसे ये लग रहा है सबको क्या उन्हीं की गलती थी कि हुसैन वापस नहीं बुलाए जा सके. क्या इस देश में ऐसी कोई विराट साहसी मांग न उठ सकती थी जो हुसैन को लौटा लाने में उत्प्रेरक होती. उनसे क्षमा मांग सकने का साहस होता. क्या जंतर मंतर और रामलीला मैदान हमारे समय की वास्तविक लडाइयां हैं. हुसैन पर हर तरह से हमला करने वालों की आत्मा में क्या नश्तर जैसा कुछ चुभता होगा. क्या रीढ की हड्डी पर कोई कंपकंपी कोई सिहरन पसीने की कोई बूंद गुजरी होगी. एक साल पहले फरवरी में कतर की नागरिकता लेने को विवश हुए थे हुसैन, और उन पर किस किस ढंग से फब्तियां नहीं कसी गईं. उनका कितना अपमान किया गया. उनके काम को कैसे कैसे कोणों से न उधेडा गया. हुसैन के राम सीता हनुमान को नोंचने की कोशिशें की गईं. उनकी रेखाओं की ज्यामिति को छिन्नभिन्न किया जाता रहा. उस कला के नाजुक कांच पर किस किसने न जाने कितनी बार पांव न रखे. वह न टूटा न दरका न मुडा न गिरा. वह बस चलता गया.

जाहिर है एक इंसान आखिर कितना झेल सकता है. हुसैन को आखिर देश से जाना पडा. और अब 96 साल के हुसैन की मौत क्या लगता है आपको एक उम्रदराज व्यक्ति की स्वाभाविक मौत है. या ये मौत के घेरे तक धकेल दिए जाने की एक अप्रत्यक्ष प्रक्रिया थी. हुसैन की तूफानी रचनाधर्मिता का रिकॉर्ड बताता है कि वो थके हुए नहीं थे, वे लगातार काम करते थे. 2006 से वो बाहर हैं. 2010 में औपचारिक रूप से दूसरे देश के भी नागरिक हो गए. इस एक साल में हुसैन घर लौटने की इच्छा से इतनी तीव्रता और उससे इतर न जाने कौन से गहरे गम और क्षोभ से भरे हुए थे कि इस बात की तस्दीक मशहूर पेंटर रामकुमार के बयान से की जा सकती है जो बीबीसी हिंदी में उन्होंने हुसैन के साथ अपनी एक बातचीत के हवाले से दिया है कि जब उन्होंने हुसैन से पूछा कि क्या आपका देश आने का मन नहीं करता तो हुसैन साहब ने कहा कि मेरा मन करता है कि मैं खिडकी से कूद कर मर जाऊं.
हुसैन मर गए हैं. कांग्रेस की अगुवाई वाली भारत सरकार के प्रधानमंत्री ने कह दिया है कि नेशन को लॉस हो गया है. बीजेपी में शामिल बंबइया फिल्मों का एक पूर्व अभिनेता अपनी गर्जना भरी आवाज में कहता है मकबूल फिदा ‘हसन’ रेरस्ट ऑफ रेयर स्पेशीज थे, दुर्लभतम आर्टिस्ट थे.


मौत के बाद के ढोल बजते रहेंगे. हम कभी शर्मिंदा नहीं होंगे. हम जो बातबेबात पर इकट्ठा हो जाते हैं. दांत भींच लेते हैं मारने दौड पडते हैं हम जो समाधिस्थलों पर रातों में प्रेतों की तरह नाचने लगते हैं हम जो नैतिकता और इंसाफ को अपने अपने तराजू पर तौलते हैं हम भारत के नागरिक जो अपने एक बुजुर्ग सह नागरिक की हिफाजत नहीं कर पाते हैं हम जो अपनी कला को कुचलते हैं हम जंतर मंतर जाने वाले हम रामलीला मैदान जाने वाले हम वोट देने वाले हम आतताइयों के खौफ से डर कर रह जाने वाले हम घुटनों के बल घिसटने पर कोई एतराज न करने वाले इन दिनों एक धंसे हुए वक्त में एक धंसती हुई जाती हुई जगह पर गिरते डगमगाते रहने वाले लोग हैं. हम आखिर ये कैसी हो गईं जिंदा कौमें हैं. हम कितना और नष्ट हो जाएंगें.

