Tuesday, June 16, 2009

कबाड़ी चौक,कबाड़खाना और कबाड़ी!

बाबूजी इस दुनिया मे नही हैं। रहते तो पता नही खुश होते या अपना सिर पीटते जब उन्हे पता चलता कि मै कबाड़ी हो गया हूं। कबाड़ी, बचपन से सुनता आ रहा हूं और जब शैतानी करता बाबूजी कहते इसके लक्षण ठीक नही है, लगता है कबाड़ी बनेगा। पता नही वे ऐसा क्यों कहते थे मगर आज लगता है कि उनकी बात खरी हो रही है। वे अपने कहे को आशीर्वाद मे बदलते देखने के लिये आज मौजूद नही है,मगर मुझे लग रहा है कहीं न कहीं से वे मुझे कबाड़ी बनते देख रहे होंगे और मन ही मन मुस्कुरा रहे होंगे।

कबाड़ी और कबाड़खाना मेरे लिये नया कुछ भी नही है। थोड़ा बहुत समझने लायक हुए तो खुद को कबाड़ियों से घिरा हुआ पाया। हम लोग रायपुर के मौदहापारा मे रहा करते थे। मौदहापारा नाम मूलतः उत्तर प्रदेश के महोबा ईलाके के बारह गांव के लोगो के यंहा आकर बस जाने के कारण पड़ा था। सारे के सारे मुस्लिम और अधिकांश लोगों का एक ही धंधा, कबाड़ी का। मेरे घर के आसपास तीन-चार हिंदू परिवार रहते थे और उसके अलावा दोनों ओर कबाड़ी बसे थे। घर से चंद कदमो की दूरी पर था एक चौक जिसका नाम था कबाड़ी चौक। बाहर से आने वालों के लिये रेफ़रेंस से लेकर पोस्टल एड्रेस तक़। उस समय टैक्सियां या आटो नही होते थे, रिक्शे और तांगे चला करते थे उनको भी पता बताया जाता था कबाड़ी चौक के पास।

समय तो जैसे उड़ता चला गया। हम लोग थोड़ा बड़े होने लगे थे और नये दोस्त बनाने की गरज से घर के आसपास खिंची लक्ष्मण रेखा पार कर मुहल्ले की ओर जाने लगे थे। पतंग से लेकर क्रिकेट तक़ सभी के लिये टीम वहीं बन पाती थी। बाबूजी को जब पता चला तो उन्होने फ़रमान जारी कर दिया कि उधर नज़र आये तो बिना मुरव्वत के धुनाई होगी। स्कूल तक़ पाबंदी जारी रही। कालेज मे प्रवेश लेने की बात आई तो मैने आई (मां) से कहा कि मै दुर्गा कालेज मे पढना चाहता हूं। दुर्गा कालेज उस समय छात्र राजनीति और दादागिरी दोनो के लिये मशहूर था। मां ने सीधे सीधे इस माम्ले से हाथ खींच लिये और कहा कि तू जान तेरे बाबूजी जाने। लाख चिरौरी के बावजूद जब मां नही मानी तो बाबूजी से डरते-डरते खुद ही कहने की हिम्मत जुटाई और जैसे ही कहा तो जवाब ये मिला कबाड़ी बनना है क्या? वहां पढना था तो काहे कान्वेंट की फ़ीस भरते रहे। सरकारी स्कूल वालो को भी वहां एडमिशन मिल जाता है। मेरे स्कूल के सारे साथियो ने वहां प्रवेश ले लिया था। बाबूजी अंत तक़ राजी नही हुए और मुझे बगल के कालेज को छोड़ कई किलोमीटर दूर स्थित साईंस कालेज मे जाना पड़ा। सिर्फ़ कबाड़ी ना बनूं इस लिये बाबूजी की इच्छा के अनुरूप एम एस सी तक़ वहां पढाई की। हालांकि ग्रेजुयेशन के तत्काल बाद हमारे एक भैया ने मेरे तेवर देख कर पत्रकार बनाने की पूरी तैयारी कर ली थीं नौकरी भी तय हो गई थी मगर तब मुझे पत्रकार बनना स्तर का नही लगता था।

पता नही क्यों जो जो नही बनना चाहा वही बनता गया। पत्रकार नही बनना चाहता था बना और वैसे ही कबाड़ी भी। एम एस सी करने के बाद लगा कि राजनीति ही अपने लिये ठीक रहेगी। तब तक़ साईंस कालेज मे अपने कबाड़ी भाईयों की दादागिरी की साख से रिकार्ड तोड़ते हुये विश्वविद्यालय प्रतिनिधि के पद पर निर्वाचित हो चुके थे। साईंस कालेज और उस इलाके मे ब्राम्हण पारा की दादागिरी चलती थी और सारे पदाधिकारी उनकी पसंद के होते थे। मै उनके विरोध के बावज़ूद चुनाव जीत गया क्योंकी 38 मे से 30 वोटर मेरे कब्जे मे थे। वो रोमांच मुझे राजनिती की ओर खींचने लगा और मां ने जब इसकी शिकायत बाबूजी से कि तो उन्होने कहा बड़ा हो गया है। अपना भला बुरा समझता है। जाने दो जो जी मे आये करे कुछ नही कर सकेगा तो कबाड़ी बन जायेगा।

