शंभू राणा के नाम से कबाड़खाने के
पाठक भली भाँति परिचित हैं. इस अघोरी संत आदमी के लेखन के दीवाने जहान भर में पसरे
हुए हैं. ‘नैनीताल समाचार’ ने इस साल शंभू के आलीशान लेखों की किताब ‘माफ़ करना हे
पिता’ का प्रकाशन किया है. कवर पर विन्सेंट वान गॉग के कव्वे छपे हुए हैं. इस
उपलब्धि के लिए कबाड़खाना जनाब शम्भू राणा और ‘नैनीताल समाचार’ को बधाई देता है.
हिन्दी के अच्छे पाठकों के लिए यह
एक संग्रहणीय किताब है. किताब प्राप्त करने का तरीका पोस्ट के आखीर में बताया जा
रहा है.
पाठकों को याद होगा शंभू के कई लेख
इस ब्लॉग पर पहले से हैं. आज उन्हीं में से एक को पुनः लगा रहा हूँ.
माफ़ करना हे पिता
सभी
के होते हैं, मेरे भी एक (ही) पिता थे. शिक्षक दिवस सन् २००१ तक मौजूद रहे. उन्होंने ७१-७२ वर्ष की उम्र तक पिता का रोल किसी घटिया अभिनेता की तरह निभाया मगर
पूरे आत्म विश्वास के साथ. लेकिन मैं उन्हें एकदम ही ‘पीता’
नहीं कहने जा रहा. इसलिये नहीं कि मेरे बाप लगते थे बल्कि इसलिये कि
चाहे जो हो आदमी कुल मिलाकर कमीने नहीं थे. किसी भी आदमी का यही एक ‘दुर्गुण’ बाकी सारे ‘गुणों’
पर भारी है. बाकी शिकायत, बल्कि शिकायतों का
कपड़छान तो यही कि उन्होंने पिता के रोल की ऐसी तैसी करके रख दी. न जाने किस
बेवकूफ ने उन्हें बाप बना दिया.
उनका
बारहवाँ और वार्षिक श्राद्ध तो मैं हरिद्वार जाकर कर आया था उधार और चंदे के पैसों
से, जैसा भी बन पड़ा. आज
सोचता हूँ कि कलम से भी उनका तर्पण कर दूँ. ऊपर मैंने शिकायतों का जिक्र किया
लेकिन यह तर्पण जाहिर सी बात है श्रद्धावश ही है, शिकायतन
नहीं.
पिता
का मेरा साथ लगभग ३२ वर्षों तक रहा, लगभग मेरे जन्म से उनकी मृत्यु तक. माँ का साथ काफी कम और वह भी किस्तों
में मिला. पिता के साथ यादों का सिलसिला काफी लम्बा है. यादें देहरादून से शुरू
होती हैं. मेरी पैदाइश भी वहीं की है. यादें आपस में गुड़-गोबर हुई जा रही हैं,
कौन पहले, कौन बाद में. लेकिन शुरू कहीं से तो
करना पड़ेगा ही. सबसे पहले दिमाग में जो एक धुँधली सी तस्वीर उभरती है वह यूँ है-
गर्मियों के दिन हैं, पिता बेहद हड़बड़ी में दोपहर को घर आते
हैं. शायद दफ्तर से इजाजत लिये बिना आये हैं. मैं बीमार हूँ. मुझे कम्बल में लपेट
कर दौड़े-दौड़े डॉक्टर के पास ले जाते हैं. डॉक्टर मुझे सुई लगाता है. पिता लौट कर
माँ से कहते हैं- "डॉक्टर कह रहा था कि आधा घंटा देर हो जाती तो बच्चा गया था
हाथ से." उस दिन तो बच्चा हाथ आ गया पर फिर कभी उनके हत्थे नहीं चढ़ा.
एक
और तस्वीर है यादों के एलबम में ... बारिश हो रही है, सड़क में एड़ियों से ऊपर तक पानी
भरा है. मुझे उल्टी-दस्त हो रहे हैं और पिता भीगते हुए पब्लिक नल में सरे बाजार
मुझे धो रहे हैं. इन दोनों घटनाओं का जिक्र उन्होंने अपने अंतिम समय तक अक्सर किया
कि ऐसे पाला तुझे मैंने. ऐसी बातें सुनकर अपने भीतर से अपना ही कोई अनाम/अदृश्य
हिस्सा बाहर निकल कर सजदे में गिर जाता है. और हो भी क्या सकता है. ऐसी बातों का
कैसा ही जवाब देना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि बदतमीजी भी.
मैं एक आदर्श बेटा नहीं, मगर ‘राग
दरबारी’ का छोटे पहलवान भी नहीं हो सकता जो अपने बाप कुसहर
प्रसाद से कहता है कि हमने लिख कर तो दिया नहीं कि हमें पैदा करो. तो पिताजी
महाराज, ऋणी हूँ तुम्हारा और इस ऋण से उऋण होने की कोई सूरत
नहीं. न तुम्हारे जीते जी था, न आज हूँ किसी लायक. जब तक रहे
तुम पर आश्रित था आज दोस्तों पर बोझ हूँ. इंसान के अंदर जो एक शर्म नाम की चीज
होती है, जिसे गैरत भी कहते हैं, मैंने
उसका गला तो नहीं दबाया पर हाँ, उसके होटों पर हथेली जरूर
रखे हूँ. शर्म आती है लेकिन जान कर बेशरम बना हूँ. सच कहूँ तुम्हारे जाने के बाद
स्थितियाँ ज्यादा खराब हुई हैं. परिस्थितियों के डार्क रूम में किसी नैनहीन सा
फँसा पड़ा हूँ. कामचोर तो नहीं पर हाँ, एक हद तक निकम्मा
जरूर हूँ.