हम भारत के लोग.

नागार्जुन जन्मशती पर एक सूचना

Saturday, June 11, 2011

दीन वि तू ईमान वि तू

आज आबिदा परवीन | सुनिए और महसूस कीजिये | 





Friday, June 10, 2011

Wednesday, June 8, 2011

जानते क्या हो ?

बाबुषा कोहली कबाड़ खाना के गम्भीर पाठकों मे से एक हैं. आप लोगों ने यहाँ उन की महत्वपूर्ण टिप्पणियँ देखीं हैं. आज उन्हो ने मुझे अपने एक अद्भुत फेसबूक नोट पर टेग किया. वह नोट शेयर किए बिना नहीं रह सकता:

कहते हैं औस्पेंसकी तत्व-ज्ञान के बहुत निकट पहुँच गया था. उसके लिखे में अनहद के शब्द सुनायी पड़ते थे.पर कुछ बाक़ी था अब भी . गुरु की खोज में उसने दुनिया का हर कोना खंगाल डाला . गुरुओं की धरती भारत आ पहुंचा. दुनिया के कोने -कोने की खाक़ छान डाली ..पर गुरु कहीं मिलता ही न था . एक दिन जब वह थका -हारा हुआ मॉस्को के एक कॉफ़ी हाउस में पंहुचा.. तब उसे वो मिला जिसके लिए औस्पेंसकी दर-दर भटक रहा था.

गुर्जियफ़ !

गुर्जियफ़ की आँखें याद आयीं आपको ? कैसे कलेजा भेद देती हैं! मनुष्यता के इतिहास में हुए सबसे शक्तिशाली और सामर्थ्यवान पुरुषों में से एक है गुर्जियफ़ ... शक्तिशाली भुजाओं से नहीं! सामर्थ्यवान संपत्ति से नहीं! लेकिन बेहद शक्तिशाली और सामर्थ्यवान !

तो बस, उन कलेजा भेदने वाली आँखों ने औस्पेंसकी को भेद दिया! आर-पार!

औस्पेंसकी चकित ... सम्मोहित ... बौराया हुआ सा पहुँच गया गुर्जियफ़ के पास! उसकी खोज पूरी हो चुकी थी. वो आँखें उसके बदन में सूराख कर के उस पार निकल गयी थीं.

बहुत ताक़त लगाने पर ये भाव शब्द ले सके - "मैं औस्पेंसकी हूँ."

"ओह औस्पेंसकी. अ न्यू मॉडल ऑफ़ द यूनिवर्स वाला औस्पेंसकी! बहुत खूब औस्पेंसकी. तुमने गज़ब की किताब लिखी है. अद्भुत. बेहतरीन. मैं उस किताब का प्रशंसक हूँ."

गुर्जियफ़ की वाणी ही नहीं ... आँखें भी प्रशंसा से भरी हुयी थीं !

फिर गुर्जियफ़ धीरे से औस्पेंसकी के कान की तरफ बढ़ा और बोला - " वो सब तो ठीक है. पर ये तो बताओ, तुम जानते क्या हो? " औस्पेंसकी के पास इस प्रश्न का उत्तर न था . बात सही थी ... इतना लिख तो डाला था. पर जानता क्या था ? उफ्फ्फ्फ़ ... क्या बता दे...? क्या जानता है? कठिन प्रश्न! गुर्जियफ़ ने पुनः प्रश्न किया. औस्पेंसकी निरुत्तर! गुर्जियफ़ ने एक कागज़ उसकी तरफ बढ़ाया - " शायद , तुम बोलने में कठिनाई महसूस कर रहे हो. एक काम करो.जो भी जानते हो उसे लिख दो.' बड़ी देर तक औस्पेंसकी उस कागज़ को लिए खड़ा रहा. कहते हैं ... मॉस्को में हड्डियां गला देने वाली ठंड के दिन थे. औस्पेंसकी के माथे से पसीना चू रहा था .