राजनीति से ज़ल्द ही मोहभंग हो गया।यहां छत्तीसगढ मे उस समय शुक्ल बंधुओं का जलवा था और वीसी याने विद्याचरण शुक्ल तो जो चरण स्पर्श नही करते थे उन्हे देखते तक़ नही थे। उनका तो समझ मे आता था मगर हर कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा पैर पड़वाने मे विश्वास रखता था। अपने से ये होना ही नही था और हुआ भी नही दो एक बार बहस भी हुई। एस एफ़ आई, फ़िर विद्यार्थी परिषद और युवक कांगेस को बारी बारी से बारीकी से देखा और सबको नमस्ते कह दिया। तब तक़ बाबूजी से खर्च लेकर शान बघारा करते थे। मां अक्सर कहती थी कुछ कर रे। फिर ठेकेदारी की और साब लोगो को मुर्गा-दारू उप्लब्ध कराने की टेण्डर की पहली शर्त पूरी नही कर पाने के कारण डिबार हो गये। तभी पब्लिक हेल्थ इंजिनीयरिंग डिपार्ट मे भूजलवैज्ञानिकों का पंजियन शुरू हुआ और मै रजिस्टर्ड हाईड्रो जिओलाजिसट बन गया। टेण्डर सारे साथियों ने मिल कर डाले और बोरिंग ठेकेदार को अपने दस्तखत किये हुये सर्टिफ़िकेट देने के बदले फ़ीस लेने का नया खेल समझ मे आया। मीटर लगाकर आंय बांय शांय रीडिंग लेकर अंदाज़ से पानी का स्त्रोत बताने के मायाजाल मे मै फ़ंस नही पाया और तभी अचानक़ एक अख़बार मे रिपोर्टर की नौकरी हाथ लग गई।

ऐसा लगा कि सब सैटल हो जायेगा मगर हुआ नही। अड़ियल स्वभाव आड़े आता रहा। नौकरी लगने के साथ ही छोड़ने का सिलसिला जो तब शुरू हुआ वो आज भी जारी है। कहीं कुछ समय के लिये काम करना शुरू होता नही है कि लोग पूछने लगते है कब छोड़ रहा है। कभी दोपहर को थक कर घर जाकर सो जाओ तो मां पूछ लेती है छोड़ दिया क्या रे। ये इमेज हो गई है अपनी। खैर बाबूजी से मिलने वाली आर्थिक मदद के दम पर मै भी पाकिस्तान कि तरह निरंकुश होता चला गया। पत्रकारिता मे कुछ साल मौज करने के बाद एक दिन अचानक बाबूजी हम सब को बिलखता छोड़ कर चले गये। मै चाह कर भी उस दिन रो नही पाया। मै अचानक से जवान और ज़िम्मेदार हो गया था। मेरे नाज़ुक कंधो पर दो छोटे भाई और एक बहन का बोझ भी आ गया। मैने तत्काल कलम तोड़ी और नौकरी छोड़ कर परिवार को उसी स्तर पर चलाने के लिये दुनियादारी की चक्की मे पिसने लगा। मकान भी बिक गया, किराये के मकान मे पहुंच गये और बस चलाने मे ईमानदारी बरतने का खामियाज़ा भारी नुकसान के रूप मे उठाना पड़ा।

शुरू मे तो नये पार्टस खरीदता रहा मगर बाद मे हर पार्ट को कबाड़खाने मे ढूंढता रहा। तब कबाड़ियों ने मुझे काफ़ी मदद की। मुझे कबाड़खाने और मुहल्ला छूट जाने के बाद कई सालो तक़ कबाड़ी चौक जाने की ज़रूरत नही पड़ती थी। फ़िर से कबाड़ी चौक रोज़ जाने लगा। मौदहापारा मे रहने के कारण उस समय भी बहुत से दोस्त मौधईया और कबाड़ी कह कर चिढाते थे। बसो का काम अजीत जोगी की सरकार मे उनसे अनबन के चक्कर मे बंद ही हो गया था और एक बार फ़िर कबाड़ी चौक, कबाड़खाना और कबाड़ियों से दूरी बन गई थी। एक दिन अचानक मेल मे अशोक पाण्डे जी का संदेश देखा, उन्होने फ़ोन नम्बर मांगा था। मैने दे दिया। उसी रात अचानक एक नये नम्बर से आये फ़ोन पर आवाज़ आई मै अशोक पाण्डे। मैने कहा बोलो महाराज कहां भटक रहे हो। मै उन्हे राजनांदगांव ज़िले का पत्रकार समझ बैठा था। वे समझ गये थे कुछ गलत फ़हमी है सो उन्होने कहा कबाड़खाने वाला। अरे रे रे अशोक जी गलती हो गई। और उसके बाद बातो का सिलसिला चल पड़ा। उन्होने जब कहा कि मै आपको कबाड़खाने मे आमंत्रित कर रहा हूं और यहां लिखने वाले कबाड़ियो मे आपको शामिल करना चाहता हूं, तो समय चक्र एकदम से उल्टा घूम गया। मुझे बाबूजी के कहे शब्द याद आ गये कि कुछ नही कर पायेगा तो कबाड़ी बन जायेगा और उनका ये आशीर्वाद मुझे आज प्राप्त हो रहा है।

लो मै आज कबाड़ी बन गया।

अपनी अपनी औकात



Monday, June 15, 2009

रेगिस्‍तान के जबड़ों में दूध के दांत



इज़रायली कवि रॉनी सॉमेक की ये कविताएँ आधुनिक अवबोध और विकल्‍प चिंतन के बीच पुल की तरह झूलती हैं. उनकी कविता में भेडि़ए, हंसिए और पिस्‍तौल के बिम्‍ब जहां उस आतंक का अक्‍़स करते हैं, जो तीसरी दुनिया के तक़रीबन हर आधुनिक कवि के हिस्‍से आया है, वहीं भेड़ों और अरबी चरवाहों के पेस्‍टोरल संदर्भ कथ्‍य को स्‍मृति-बिम्‍बों वाली वह संचेतना भी बख्‍़शते हैं, जो अमूमन समकालीन रचना की अनिवार्य पनाहगाह भी बनती रही है. अगरचे उससे ग़ैर-सहमति की भी आवाज़ें उठती रहीं. नेरूदा और पॉज़ में वर्तमान और विरासत का ये द्वंद्व ख़ूब है. बहरहाल, यह दोहरी विवेक-चेतना रॉनी सॉमेक की कविताओं में पर्याप्‍त तनाव और ड्रॅमैटिज्‍़म तो पैदा करती ही है.