लेकिन
यह उऋण होने का खयाल मेरे मन में आ ही क्यों रहा है ? मैं तो इस खयाल से सहमत ही नहीं
कि माँ-बाप के ऋण से कोई उऋण भी हो सकता है. क्या यह किसी लाले बनिये का हिसाब है,
जिसे चुका दिया जाये ? हाँ, लाला बोले, कितना हिसाब बनता है तुम्हारा ? हाँ, यार ठीक है ‘वैट’ भी जोड़ो, डंडी मार लो, छीजन
काट लो, औरों से दो पैसा ज्यादा लगा लो और कुछ ? हाँ, अब बोलो दो दिन देर क्या हुई यार कि तुमने तो
चौराहे पर इज्जत उतार ली. लो पकड़ो अपना हिसाब और चलते-फिरते नजर आओ. आज से
तुम्हारा हमारा कोई रिश्ता नहीं. अब ऋण तो कुछ इसी तर्ज में चुकता किया जाता है.
क्या माँ-बाप से इस जबान में बात करनी चाहिये ? मैं तो नहीं
कर सकता. क्यों न हमेशा उनका कर्जदार रहा जाये और एक देनदार की हैसियत से खुद को
छोटा महसूस करते रहें. माँ की प्रसव पीड़ा और पिता का दस जिल्लतें झेल कर परिवार
के लिये दाना-पानी जुटाने का मोल तुम चुका सकते हो नाशुक्रो कि उऋण होने की बात
करते हो ?
शहर
वही देहरादून, मोहल्ला
चक्कूवाला या बकरावाला जैसा कुछ. पास में एक सूखा सा नाला या नदी है, जहाँ खास कर सुबह के वक्त सुअर डोलते हैं. कतार में मिट्टी गारे से बनी
खपरैल की छत वाली चार-छः कोठरियाँ हैं. हर कोठरी में अलग किरायेदार रहता है. कोठरी
के भीतर एक दरवाजा है, जो इस कोठरी को उस से जोड़ता है. यह
दरवाजा अपनी-अपनी ओर सब बन्द रखते हैं. बाहर-भीतर जाने का दरवाजा अलग है. एक दिन
माँ इस दरवाजे की झिर्री में हाथ डाल कर दरवाजे के उस ओर रखे कनस्तरों तक पहुँचने
की कोशिश कर रही है. झिर्री काफी छोटी है, न उसका हाथ पहुँच
पाता न मेरा. इस ओर कनस्तर खाली हैं. मुझे भूख लगी है, शायद
माँ भी भूखी है. पिता कहाँ हैं, कनस्तर क्यों खाली हैं,
पता नहीं. याद नहीं. इस चित्र के चित्रकार भी तुम्हीं हो पिता मेरे.
इस तस्वीर को मैं नोंच कर फेंक नहीं सकता एलबम से. लेकिन यह सब कह कर आज तुमसे
शिकायत नहीं कर रहा. ऐसा करके क्या फायदा. वैसे भी तुम कभी घरेलू मामलों में
जवाबदेह रहे नहीं. सूचना का अधिकार तुम पर लागू नहीं होता था. शिकायत या कहो कि
झुँझलाहट मुझे खुद पर है कि मैं इस चित्र का कोई रचनात्मक उपयोग नहीं कर पाया. तब
से आज तक यह अनुभव दिमाग की हंडिया में बस खदबदा रहा है. मैं इसे दूसरों के आगे
परोसने लायक नहीं बना पाया कि औरों की तृप्ति से मेरा असंतोष कम हो. ऐसी बातों को
यूँ सपाटबयानी में कहने से दूसरों के दिलों में सिर्फ दया ही उपजती है जो कि अपने
काम की नहीं. अब ऐसा भी नहीं कि हर चीज हमेशा काम की न होती हो, दया-ममता लड़कियों के भी तो नाम होते हैं.
इसी
कोठरी में मुझसे तीनेक साल छोटी बहन लगभग इतनी ही उम्र की होकर गुजर जाती है. उससे
कुछ समय बाद, जब एक दोपहर
पिता मुझे डॉक्टर के पास ले गये थे. बीमार हम दोनों थे, वह
कम मैं ज्यादा. उस बच्ची का नाम याद है, गुड्डी था. माँ,
पिता और मेरी जो एक मात्र फोटो मेरे पास है, उसमें
वह भी माँ की गोद में है- शहद वाला निप्पल चूसती हुई. पिता कुर्ते की बाँहें समेटे
मुझे गोद में लिये बैठे हैं. मैंने उस वक्त किसी बात पर नाराज होकर अपना एक हाथ
अपने ही गरेबान में अटका लिया था. वह हाथ आज भी वहीं टँगा है. वैसे मुझे याद नहीं,
पर इस तस्वीर को देख कर पता चलता है कि माँ की एक आँख दूसरी ओर
देखती थी. दो भाई-बहन मुझसे पहले गुजर चुके थे, दो मेरे बाद
मरे. मुझमें पता नहीं क्या बात थी कि नहीं मरा. बाद में पिता ने कई बार मन्नत
माँगी कि तू मर जाये तो मैं भगवान को सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँ. यार, नंगा करके चौराहे पर सौ दफे जुतिया लो, पर ऐसी ‘बेइज्जती खराब’ तो मती करो ! प्रसाद की रकम पर मुझे
सख्त ऐतराज है. कुछ तो बढ़ो. मैं इंसान का बच्चा हूँ भई, चूहे
का नहीं हूँ. सवा रुपये में तो कुछ भी नहीं होगा, बुरा मानो
चाहे भला. इंसान की गरिमा और मानवाधिकार नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं ?
भगवान से या शैतान से, जिससे मर्जी हो कह दो
कि जो चाहे उखाड़ ले, सवा रुपये में तो हम किसी भी सूरत नहीं
मरेंगे. भूखे नंगे रह लेंगे, मरेंगे नहीं. प्रसाद खाकर
तुलसीदास की तरह मस्जिद में सो रहेंगे.
