Tuesday, May 5, 2009

चप्पल पर भात

चप्पल पर भात

-वीरेन डंगवाल

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क़िस्सा यों हुआ
कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण
गिर गए थे
जो जल्दबाज़ी में दिखे नहीं.

फिर तो काफ़ी देर
तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट
चढ़ी रहीं
तमाम महान चिन्ताएं.

Monday, May 4, 2009

साथियो, बेटे का नाम रख दिया गया है

बात निजी है लेकिन फिर आसमान किसलिए है?... और मेरा निजी है ही क्या?
(गलाफाड़ आवाज़ में) साथियो, बेटे का नाम रख दिया गया है. ४ मई को वह २ माह का हो गया.

बेटी का नाम रखते समय मैंने ज्ञानरंजन जी से पूछा था. उन्होंने अपनी शैली में (जो लोग उनकी इस अद्भुत अदा को जानते हैं; उनके लिए) कहा था- 'विजय, जल्दी से बिटिया का कोई प्यारा-सा नाम रख लो वरना तरह-तरह के नाम चलने लगते हैं.'

उन्हीं दिनों कवि निलय उपाध्याय मुंबई आये थे. आजाद मैदान (तबके वीटी स्टेशन के सामने) की घास पर हम लोग लगभग लेटे हुए थे. चर्चा फंसी तो उन्होंने कहा कि उनके मन में एक नाम है अगर मैं पसंद करुँ! उन्होंने नाम सुझाया 'उदिता'. मैंने उनका शुक्रिया अदा करते हुए फ़ौरन स्वीकार कर लिया क्योंकि यह शमशेर जी की एक कविता और आगे को संग्रह का शीर्षक था. ख़ैर, वह आज से 14 वर्ष पहले की बात है.

गुजिस्ता २९ अप्रैल को मैं जबलपुर में था. वहाँ एक आत्मीय कार्यक्रम के दौरान नामकरण समारोह संपन्न हुआ. वहाँ भी नाम रखे जाने को लेकर बड़ी हील-हुज्जत हुई. आखिरकार मैं रूठ गया. चूँकि मामला दामाद जी का था इसलिए मेरी ही चली और मैंने नाम रखा- 'विश्वप्रिय'.

यह नाम सुनते ही करीब ४-५ सौ लोग मुझे बधाई देने दौड़ पड़े. ये सब मेरे ससुर जी के सहकर्मी, अफसरान, व्यौहारीजन, संबंधीजन थे. बड़ा जंका-मंका था.

पता चला कि प्रियजन मेरा रूठना देखना चाहते थे (शादी में दामाद जी घड़ी तक के लिए नहीं रूठे थे; कलेऊ में हमने चीलगाड़ी यानी हवाई जहाज माँगा था; वरना उन्होंने तो पहले ही तय कर रखा था कि नामकरण दामाद जी ही करेंगे और जो नाम वह रखेंगे वह सबको स्वीकार्य होगा).यह बाद को जाहिर हुआ. अब लो, सभी विश्वप्रिय बोलने का अभ्यास कर रहे हैं. उनकी सुविधा के लिए मैंने लाड़ का नाम 'विशु' रख दिया है.

उम्मीद ही नहीं यकीन है कि 'विश्वप्रिय' कबाड़ियों और अन्य आत्मीयों को पसंद आयेगा. आप सबके शुभासीष का एक अर्थ होगा.

ख़ता मु'आफ: टिप्पणियों में से एक टिप्पणी शिरीष के प्रसंग में मुझे बहुत नागवार गुज़री है उसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं. लोग चाहते हैं कि यह ब्लॉग भी उनकी तरह हो जाए! मुझपे अनेक वार करके अपना ब्लॉग कितने लोगों ने चमका लिया यह कोई छिपी बात नहीं. कृपया इस महत्वपूर्ण ब्लॉग को भाजपा की तरह दुष्प्रचार (हिटलर का सूक्त) करके अनर्गल न बनाएं. मेरे दादा जी कहते थे 'ह्वा परोसिन हमरी साही.'

शिरीष को मैं एक कवि के रूप में जानता हूँ. 'कबाड़खाना' से वह तभी हटेंगे जब वह कोई निजी कारण देंगे. अन्यथा शिरीष हम सबके चहेते हैं. वह कोई बटमारी या डाकाजनी नहीं करते. वह शब्दों की साधना में तल्लीन है. उन्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं.

...अब एक बात शिरीष के लिए, मुनीष की टिप्पणी में ऐसा कुछ भी नहीं था कि इतना बड़ा निर्णय लिया जाए. या तो आप उस समय उद्विग्न थे या कोई और कारण होगा. बहस की बात तो मैं कर सकता हूँ. लेकिन नशे में भी मैं कभी 'कबाड़खाना' से अलग होने की बात नहीं सोच पाया. इस ब्लॉग से जुड़कर कोई किसी पर अहसान नहीं कर रहा है. अशोक भाई पर तो हरगिज नहीं. एक सदस्य होने के नाते मैं फिर कहता हूँ कि मुनीष की टिप्पणी शिरीष आप फिर पढ़ें. और कोई वजह होने का अंदेशा शायद इसलिए नहीं है कि उसकी बाकायदा वजह आपने पोस्ट के तौर पर स्पष्ट छापी है... जो कहीं से कोई छोटी-मोटी वजह भी नहीं लगती. बहरहाल...

गाना नहीं सुन पा रहा हूँ!

देह महजिद मन मौलाना: कुमार गन्धर्व की आवाज़ में सन्त नामदेव का भजन


कल सिद्धेश्वर बाबू ने शुभा मुद्‌गल की मधुर वाणी में कबीरदास जी का एक भजन सुनवाया था. मैं चाहता था इसी श्रृंखला को जारी रखता हुआ कबीरदास जी का हॊ कोई और भजन आपको सुनवाऊं.

फिर जमा किये गए कबाड़ में खोजते बीनते निगाह एक भजन पर अटक गई. सो पहले वाला निश्चय बरकरार रखते हुए भी मैं पहले इसे पोस्ट कर पाने के लालच से नहीं बच सका.

सुनिये पंडित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में सन्त नामदेव का भजन "आव कलन्दर केशवा".



यहां से डाउनलोड करें: आव कलन्दर केशवा

(पंडितजी का चित्र: अनवर हुसैन की कलाकृति)

Sunday, May 3, 2009

सुर तैंतीसों कौतिग आए

चपन से ही कबीर की रचनाओं को पढ़ने - सुनने का क्रम जारी है और हमेशा लगता रहा है कि 'मसि कागद' न छूने वाला यह इंसान आम भाषा में कितना सटीक और हर लिहाज से मौजूं अभिव्यक्तियाँ कर गया है कि कुछ कहते नहीं बनता। कबीर और उनकी कविता पर इतना कुछ कहा जा चुका हि कि मेरे कहने का कोई नहीं रह जाता ।
आज कोई टीप-टिप्पणी न करते हुए बस कबीर का यह बहुश्रुत पद सुना जाय-

दुलहिनी गावहु मंगलचार.
हम घर आए हो राजा राम भरतार.

तन रति करि मैं मन रति करिहौं पंचतत्त बाराती
रामदेव मोहे पाहुनैं आए मैं जोबन मैंमाती
सरीर सरवर वेदी करिहौं ब्रह्मा वेद उचारैं
रामदेव संग भाँवर लेहौं धन -धन भाग हमार
दुलहिनी गावहु मंगलचार.

सुर तैंतीसों कौतिग आए मुनिवर सहस अठासी
कहै कबीर हम ब्याहि चले हैं, पुरुष एक अविनासी.....
दुलहिनी गावहु मंगलचार.
हम घर आए हो राजा राम भरतार.



रचना - कबीर
स्वर - शुभा मुदगल

Friday, May 1, 2009

सिकन्दर, जंगली मुर्गी का शिकार और एक नशीली पिकनिक - आखिरी हिस्सा

(पिछली पोस्ट से जारी)

किलबरी से एक किलोमीटर पहले नरदा बुरांश के एक पेड़ की छांह में लधरा हुआ था. पास पहुंचे तो देखा नरदा ने अपना पिठ्ठू तकिये जैसा बनाया हुआ था और बाकायदा ख़र्राटों की बहार छाई पड़ी थी. मैं और लल्तू दाज्यू भी वहीं बैठ गए. ढाई-तीन बज चुका था. हमें जगतदा और राजेशदा का इन्तज़ार करना ही श्रेयस्कर जान पड़ा ताकि आगामी कार्यक्रम को चॉक आउट किया जा सके.