रॉनी सॉमेक का जन्‍म 1951 में बग़दाद में हुआ था. वे उस मुल्‍क़ के शाइर हैं, जहां से एदोनिस और सादी यूसुफ़ जैसे सुख़नवर आते रहे. 2 साल की उम्र में वे इज़राइल चले गए, लेकिन कविताएं उन्‍होंने अरैबिक में ही लिखीं. उनका संग्रह 'जास्‍मीन' 1995 में शाया हुआ. उसके बाद उनके आधे दर्जन से अधिक मज़मुए और छपे. उन्‍हें इज़राइल के प्रधानमंत्री पुरस्‍कार और येहूदा अमीख़ाई पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जा चुका है. रॉनी सॉमेक की ये कविताएँ 'द अमेरिकन पोएट्री रिव्‍यू' के जुलाई-अगस्‍त, 2000, वोल्‍यूम 29 में प्रकाशित हुई थीं.)

---------------------------------

अराद की ओर
अराद की ओर जाती भेड़ें
रेगिस्‍तान के जबड़ों में
दूध के दांत की तरह हैं
जारी है जंग
भेड़ों के बीच रहने वाला भेडि़या
अभी नहीं जन्‍मा.


आग ठहरती है लाल रंग में
दिसंबर का अंत
और सम्राट साउल एवेन्‍यू का हरापन
अपने आपमें नक़ल है पत्तियों की
और आग रुकी रहती है लाल रंग में
और पीला पीला है
आज की रात
औचक बारिश के अंतराल में
वह बात करती है
मार्टिन बूबर के बाबत
एक 'छुपी हुई रोशनी'
कार की हैडलाइट और ट्रैफिक सिग्‍नल्‍स से.
मेरे बदन में तारों की तरह
स्‍थगित हैं उसके शब्‍द
जिनके नीचे उसकी स्‍मृति सिहरती है
जैसे लहराता हंसिया.


कविता, जो चेख़ोव की पंक्तियों से शुरू होती है
पहले अंक में नमूदार होने वाली पिस्‍तौल
तीसरे में दाग़ी ही जानी चाहिए
पिस्‍तौल की नाल थूकेगी जैकेटों के बक्‍कल
लोहे की चेन और ऊँची सैंडिल पहनने वाली औरत की चाल
जो छील देगी येहूदा हेल्‍वी सड़क को
छोटे-छोटे टुकड़ों में.
इस दौरान, वह बालों को लाल रंगती है
जैसे कोई अरबी चरवाहा रंगता है अपनी भेड़ों को
कौन जाने, शायद किसी चरवाहे की बंसी ही हो
उसके सपनों का सीमांत.

(टिप्पणी और अनुवाद : सुशोभित सक्‍तावत)

परीकथा की लोकेशन यानी सौ पानियों वाला मकान

(पिछली पोस्ट से जारी)

हुनडर्टवासेरहाउस का निर्माण १९८३ से १९८६ के मध्य हुआ. इस इमारत के ५२ अपार्टमेन्ट्स सरकारी सहायता पर आश्रित लोगों के लिए बनाए जाने थे. जब फ़्राइडेन्सराइख़ हुनडर्टवासेर से इस भवन का नक्शा बनाने का अनुरोध किया गया तो यह कहते हुए कि वे एक और बदसूरत इमारत बनता नहीं देखना चाहते उन्होंने शर्त रखी कि उन पर कोई दबाव नहीं बनाया जाएगा. इसकी हामी मिलने पर ही उन्होंने काम चालू किया और यकीन मानिये इस अद्भुत शिल्प को बनाने के एवज में एक पैसा तक नहीं लिया.

हुनडर्टवासेरहाउस में कहीं भी समतल फ़र्श नहीं है. पचास से अधिक अपार्टमेन्ट वाले इस ब्लॉक के किसी भी कमरे किसी भी कोने का फ़र्श समतल नहीं है. कमरों के भीतर से उगते हुए पेड़ हैं, छत पर मिट्टी और घास है. हुनडर्टवासेर का मानना था कि अपार्टमेन्ट्स को बनाते समय आम तौर पर भविष्य में उन में रहने जा रहे लोगों के सौन्दर्यबोध का ध्यान नहीं रखा जाता. एक इन्टरव्यू में उन्होंने कहा था: "किराए के घर में रह रहे आदमी को इतनी सुविधा तो होनी ही चाहिए कि वह अपनी खिड़की से हाथ बाहर निकाल कर दीवार में लगी काई वगैरह को साफ़ कर सके. उसे यह सुविधा भी मुहैय्या करवाई जानी चाहिए कि वह एक लम्बा ब्रश लेकर अपने घर की बाहरी दीवारों को मनचाहे रंग में रंग सके. यह सब इसलिए ज़रूरी होता है कि दूर सड़क से कोई उसके घर को देखे तो कह सके कि हां जी उस घर में रहने वाला अपने तमाम पड़ोसियों से अलग किस्म का इन्सान है."

इस अजबगज़ब इमारत की हर खिड़की के बाहर अलग रंग है. किसी परीकथा की लोकेशन सरीखा यह भवन अपने सनसनीखेज़ डिज़ाइन के कारण इस कदर लोकप्रिय हुआ कि सरकारी सहायता पर आश्रित लोगों के लिए बनाए गए इसके अपार्टमेन्ट्स बाद में अमीर लोगों ने बहुत बड़ी कीमतों पर ख़रीदे.