राजा

सादिक राज्य के लोगों ने विद्रोह की आवाज उठाते हुए अपने राजा का महल घेर लिया | और वह अपने एक हाथ में अपना ताज और दूसरे हाथ में अपना राजदंड लेकर महल की सीढ़ियों से नीचे उतरा | उसकी प्रभावी मौजूदगी ने भीड़ को ख़ामोश कर दिया, और वह उनके सामने खड़ा हुआ और कहा, "साथियों, जो अब मेरी प्रजा नहीं रही, मैं अपना ताज और राजदंड आपको सौंपता हूँ | मैं अब आप लोगों में से एक बनकर रहूँगा | मैं भी एक आम आदमी हूँ, लेकिन एक आम आदमी की तरह मैं तुम्हारे साथ मिलकर काम करूँगा ताकि हमारी ये जमीन शायद और अच्छी बन जाए | राजा की कोई जरुरत नहीं है | आओ खेतों और अंगूर के बागों की तरफ चलें और मिलजुलकर काम करें | बस आप लोग मुझे बताएं कि किस खेत या किस बाग़ में मुझे जाना चाहिए | अब आप सब राजा हैं |"

और सारे लोग अचंभित हो गए, और मौन छा गया, क्योंकि वो राजा जिसे वे अपने असंतोष के लिए जिम्मेदार मानते थे अपना ताज और अपना राजदंड उन्हें सौंप रहा है और एक आम आदमी बन गया है |

तब हर एक अपने रास्ते चला गया, राजा किसी के साथ एक खेत की ओर चला गया |

लेकिन सादिक का राज्य बिना राजा के अच्छी तरक्की नहीं कर पाया, और असंतोष के बादल फिर से उनकी जमीन के ऊपर मंडराने लगे | लोग बाजारों में अक्सर ये कहकर अपना दुखड़ा रोया करते कि उनके पास एक राजा है राज्य करने के लिए | और बड़े बूढ़े और जवान सबने एक सुर में कहा , "हम अपना राजा बनायेंगे |"

और वे राजा को ढूँढने लगे और उसे एक खेत में मेहनत करते हुए पाया, और उन्होंने उसे उसकी गद्दी पर बिठाया, उसका ताज और उसका राजदंड उसे सौंप दिया | और उन्होंने कहा, "अब शक्ति और न्याय के साथ इस राज्य को चलाओ |"

और उसने कहा, "मैं वास्तव में पूरी शक्ति के साथ राज्य करूँगा, और स्वर्ग और दुनिया के भगवान् मुझे आशीर्वाद दें ताकि मैं न्याय के साथ राज्य कर सकूँ |"

अब, उसके सामने कुछ आदमी और औरतें आयीं और उन्होंने उससे एक व्यापारी की शिकायत की जिसने उनसे दुर्व्यवहार किया, और जिसके लिए वे महज एक ग़ुलाम थे |

और राजा ने तत्काल उस व्यापारी को अपने सामने बुलाया और कहा, "भगवान् के तराजू में एक आदमी की जिंदगी उतनी ही वजनदार है जितनी कि दूसरे की | और क्योंकि तुम उनकी जिंदगी का वजन नहीं जानते जो लोग तुम्हारे खेतों या तुम्हारे अंगूर के बागों में काम करते हैं, तुम इस राज्य से निकाले जाते हो, और तुम्हे हमेशा हमेशा के लिए ये राज्य छोड़ना होगा |"

अगले ही दिन और लोग राजा के पास आये और उसे पहाड़ों के दूसरी ओर रहने वाली एक जमींदार की निर्दयता के बारे में बताया, और कैसे उसने उन्हें उनके दुर्दिनों में ला पटका | उसी समय जमींदार को दरबार में लाया गया, और राजा ने उसे भी देशनिकाला दे दिया, कहा, "वो लोग जो हमारे खेतों को जोतते हैं और हमारे अंगूर के बागों की रक्षा करते हैं हम जोकि सिर्फ उनका अन्न खाते हैं, और उनके शराबखाने की वाइन पीते हैं से कहीं ज्यादा कुलीन हैं | और क्योंकि तुम यह नहीं जानते हो, तुम्हें यह भूमि छोडनी होगी और इस राज्य से कहीं दूर रहना होगा |"

तब कुछ आदमी और औरतें आयीं जिन्होंने कहा कि बिशप ने उनसे पत्थर उठवाए और उन्होंने बड़े गिरजाघर के लिए पत्थर ढोये, तब भी उसने उन्हें कुछ नहीं दिया, हालांकि वे जानते थे कि बिशप का संदूक सोने चांदी से भरा हुआ है, जिस समय वे खुद भूख से खाली थे |