फिर
याद आता है कि माँ मायके चली जाती है. न जाने कितने अर्से के लिये और क्यों. मैं
पिता के पास क्यों रह जाता हूँ जब कि उस उम्र के बच्चे को माँ के पास होना चाहिये ? पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगते
हैं. दफ्तर में दो-एक लोगों की आज भी याद है. एक दीक्षित जी थे, थोड़ा मोटे से, शकल याद नहीं. बड़ी ही संक्रामक हँसी
हँसते थे. एक जल्ला सिंह थे पिता की तरह चपरासी (बकौल पिता- ‘चढ़ बेटा फाँसी’). शायद कांगड़ा के रहने वाले थे.
जल्ला सिंह एक दिन घर से आयी चिट्ठी पढ़ रहे थे. उसकी एक पंक्ति याद है- कमर
झुकाने का समय है, छुट्टी लेकर आ जाओ. मैंने पिता से इसका
मतलब पूछा, उन्होंने बताया कि खेती-बाड़ी का समय है. धान यूँ
झुक कर रोपते हैं. जल्ला सिंह को आज भी ग्रुप फोटो में नामों का क्रम देखे बिना
पहचान लेता हूँ. पिता अर्थ एवं संख्या (सांख्यिकी) विभाग में थे. उनके कहे मुताबिक
डी.एम. साला उनके विभाग के बिना दो कदम नहीं चल सकता. सारे डाटा हमारे पास होते
हैं. डी.एम. हम से घबराता है.
शाम
लगभग सात-आठ बजे का समय है. पिता खाना बना रहे हैं, मैं बरामदे में खेल रहा हूँ. गेट खोल कर ऑफिस
का कोई कर्मचारी अहाते में दाखिल होता है. पिता उसका कमरा खोल देते हैं, वह आदमी बैठ कर कोई फाइल निपटाने लगता है. पिता फिर रसोई में जुट जाते हैं.
करीब आधे घंटे बाद वह आदमी बाथरूम में घुस जाता है और तभी बिजली चली जाती है. पिता
लालटेन या मोमबत्ती लेकर दफ्तर के खुले कमरे में जाते हैं. कुछ देर इन्तजार करने
के बाद आवाज देते हैं. वह आदमी और जवाब दोनों नदारद. पिता मुझे कंधे में बिठाते
हैं, हाथ में एक डंडा लेकर अंधेरे बाथरूम में ताबड़तोड़ लाठी
चार्ज कर देते हैं. जवाब में जब किसी की चीख नहीं सुनाई दी तो उन्होंने नतीजा
निकाला कि बिजली चली जाने के कारण वह आदमी बिना बताये चला गया. उनकी इस हरकत का
मतलब मैं कभी नहीं समझ पाया. दुर्घटनावश मेरा खोपड़ा डंडे की जद में नहीं आ पाया.
कुछ
समय बाद माँ फिर देहरादून आ जाती है. हम पास ही किराये की एक कोठरी में रहने लगते
हैं. यह कोठरी पहले वाली से बेहतर है. कतार में चार-पाँच कोठरियाँ हैं, छत शायद टिन की हैं. मकान मालिक का घर
हम से जरा फासले पर है. वह एक काफी बड़ा अहाता था जिसमें आम, लीची और कटहल वगैरहा के दरख्त हैं. अहाते में एक कच्चा पाखाना था जिसकी छत
टूट या उड़ गयी थी. जब कोई पाखाने में हो उस वक्त दरख्तों में चढ़ना अलिखित रूप से
प्रतिबंधित था. इसी तरह कोई अगर दरख्त में चढ़ा हो तब भी. अहाते में एक ओर मकान
मालिक के दिवंगत कुत्तों की समाधियाँ थीं जिन में वह हर रोज सुबह को नहा-धोकर फूल
चढ़ाता था. फूल चढ़ाने के बाद हाथ जोड़ कर शीश नवाता था कि नहीं, भगवान की कसम मुझे याद नहीं.
मकान
मालिक लगभग तीसेक साल का था. दुबला पतला, निकले हुए कद का, चिड़चिड़ा सा, शायद अविवाहित था. परिवार में उसकी विधवा माँ और दो लहीम-शहीम सी बिन
ब्याही बहनें थीं. एक नाम रागिनी था, दूसरी का भी शर्तिया
कुछ होगा. परिवार में एक नौकर था श्रीराम. गठा हुआ बदन, साँवला
रंग और छोटा कद. उसके नाम की पुकार सुबह के वक्त कुछ ज्यादा ही होती थी. मालिक
मकान के परिवार का मानना था कि इस बहाने भगवान का नाम जबान पर आ रहा है. वे राम पर
श्रद्धा रखने वाले सीधे-सच्चे लोग थे, हाथ में गंडासा लेकर
राम-राम चिल्लाने वाले नहीं. ऐसे लोग तब अंडे के भीतर जर्दी के रूप में होंगे तो
होंगे, बाहर नहीं फुदकते थे. बेचारा श्रीराम अपने नाम का
खामियाजा दौड़-दौड़ कर भुगत रहा था. परिवार वाले उसे काम से कम बेवजह ज्यादा पुकारते.
एक
दिन सुबह के वक्त मैं खेलता हुआ मकान मालिक के आँगन में जा पहुँचा. सामने रसोई में
श्रीराम कुछ तल-भुन रहा था और मुझ से भी बतियाता जा रहा था. तभी अचानक न जाने क्या
हुआ कि आँगन में एक ओर बने गुसलखाने का दरवाजा भड़ाम से आँगन में आ गिरा. भीतर
मकान मालिक की बहन नहा रही थी. दरवाजा गिरते ही वह उकड़ूँ अवस्था में न जाने किस
जनावर की सी चाल चलती तथाकथित कोने में खिसक गयी- श्रीराम को पुकारती हुई. श्रीराम
ने रसोई से निकल कर श्रीकृष्ण की सी हरकतें कीं. उसने दोनों हाथों से टिन का
दरवाजा उठाया, उसकी आड़ से
गुसलखाने के भीतर एक भरपूर नजर डाल कर दरवाजा चौखट से यूँ टिका दिया, जैसे लाठी दीवार से टिकाते हैं. आइये दो मिनट का मौन धारण कर उस लड़की की
हिम्मत को दाद दें. ऐसे गुसलखाने कई बार देखे कि जिनके भीतर जाते ही गूँगा आदमी भी
गवैया बन जाता है. मगर वैसा चौखट से जुदा, कील-कब्जों से
सर्वथा विरक्त दरवाजे वाला बाथरूम फिर देखने में नहीं आया और न नहाती हुई लड़की ही
फिर कभी दिखी. समय भी कई बार अजीब हरकत कर बैठता है. अब भला लॉलीपॉप की उम्र के
बच्चे को शेविंग किट भेंट करने की क्या तुक है ?