फ़िलहाल आप वहां जाएं तो ग्राउन्ड फ़्लोर पर अवस्थित असमतल फ़र्श वाले एक शानदार रेस्त्रां में कॉफ़ी का मज़ा अवश्य लें. कुछेक अपार्टमेन्ट्स को अन्दर से देखा जा सकता है. कोई भी कमरा पूरी तरह आयताकार/वर्गाकार नहीं है. हुनडर्टवासेर कहते थे कि समतल फ़र्श तो आदमी ने बनाए. इसके पहले तो वह धरती पर ही चला करता था.

वे यह भी कहते थे कि अगर आप प्रकृति के बीच चल रहे हैं तो आप प्रकृति के मेहमान हैं और आपने सीखना चाहिए कि आपका व्यवहार एक ऐसे मेहमान का सा हो जिसकी परवरिश सभ्य लोगों के बीच हुई हो.

विएना शहर में कूड़े से बिजली बनाने का एक प्लान्ट है. इसका डिज़ाइन भी हुनडर्टवासेर ने तैयार किया था. यह भी एक पर्यटकस्थल बन चुका है. इसके बारे में फिर कभी, फिलहाल हुनडर्टवासेरहाउस की तस्वीरों का आनन्द लें.







Sunday, June 14, 2009

कैसे कैसे पानी उर्फ़ नाम में ही सब कुछ रखा है

विएना में एक दर्शनीय स्थल है हुनडर्टवासेरहाउस.मशहूर ऑस्ट्रियाई शिल्पी, चित्रकार वास्तुविद फ़्राइडेन्सराइख़ स्टोवासेर का बनाया यह अपार्टमेन्ट ब्लॉक अपने आप में एक अजूबा है. इस इमारत के बारे में अगली पोस्ट में बतलाऊंगा.
पहले इस सनकी कलाकार के नाम के बारे में कुछ बताया जाए.



फ़्राइडेन्सराइख़ स्टोवासर के पूर्वज स्लोवाक थे. स्लोवाक भाषा में 'स्टो' का अर्थ होता है एक सौ. जर्मन शब्द वासेर का अर्थ पानी. अब चूंकि ये साहब ऑस्ट्रिया में बस गए थे इन्हें यह नाम भाया नहीं. सो स्लोवाक स्टो को बदल कर जर्मन शब्द लगा लिया और बन गए फ़्राइडेन्सराइख़ हुनडर्टवासेर. फ़्राइडेन्सराइख़ शब्द के दो अर्थ होते हैं: शान्ति का देश या शान्तिप्रिय. तो उनके नाम का अर्थ हुआ: सौ पानी वाला शान्ति देश.

अधिकांश भारत की तरह हमारे कुमाऊं गढ़वाल के गांवों में भी पानी अपनी दुर्लभता के कारण बहुत बड़ी नेमत हुआ करता था. मध्य हिमालय में रहने वाली शौका जनजाति के घरों में तो सबसे पहले पानी की देवी न्युंगटांग की आराधना करने का रिवाज़ है.

तो साहब जब मैंने हुनडर्टवासेरहाउस के दर्शन पहली बार किए थे तभी से 'सौ पानी' नामक इस कलाकार के प्रति विचित्र सा अनुराग जाग्रत हुआ क्योंकि मेरे इलाके में बहुत सारी जगहों के नाम 'पानी' से समाप्त होते हैं. कुमाऊं गढ़वाल में मौजूद जो जो जगहें अभी याद आ रही हैं उनकी पूरी सूची बनाने की कोशिश करता हूं:



1 गरमपानी
2 पहाड़पानी
3 सोनापानी
4 सेनापानी
5 चोरपानी
6 डीनापानी
7 बुंगापानी
8 कालापानी
9 गच्चूपानी
10 तिमलापानी
11 तीनपानी
12 डांडापानी
13 भुम्कापानी
13 तोलापानी
14 पीपलपानी

... फ़िलहाल इतना ही. आप लोग इस लिस्ट को बड़ा बनाने में सहयोग देंगे तो आनन्द रहेगा. ज़रूरी नहीं कि ये नाम उत्तराखण्ड से ही हों. बस ज़रा लोकेशन वगैरह बता पाएंगे तो बेहतर.

(फ़ोटो: ऊपर हुनडर्टवासेरहाउस, नीचे दिल्ली से रानीखेत और अल्मोड़ा को जाने वाले रास्ते में एक पड़ाव जहां के सन्नाटेदार रायते का ज़िक्र कई ट्रैवेलॉग्स के अलावा मनोहर श्याम जोशी और शिवानी के गद्य में बिखरा पड़ा है. हुनडर्टवासेरहाउस पर एक पोस्ट कल देखिए.)

रतनपुर की कुछ तस्वीरें

इस बार कई सालों के बाद रतनपुर (छतीसगढ़) जाना हो सका .
प्रस्तुत हैं वहाँ ली गईं कुछ तस्वीरें


छूटी पढ़ाई - लिखाई - खेल
देखो बच्चा बेच रहा है बेल


थोड़ा यथार्थ - थोड़ी माया
जल में देवस्थल की छाया
ऊँचाई -ऊपर से ही शहर
दीखता है भला - सुन्दर

ऊपर शिखर पर ईश्वर
नीचे मनुष्यों का घर

सड़क के किनारे की सूनी दुकान
ग्राहक देवता ! आ जाओ सिरीमान

Saturday, June 13, 2009

टॉमी बाबू का मुक्का

कल इत्तेफ़ाक़न आलोक के घर जाना हुआ. कुछ सालों बाद.

आलोक मेरे सबसे पुराने दोस्तों में है. कॉलेज के ज़माने में उसके घर में मौजमस्ती के कई क़िस्से अब तक याद हैं. बेहद ज़िन्दादिल इन्सान आलोक के पापा अब साठ के पार हैं. इसके बावजूद उनकी उपस्थिति हमारी दावतों वगैरह में कभी आड़े नहीं आती थी - यानी न कोई झेंप न डर. बल्कि वे खुद हमारे साथ हम जैसे बन जाया करते थे. और क्या तो उनके किस्सों की खानें खुल जाया करती थीं.