करीब आधे घन्टे बाद खरामा खरामा डोलते, किसी बात पर ठठाकर हंसते दोनों का आगमन हुआ. राजेशदा का पीठ्ठू सबसे बड़ा था और संभवतः सबसे भारी भी क्योंकि ठोस और द्रव दोनों तरह की रसद उसमें लदी हुई थी. उन्होंने बेहोश सोये नरदा को देखा और हंसने के क्रम को जारी रखते हुए नरदा की पिछाड़ी पर लात लगाई. किसी दुस्वप्न से जैसा जागे नरदा ने "अबे इत्ती मत पिया करो सालो!" कहकर हमें हड़काया और चलने की हमारी रफ़्तार का मज़ाक बनाया. नरदा अपना पिठ्ठू थामकर उठने को हुआ तो नीचे बैठता हुआ जगतदा बोला कि किलबरी आ ही गया है ऐसी क्या जल्दी है. राजेशदा से बोतल निकालने को कहा गया और एक-एक शॉर्ट खींचा गया. मुझ नए नए शराबी की आंखें मुंद जैसी रही थीं और दाल-भात खाने की इच्छा हो रही थी. लेकिन मेरे वरिष्ठ साथी उतने ही ऊर्जावान लग रहे थे जैसे वे लगा करते थे.

बुरांश के पेड़ के नीचे दारूवन का निर्माणकार्य पूरा करने के उपरान्त करीब पन्द्रह मिनट में हम किलबरी डाकबंगले के भीतर थे. आलीशान ब्रिटिशकालीन बंगला जिसमें कभी जिम कॉर्बेट तक आकर रहा करते थे आज जगतदा जैसे शिकारी के नेतृत्व में आए कलाग्रस्त शराबियों की सोहबत पाकर अपने को धन्य समझ रहा होगा, ऐसा कुछ कहकर ललतू दाज्यू ने समां बांधने कि कोशिश की. हमने उन्हें बहुत तवक्को नहीं दी और अपने झोले-झिमटे नीचे धरे. चौकीदार ने चाय के बारे में पूछा तो जगतदा ने उसे प्यार से लताड़ा कि गुरू क्या हम यहां चाय पीने आए हैं. पानी, कांच के गिलास वगैरह मंगाए गए और चौकीदार को भुजिया इत्यादि तैयार करने का निर्देश देते हुए इत्तला दी गई कि हम लोग आधे घन्टे के भीतर शिकार पर निकलने वाले हैं. महौल बनाने में उस्तादी रखने वाले लल्तू दाज्यू ने इस बार अपने टू इन वन पर "आए कुछ अब्र कुछ शराब आए" लगाया तो जगतदा बोला कि यार लल्तू बैटरी खत्म हो जाएगी तो रात में दारू कैसे पिएंगे बिना म्यूज़िक के.

सभी ने इस बारे में हामी भरी तो टेप बन्द कर दिया गया. मैं अलबत्ता अब हैरत कर रहा था कि राजेशदा कितनी दारू लाया होगा और अगर शराब रात को पी जाएगी तो अब तक क्या किया गया और क्या किया जाने वाला है.

शिकार पर निकले तो नरदा के और मेरे पैर डगमग करने लगे थे. हमें चुपचाप पीछे आने का निर्देश देकर जगतदा बन्दूक थामे मुर्गियों की टोह ले रहे थे. चार-पांच बजे से करीब साढ़े छह बजे तक उन्होंने तीन जगह मुर्गियां देखकर फ़ायर किये पर कुछेक पंखों को छोड़कर हाथ कुछ नहीं आया. इस बीच राजेशदा और लल्तू दाज्यू ने भी हाथ आजमाए पर कुछ मिला नहीं. हल्का अंधेरा घिरने को हुआ तो जगतदा बोला कि छर्रे बहुत कम बचे हैं और अब डाकबंगले जाने में ही भलाई है. रात को आसानी से मुर्गियां मारी जा सकती हैं ऐसा उन्होंने किसी किताब में पढ़ रखा था.

डाकबंगले पहुंचकर और टुन्न होने की प्रक्रिया में इस बार चौकीदार को भी शरीक किया गया क्योंकि शिकार करने के उपरान्त उसी ने मुर्गियां छीलनी थीं और उन्हें पकाना भी था. चौकीदार अकेला रहता था और मुकेश के गानों का शौकीन था. जगतदा के टू इन वन की बैटरी घुस गई थी और तीन-चार पैग खेंच लेने के बाद चौकीदार ने "एक धनवान की बेटी ने निरधन का दामन छोड़ दिया" की कराहनुमा तान छेड़ी हुई थी.

समय बीतता जा रहा था. रात बाकायदा हो चुकी थी. डाकबंगले में लाइट नहीं थी पर चौकीदार ने दो पैट्रोमैक्स जलाकर अच्छी रोशनी कर दी थी. पहले तो सब ने जगत दा के असफल शिकार अभियान को लेकर उनकी खूब ऐसीतैसी की. जल्द ही महफ़िल अपने उरूज पर आ गई और मेरे वरिष्ठ पथप्रदर्शक ऐसी ऐसी बातों से माहौल को जमाए हुए थे कि भूख अब किसी ब्लैक होल में तब्दील होकर पेट के किसी गुप्त हिस्से में छुप चुकी थी. इन लोगों के अनुभव का संसार इस कदर भरपूर था कि मुझे उनसे ईर्ष्यापूर्ण मोहब्बत हो चुकी थी जो किसी चस्के की तरह आज तरह लगी हुई है.

खा़स 'पीने' के साथ के वास्ते लाया गया सामान अब राजेशदा के थैले से एक एक कर बाहर निकल रहा था. रेडीमेड कवाब, काजू, पिस्ते और पापड़ इत्यादि. इन्हें खाना शुरू किया तो मेरी भूख का दैत्य एक बार फिर बड़ा होना शुरू हो गया. गप्पों के बाद अब गायन का सत्र चालू हुआ. गायन के उपरान्त पुनः गप्पें और फिर वही रिपीट.

चौकीदार अब ऊंघ रहा था और नरदा ने सबको लातें रसीद करना चालू कर दिया था. जगतदा ने मुझसे मेरे अपेक्षाकृत ज़्यादा चुपचुप रहने का सबब पूछा तो मैंने भूख की बात बताई. भूख का नाम लेते ही सबकी भूख जाग गई. घड़ी साढ़े ग्यारह बजा रही थी. शिकार का कार्यक्रम रद्द करने में ही भलाई समझी गई क्योंकि किलबरी के आसपास का जंगल बाघों और भालुओं का घर भी हुआ करता था. चौकीदार को हिलाकर जगाया गया और खाने के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि उसके पास मुठ्ठी भर दाल के अलावा कुछ नहीं. जगतदा ने उससे कहा कि हमारे लाए चावल को मसालों और नमक के साथ उबाल दे. चौकीदार पता नहीं घाघ था या हमारा हितैषी. बोला:"नीचे झोपड़ी में शेरसिंह ने मुर्गे पाले हुए हैं. वो बेच देगा तो साब लोगों की दावत पूरी हो जाएगी."

"चलो" कहकर राजेशदा और जगतदा ने चौकीदार के साथ नीचे शेरसिंह की झोपड़ी का रुख़ किया. करीब बीस मिनट बाद जगतदा पैर बंधा हुआ एक आलीशान और तन्दुरुस्त मुर्गा थामे अन्दर घुसे. "जै हो!" कहते हुए लल्तू दाज्यू ने जगतदा के गले से लिपटकर मुर्गे का मुआयना किया. "बहुत हैल्दी है साला. दो किलो से कम तो मीट क्या ही निकलेगा."

"दो सौ रुपए ले लिये साले ने बेटा. अब कुछ माल तो निकलना ही चाहिये ना!" पीछे से आते राजेशदा बोले.

भोजन आ चुका था, यह तथ्य हमारी भूख को बैकग्राउन्ड में धकेलने को पर्याप्त था. जगतदा अपनी शिकार न कर पाने की शर्म से अभी तक उबर नहीं पाया था ऐसा लगा. उन्होंने और रम खेंची. हाहाहीही का सिलसिला जो फिर चालू हुआ तो समय को जैसे पंख लग गए. जगतदा अपने रंग में आ गया था और नाटकों के अपने डायलॉग्स बोलने लगा था. किसी ज़माने में जगतदा ने सिकन्दर का पार्ट खेला था. वह अक्सर रमातिरेक में इसी पारसी स्टाइल नाटक के अपने संवाद बोला करता था. इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का समय परम्परा से ही सोने से ठीक पहले का नियत था. जगतदा को दारू लग जाने का मतलब यह माना जाता था कि अब कोटा निबट गया और शरीफ़ लोगों की तरह जल्दी से खाना खा कर सो जाने का बखत आ चुका.