शाम
का वक्त है. पिता मेरा हाथ थामे द्वारका स्टोर बाजार (शायद यही नाम था) की ओर जा
रहे हैं. कंधे में झोला है, झोले
में तेल के लिये डालडा का डमरूनुमा डब्बा. राशन लेने निकले हैं. दुकान में भीड़ है.
पिता उधार वाले हैं, उनका नम्बर देर तक नहीं आता. मैं
काउण्टर से सट के खड़ा हूँ. खड़े-खड़े टाँगें दुखने लगी हैं. छत से टँगे तराजू में
जब सामान तोल कर उतारा जाता है तो उसका एक पल्ला पेंडुलम की तरह झूलता है और मैं
हर बार अपना सर बचाने के लिये पीछे हटता हूँ. यह दृश्य उधार वाले ग्राहक के प्रति
दुकानदार की नापसंदीदगी के प्रतीक के रूप में मुझे खूब याद है. यह बिम्ब भी अकसर
कोंचता है. तगादा सा करता हुआ यादों के मुहाफिजखाने में कहीं मौजूद है. इसका भी
कोई इस्तेमाल नहीं हो पाया.
पिता
दफ्तर से दो-एक किलो रद्दी कागज उड़ा लाये हैं, जिन्हें बेच कर कुछ पैसे मिल जायेंगे. शाम के झुरमटे में
साइकिल में मुझे साथ लिये कबाड़ी के पास जा रहे हैं. साइकिल दुकान के बाहर खड़ी कर
मेरा हाथ थामे पानी कीचड़ से बचते आगे बढ़ते हैं कि एकाएक बड़ी फुर्ती से मुझे गोद
में उठा कर साइकिल की ओर भागने लगते हैं. बहुत देर तक ताबड़तोड़ साइकिल चलाते रहते
हैं. साँसें बुरी तरह फूली हुई हैं. मैं कुछ भी समझ नहीं पाता, डरा सहमा सा साइकिल का हैंडल कस कर पकड़े हूँ. बाद में पिता बताते हैं कि
कबाड़ी की दुकान में सी.आइ.डी. का आदमी खड़ा था ताकि उन्हें सरकारी कागज बेचते
रंगे हाथ पकड़ ले. पिता के मुताबिक साइकिल ने इज्जत रख दी, वर्ना
जेल जाना तय था. उन्हें अपनी साइकिल पर बड़ा नाज था. बकौल उनके वह मामूली साइकिल
नहीं थी, रेलवे की थी. रेलवे की साइकिल का मतलब अब वही जानें.
जहाँ तक मुझे याद है, वह साइकिल उनकी अपनी नहीं थी, किसी की मार रखी थी.
देहरादून
की यह यादें सन 1971
के आस-पास और उसके कुछ बाद की हैं. समय का अंदाज एक धुँधली सी याद
के सहारे लगा पाता हूँ. शाम को रोशनदानों में बोरे ठूँस दिये जाते थे और कमरे के
अंदर जलती हुई ढिबरी को गुनाह की तरह छिपाया जाता. बाहर घटाटोप अंधेरा. यकीनन उस
समय सन 71 की भारत-पाक जंग चल रही होगी. उसी के चलते अंधेरे
का राज था – ब्लैक आऊट. रोशनी से परहेज जंग में ही किया जाता
है. न सिर्फ दिये की रोशनी से बल्कि दिमाग पर भी स्याह गिलाफ चढ़ा दिये जाते हैं.
जो कोई अपने दिमाग पर पर्दा न डाले, युद्ध के वास्तविक
कारणों, जो कि अमूमन कुछ लोगों के अपने स्वार्थ होते हैं,
पर तर्कसंगत बात करे, वह गद्दार हैं. सामान्य
दिनों में देश को अपनी माँ कह कर उसके साथ बलात्कार करने वाले अपनी माँ के खसम उन
दिनों खूब मात्र भक्ति का दिखावा करते हैं.
माँ
बीमार है, अस्पताल में भर्ती
है. पिता दफ्तर, अस्पताल और घर सब जगह दौड़े फिर रहे हैं.
मैं दिन भर घर में छोटे भाई के साथ रहता हूँ. यह भाई कब कहाँ से टपका, मुझे याद नहीं. मैं खुद बहलाये जाने की उम्र का हूँ, उसे नहीं बहला पाता. उसे झुलाने, थपकियाँ देने के
अलावा बोतल से दूध पिलाता हूँ और अपनी समझ के मुताबिक पानी में चीनी घोल कर देता
हूँ. शहद वाले निप्पल से कई बार बहल भी जाता है. उसे बहलाते हुए अकसर मुझे नींद आ
जाती है. रोते-रोते थक कर वह भी सो जाता है. गर्मियों के दिन, दरवाजे चौखट खुले हुए.
शाम
को पिता दफ्तर से लौट कर खाना बनाते हैं, फिर छोटे भाई को गोद में लिये एक हाथ से दरवाजे में ताला लगाने का करतब
करते हैं. कंधे में बिस्तरा, झोले में खाना और चाय का सामान,
एक हाथ में स्टोव लिये मुझे साथ लेकर पैदल अस्पताल जाते हैं.