उनके साथ फिर बड़े यादगार क्षण बीते. पहले तो वे अपने पीठ के दर्द का मज़ाक बनाते रहे कि इस दर्द ने उन्हें हल्द्वानी का रामलीला मैदान बना लिया है, जहां चाहे वहां पहुंच जाता है वगैरह. बातों का सिलसिला दरअसल एक साहब के ज़िक्र से चालू हुआ. अंकल के साथ जवानी के दिनों में (हालांकि मैं तो मानता हूं कि अंकल अब भी जवान ही हैं) भीषण लुत्फ़ काट चुके इन साहब ने राजनीति में हाथ आजमाए और भगवा सरकार में मंत्री के ओहदे पर विराजमान हैं हमारे राज्य में. मंत्री महोदय अब खुले में दारू पीने से गुरेज़ करते हैं क्योंकि इमेज का चक्कर पड़ता है. खुले में दारू पीना मंत्री जी ने काफ़ी पहले बन्द कर दिया था लेकिन एक ज़माना था ...

मंत्री को छोड़िए साहब. बातों बातों में मंत्री से होते होते बात अंकल के अंतरंग यारसमूह तक पहुंच गई. और ज़िक्र आया टॉमी बाबू का. गोश्तखोरी में विश्वरेकॉर्ड कायम कर चुके टॉमी बाबू अच्छे कुक थे. तीनेक दोस्त इकठ्ठा हुए और बन गया मीट-भात का प्रोग्राम. यह तय होता था कि मीट टॉमी बाबू ही पकाएंगे. यह दीगर है कि यारों को टॉमी बाबू की यह हरकत कतई पसन्द नहीं थी कि पकते पकते दो किलो मीट सवा किलो रह जाता था. कलेजी के टुकड़े तो टॉमी बाबू कच्चे खा जाया करते थे. हांडी चढ़ते ही मिनट-मिनट पर एक टुकड़ा निकाल कर चखने और "ऐल नि पक" (कुमाऊंनी में "अभी नहीं पका") एनाउन्स करने का सिलसिला बंध जाता. टॉमी बाबू चूंकि बढ़िया कुक थे सो दोस्त बरदाश्त कर लेते.

टॉमी बाबू हैन्डसम आदमी थे. लम्बा कद. एथलीट सरीखी देह. और बदन में ताकत इतनी कि किसी के गालों पर घूंसा मारें तो समझ लीजिए दो-चार दांत गए और छः-सात लगे टांके. दरअसल खाली समय में टॉमी बाबू एक अन्य मित्र की राशन की दुकान पर दीवार से सटा कर रखी डली वाले नमक की बोरियों पर बॉक्सिंग प्रैक्टिस करते थे.

हल्द्वानी शहर में डंका बजता था टॉमी बाबू के मुक्के का.

होली आती तो होलिका दहन के लिए लकड़ी कम पड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता था. टॉमी बाबू मित्रों के साथ सदर बाज़ार में निकलते और अपनी मर्ज़ी के हिसाब से किसी दुकान के आगे धरे तखत या बेन्च को उठवा लेते या कुर्सी मेज़ को. लकड़ी अब भी कम होती तो जो भी पहला बन्द दरवाज़ा मिलता टॉमी बाबू उस पर एक मुक्का मारते और उनका अनुसरण करते दोस्त टूटे दरवाज़े को लाद ले जाते. दरवाज़ा बन्द करे भीतर बैठे/सोये/खाते/पीते लोग चूं भी नहीं करते थे. "टॉमी बाबू होंगे!" यानी ये साख थी टॉमी बाबू के मुक्के की. लोग उसकी आवाज़ तक पहचानते थे.

अंकल के आराम का बखत होता है और वे भीतर चल देते हैं. मेरे इसरार पर आलोक अपने पापा-मम्मी की शादी की अल्बम निकाल लाता है. उसी में से बारात की दो तस्वीरें आपके अवलोकन हेतु लगा रहा हूं.

टॉमी बाबू पहचान में आ रहे हैं आपकी?

क्लू ये है कि उनकी मूंछें हैं और उन्होंने बैन्ड वाले का टोप पहना हुआ है.



Thursday, June 11, 2009

एक तस्वीर नैनीताल से



यह तस्वीर पर्यटक नगरी नैनीताल के व्यस्त तल्लीताल रिक्शा स्टैंड पर खींची गई थी. टूरिस्ट सीज़न आने के साथ साथ धन्धे-पानी की जुगत में तमाम तरह के लोग नैनीताल पहुंचा करते हैं. ये साहब भी उन्हीं में से हैं. एक अदद एयरबैग, एक वायलिन, एक थाली और स्मृति में कुछ कुमाऊंनी गीत.

दिलचस्प लगे. सो तस्वीर आपके साथ साझा करने का मन हुआ.

Wednesday, June 10, 2009

क्या कहता है पिकासो का बुल !