और तब राजा ने बिशप को पेश होने को कहा, और जब बिशप आया, तो राजा ने उससे कहा, "जो सलीब तुम अपने सीने पे पहनते हो इसका मतलब दूसरों को जिंदगी देना होना चाहिए | लेकिन तुम उनकी जिंदगी ले रहे हो और उन्हें कुछ नहीं दे रहे हो | इसलिए तुम्हें इस राज्य को छोड़ना होगा और कभी वापस नहीं आना |"


इस तरह से हर दिन आदमी और औरतों का झुण्ड राजा के पास अपनी समस्या बताने आता था | और हर दिन कुछ अत्याचारियों को उस भूमि से बेदखल किया जाता |

और सादिक के लोग आश्चर्यचकित हुए, और उन्हें दिल में बेहद ख़ुशी हुई |

और एक दिन बड़े बूढ़े और जवान आये और उन्होंने राजा का महल घेर लिया और उसे पुकारने लगे | और वह नीचे उतरा हाथ में ताज और दूसरे हाथ में अपना राजदंड लेकर |

और वह उनसे बोला, अब, आप लोग मुझसे क्या चाहते हैं ? रुको, मैं तुम्हें वह वापस कर दूँ, जो तुमने मुझे सौंपा था |"

लेकिन वे लोग चिल्लाये, "नहीं, नहीं, आप ही हमारे यथोचित राजा हैं | आपने इस धरती को साँपों से खाली किया, और आपने ही सब भेड़ियों को खत्म किया | और हम यहाँ पर आपका स्वागत करते हैं तथा गीतों के जरिये आपका धन्यवाद करना चाहते हैं | आपका राजदंड हमेशा यश पाए, और आपका ताज़ हमेशा बना रहे |"

तब राजा ने कहा, "नहीं, मैं नहीं, आप लोग खुद ही राजा हैं | जब आप लोगों ने मुझे कमजोर और बुरा शासक समझा, तब आप लोग खुद ही कमजोर थे और बुरा शासन कर रहे थे | और अब क्योंकि तुम ऐसा चाह रहे हो इसलिए राज्य तरक्की कर रहा है | मैं सिर्फ आप लोगों के मन का एक विचार हूँ, और मेरा अस्तित्व आपके कर्म में निहित है | शासक जैसी कोई चीज नहीं होती | केवल शासित ही मौजूद होते हैं अपने आप पर शासन करने के लिए |" 

और राजा अपने ताज और अपने राजदंड के साथ दुबारा महल के अन्दर चला गया | और सभी बड़े बूढ़े और जवान अपने अपने रास्ते चले गए और वे सभी संतुष्ट थे |

और हर एक ने अपने आप को राजा महसूस किया जिसके एक हाथ में उसका ताज़ है और दूसरे हाथ में राजदंड |


[The Awakening by Jeana Marino ]

Saturday, June 4, 2011

तुर्की का सूफ़ी संगीत - १


कारवांसराय नाम से तुर्की सूफ़ी संगीत का सात अल्बम का एक संग्रह हाथ लगा है. सुनिये उससे एक कम्पोज़ीशन-

Wednesday, June 1, 2011

दूर दक्षिण से एक ताज़ातरीन गीत

कुछ समय पहले उरुमी नाम से एक मलयालम फ़िल्म बनी थी. खूब चर्चा में भी रही; सिर्फ केरल में ही नहीं बाहर भी. एक कारण तो यह कि अब तक की यह दूसरी सबसे महँगी मलयालम फ़िल्म थी और दूसरा यह कि इस फ़िल्म की कहानी एक प्रसिद्ध योद्धा पर आधारित है. हालाँकि केलु नामक इस नायक के बारे में ऐतिहासिक तथ्य मौजूद नहीं हैं किन्तु उसके अस्तित्व को नाकारा भी नहीं जा सकता. माना जाता रहा है कि केलु नयनार को अमरीका जैसी आफ़त खोजने वाले वास्को ड गामा की हत्या का काम सौंपा गया था. हत्या का कारण निश्चित ही अमरीका की खोज नहीं था. सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में वास्को ड गामा पुर्तगाल की ओर से पुर्तगाली आधिपत्य वाले भारतीय भूभाग के वायसराय थे.