सिकन्दर के संवाद बोलते जगतदा अपनी रौ में आ गया था और हम बहुत ज़्यादा लुत्फ़ लूट रहे थे. इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का एक अहम हिस्सा यह होता था कि सामने वालों में से किसी एक ने पोरस बन जाना होता था और हां-हूं की टेक लगाते रहना होती थी. किलबरी के डाकबंगले में यह काम लल्तू दाज्यू ने सम्हाला हुआ था. लेकिन सुबह सात बजे से दारू पीते पीते उनका भूसा भर चुका था और हां-हूं करते किसी क्षण उनकी आंख लग गई.

मैं बीच बीच में एक निगाह उल्टा कर धरे गए पैर बंधे जीवित डिनर की तरफ़ डालकर यह जान गया था कि खाना तो अब कल सुबह ही मिलेगा. मुर्गा इस असुविधापूर्ण पोज़ीशन के बावजूद माहौल का मजा ले रहा लगता था. चौकीदार ने एक नींद निकाल ली थी और आंखें खोले वह यकीन करने का प्रयास कर रहा लगता था कि ये जीवित दैत्य भी इसी धरती के बाशिन्दे हैं.

लल्तू दाज्यू के इस तरह सो चुकने को संभवतः जगतदा ने अपना अपमान समझा और एक निर्णायक क्षण में वे लपक कर मेज़ पर खड़े हो गए. उन्होंने एक द्रवित दृष्टि बंधे हुए मुर्गे पर डाली और उनकी आंखों से टपटप आंसुओं की धारा बहने लगी. भावातिरेक में उन्होंने मुर्गे को संबोधित किया: "मेरे भाई तेरा यह अपमान सिकन्दर से और बरदाश्त नहीं होता. सिकन्दर के सामने पोरस को इस तरह बांध दिया जाए, ऐसा यूनान के खून में नहीं होता, मेरे दोस्त!"

वहां से जगतदा ने छलांग सी मारी और मुर्गे के सामने बैठ कर सुबकते हुए उसे देखने लगे. हकबकाया मुर्गा भी उन पर निगाहें डाले था. अचानक जगतदा दहाड़ा: "सेनापति! कहां हो सेनापति!"

काफ़ी देर से चुपचाप बैठा नरदा झटके से उठा और उनके पास जाकर बोला: "आदेश विजेता सिकन्दर! आदेश!"

"बन्दी को मुक्त किया जाए!"

बन्दी को मुक्त किया गया. "सुनो पोरस! सिकन्दर किसी को इस तरह की नाइन्साफ़ी बरदाश्त नहीं!" नरदा से मुख़ातिब होकर सिकन्दर महान ने आदेश दिया: "बन्दी को खुले आकाश ने नीचे ले जाया जाए!"

बन्दी को खुले आकाश के नीचे ले जाया गया. राजेशदा और लल्तू दाज्यू आंखें मूंदे मरे का अभिनय कर रहे थे. मैंने पहली बार इस कोटि के सांस्कृतिक कार्यक्रम को देखने का सौभाग्य पाया था. नरदा सेनापति थे सो उन्हें तो बाहर जाना ही था. मैं और चौकीदार दोनों अधमरे हो चुके थे लेकिन इस नाटक को देखने का लोभ संवरण नहीं कर सके. जगतदा अपनी बन्दूक में छर्रे भर कर बाहर आ गए थे. बाहर अंधेरी रात थी. चौकीदार ने एक पैट्रोमैक्स बरामदे में धर दिया. बरामदे के आगे थोड़ी सी खुली जगह थी. मुर्गे को जगतदा के आदेसानुसार उसी जगह पर धर दिया गया. बेचारा मुर्गा अब भी डरा हुआ था और हम दानवों को हैरानी से देख रहा था.

"लैट्स हैव अ डुएल ओ नाइट ऑव द ब्लू कासल! हेयर कम्स किंग आर्थर ऑव कैमेलॉट!" बरामदे के खम्भे के पीछे पोज़ीशन लेते हुए सिकन्दर अब किंग आर्थर में तब्दील हो गया था. पैट्रोमैक्स की भकभक रोशनी काफ़ी मन्द पड़ चुकी थी. बन्दूक से धांय की आवाज़ आई और हवा में बारूद की गन्ध फैल आई. हमारा डिनर गायब था.

जगतदा वापस जगतदा बन गया था. और काफ़ी पशेमानी झेल चुकने के बाद अब और डायलॉग बोलने की स्थिति में नहीं बचा था.

हम भूखे ही जाकर सोने की जुगत में लग गए. नींद आने को ही थी कि दरवाज़े पर साहब! साहब! की आवाज़ आई. मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा चौकीदार था. "शेरसिंह आया है साहब. मुर्गा वापस लाया है. कह रहा था कि आप लोगों ने उसे खाया क्यों नहीं. वो तो वापस घर आ गया."

जगतदा जगे हुए थे शायद. वहीं से झेंपते-झींकते बोले: "यार इसे कह दो कि काट वाट के पका दे! भूख से आंतें चिपक गईं साली!"

करीब साढ़े तीन बजे चौकीदार ने खाना पक चुकने की सूचना दी. भोर साढ़े चार-पांच बजे तक हमारा भोज चला. दारू कब की निबट चुकी थी. भरपेट मुर्गा-भात ठूंसकर हम बिस्तर की तरफ़ जा रहे थे. बाहर परिन्दे फड़फड़ाने-गाने वगैरह लगे थे.

"बाहर जंगली मुर्गियां फड़फड़ाने लग गई हैं शायद! चलता है बेटा शिकार पे?" कोने के एक बिस्तर पर लेटे नरदा ने डकार लेते हुए जगतदा को छेड़ा.

सिकन्दर, जंगली मुर्गी का शिकार और एक नशीली पिकनिक - भाग एक



दारू पीना सीखे हुए साल भर हो गया था. नैनीताल शहर की रोमान्टिकपन्थी के चक्कर में मोफ़्फ़त की मार भी पड़ चुकी थी. घर से मिलनेवाली पाकेटमनी हम मित्रों के मिलौचा-प्रोग्रामों की भेंट चढ़ जाया करती थी और पन्द्रह तारीख़ आते ने आते फ़ोकट दारू पिलाने वाले महात्माओं की खोज शुरू हो जाती.

इस संकटपूर्ण समय में शहर में मेरा जलवा एक प्रतिभावान छोकरे के रूप में क्या फैलना चालू हुआ कि कई सारे नौकरीपेशा, बिजनेसरत लोगों से दोस्ती हो गई. ये सब किसी न किसी रूप से कला-साहित्त के मारे थे.

इनकी संगत में होता यूं था कि रोज़ फ़ोकट दारू पीने को मिल जाती थी और झील किनारे देर रात टहलते आवारागर्दी और मौज के अनन्त सेशन्स चलते थे. मेरी अपनी कैपेसिटी अब पव्वे के आसपास पहुंचा चाहती थी.

एक दिन इन्हीं पुरोधाओं द्वारा नैनीताल से दसेक किलोमीटर दूर किलबरी नामक स्थान पर पिकनिक का प्लान बनाया गया. किलबरी में वन विभाग का गेस्ट हाउस है जिसे बाकायदा बुक करा लिया गया था.

पिकनिक पार्टी में जगतदा बतौर लीडर शामिल थे. जगतदा ज़बरदस्त एक्टर थे और सारा शहर उन्हें इस वजह से ज़्यादा जानता था बजाय इस के कि वे बड़े अफ़सर भी थे. पार्टी के अन्य सदस्यों में नरेश जोशी यानी नरदा, राजेशदा, लल्तू दाज्यू और मैं थे.

नरदा का यू.एस.पी. यह था कि वे दारू पीने के बाद मस्ती के पहले दौर में दोस्तों को बहुत दर्दनाक चिकोटियां काटते थे, दूसरे दौर में मां-बहन की गालियां सुनाते हुए शहर भर की सुन्दरियों पर लानत भेजते और तीसरे में लुढ़क जाने से पहले उपस्थित मित्रों को प्रसाद के तौर पर एक एक लात रसीद किया करते. नरदा वकील भी थे.

राजेशदा भांग और चरस को भी दारू के बराबर सम्मान दिये जाने के हिमायती थे, सो नैसर्गिक था वे बहुत कम बोलते थे. अच्छी कदकाठी वाले राजेशदा दारू-सत्रों के उपरान्त पूर्णटुन्नों को घर पहुंचाने का कार्य बचपन से ही करते आए थे, ऐसा कहा जाता था. नैनीताल में उनका अपना पैतृक बिजनेस था.

लल्तू दाज्यू के तो क्या कहने - हारमोनियम थाम लेते तो पानी जैसा बहा देते सुरों को, और पक्के राग गाते हुए ऐसी ऐसी तानें छेड़ा करते कि उफ़! वे नौकरी करते थे कहीं.