खबर है कि पिकासो म्यूजियम पेरिस से पिकासो की एक स्कैचबुक चोरी हो गई है। जाहिर है इसकी कीमत करोड़ों में हैं। यहां पिकासो की बुल श्रृंखला की ग्यारह कलाकृतियां दी जा रही हैं। इसकी खूबसूरती यह है कि कैसे इस महान चित्रकार ने एक ठोस और जीवंत बुल को एक रचनात्मक प्रक्रिया में कितना अमूर्तन करके उसे एक नया रूप दे दिया है। यह उनकी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता का एक अद्भुत और बेमिसाल खेल है। शुरूआत में एक ठोस, खुरदुरा और आक्रामक बैल है। आप गौर करेंगे इसे पहले ब्रश के सधे ट्रीटमेंट से टोनल इफेक्ट दिया है ताकि उसे ठोस और उसकी त्वचा को खुरदुरापन दिया जा सके। और इसके बाद वे धीरे धीरे अपनी अचूक निगाह से उसे, सधी रेखाओं से, रूप के स्तर पर प्रयोग करते हुए. संतुलन साधते हुए लगातार नया रूप देते चलते हैं। वे उसके शुरुआती आकारों में से कुछ चीजें मिटाते चलते हैं धीरे धीरे जैसे जैसे यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है वे नई चीजें जोड़ते चले जाते हैं। मुंह से लेकर सींग, धड़ से लेकर पीछे के हिस्से और पैर से लेकर पूँछ तक वे नए नए आकार गढ़ते हैं और ठोस और जीवंत प्राणी को ऐसा अनोखा रूप देते हैं जो अपने में अमूर्त है लेकिन बावजूद इसके अपने कुछ बुनियादी तत्वों के साथ वह कितना कलात्मक है।

पिकासो ने अपने कई चित्रों में बैल को रूपक की तरह इस्तेमाल किया है। इस श्रृंखला के बारे में भी कहा जाता है कि उन्होने इसके जरिये फासिज्म और बर्बरता पर टिपप्णी की है तो यह भी कहा जाता है कि यह आक्रामकता की अभिव्यक्ति है। कहा तो यह भी जाता है कि यह उनकी सेल्फ इमेज है। यह गौर करने लायक यह बात है कि वे बैल के जननांगों को काले रंग से हाईलाइट कर उसके जेंडर पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करते हैं। वे बैल की मांसपेशियों को रिड्यूस करते हैं, मुंह को और सिर को भी। सींग में बदलाव देखा जा सकता है औऱ पूंछ में भी। इन दोनों में एक तरह की लयात्मकता है, लगभग लिरिकल। फिर आप यहां रेखाओं का इतना कल्पनाशील इस्तेमाल भी देखा जा सकता है जिसकी बदौलत यह प्राणी कई टुकड़ों में बंटा दिखाई देता है लेकिन साथ ही आकार में एकता है। वे लगातार इस आकार को सरल करते जाते हैं और आखिर में वह आकार इतना सरल हो जाता है कि सिर्फ रेखाओं में स्पंदित रहता है और उसकी खूशबू बरकरार रहती है।

आप इस महान चित्रकार की ताकत, उसकी यौनिकता, उसके रूपक, उसकी निगाह, उसकी प्रयोगधर्मिता, और रेखाओं के जादू का मजा लें और यह भी सोचें कि क्या कहता है पिकासो का यह बुल!

पिकासो के बहुत ही सरल और खूबसूरत रेखांकनों पर एक पोस्ट जल्द ही।

स्रोत: आर्टफैक्ट्री

'द डिसाइसिव मोमेन्ट': फ़ोटोपत्रकारिता के जनक ब्रेसों के कुछ फ़ोटोग्राफ़

फ़ोटोग्राफ़ी में एक खास मूड, एक खास क्षण को पकड़ा जाना सबसे महत्वपूर्ण होता है. तकनीकी भाषा में इसे decisive moment कहा जाता है. ब्रेसों का कथन है: "There is nothing in this world that does not have a decisive moment."

फ़्रांसीसी मूल के ओनरी कार्तिएर ब्रेसों (२२ अगस्त १९०८ - ३ अगस्त २००४) को आधुनिक फ़ोटोपत्रकारिता का जनक माना जाता है. उनके बारे में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि फ़ोटोपत्रकारों की कई पीढ़ियां उनसे प्रभावित रहीं और अपने जीवन काल में ही वे एक कल्ट के तौर पर स्थापित हो चुके थे.

इन्दौर में रहने वाले श्री सुशोभित सक्तावत ने मुझे ब्रेसों के कुछ फ़ोटोग्राफ़ मेल से भेजे. क्यों न उन्हें आप के साथ शेयर किया जाए.


मशहूर शिल्पकार अल्बेर्तो ज्याकोमेती एक प्रदर्शनी में


चीन, दिसम्बर १९४८


फ़्रांस, १९६८


फ़्रांस,१९३२


फ़्रांस, १९३२


फ़्रांस, द वार डिपार्टमेन्ट


वडोदरा, गुजरात, १९४८


इटली, १९५१


हाइड पार्क, लन्दन, १९३७


विख्यात पेन्टर ओनरी मातीस अपने घर में


मैक्सिको सिटी, १९३४


पेरिस, १९५९


लूसियाना, अमेरिका, १९४७

मैनहटन, अमेरिका, १९४७

"Photography is not like painting, There is a creative fraction of a second when you are taking a picture. Your eye must see a composition or an expression that life itself offers you, and you must know with intuition when to click the camera. That is the moment the photographer is creative.Oops! The Moment! Once you miss it, it is gone forever." - ब्रेसों (द वॉशिंगटन पोस्ट को दिए गए एक इन्टरव्यू का हिस्सा, १९५७)

एक तरह से सुशोभित सक्तावत साहब की ही वजह से यह पोस्ट लगाई जा रही है, सो उन्हें शुक्रिया भी!

Tuesday, June 9, 2009

गांव का नाम थिएटर, हमार नाम हबीब !