संतोष सिवान का नाम हिंदी सिनेमावालों के लिए नया नहीं है. असोका जैसी बेवकूफ़ाना फ़िल्म बनाने वाले सिवान ने कुछ बेहतरीन फ़िल्में भी बनायीं हैं जैसे तहान. उरुमी भी उन्ही की फ़िल्म है और फ़िल्म के कुछ दृश्य देखने के बाद मैं कह सकता हूँ कि सिनेमाटोग्राफी के कमाल को नाकारा नहीं जा सकता. संतोष पेशे से सिनेमाटोग्राफर हैं और इस फ़िल्म में सिनेमाटोग्राफी भी उन्हीं की है.

जानता हूँ बात खिंचती जा रही है फिर भी एक बात और जोड़ना ज़रूरी लग रहा है. कुछ अरसा पहले मेरे एक मलयालम मित्र ने मुझसे पूछा कि हिंदी फ़िल्मों में पश्चिमी वाद्यों का इस्तेमाल इतना ज़्यादा क्यों होता है? उसके सवाल पूछने की वजह मुझे मालूम थी इसलिए मैं उसकी जिज्ञासा शांत कर सका. ऐसा नहीं कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में पश्चिमी वाद्यों का इस्तेमाल नहीं होता, मगर मलयालम सिनेमा मलयाली लोगों की ही तरह बाकी के दक्षिण भारतीय सिनेमा से कुछ हद तक अलग है. किसी भी वाद्य का इस्तेमाल हो मगर गीत सुनने में भारतीय ही लगता है. उरुमी फ़िल्म के कुछ गीत कर्णप्रिय हैं और मेरे ख़याल से ऐसा इसलिए है क्योंकि संतोष ने संगीतकार दीपक देव को पश्चिमी वाद्यों के इस्तेमाल से दूर रहने की हिदायत दी थी. इसका असर गानों में दीखता है और आपको लगेगा की आप वाकई सोलहवीं शताब्दी में बैठे ये गाने सुन रहे हैं. फ़िल्म के बाकी गीतों की बनिस्पत चिम्मी चिम्मी गीत ज़्यादा प्रसिद्ध हुआ है. इस फ़िल्म के संगीत की प्रसिद्धी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बंगलौर में जहाँ वैसे मलयाली गाने नहीं सुनाई देते, वहां भी चिम्मी चिम्मी यदा कदा सुनाई दे जाता है.

नीचे गीत का वीडियो लगा रहा हूँ जिससे सिनेमाटोग्राफी की भी थोड़ी झलक मिल जाये. साथ ही गीत के बोल भी. हिंदी तर्जुमे की उम्मीद इस ग़रीब के साथ ज्यादती होगी क्योंकि मलयालम को मैं भारत की सबसे ज़्यादा  विदेशी भाषा मानता हूँ. मेरे आधे से ज़्यादा सहकर्मी मलयाली हैं मगर कोई भी इस गीत का तर्जुमा करने को तैयार नहीं हुआ. ज़्यादातर लोग इस बारे में ही निश्चित नहीं थे कि गीत में चिम्मी चिम्मी कहा गया है या चिन्नी चिन्नी.


Chimmi chimmi minni thilangana
vaaroli kannanukk
poovarash pootha kanakkane
anjunna chelanakk..
nada nada annanada kanda theyyam mudiyazhakum
nokk vellikinnam thulli thulumbunna chele..
(chimmi chimmi)
kolathiri vazhunna nattile valiyakarenne
kandu kothikum
illatholloramba kore neram kandu kaliyakum
samothiri kolothe anunga
mullapoo vasana ettumayangum
valittenne kannezhuthikkan varmukilodivarum
poorampodi paariyittum poorakaliyaditum
nokkiyilla nee ennitum neeyenthe
(chimmi chimmi)
poovambante ola chuvachoru
karimpuvillathe padathalava
vaaleduth veeshalle njanath murikin poovakkum..hmm
allimalar kulakadavile ayaluthi pennunga kandupidikum
nattunadappothavar nammale kettunadappakum
enthellam paditum mindathe mindittum
mindiyilla nee ennitum neeyenthe