अस्पताल के बरामदे में लकड़ी की दो बेंचों के मुँह आपस में जोड़ कर बिस्तरा बिछाया
जाता है, जिसमें दोनों बच्चे सो जाते हैं. पिता रात भर माँ
और हमें देखते हैं. यह सिलसिला न जाने कितने दिन, लेकिन कई
दिनों तक चला. दून अस्पताल की धुँधली सी यादें हैं. गेट के बाहर सड़क में खाली
शीशियाँ बिका करती थीं. तब अस्पताल में अनार के जूस सा दिखने वाला एक घोल भी मरीज
को मिलता था, जिसके लिये लोग शीशी खरीदते थे. समझदार लोग
शीशी घर से लाते, दस-बीस पैसे की बचत हो जाती. यह घोल
मिक्सचर कहलाता और हर मर्ज में मुफीद मान कर दिया जाता था. मिक्सचर स्वाद में शायद
कसैला सा होता था लेकिन मीठा तो हरगिज नहीं.
उन्हीं
दिनों कभी मैंने पिता से पूछा कि क्या इंदिरा गांधी तुमको जानती है ? क्योंकि वे खुद को सरकारी नौकर बताते थे
और लोग कहते थे कि सरकार इंद्रा गांधी की है. मतलब कि वे इंदिरा गांधी के नौकर हुए.
मालिक अपने नौकर को जानता ही है. मेरा सवाल ठीक था. ऐसे ही एक बार मैंने उनसे पूछा
जब मैं तुम्हें याद कर रहा था तब तुम कहाँ थे, क्या कर रहे
थे.
देहरादून
की यादें बस इतनी सी है. शायद सन 74 में देहरादून छूट गया और आज तक फिर कभी वहाँ जाने का इत्तेफाक नहीं हुआ.
कई चीजों और वाकयात आज भी यूँ याद हैं जैसे हाल ही की बात हो. पिता का दफ्तर,
पास ही में चाय की दुकान, तिराहे पर साइकिल
मैकेनिक गुलाटी. उसके बाँये मुड़ कर थोड़ा आगे अहाते के भीतर हमारी कोठरी.
चित्रकार होता तो यह सब कैनवस में उकेर सकता था.
फिर
पिता का तबादला अल्मोड़ा हो जाता है, बकौल उनके ऑन रिक्वेस्ट. अल्मोड़ा आकर हम गाँव में रहने लगे. पिता गाँव से
शहर नौकरी करने आते-जाते हैं. कुछ समय बाद माँ फिर बीमार अस्पताल में भर्ती हो जाती
है. पता नहीं क्या मर्ज था. पिता तीमारदारी और नौकरी साथ-साथ करते हैं. मुझे
ननिहाल भेज दिया जाता है. एक दिन नानी के साथ माँ से मिलने गया था. याद नहीं हमारी
क्या बातें हुई थीं. स्टूल में बैठा पाँव हिलाता उसे देखता रहा. पिता दहेज में
मिले तांबे-पीतल के थाली-परात (जो कि उनकी गैरमौजूदगी के कारण ननिहाल में सुरक्षित
थे) बेच-बेच कर दवा-दारू कर रहे थे.
माँ
से वह आखिरी मुलाकात थी. माँ की याद मेरे लिये कभी भी भावुक कर देने वाली नहीं रही.
ऐसा शायद इसलिये कि उसका मेरा साथ काफी कम रहा. हाँ, मुझे काठ का बना एक गोल डब्बा अकसर याद आता है.
धानी रंग के डब्बे में लाल-हरी फूल पत्तियाँ बनी थीं. माँ का सपना था कि कभी पैसे
जुटे तो अपने लिये नथ बनावाउँगी, यह डब्बा नथ रखने के काम
आयेगा. वह डब्बा मैं संभाल कर नहीं रख पाया. माँ साक्षर थी, मुझे
पढ़ाया करती थी. गाँव में एक बार उसने मेरे पूछने पर पशुओं की मिसाल देकर बताया कि
इंसान के बच्चे भी इसी प्रक्रिया से पैदा होते हैं. मैं हैरान होता हूँ इस बात को
सोच कर. ऐसी बातें आजकल की उच्च शिक्षित माँएँ भी अपने बच्चों को बताने की जुर्रत
नहीं करती. तब तो बच्चा अगर किसी बात पर ‘मजा आ गया’ कहता तो तमाचा खाता था. क्योंकि तब माँ-बाप को मजा सिर्फ एक ही चीज में
आता था, जिसके नतीजे में कम से कम दर्जन भर बच्चे हर वक्त
मजे को बदमजगी में बदल रहे होते, जिन्दगी अजीरन बन जाती.
सुबह
का समय है, दिन जाड़ों के,
धूप निकली है मगर खुद ठिठुरी हुई सी. आँगन में छोटे मामा मुझे पीट
पीट कर हिन्दी पढ़ा रहे हैं. ऊपर सड़क में जो एक दुकान है, वहाँ
से बीच वाले मामा को आवाज देकर बुलाया जाता है. मामा मुझे भेज देते हैं कि जाकर
पूछ आऊँ कि क्या काम है. ताकि अगर कोई बबाली काम हो तो बहाना बनाया जा सके. पाले
से भीगे पथरीले रास्ते पर नंगे पाँव चलता हुआ करीब आधा किमी. दूर दुकान में जाता
हूँ. दुकानदार मुझे लौटा देता है कि तेरे मतलब की बात नहीं, नवीन
को भेज. थोड़ी देर बाद मामा आकर बताते हैं कि अस्पताल में माँ चल बसी. तब डाक
विभाग के हरकारे डाक के थैले लेकर पैदल चला करते थे. उन्हीं से पिता ने जवाब
भिजवाया था. मेरे कॉपी-किताब किनारे रखवा दिये जाते हैं, मेरे
लिये सीढ़ियों में बोरा बिछा दिया गया. लोग कहते हैं, देखो
कैसा बड़ों की तरह रो रहा है. वो लोग दहाड़ें सुनने के आदी थे. दहाड़ें मारते हुए
सर फोड़ने को आमादा आदमी को संभालने और संसार की असारता पर बोलने के सुख से अनजाने
ही उन्हें वंचित कर रहा था मैं.