हबीब तनवीर जीते जी एक किंवदंती बन चुके थे। समकालीन भारतीय रंगमंच परिदृश्य में उनकी उपस्थिति एक ऐसे रंगकर्मी की रही है जिन्होंने नाटक को एक नया मुहावरा दिया। एक ऐसी रंगभाषा दी जो अपनी ताकत के लिए अपनी जड़ों से रस लेती है लेकिन आधुनिक संवेदना के साथ थरथराती है। इसीलिए उनके नाटक अपनी आत्मा का उजाला लोक से ग्रहण करते थे लेकिन उनका कथ्य-रूप इतना आधुनिक था कि वे अधिक से अधिक लोगों से तादात्म्य स्थापित कर लेता था। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ से लेकर पूरे हिंदुस्तान में और विदेशों में उन्हें जो सराहना मिली, वह अतुलनीय है। नया थिएटर के साथ उन्होंने जो गंभीर काम किए उसमें जबर्दस्त लोकप्रियता मिली और वे अपने उन प्रयोगों में कामयाब भी हुए। यही कारण है कि जब जर्मनी में इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल 1992 में उन्होंने अपना नाटक चरणदास चोर खेला तो पुरस्कृत हुआ था।

श्री तनवीर ने नया थिएटर और छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के साथ प्रयोग करते हुए जो नई और रोचक रंगभाषा ईजाद की उसके पीछे सिर्फ प्रयोगधर्मिता ही नहीं थी बल्कि अपनी जड़ों को खोजते हुए नाटक का वह रूप हासिल करना था जो लोक से गहरा जुड़ा होकर भी अपने कथ्य और रूप में उतना ही आधुनिक भी हो। यही कारण है कि उनके प्रयोग करने के पीछे सिर्फ नया और प्रयोग करने की मंशा ही नहीं थी बल्कि यह प्रयोगधर्मिता एक गहरी रचनात्मक बेचैनी का नतीजा थी। यह कितने आश्चर्य की बात है कि एक युवा रंगकर्मी इंग्लैंड में रायल एकेडमी आफ ड्रामेटिक आर्ट से ट्रेनिंग लेता है, यूरोप घूमकर नाटक देखता है लेकिन भारत वापस आकर वह अपने नाटकों के लिए किसी यूरोपीय नाट्य रूपों की नकल नहीं करता बल्कि वह नाचा से लेकर पंडवानी जैसे फोक फार्म का बहुत ही कल्पनाशील इस्तेमाल करता हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के ही कलाकारों के साथ काम किया जो प्रोफेशनल अभिनेता नहीं थे और यही कारण है कि उनके नाटकों में इम्प्रोवाइजेश गजब का मिलता है। यह एक ऐसा लचीला रूप था जिसमें कलाकार को अपने को व्यक्त करने के लिए एक अनौपचारिक और चुनौतीपूर्ण मौका मिलता था। उनके कलाकार अभिनय करते थे, गाते थे और मौके पर नाचने भी लगते थे। कहने की जरूरत नहीं कि उनके नाटक लोकरंजक थे।

एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्में हबीब तनवीर ने नागपुर और अलीगढ़ में शिक्षा हासिल की। 1945 में वे मुंबई चले गए । आल इंडिया रेडियो से जुड़े। हिंदुस्तानी थिएटर में रंगकर्म किया और बच्चों के लिए नाटक किए लेकिन हबीब तनवीर जब इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) और प्रगतिशील लेखक संघ (पीडब्ल्यूए ) से जुड़े तो जाहिर है, वे अपने समय, समाज और शोषित-वंचितों के प्रति प्रतिबद्ध हुए। इन दोनों संस्थाओं से जुड़ने से उन्हें विचारधारात्मक प्रखरता मिली। यही कारण है कि सही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समझ विकसित हुई जिसका उन्होंने अपने नाटकों के चयन से लेकर उनके निर्माण तक में मदद ली। उन्होंने अपने लिए जो नाटक चुने वे सामाजिक स्तर पर बहुत ही मानीखेज थे लेकिन अपनी अचूक और संवेदनशील रंग दृष्टि की बदौलत उन्होंने इसे कलात्मक ऊंचाईयां भी दी। यानी कंटेंट के साथ ही उन्होंने लगातार प्रयोग किए और अपनी असंदिग्ध प्रतिबद्धता से लगातार और ठोस कोशिशें कीं और नाटकों को नया रूप दिया।
इप्टा और प्रेलसं से जुड़ने के साथ ही उनमें संगीत और कविता में गहरी दिलचस्पी थी। जोश से लेकर मीर, गालिब और फैज की शायरी हो या नजीर अकबराबादी की कविता या फिर समकालीन आधुनिक कवि। वे कविता से गहरे जुड़े रहे। इसीलिए उन्होंने 1954 में आगरा बाजार नाटक किया। यह नजीर अकबराबादी के जीवन और समय पर आधारित था। इसमें एक बाजार के जरिये उन्होंने बहुत ही खूबी के साथ तत्कालीन सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक विद्रूपताओं को मुखर लेकिन कलात्मक अभिव्यक्ति दी। इसे बहुत सराहा गया। 1959 उन्होंने नया थिएटर की स्थापना की और लोक कलाकारों के साथ काम करने की प्रतिबद्धता जाहिर की। इसके बाद उन्होंने शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम को छतीसगढ़ में खेला। फिर गांव नाम ससुराल, मोर नाम दामाद नाटक किया। चरनदास चोर नाटक तो उनका इतना हिट रहा कि इसके कई शोज हुए और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली।
हबीब तनवीर इतने विलक्षण रंगकर्मी थे कि उन्होंने संस्कृत से लेकर यूरोप के कई नाटकों को छतीसगढ़ में खेला और और अपनी रंगदृष्टि तथा अद्बुत रंगकौशल से यह साबित किया कि किस तरह से क्लासिक और विदेशी नाटकों को ठेठ लोक कला से जोड़कर मनोरंजक, मोहक और मारक बनाया जा सकता है। शेक्सपीयर के मिडसमर्सनाइट ड्रीम को उन्होंने कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना नाम से खेला। हिरमा की अमर कहानी के साथ ही उन्होंने समाज के संवेदनशील मुद्दों पर नाटक खेले। बहादुर कलारिन और पोंगा पंडित नाटक को लेकर तो विवाद हुआ और कई बार पोंगा पंडित के प्रदर्शन रोके गए क्योंकि यह पोंगापंथी और पाखंडियों पर तीखा प्रहार करता है। भोपाल गैस त्रासदी पर भी उन्होंने नाटक किया-जहरीली हवा। उनका एक नाटक और मशहूह हुआ । जिस लाहौर नई देख्या वो जन्माई नाही। वस्तुतः कहानीकार असगर वजाहत ने पहले कहानी लिखी थी। जब हबीब तनवीर ने यह पढ़ी तो उनकी अचूक रंगदृष्टि ने उसमें छिपे नाटकीय तत्वों और रूप की तुरंत पहचान की और उन्हें सुझाव दिया कि इसे नाटक के रूप में लिखा जाना चाहिए। असगर वजाहत ने इसे नाटक में बदला और वह हिट रहा। यह नाटक वस्तुतः सांप्रदायिकता पर चोट करता है और एक साझा संस्कृति की वकालत करता हुआ उदात्त मानवीय मूल्यों को खूबसूरती से अभिव्यक्त करता है।
वे जर्मनी के महान नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त से खासे प्रभावित थे और उनकी नाट्य युक्तियों को अपने नाटकों में कल्पनाशील इस्तेमाल कर समृद्ध किया। वे अभिनेता भी बेजोड़ थे। उनकी आवाज भी गजब की थी। रांगेय राघव के उपन्यास कब तक पुकारूं से लेकर फिल्म ये वो मंजिल तो नहीं में उन्होने सशक्त अभिनय भी किया। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में भी काम किया। मंगल पांडे में उन्होंने बहादुर शाह जफर की भूमिका निभाई और ब्लैक एन व्हाईट में भी। चरनदास चोर पर श्याम बेनेगल ने एक फिल्म भी बनाई थी। 2005 में उन पर एक वृत्तचित्र भी बनाया गया था जिसका शीर्षक है- गांव का नाम थिएटर, हमार नाम हबीब।।
रंगकर्म के इलाके में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी, संगीत नाटक अकादमी की फैलोशिप, पद्मश्री, पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। कहने की जरूरत नहीं कि भारतीय रंगकर्म की बात उनके बिना हमेशा अधूरी रहेगी।