ये चारों चालीस-पैंतालिस के फेरे में थे - चारों शादीशुदा थे, उनके बच्चे थे. बस कला-साहित्त के कीड़े ने उन्हें ऐसा काटा था कि मुझ बीसेक साल के लौंडे को बड़ा कलापारखी समझते थे जबकि मुझे सिवाय बात-बात पर मीर और चचा ग़ालिब के शेर सुनाने और छात्र संघ के चुनावों के पोस्टर बनाने के अलावा कुछ नहीं आता था. नहीं, नहीं! ऐसा नहीं है कि मैं कुछ और नहीं करता था. मैं दारू भी पीता था. और एक तरह से दारु और कला-साहित्त की ऐसी संगत बैठती कि अपने से दूनी उमर के इन महानुभावों की निस्बत में बहुत अपनापन महसूस होता था. भाग्यवश ये सब आज भी मेरे अंतरंग मित्र हैं.

सुबह सात बजे तल्लीताल रिक्शा स्टैंड पर इकठ्ठा हुए सारे - पिकनिक वाली पोशाकों में - यानी स्पोर्ट शूज़, जीन्स, टी शर्ट, हैट, काले चश्मे, पिठ्ठु, टू इन वन, कैसेट वगैरह. जगतदा के कन्धे पर भरवां बन्दूक लगी हुई थी. प्लान यह था कि जल्द से जल्द किलबरी पहुंचकर शिकार पर निकला जाएगा - पांचेक जंगली मुर्गियां चित्त की जाएंगी, लकड़ियां वगैरह इकठ्ठा करके खाना बनेगा, दारू पी जाएगी और मौज के समुन्दर में गोता लगाया जायेगा.

रसद के नाम पर चावल और मसाले ले जाए जा रहे थे. किलबरी में सिवाय गेस्ट हाउस और कुछ नीचे एक बेहद छोटे गांव के कुछ नहीं था.

तल्लीताल से किलबरी जाने के लिए पहले स्नोव्यू चढ़ना पड़ता है. सात बजकर सात मिनट पर जगतदा ने ओल्ड मॉंक की बोतल खोल ली ताकि चढ़ने में ताकत मिले. रिक्शा स्टैण्ड जैसे सार्वजनिक जगह पर ही बोतल मुंह में लगाकर एक-दो जलते हुए पैग हलक में ठूंसे गए, बन-आमलेट का भोग लगाया गया और अजगर जैसी मरियल चाल से चढ़ना शुरू किया गया. हर मोड़ पर बोतल पास-ऑन की जाती और करीब नौ बजे तक घिसटते चलते, लतीफ़ों और किस्सों की मौज के बीच पहली बोतल निबट गई. मैंने इस से पहले प्रभाती कभी नहीं की थी सो अभी यह समझ पाने की स्थिति में नहीं था कि अच्छा लग रहा है या नहीं. उतना नशा भी नहीं हो रहा था. मुझे उम्मीद थी जगतदा रात के वास्ते एक बोतल से ज़्यादा माल लाया होगा क्योंकि मैं अपनी कैपेसिटी भी चैक करना चाहता था इस पिकनिक में.

स्नोव्यू पहुंचते पहुंचते दस बज गया. हमें पूर्वनिर्धारित प्लान के मुताबिक अब तक किलबरी का आधा रास्ता तय कर लेना था पर नरदा सब को चिकोटियां काट काट कर बता रहा था कि कोई जल्दी नहीं है और शिकार के लिए चार-एक बजे के बाद का समय सबसे उत्तम होता है. स्नोव्यू आते आते भूख लग आई थी. कुछ नाश्ते का ऑर्डर दिया गया और देखते न देखते दुसरी बोतल मेज़ पर थी. आधी पौनी बोतल सूती जा चुकी थी जब मुझे अपने पेट की तरफ़ से "हो गया!" की पुकार आ गई. मेरा फ़िलहाल का कोटा पूरा निबट चुका था लेकिन मेरे बहादुर वरिष्ठ साथियों द्वारा पी गई रम ऐसा लगता था उनकी ऐड़ियों या हद से हद घुटनों को भिगा सकी. दूसरी बोतल निबटी और हम रस्ता लग लिये. दारू और भोजन की मात्रा ज़्यादा हो गई थी और हमारा टल्लीदल सुस्त चाल से मंज़िल-ए-मकसूद की जानिब रेंग रहा था.

सबने अपने अपने हिसाब से अपनी गति निर्धारित कर ली थी. नरदा बहुत तेज़ तेज़ चलता हुआ हमारी निगाहों से ग़ायब हो चुका था. मैं और लल्तू दाज्यू साथ साथ थे जबकि तीसरी सब - पार्टी में जगतदा और राजेशदा "हम आ रहे हैं एक एक लगा के" कह कर चरसठुंसी सिगरेट बनाने के उद्देश्य से कुछ पीछे रुक गए थे. रास्ता वीरान था, सिवाय एकाध दूधियों के जो नैनीताल में दूध बांटकर अपने टट्टुओं को हांकते अपने घर लौट रहे थे. लल्तू दाज्यू इन दूधियों से कुमाऊंनी में कुछ चुहल करते और देर तक हंसते जाते. अपने टू इन वन पर उन्होंने मेहदी हसन की कोई ग़ज़ल लगा ली थी और सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं टाइप माहौल की सर्जना होने लगी थी. दोपहर का करीब एक बजा था, सूरज सिर पर था पर उसकी टक्कर का सूरज हम उदरस्थ कर चुके थे और मौज आनी शुरू हो गई थी.

(अगली किस्त में तमाम)

Wednesday, April 29, 2009

मास्टर जी के पान में सिंदूर...

आधुनिक भारत में पारसी थियेटर जो प्रकारांतर से हिन्दी सिनेमा की नींव भी बना, के अन्यतम अभिनेता-निर्देशक और बहुआयामी व्यक्तित्व के इन्सान मास्टर फिदा हुसैन के बारे में महामहोपाध्याय अशोक पांडे ने कुछ दिनों पहले कबाड़खाना पर परिचयात्मक पोस्ट लगाई थी जिसे देखकर याद आया कि हमारे ख़ज़ाने में भी मास्टरजी पर कुछ दुर्लभ सामग्री है। हमने यूं भी उसे कबाड़खाना पर ही सजाने का सोचा था, पांडे जी का आदेश था कि यह काम जल्द अज़ जल्द हो जाए। शब्दों का सफ़र से फुर्सत कम ही मिलती है...फिर भी साझेदारी के सुख से न हम महरूम रहना चाहते हैं और हमसफरियों और कबाड़ियों को रखना चाहते हैं।
पेश है इस श्रंखला की पहली किस्त। हिन्दी रंगमंच की दुनिया का जाना माना नाम है प्रतिभा अग्रवाल का। कोलकाता के श्यामानंद जालान के साथ मिलकर भारतीय रंगमंच के लिए ऐतिहासिक महत्व का काम किया है। प्रतिभाजी ने 1978 से 1981 के दरम्यान मास्टरजी के साथ लगातार कई बैठकें कर उनके अतीत की यात्रा की। मास्टरजी के स्वगत कथन और बीच बीच में प्रतिभाजी के नरेशन की मिलीजुली प्रस्तुति बनी एक किताब जो मास्टरजी के जीवन के बारे में और इस बहाने पारसी रंगमंच की परम्परा और नाट्य परिदृश्य की जानकारी देनेवाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यहां इस पुस्तक के चुने हुए दिलचस्प अंश प्रस्तुत किए जा रहे हैं।


फिदा हुसैन साहब को बचपन से गाने का शौक था। कहीं से सुर कान में पड़ा फिर उनके लिए अपने को रोक पाना कठिन होता था। और जन्म हुआ था एक ऐसे खानदान में जो हाजी-हाफिजों का था और जिसमें गाने-बजाने की सख्त मुमानियत थी। अंदाज लगा सकते हैं रोज के वाकये का। कहीं गाने-बजाने की भनक पड़ी और फिदा हुसैन दौड़ पड़ते थे सबकी आखें बचाकर। पर पता तो चल ही जाता था और खूब पिटाई होती थी। पिटाई होती थी तो ये उस वक्त तौबा भी करते थे पर फिर जहां कानों में सुर पड़ा कि सब कुछ भूल जाते थे। सन 1911 का वाकया है। दिल्ली में पंचम जार्ज का दरबार हुआ था। देश के कोने -कोने से फनकारों को बुलाया गया था दिल्ली तमाशा दिखाने के लिए। दरबार खत्म होने पर सब अपनी-अपनी जगह को लौटे तो रास्ते में जगह-जगह रुक-रुककर तमाशा भी दिखाते चले। उनमें कठपुतली का तमाशा दिखाने वाले थे, नट का खेल दिखाने वाले थे, जादू का खेल दिखाने वाले थे।