इसके
शायद दूसरे ही दिन छोटे मामा मुझे पिता के पास गाँव छोड़ गये, जहां पिता माँ का क्रियाकर्म कर रहे थे.
शायद तकनीकी मजबूरी के कारण ऐसा करना पड़ा होगा. मैं काफी छोटा था और चचा-ताऊ कोई
थे नहीं. हिन्दुओं के शास्त्र भारतीय संविधान की तरह काफी लचीले हैं, जैसा बाजा बजे वैसा नाच लेते हैं. चाहें तो हर रास्ता बंद कर दें और अगर
मंशा हो तो हजार शहदारियाँ खुल जाती हैं.
माँ
के क्रियाकर्म से निपट कर पिता फिर दफ्तर जाने लगे. सुबह मेरे लिये खाना बना कर रख
जाते हैं. रात को 8-9 बजे
लौट कर आते हैं. टॉर्च और जरकिन लेकर एकाध किमी. दूर नौले से पानी लाते हैं. खाना
बनाते हैं. उनके लौटने तक मैं दूसरों के घरों में बैठा रहता हूँ. बाद में पिता
पानी का जरकिन सुबह साथ लेकर जाते हैं जिसे रास्ते में पड़ने वाले गाँव में रख
जाते हैं. शाम को उसी दिशा में नौले जाने का फेरा बच जाता है. मैं दिन भर सूखे
पत्ते सा यहाँ-वहाँ डोलता रहता. दूसरे के बच्चों के साथ गाय-बकरियाँ चराने जाते
(अपनी कोई गाय बकरी नहीं थी). दूसरे बच्चों की देखादेखी कीचड़नुमा पानी के तालाब
में नहाता, काफल के पेड़ों में चढ़ता-गिरता. लगभग साल भर यूँ
ही बीत गया. इसी दरमियान मैं स्कूल भी जाने लगा, कुछ उसी
तर्ज पर जैसे गाय-बकरियाँ चराने जाता था और वह भी सीधा तीसरी क्लास में. शायद
इसलिये कि मेरी हिन्दी चौथी-पाँचवी के बच्चों से अच्छी थी. मास्टर का बोला हुआ मैं
कम या बिना गलती के लिख लेता. शायद इसी बात से मास्टर साहब प्रभावित हो गये हों.
लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि शिक्षा की बुनियाद रखते ही हिल गयी. इस ऐतबार से मेरी
गिनती घोड़े में न गधे में. बाद में दुश्मनों ने काफी समझाया-उकसाया कि भई ऊपर का
माला पक्का करवा लो और दीवारों में पलस्तर भी. अब भला झुग्गी की छत भी कहीं सीमेंट
और लोहे की हो सकती है.
माँ
की मौत के साल बीतते-बीतते पिता जब्त नहीं कर पाये और दूसरी शादी की बातें होने
लगीं. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुझे बताया गया कि मेरी देखभाल कौन करेगा. घर, खेती-बाड़ी सब वीरान हो जायेंगे. यह सब
बहाना था, बकवास था.
पिता
साफ झूठ बोल रहे थे. कारण शुद्ध रूप से शारीरिक था, इतनी समझ मुझमें तब भी थी (बाकी आज भी नहीं). पिता अपने
निजी, क्षणिक सुख के लिये शादी करना चाह रहे थे. मुझे देखभाल
की ऐसी कोई जरूरत नहीं थी और खेती-बाड़ी ऐसी माशाअल्लाह कि आम बो कर भी बबूल न उगे.
पिता ने बड़ा ही अराजक किस्म का जीवन जिया था. अपनी जवानी का लगभग तीन चौथाई
हिस्सा हरिद्वार, मुरादाबाद, बिजनौर
जैसी जगहों पर किसी छुट्टा साँड सा बिताया था. बाद में उनके जीजा जी ने पकड़-धकड़
कर उनकी शादी करवायी थी. जहाँ तक मैं समझता हूँ, उनकी शादी
उस समय के हिसाब से काफी देर में हुई थी. पिता मुरादाबाद में किसी भाँतू कॉलोनी का
जिक्र अक्सर किया करते थे कि गुरू हम वहाँ शराब पीने जाया करते थे….. बाद में मेरे एक दोस्त ने भाँतू कॉलोनी के बारे में जो मुझे मोटा-मोटा
बताया, उसे मैं यहाँ जानबूझकर नहीं कह रहा. क्योंकि हो सकता
है कि बात गलत हो और भाँतू कॉलोनी का कोई शरीफजादा मुझ पर मुकदमा लेकर चढ़ बैठे.
पिता कहते थे कि हमने अपना ट्रांस्फर बिजनौर या मुरादाबाद से देहरादून इसलिये
करवाया ताकि हम जौनसार की ब्यूटी देख सकें. देखी या नहीं, वही
जानें.
तो
पिता ने दूसरा विवाह कर लिया. नतीजतन बाप-बेटे के बीच जो एक अदृश्य मगर नाजुक-सा
धागा होता है उसमें गाँठ पड़ गयी,
शीशे में बाल आ गया. पिता के पास शायद वह आँख नहीं थी कि उस बाल को
देख पाते. उस समय वह सिर्फ अपनी खुशी देख रहे थे. मानो मैं गिनती में था ही नहीं.