चोप्ता का मौसम, बंबई का फैशन



एक चिड़िया है, जिसे मैं नहीं देख पाया। सुबह से शाम तक लगातार कोमल सुर में मुझी से कहती है- तुई...तुइतुइ...तुई....तुइतुइ। इतना अंतरंग बोलती थी कि किसी अपरिचित से नाम पूछने का मन नहीं हुआ।

फिर ठिठुरती चांदनी में केदार के ऊपर सूनी सफेदी याद आती है और अदहन के उबाल खाने के पहले की सनसनाहट जो हर दोपहर ढलने के साथ कनपटी पर महसूस होती थी....यानि अब बारिश होने वाली है। ...और जंगल जहां अब भी तनों पर लाइकेन का मखमल बचा हुआ है। हरा अंधेरा है जिसके निर्जनपन में भय और शांति एक दूसरे के कंधों पर हाथ डाले हर दिन लकड़ी बीनने या घास काटने के लिए जाते हैं।

सेत्ताराम...अगड़धत्त भोले ने बुलाया है। ढेरों साधु थे, किसिम-किसिम के जो बताते थे बेरोजगारी और पारिवारिक कलह समकालीन अध्यात्म की दो सबसे बड़ी मल्टीनेशनल फैक्ट्रियां है। किसी वरदान की आशा में उन्हें बूटी का पता बताते इंटर पास नौजवान थे जो एक सिगरेट की साझेदारी के तुरंत बाद यह पूछ कर असहाय कर देते थे कि सर उधर नीचे मुझे कोई जॉब मिल सकता है क्या?

उनकी ज्यादातर बातें भैणचो के कसैलेपन या अविश्वास के खूंट में बंधी मां कसम से शुरू या खत्म होती थीं...वे बुग्यालों में कुदरत के नखरों पर ध्यान दिए बगैर अपनी गाय, भैंसों के पीछे कोई पचास मीटर ऊपर चढ़ते थे और सुस्ताने के लिए लद्द से ढह पड़ते थे। नीचे सड़क पर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, जयपुर, अहमदाबाद के नंबर प्लेटों वाली प्राइवेट गाड़ियां थीं जिनसे निकले देसी टूरिस्ट बाबू अपने अकड़े पैरों को सीधा करते हुए कांखते थे- वाऊ यहां क्या लाइफ है।

मैं पिछले दस दिन वहीं था। चोप्ता घाटी के दुगलभिट्टा की एक कोठरी में। लिमड़े की सब्जी जिंदगी में पहली बार खाई। देखने में चौलाई और भिंडी जैसा स्वाद। चूल्हे की राख का भभूत पोते मड़ुए की रोटी कोई पंद्रह साल बाद।

मैं अब भी वहीं हूं। जहां मक्कू और ताला के लड़के लड़कियां हाइस्कूल में थर्ड डिवीजन पास होने की खुशी में बधाई देने पर थैंक खू कह कर शरमाए जा रहे हैं। कुछ और देर वहीं रहना चाहता था लेकिन कबाड़खाने के संचालक अशोक ने आज शाम काफी खतरनाक अंदाज में धमकाया इसलिए यह सब लिखना पड़ रहा है।

हां, पूरे दिन में एक बार धारी माता की विनती करती एक बस आती जिस पर लिखा होता था न्यूनतम किराया- पांच रूपए और आपका व्यवहार ही आपका परिचय है। उसमें एक गाना बजता था जिसमें दिल्ली में नई सरकार के गठन का रहस्य छिपा हुआ था-

हाथ न पिलाइ हुसुकि, फूल न पिलाइ रम।
हाथ प्याग निर्दली दिदौन, कच्ची में टरकाया हम।