दिल्ली से लौटने वाले मुरादाबाद भी पहुंचे और एक दिन इनके मुहल्ले में ही कठपुतली का खेल हुआ। खाट खड़ी करके, चादर बांध कर खेल दिखाया गया। कहानी थी किसी बादशाह की। बादशाह था, उसका वजीर था, सिपहसालार था, सेनापति था। कुछ कहासुनी हुई, एक दूसरे से झगड़ा हुआ और तलवारबाजी हुई। अच्छा लगा। खेल में कहानी थी और वह मन पर ऐसी छा गई कि घर आकर वही हरकतें शुरू कर दीं। कहने का मतलब यह कि नाटक और एक्टिंग की शुरुआत यहीं से हुई। खैर, यह किस्सा तो आया गया खत्म हो गया पर गाने का शौक बना रहा। रोज कहीं न कहीं सुनने पहुंच जाते और घर में पता लगने पर पिटाई होती। मां का तब तक स्वर्गवास हो चुका था, पर पिता थे, बड़े भाई थे। सबसे बड़े भाई की शादी भी हो चुकी थी। एक बार जब वे फिदा हुसैन की हरकतों से तंग आ गए तो उन्होंने बीवी के हाथों इन्हें पान में सिंदूर दिलवा दिया ताकि आवाज बंद हो जाए। वह किस्सा फिदा हुसैन साहब की जुबानी सुनिए।

``जब मैनें गाने का शौक नहीं छोड़ा तो तंग आकर भाई साहब ने भाभी के जो मुझे बहुत प्यार करती थीं, उनके हाथों से मुझे पान में सिंदूर दिलवा दिया कि आवाज ही खत्म हो जाए। और लोग भी एतराज करते थे। तो मेरी आवाज बंद हो गई। करीब चार-पांच महीने तक मेरी ये हालत रही कि मैं सांय-सांय बोलता, सर पटकता था। मगर आवाज ही नहीं। और दवाईयां जितनी कर सकता था की। लेकिन कुछ हुआ नहीं, पर लगन मेरी थी। मैं एकांत में रोता था और ईश्वर से प्रार्थना करता था कि मुझे दुनिया की कोई चीज नहीं चाहिए, बस मेरा सुर ठीक हो जाए। पर वह ठीक ही न हो। कुछ रोज के बाद जन्माष्टमी पड़ी। हमारे मुरादाबाद में किला का मंदिर है। वहां जन्माष्टमी के समय मंडलियां आती हैं, संत लोग आते हैं। तो वहां एक संत आए हुए थे। उनकी बड़ी हस्ती थी।

मैं इस तलाश में रहता था कि कोई मिले, मुझे कोई उपाय बता दे। मतलब बड़ी बुरी हालत थी। तो में वहां पहुंच गया। चौरासी घंटा मुहल्ला है मेरे मुहल्ले के पीछे ही, वहीं पहुंच गया। देखा, धूप में चबूतरे के ऊपर एक विशाल मूर्ति , बहुत सफेद दाढ़ी। वे तकिया लगाकर चारपाई पर बैठे थे और एक आदमी उनका पैर दबा रहा था। वहां बल्लम का पहरा था, भाला लेकर संतरी खड़ा था। मैं अंदर दरवाजे में जाने लगा तो उन लोगों ने रोक दिया और मैं परेशान कि क्या करुं । फासला था फिर भी उनकी नजर मुझ पर पड़ गई। उन्होंने कहा `आने दो, आने दो। मतलब ये कि जानते हुए भी कि मुसलमान है, इसीलिए इसको रोक रहे हैं, उनके मुंह से निकला `आने दो, आने दो। मैं पास आ गया। आने के साथ उनके पैर पकड़कर, पैर फैला था इतना, रोने लगा। और लोगों ने कहा कि , `ठहरों इसे अलग करों तो उन्होंने कहा `नहीं, रो लेने दो, इसका मन हलका हो जाने दो।

मैं दो-तीन मिनट तक रोता रहा। उसके बाद एक शेख खड़े थे वहां पे, उन्होंने कहा- साहब का कंठ खराब हो गया है। इसका कंठ बहुत अच्छा था। भजन-वजन में भी कभी-कभी आता था ये। तो बोले अच्छा । पास बुलाया, बोले-`कैसे हुआ। सब बता दिया तो बाले- `अच्छा दवा तो मैं खास कोई नहीं बताऊगा। एक साधना बताता हूं और संभव है कि उससे तुमको फायदा पहुंचे, लाभ मिल जाए। दवा में सिर्फ ये है कि जिसने तुमको सिंदूर दिया है (भाभी ने) उसके ही हाथ से पक्का केला घी में तलवाकर तीन रोज तक खाओ। और साधना यह कि कुएं के ऊपर लेटकर, गर्दन कुएं में लटका कर जब तक तुम्हारा सुर साफ न हो जाए सुर भरो, आ-आ करते रहो। मैं लौट आया। मकान के बाहर कुआ था। वहां तो मैं ये कर नहीं सकता था। पास ही एक जगह थी जहां कोई नहीं जाता था। पास ही एक जगह थी, जहां कोई नहीं जाता था। वहां दसमा घाट है। वहां के लिए मशहूर था कि खजूर पर कोई भूत रहता है। लेकिन मैं तो भूत-वूत को नहीं मानता था। मैं दोपहरी में वहां पहुंच जाता। एकांत रहता। कुएं पर लेटकर आ-आ करता। कोई 10-20 रोज तक यह करता रहा, पर कोई फायदा नहीं पहुचा। केले की दवा भी कर ली थी लेकिन कुछ हुआ नहीं। पर मैं हिम्मत नहीं हारा। उन्होंने कहा था जब तक न हो करते रहना। मुझे उनका कहना याल में था। कोई 20 रोज के बाद 21 दिन मुझे मालूम हुआ कि आवाज कुछ शुरू हुई। 26 दिन के अंदर्र-अंदर मेरा गला साफ हो गया। जैसा सुर वैसा फिर हो गया। जारी

ऊपर का चित्र कश्मीर हमारा है नाटक का।

Tuesday, April 28, 2009

पप्पुओं की चुनावी चकल्लस

यह कैसा चुनाव है, जिसमें चुनने को कुछ है ही नहीं। दिल्ली में सरकार किसकी और कैसी बनेगी- मीडिया के मुंहजोर विशेषज्ञ ही नहीं, खुद प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी बता रहे हैं- इस बात का फैसला वोटिंग मशीनों से नहीं, कहीं और से निकलने वाला है। चुनाव बाद कौन कितनी सीटें लेकर आता है, फिर किसके बीच कैसे समीकरण बनते हैं, इन समीकरणों को बनाने में थैलियों का कैसा और कितना रोल बनता है, इससे तय होगा कि सरकार किसकी बनेगी। कैसा चुनाव है यह, जिसमें शुरू से ही तय है कि न कोई पक्ष जीतने वाला है, न कोई हारने वाला है, सारा कुछ बस ऊपर से तय होने वाला है।

इस परिघटना को क्या कहें, सिवाय इसके कि दो-ढाई दशक पहले शुरू हुई एक प्रक्रिया इसी तरह अपनी परिणति तक पहुंच रही है। जनता सरकार के पतन के बाद लौटी इंदिरा गांधी राजनीति का जो नया हमलावर मुहावरा अपने साथ लाई थीं उसकी पूर्णाहुति उन्हें अपना शरीर देकर चुकानी पड़ी। उसे जारी रखना राजीव गांधी के बूते से बाहर था, अलबत्ता श्रीलंका में उन्होंने अपनी एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली भकचोन्हर स्टाइल में इसे जारी रखने की कोशिश जरूर की थी।

राजनीति को आक्रामक मुहावरों से चार्ज रखने के बजाय उन्होंने खुद को राजनीति के थपेड़ों में टपले खाने के लिए छोड़ दिया और अपने लिए एक राजनीति-निरपेक्ष करीअरिस्ट कांस्टिटुएंसी बनाने की कोशिश की। लेकिन यह काम रातोंरात नहीं हो सकता था। कहें तो यह बीस साल बाद, यानी कुछ हद तक अब जाकर संभव हुआ है, जब उसे संभालने-सहेजने वाला कोई नहीं है।

पंचायती राज से लेकर कंप्यूटर तक राजीव गांधी के सारे प्रयोग देख जाइए- सभी के कुछ अच्छे नतीजे भी देश के लिए निकले हैं, जिन्हें आधार बनाकर उन्हें स्वप्नदर्शी वगैरह बताया जा सकता है, बताया जा भी रहा है। लेकिन इनका दूसरा पक्ष यह है कि पंचायती राज ने गांवों के स्तर पर भ्रष्टाचार, हिंसा और गैर-जवाबदेही को असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है , जबकि सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के इर्दगिर्द नए-नवेले पैसे वालों की ऐसी जमात खड़ी हो गई है जो अमेरिका में खड़े होकर सोचती है और भारत को अपने रीयल एस्टेट की तरह देखती है।