अगर था भी तो शायद वो मान कर चल रहे थे कि उनकी खुशी में मैं भी खुश हूँ या कुदरती
तौर पर मुझे होना चाहिये. मैं इस तरह का बच्चा नहीं था कि पूड़ी पकवान और हो हल्ले
से खुश हो लेता, बहल जाता. पिता जो कर रहे थे वह मुझे हरगिज
मंजूर नहीं था. लेकिन मैं उन्हें रोक भी नहीं सकता था. विमाता से मैं कई सालों तक
हूँ-हाँ के अलावा कुछ नहीं बोला. मजबूरी में बोलना भी पड़ा तो ऐसे कि जैसे किसी और
से मुखातिब होऊँ. आज भी किसी संबोधन के बिना ही बातचीत करता हूँ. दोषी मेरी नजर
में पिता थे, विमाता की क्या गलती ? पिता
ने मेरे लिये अजीब सी स्थिति पैदा कर दी थी. मैं उनकी इस हरकत (शादी) को कभी भी
नहीं पचा पाया. जाहिर सी बात कि मैं कोई सफाई नहीं दे रहा, सिर्फ
अपनी स्थिति और मानसिक बनावट का बयान कर रहा हूँ. विमाता का व्यवहार कभी मेरे लिये
बुरा नहीं रहा. संबंध हमारे चाहे जैसे रहे हों पर मान में मेरी ओर से कोई कमी नहीं
और मान मेरी नजर में कोई दिखावे की चीज नहीं.
विमाता
की एक बात ने मुझे तब भी काफी प्रभावित किया था. शादी के एकाध महीने बाद वह एक दिन
पूड़ी पकवानों की सौगात लिये मेरी ननिहाल अकेले जा पहुँची कि मुझे अपनी ही बेटी
समझना, इस घर से नाता बनाये रखना.
ऐसी बातें जरा कम ही देखने में आती हैं. आज मेरे संबंध ननिहाल में चाहे तकरीबन
खत्म हो गये हों पर गाँव में मेरा जो परिवार है उनके ताल्लुकात मेरी जानकारी में
अच्छे हैं, सामान्य हैं.
इस
शादी से पिता शुरूआती दिनों के अलावा कभी खुश नहीं रह पाये. साल भर भी नहीं बीतने
पाया कि लड़ाई-झगड़े शुरू हो गये. मनमुटाव का ऐसा कोई खास कारण नहीं, बस झगड़ना था. पिता महिलाओं के प्रति
एकदम सामंती नजरिया नहीं रखते थे (उनके कद के हिसाब से सामंती शब्द कुछ बड़ा हो
गया शायद). गाँव में उनका मजाक इसलिये उड़ाया जाता कि यह आदमी अपनी बीवी को तू
नहीं तुम कह कर पुकारता है. बावजूद इसके झगड़ा होता था. हाँ पिता काफी हद तक टेढ़े
थे, कान के कच्चे और कुछ हद तक पूर्वाग्रही भी. ऐसे लोग हर
जगह होते हैं जो दोनों पक्षों के कान भर कर झगड़ा करवाते और खुद दूर से मजा लेते
हैं. विमाता का भी यह दूसरा विवाह था, एक तरह की अल्हड़ता
मिजाज में काफी कुछ बची रह गयी थी और सौंदर्यबोध का सिरे से अभाव. हालाँकि अपनी
नजर में कोई भी फूहड़ नहीं होता, सभी का अपना-अपना
सौंदर्यबोध होता है. पिता बड़े सलीकेदार, गोद के बच्चे को भी
आप कह कर बुलाने वाले और कबाड़ से जुगाड़ पैदा करने वाले आदमी थे. नहीं निभनी थी,
नहीं निभी.
पिता
के दिमाग की बनावट बेहद लचकदार थी. वो कई मामलों में वैज्ञानिक सोच रखने वाले, परम्पराओं के रूप में कुरीतियों को न
ढोने वाले व्यक्ति थे. उनका गाँव वालों से कहना था कि हमें मडुवा-मादिरा जैसी
परम्परागत और लगभग निरर्थक खेती को छोड़ ऐसी चीजें उगानी चाहिये कि जिनकी बाजार
में अच्छी कीमत मिलती है. खुद हमें इन चीजों को खरीदना पड़ता है. मसलन हल्दी,
अदरक, गंडेरी, आलू,
दालें वगैरा. फलों के पेड़ और फूल भी. हमें शहरों में जाकर बर्तन
मलने, लकड़ी बेचने जैसे जिल्लत भरे कामों के करने की जरूरत
नहीं है. जहाँ तक जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान पहुँचाने की बात है, अगर सारा गाँव इस काम को करने लगेगा तो बाड़ और पहरे का भी इंतजाम हो
जायेगा. एक अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता. उनके दिमाग की बनावट को समझने के लिये एक
और मिसाल देने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा. गाँव में कोई किसी को लोटे के साथ अपने
खेत में बैठा देख ले (रिवाज दूसरे के खेत में ही बैठने का है) तो गरियाने लगता है
कि अरे बेशर्म तुझे गंदगी फैलाने को मेरा ही खेत मिला ? बैठा
हुआ आदमी बीच में ही उठ कर किसी और के खेत में जा बैठता है. पिता के विचार इस बारे
में जरा अलग और क्रांतिकारी थे. उनका कहना था कि एक तो तुम उसके खेत को इतनी महान
खाद मुफ्त में दो और बदले में गाली खाओ, क्या फायदा ?
क्यों न धड़ल्ले से ससुर अपने खेत में जाकर बैठो. खुला खेल
फर्रुखाबादी.
एक
रोज सीढ़ियों से लुढ़क कर मैं अपना माथा फुड़वा बैठा. लोगों ने घाव में चीनी चरस
ठूँस कर कपड़ा बाँध दिया. कुछ दिन बाद घाव पक कर रिसने लगा, उसमें मवाद पड़ गया. पिता एक दिन
मुझे अल्मोड़ा ले आये. जहाँ दो हफ्ते तक घाव की मरहम-पट्टी होती रही और ढेर सारे
पेंसलीन के इन्जेक्शन लगे. पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगे. कहीं से एक
स्टोव ले आये, अटक-बिटक के लिये सरकारी हीटर था ही. भगौने का
ढक्कन तवा, उल्टी थाली चकला, गिलास
बेलन बन गया. बैंच-टेबलें खटिया और पर्दे-कुशन बिस्तरा. कुछ ही समय बाद पास ही में
किराये की कोठरी (फिर कोठरी) मिल गयी. मेरा दाखिला स्कूल में करवा दिया गया. यह सब
सन 81-82 की बात है.