बिजली-सड़क-पानी नाम का जो महामंत्र मीडिया पिछले सात वर्षों से जप रहा है, उसका एक पहलू यह भी है कि इन मामलों में कुछ करते हुए दिखिए, फिर चाहे जो कीजिए- आपका नरेंद्र मोदी होना भी माफ है। गांवों में यह प्रधानों और प्रधानपतियों का और शहरों में दो या तीन बेडरूम वाले ब्रह्मांड के महानायकों का लोकतंत्र है, जिनके बारे में पंकज मिश्र की किताब बटर चिकन इन लुधियाना और पवन वर्मा की द ग्रेट इंडियन मिडल क्लास अच्छी खिड़कियां खोलती हैं।

राजीव गांधी के दौर की ही दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि सत्ता शिखर का भ्रष्टाचार है, जिसने राजनीति में नैतिकता की रही-सही हुड़क को भी समाप्त कर दिया। हर छह में से एक उम्मीदवार करोड़पति होने के जो आंकड़े छप रहे हैं, उससे किसी को कोई आक्रोश नहीं है। अगर आप राजनीति में हैं और जाहिर तौर पर आपके खिलाफ किसी बहुत बड़े भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है तो आप देश पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। और अगर आरोप हो भी तो चिंतित होने की कोई बात नहीं है। जिन संस्थाओं से आपको ऐसा कोई डर हो सकता है, वे सब आपको बचाने के लिए जी-जान लड़ा देंगी, शर्त सिर्फ इतनी है कि आप किसी तरह सत्ता में पहुंच जाएं या उसके नजदीकी बन कर रहें।

राजीव गांधी के बाद की राजनीति में मंदिर आया, मंडल आया, बहुजन क्रांति आई, लेकिन ये सभी अब धीरे-धीरे जा रहे हैं। समाज में इनकी छापें लंबे समय तक रहेंगी लेकिन राजनीति में अब सारा कुछ उसी लेवल प्लेयिंग फील्ड में घटित होगा, जिसकी रचना राजीव गांधी करके गए हैं। देश की अस्सी फीसदी आबादी की छाती पर बुलडोजर की तरह फिरता एक या दो प्रतिशत सुपर अमीरों का लोकतंत्र, जिनके पीछे अट्ठारह-उन्नीस फीसदी मिडल क्लास झाल बजाता घूम रहा है।

बाकी लोगों के लिए चुनाव में चलने वाली कच्ची दारू है, टंडन के जलसे में बंटने वाली साड़ी है, छोटे-मोटे अपराध हैं, आत्महत्याएं हैं, पागलपन और भिखमंगापन है। ऐसे लोग वोट दें भी तो क्या, और न दें तो भी क्या- पप्पू लोग तो उन्हें पप्पू कह कर ही बुलाएंगे- और मई या जून की किसी तारीख को जब दिल्ली में उनकी मर्जी की सरकार बन चुकी होगी तो इसे लोकतंत्र की विजय बताएंगे।

गर्मी में मियां की मल्हार


इधर कई दिनों से भीषण गर्मी पड़ रही है. बारिश का नामोनिशान नहीं. तीन-चार दिनों से पहाड़ों पर आग लगने का दुर्भाग्यपूर्ण सिलसिला भी शुरू हो गया है.

गर्मी का कोई क्या करे साहब?

हां पंखा चलाकर मियां की मल्हार को तो सुना ही जा सकता है. कल्पना तो की ही जा सकती है मेघाछन्न आकाश की ... और बारिश की! यह प्रस्तुति पंडित विनायक तोरवी के स्वर में है.

१९४८ में जन्मे पंडित विनायक तोरवी को ग्वालियर घराने के गायनाचार्य गुरुराव देशपाण्डे का शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. महान गायिका गंगूबाई हंगल के अतिरिक्त पं. मल्लिकार्जुन मंसूर और पं. बासवराज राजगुरु जैसे संगीतज्ञों से भी उन्होंने गायन की बारीकियां जानीं. फ़िलहाल पं. तोरवी शास्त्रीय गायन के साथ ही कन्नड़, मराठी और हिन्दी में भक्ति संगीत और सुगम संगीत के साथ नवीन प्रयोग करने में व्यस्त हैं

कई सम्मानों से नवाज़े जा चुके पं. तोरवी वाणिज्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त हैं और कैनरा बैंक में मैनेजर की पोस्ट पर हैं.



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Monday, April 27, 2009

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड - भाग दो

पिछली पोस्ट से जारी:



मेन्दोज़ा: चलो किताब के बारे में बात करते हैं, बुएनदीया परिवार का एकाकीपन आता कहां से है?

मारकेज़: मेरे विचार से प्रेम की कमी से. तुम देख सकते हो कि पूरी शताब्दी में सुअर की पूंछ वाला ऑरेलियानो जन्म लेने वाला इकलौता बुएनदीया है. बुएनदीया लोग प्रेम करने में असमर्थ थे और यही उनकी कुंठा और एकाकीपन की कुंजी है. मैं मानता हूं कि एकाकीपन, भाईचारे का विलोम है.

मैं वह सवाल तुमसे नहीं करूंगा जो हर कोई करता है-कि किताब में इतने सारे ऑरेलियानो और इतने सारे होसे आरकादियो क्यों हैं - क्योंकि हम दोनों जानते हैं कि यह एक लातीन अमरीकी परंपरा है. हम सब के नाम हमारे पिताओं और दादाओं के नाम पर रखे जाते हैं और तुम्हारे परिवार में तो यह परम्परा सनक की इस हद तक पहुंची कि तुम्हारा एक अपना भाई गाब्रीएल के नाम से जाना जाता है. पर मैं समझता हूं कि ऑरेलियानो नाम के लोगों को होसे आरकादियो लोगों से फ़र्क करने में एक सूत्र है. क्या है वह?

बहुत आसान है. होसे आरकादियो नाम के लोगों के बच्चे होते हैं और ऑरेलियानों के नहीं. सिर्फ़ एक अपवाद है - होसे आरकादियो सेगुन्दो और ऑरेलियानो सेगुन्दो. ऐसा शायद इसलिये है कि एक समान जुड़वां होने के नाते जन्म के समय ही उनमें कुछ अदल-बदल हो गई थी.

किताब में पुरुषों के भीतर तमाम खोट हैं (खोजें, कीमियगरी, युद्ध, पीने के दौर) और स्त्रियों में समझदारी. क्या दोनों को तुम इसी तरह देखते हो?

मेरा मानना है कि स्त्रियां संसार को टूटने से बचाए रखती हैं जबकि पुरुष इतिहास को आगे ले जाने का प्रयास करते हैं. अंत में आप हैरत करते हैं कि दोनों में से ज्यादा सनकी कौन है?

स्त्रियां न सिर्फ अगली पीढ़ियों की सुनिश्चितता तय करती हैं बल्कि उपन्यास की भी. क्या शायद यही उसुZला की असाधारण लम्बी जिन्दगी का रहस्य नहीं?


हां, उसने गृहयुद्ध से पहले मर जाना चाहिये था जब वह सौ साल की होने वाली थी पर मुझे अहसास हुआ कि यदि उसकी मौत हो गई तो किताब ढह जायेगी. जब वह अंतत: मरती है, किताब में इतना उबाल आ चुका होता है कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आगे क्या होगा?

किताब में पेत्रा कोट्स की क्या भूमिका है?

सतही तौर पर आप उसे फर्नांदा की छवि के तौर पर देख सकते हैं, एक कैरिबियाई स्त्री जिसे आन्देस की स्त्रियों के प्रति कोई नैतिक पूर्वाग्रह नहीं है. लेकिन मैं समझता हूं उसका व्यक्तित्व बहुत कुछ उर्सुला जैसा है - वह सच्चाई के ज्यादा मोटे तौर पर समझने वाली उर्सुला है.

मैं मानता हूं कि जब तुम किताब लिख रहे थे, कई चरित्र उससे अलग बनकर सामने आये होंगे जैसा तुमने पहले तय किया होगा. क्या तुम कोई उदाहरण दे सकते हो?

हां एक तो सान्ता सोफिया दोन्या पियेदाद का होगा. किताब में, जैसा कि वास्तविकता में हुआ था, मैंने सोचा था कि जब उसे पता लगेगा कि उसे कोढ़ है वह बिना किसी को बताये घर छोड़कर चली जायेगी. हालांकि उस चरित्र का पूरा व्यक्ति समर्पण और स्व-अस्वीकार से निर्मित है, जिसके कारण यह अन्त विश्वसनीय लगता पर मुझे लगा कि मुझे इसे बेहतर बनाना होगा. वह काफी क्रूर लग रहा था.

क्या कोई चरित्र कतई बेकाबू हुआ?

तीन बेकाबू हो गये थे पूरी तरह - इस मायने में कि उनका जीवन और व्यक्तित्व वैसा सामने नहीं आया जैसा मैंने तय किया था. ऑरेलियानो होसे का अपनी आन्ट आमारान्ता के लिये प्रेम मेरे लिये हैरान करने वाला था( होसे ऑरकादियो सेगुन्दो बनाना वर्कर यूनियन का ऐसा नेता नहीं था जो मुझे पसन्द आता( और प्रशिक्षु पोप होसे ऑरकादियो एक ऐसे एडोनिस के रूप में बदल गया जो किताब में जंचता नहीं.

हममें से जो इस किताब के कुछ सूत्रों को जानते हैं, इस बात को महसूस कर सकते हैं कि एक क्षण आता है जब माकोन्दो एक कस्बा, तुम्हारा कस्बा नहीं रह जाता और एक नगर बन जाता है - बारान्कीया. क्या तुमने वहां के किसी परिचित व्यक्ति या स्थान को वहां रखा? इस बदलाव से तुम्हें कोई दिक्कतें तो नहीं आई?

माकोन्दो जगह की बनिस्बत एक मन:स्थिति ज्यादा है, सो कहानी को कस्बे से शहर में ले जाने में कोई खास दिक्कत नहीं आई - न ही किताब के माहौल में कोई परिवर्तन आया.


उपन्यास में तुम्हारे लिये सबसे मुश्किल क्षण कौन सा था?

शुरूआत करना. मुझे वह दिन अच्छे से याद है जब मैं बहुत मुश्किल के बाद पहला वाक्य पूरा कर पाया था और भयभीत होकर मैंने अपने आप से पूछा कि आगे क्या होने वाला है. असल में, जब तक जंगल के बीच वह गलियारा नहीं खोजा गया था, मैं नहीं सोचता था कि किताब का कुछ बन पायेगा. पर उसके बाद किताब लिखना एक तरह का पागलपन बन गया - हालांकि उसमें आनन्द भी आया.

क्या तुम्हें वह दिन याद है जब तुमने उसे खत्म किया? कितना बजा था? तुम्हें कैसा लगा?

अठारह महीनों तक मैं सुबह नौ से दोपहर तीन तक हर रोज लिख रहा था. मुझे पता था कि वह अंतिम दिन था पर किताब अपने नैसर्गिक अन्त पर गलत वक्त पर पहुंची - सुबह करीब ग्यारह बजे. मेरसेदेज़ घर पर नहीं थी और मुझे फोन पर कोई नहीं मिला जिसे मैं इस बारे में बता पाता. मुझे अपनी हैरत बिल्कुल अच्छे से याद है, मानो वह कल घटा हो. मुझे पता नहीं था कि समय के साथ क्या किया जाय, सो तीन बजे तक जिन्दा रहने के लिये मुझे कई तरह की चीजों की खोज करनी पड़ी.

इस किताब के कुछ आयाम जरूर होंगे जिन्हें आलोचकों ने (जिनसे तुम इतनी नफरत करते हो) नजरअन्दाज कर दिया होगा. कौन हैं वे आयाम?

एक तो किताब की सबसे उत्कृष्ट बात है - अपने बेचारे पात्रों के लिये लेखक की उद्दाम भावनाएं.

तुम्हारे ख्याल से तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ पाठक कौन है?

मेरे एक रूसी दोस्त की मुलाकात एक स्त्री से हुई. एक बहुत बूढ़ी स्त्री से जो किताब को हाथ से प्रतिलिपि बना रही थी - आखिरी पंक्ति तक. मेरे दोस्त ने उससे पूछा कि वह क्यों ऐसा कर रही है. वह बोली, "क्योंकि मैं जानना चाहती हूं कि वास्तव में पागल कौन है - लेखक या मैं, और यह जानने के लिये किताब को दुबारा लिखना पड़ेगा." मुझे इससे बेहतर पाठक की कल्पना करना मुश्किल लगता है.


कितनी भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है?

सत्रह.

कहते हैं कि अंग्रेजी अनुवाद बढ़िया हुआ है?

हां, बहुत बढ़िया है. अंग्रेजी में भाषा सघन होकर ज्यादा ताकतवर हो गई है.

और बाक़ी अनुवाद?

मैंने फ्रांसीसी और इतालवी अनुवादकों के साथ थोड़ा काम किया था. दोनों अच्छे अनुवाद हैं हालांकि कम से कम मेरे लिये फ्रांसीसी में किताब में वैसी बात नहीं है.

फ्रांस में यह बहुत ज्यादा नहीं बिकी है - इंग्लैण्ड और इटली के मुकाबले, स्पानी भाषी देशों को छोड़ दें तो, जहां यह असाधारण रूप से सफल हुई है. तुम्हारे ख्याल से ऐसा क्यों है?

शायद कार्तेसियाई परम्परा के कारण. मैं देकार्ते के अनुशासन के बदले राबेलाइस के सनकीपन के ज्यादा करीब हूं और फ्रांस में देकार्ते काफी प्रभावशाली है. शायद इसीलिये यह किताब फ्रांस में और देशों कितनी लोकप्रिय नहीं हुई, हालांकि वहां बढ़िया आलोचनाएं हुईं. रोसाना रोजान्दा ने एक बार मुझे कहा था कि सन् 1968 में जब यह किताब फ्रांस में छपी थी - व्यावसायिक सफलता के लिये वहां वह कोई उल्लेखनीय मौका नहीं था.

क्या तुम्हें `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड´ की सफलता से हैरत होती है?

हां, बहुत ज़्यादा.

क्या तुमने कभी इसका रहस्य जानने की कोशिश की है?

नहीं, मैं जानना नहीं चाहता. मेरे ख्याल से यह पता करना बहुत ख़तरनाक होगा कि कोई किताब, जिसे मैंने बस कुछ करीबी दोस्तों को दिमाग़ में रखकर लिखा था, इस कदर बिक सकती है.

मुनीश जी की इस टिप्पणी और इसके प्रकाशन पर पर मैं कबाड़खाना छोड़ रहा हूँ !

पिछली पोस्ट पर मेरी टिप्पणी पर मुनीश जी की इस टिप्पणी और इसके प्रकाशन पर मैं कबाड़खाना छोड़ रहा हूँ। उम्मीद है मेरे इस फैसले से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये एक मूर्ख की विदाई है ! इसे इससे ज़्यादा कुछ न समझें ! सभी दोस्तों से मुआफी !
मेरी टिप्पणी : समकालीन हिन्दी साहित्य संसार के लिए ये सपनों सरीखी बातें हैं। बहुत बढ़िया पोस्ट- बहुत बढ़िया सपना ! "सपनों के सौदागर" ! मुझे लगता है कई सालों से प्रकाशित हो रही ये किताब इस साल पुस्तक मेले में आ जाएगी।
मुनीश जी की टिप्पणी : Some of them may be ur friends , but i feel the most unwanted people in the realm of literature are none but critics! Who are they to instruct people what to read and what not to! This 'kaum' has strangulated many a budding talent in the spring of their lives . Not everyone had the nerves of steel like Marquez.

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड - भाग एक



गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ उर्फ़ गाबो के साक्षात्कारों पर आधारित प्रसिद्ध पुस्तक 'फ़्रैगरेन्स ऑफ़ गुवावा' के एक अध्याय से कुछ टुकड़े मैंने कभी यहां लगाए थे. मेरे संग्रह में कोई बीस किताबें ऐसी हैं जिन्हें मैं हर साल पढ़ता हूं - और यह सिलसिला पिछले बारह-तेरह सालों से जारी है. गाबो का कालजयी उपन्यास 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड' किताबों की इस सूची में काफ़ी ऊपर आता है. कल देर रात इसे एक बार और पढ़ कर समाप्त किया.

'फ़्रैगरेन्स ऑफ़ गुवावा' का अनुवाद कई सालों से प्रकाशनाधीन है - किताब जब छपे, क्यों न आपको इस का वह हिस्सा पढ़वाऊं जिस में मारकेज़ ' वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड' की बाबत बातें कर रहे हैं अपने अभिन्न मित्र और मशहूर कोलम्बियाई पत्रकार प्लीनीयो आपूलेयो मेन्दोज़ा से. ये लीजिए पहला हिस्सा. दूसरा रात में लगा दूंगा.





जब तुमने `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ लिखना शुरू किया तुम क्या करना चाहते थे?

मैं उन सारे अनुभवों को साहित्य में व्यक्त करने की राह खोजना चाहता था, जिन्होंने एक बच्चे के तौर पर मुझ पर प्रभाव डाला था.

बहुत से आलोचकों को इस किताब के भीतर मानव जाति के इतिहास की जातक कथा या एक रूपक नजर आते हैं.

नहीं, मैं बस इतना करना चाहता था कि अपने बचपन के संसार की एक साहित्यिक छवि छोड़ना चाहता था जो, जैसा तुम्हें पता है एक बड़े, बेहद उदास घर में बीच था जहां एक बहन थी जो मिट्टी खाती थी, एक नानी थी जो भविष्यवाणियां किया करती थी, और एक ही नाम वाले असंख्य रिश्तेदार थे जिनके लिये प्रसन्नता और पागलपन के बीच बहुत फर्क नहीं था.

तो भी आलोचकों को कहीं जटिल उद्देश्य नजर आते हैं.

यदि वे हैं भी तो ऐसा करने की मेरी नीयत नहीं थी. होता ये है कि लेखकों के बरअक्स आलोचकों को किताब में अपनी मनचाही चीज मिल जाती है, वह नहीं जो उसमें सचमुच है.

तुम आलोचकों के बारे में बहुत विडंबनापूर्ण बातें करते हो. तुम उन्हें इतना नापसंद क्यों करते हो?

क्योंकि ज्यादातर आलोचक इस बात को नहीं समझते कि `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ एक तरह का लतीफ़ा है, जिसमें नजदीकी मित्रों के लिये कई संकेत है( सो किसी अधिकार के कारण वे किताब को `डीकोड´ करने का काम अपने ज़िम्मे ले लेते हैं और आख़िरकार मूर्खों जैसे नज़र आने लगते हैं.

मिसाल के तौर पर मुझे याद है कि एक आलोचक को लगा था कि उसे उपन्यास का सूत्र मिल गया है जब उसने गौर किया कि एक पात्र - गाब्रीएल - राबेलाइस की सम्पूर्ण कृतियां पेरिस ले जाता है. इस खोज के बाद उसने साहित्यिक प्रभाव को अतिरंजित किया. मैंने राबेलाइस की उपमा के बतौर इस्तेमाल किया है और ज़्यादातर आलोचक इस बात को देख नहीं पाये. इस बात को दरकिनार करके कि आलोचक क्या कहते हैं मेरे ख्याल से उपन्यास तुम्हारे बचपन की स्मृतियों की काव्यात्मक पुनर्रचना के आगे भी कुछ है. क्या तुमने एक बार नहीं कहा था कि बुएनदीया परिवार की कहानी लातीन अमरीकी इतिहास का वृतांत हो सकता है?

हां, मेरे विचार से ऐसा ही है. लातीन अमरीकी इतिहास भी भीषण बेकार उद्यमों से भरा हुआ है और उन महान नाटकों से भी जिन्हें घटने से पहले ही खारिज कर दिया गया. हमें स्मृति के ह्रास की हैजे की बीमारी भी है. समय बीतने पर कोई याद नहीं रखता कि बनाना कंपनी के कर्मचारियों का हत्याकांड वाकई हुआ था, उन्हें सिर्फ कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया की याद आती है.

और जो तैंतीस युद्ध कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया ने हारे सम्भवत: हमारी अपनी राजनीतिक कुंठा की अभिव्यक्ति हो सकते हैं, अगर कर्नल जीत गया होता तो क्या होता?

वह पैट्रिआर्क जैसा होता. उपन्यास को लिखते वक्त एक दफे मुझे लालच आया कि कर्नल को सत्ता मिल जाये. ऐसा होता तो मैंने `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ की जगह `द ऑटम ऑफ़ द पैट्रिआर्क´ लिखा होता.

तो क्या हम यह मान लें कि भाग्य की किसी ऐतिहासिक सनक के कारण जो भी तानाशाही के खिलाफ लड़ता है, खुद सत्ता में आने के बाद तानाशाह बन जाता है?

`वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड´ में कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया का एक बन्दी उससे कहता है, "मुझे फिक्र इस बात की है कि सेना की प्रति तुम्हारी इतनी घृणा, उससे इतना लड़ चुकने और उसके बारे में इतना सोच लेने के बाद तुम भी वैसे ही बन चुके हो". अन्त में वह कहता है, "इस हिसाब से तुम हमारे इतिहास के सबसे बड़े खूनी तानाशाह हो."

क्या यह सच है कि तुमने यही उपन्यास तब लिखना शुरू किया था जब तुम अठारह के थे?

हां, `द हाउस´ नाम था उसका क्योंकि मैंने सोचा था कि पूरा घटनाक्रम बुएनदीया परिवार के घर के भीतर घटेगा.

उसमें तुम कहां तक पहुंचे थे? क्या तुमने सौ सालों के बारे में लिखने का सोचा था?

मैं किसी खाके तक नहीं पहुंच पाया. मैं कुछ टुकड़े अलग कर पाया, जिनमें से कुछ उस अख़बार में छपे जहां मैं उन दिनों काम करता था. सालों की संख्या से मुझे कभी चिन्ता नहीं हुई. मुझे ख़ुद नहीं पता कि असल में `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ में सौ सालों की कहानी है या नहीं.

तुमने तभी उसे लिखना जारी क्यों नहीं रखा?

क्योंकि तब उस तरह की किताब लिखने के लिये न मेरे पास पर्याप्त अनुभव था न शक्ति न ही तकनीकी कौशल.

लेकिन वह कहानी तुम्हारे दिमाग में घूमती रही थी.

पन्द्रह सालों तक. मुझे सही कहानी नहीं मिल पाई थी. उसने मेरे कानों में सही-सही गूंजना था. एक दिन जब मैं मेरसेदेज और बच्चों के साथ आकापुल्को की तरफ गाड़ी से जा रहा था, वह एक कौंध की तरह मेरे दिमाग में आई. मुझे वह कहानी उसी तरह सुनानी थी जैसी मेरी नानी सुनाया करती थीं. मैं उसी दोपहर से शुरू करने वाला था जब छोटे बच्चे को उसके नाना बर्फ खोजने ले जाते हैं.

एक एकरेखीय इतिहास

एक एकरेखीय इतिहास जिसमें असाधारण तत्व सामान्य चीजों में जज़्ब हो जाते हैं, अपनी पूरी सादगी के साथ.

क्या यह सच है कि तुमने गाड़ी मोड़ ली थी और तुरन्त लिखना शुरू कर दिया था?

सच है. मैं कभी आकापुल्को नहीं पहुंच पाया.

और मेरसेदेज़?

तुम जानते हो मेरसेदेज़ ने मेरे कितने सारे ऐसे पागलपन बर्दाश्त किये हैं. उसके बिना मैं किताब नहीं लिख सकता था. उसने चीज़ों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया. मैंने कुछ ही महीने पहले कार खरीदी थी, सो उसे जमानत पर दे कर मैंने उसे पैसे दे दिया. मुझे लगा था कि मैं छ: महीने लूंगा पर किताब पूरा करने में मुझे डेढ़ साल लगे. जब पैसा ख़त्म हो गया उसने एक शब्द भी नहीं कहा. मुझे नहीं पता कि वह कैसे कर पाई लेकिन उसने कसाई को उधार पर मांस देने को, नानबाई को उधार पर डबलरोटी देने को और मकान मालिक को किराये के लिये नौ महीने रूके रहने पर राजी कर लिया. उसने मुझे बताये बिना हर चीज की देखरेख की और जब-तब मेरे लिये पांच-पांच सौ कागजों का बण्डल लाया करती थी. उन पांच सौ पन्नों के बिना मैं कभी नहीं रहा. जब किताब ख़तम हो गई तो यह मेरसेदेज़ थी जिसने पाण्डुलिपि को डाक से एदीतोरियाल सूदामेरिदाना भेजा.

उसने मुझे एक बार बताया था कि पाण्डुलिपि को डाकखाने ले जाते हुए उसने सोचा था `अगर यह किताब इतने सब के बाद उतनी अच्छी न हो पाई तो?´ मैं नहीं समझता उसने उसे पढ़ा था. पढ़ा था क्या?

नहीं, वह पाण्डुलिपियां पढ़ना पसन्द नहीं करती.

वो और तुम्हारे बेटे अक्सर तुम्हारी किताबें पढ़ने वाले आखिरी लोग होते हैं. मुझे बताओ, क्या तुम्हें निश्चित पता था कि यह किताब सफल होगी?

मुझे पता था कि आलोचकों को किताब पसंद आयेगी पर इतनी सफलता के बारे में नहीं सोचा था. मुझे लगा था कि वह करीब पांच हजार बिक जायेगी (तब तक मेरी बाक़ी किताबें की सिर्फ हजार प्रतियां बिकी थीं). एदीतोरियाल सूदामेरिकाना ज्यादा आशावान था - उनके ख्याल से किताब आठ हजार बिक सकती थी. असल में किताब का पहला संस्करण अकेले बुएनोस आयरेस में दो हफ्ते में बिक गया.