इसके
बाद दो-चार बार गाँव जाना हुआ, पर वहाँ मेरा मन नहीं लगा. मुझे शहर रास आने लगा था. आखिरी बार गाँव मुझे
यज्ञोपवीत संस्कार के लिये ले जाया गया. यह तब की बात है जब नवाज शरीफ पहली बार
(जाहिर सी बात है कि पाकिस्तान के) प्रधानमंत्री बने थे. गाँव में रहने का अनुभव
बस तीनेक साल का है.
पिता
का गाँव आना-जाना लगा रहा. शायद उन्होंने जादू टोना भी एकाध बार करवाया कि मैं
गाँव नहीं जाता. पिता ने फिर से चार संतानें पैदा कीं. पहली मरी हुई, बांकी तीन स्वस्थ हैं पर शायद प्रसन्न न
हों. उन्होंने संपत्ति के रूप में अपनी अंतिम रचना रिटायरमेंट के बाद प्रस्तुत की.
गोया रिटायर कर दिये जाने से खुश न हों और अपनी रचनात्मक क्षमता साबित कर उन्होंने
सरकार को मुँहतोड़ जवाब दिया हो.
रिटायर
होने के ठीक अगले दिन उन्होंने सड़क में बैठ कर लॉटरी बेचना शुरू कर दिया. ऐसा
करने की हार्दिक इच्छा उनकी काफी समय से थी. उनका खयाल था कि जिस दिन वो लॉटरी
बेचने लगेंगे उस दिन सब (दूसरे लॉटरी वाले) अपना बिस्तरा गोल कर लेंगे. और कि गुरू, हमारे चारों ओर लोग यूं उमड़ पड़ेंगे
जैसे गुड़ में मक्खियाँ लगती हैं. उनका खयाल था कि वो इस धंधे में लखपति…. शायद करोड़पति भी बन सकते हैं. उनका कहना था कि हम यहाँ से अपने गाँव तक
एक पुल बनायेंगे. वगैरा-वगैरा. हाँ, तो लोग उनके इर्द-गिर्द
खूब मँडराये. लोगों ने दो-एक महीने में ही गुड़ में से ‘ड़’
चूस लिया. ‘गु’ छोड़
दिया. अब क्योंकि ‘ड़’ के बिना ‘गु’ अकेला मीठा नहीं होता, इसलिये
मक्खियों ने दूसरे बाग-बगीचों का रुख किया. खेल खतम, पैसा
हजम. बच्चा लोग बजाओ…..ताली बजाने को कोई मौजूद नहीं था.
उन
जैसा स्वप्न विश्लेषक शायद ही कोई दूसरा हो. एक नम्बर वाली लॉटरी के मामले में.
मसलन वो कहेंगे कि गुरू हमने कल रात सपने में गाय को सीढ़ी चढ़ते देखा, हमें उसकी चार टाँगें दिखायी दीं. तो
चढ़ने का बना चव्वा और चार टाँगों का भी चव्वा ही बनता है. इन दोनों को जोड़ कर
बना अट्ठा. मतलब कि आज चव्वा और अट्ठा पकड़ लो और सपोर्ट में रख लो दुक्की. कई
दिनों से बंद पड़ी है दुक्की. सपने में अगर शादीशुदा औरत दिखे तो मतलब कि आज जीरो
खुलेगा, क्योंकि औरतें बिन्दी लगाती हैं. कुँवारी लड़की का
नम्बर अलग बनता था और अगर प्रश्नकर्ता सपने में महिला के साथ कुछ ऐसी-वैसी हरकत कर
रहा हो तो उससे कुछ और नम्बर निकलता था. मैं अधिकांश प्रतीकों को भूल गया हूँ,
जो कि अद्भुत थे. सपनों से नम्बर निकालने के पीछे जो कारण और तर्क
थे वो कल्पनातीत थे. मेरे खयाल में यह सट्टे के तौरतरीके हैं और पिता ने मैदानी
इलाकों में रहते हुए सट्टा न खेला हो, ऐसी गलती उनसे कैसे हो
सकती थी ?
एक
बार किसी ने आकर उन्हें बताया कि मैंने कल रात खुद को हाथी पर बैठे देखा. पिता ने
इसका मतलब उन्हें बताया कि आज अट्ठा पड़ेगा. दो-एक दिन बाद वही साहब कहने लगे कि
मैं जमीन में खड़ा हूँ. हाथी मेरे बगल में खड़ा है. पिता ने कहा कि आज आप चव्वा
पकड़ लें. प्रश्नकर्ता ने कहा ऐसा कैसे ? जवाब मिला – अब क्या जिन्दगी भर हाथी में ही बैठे
रहेंगे ? परसों हाथी में थे तो अट्ठा खुला, आज हाथी से उतर गये हैं तो उसका जस्ट आधा कर लीजिये. कौन सा कठिन है.
मेरे
एक दोस्त ने उन्हें एक काल्पनिक सपना कह सुनाया कि मैंने जंगल में आग लगी देखी तो
उस पर पानी डाल कर बुझा दिया. प्रश्नकर्ता का मकसद लॉटरी का नम्बर निकलवाना नहीं
था, उसे पिता के जवाब में दिलचस्पी
थी. पिता ने बिना सोचे जवाब दिया- हाँ ठीक तो है. आपने आग में पानी डाल दिया,
आग बुझा दी….बस. बड़ा आसान है. योगेश बाबू,
पढ़े-लिखे जवान आदमी हो, इतना भी नहीं समझते
कि इस उम्र में ऐसे सपने आते हैं.
दो-एक
महीने तक अपने आसपास मक्खियों का भिनभिना महसूस कर पिता अज्ञातवास में गाँव चले
गये. करीब छः महीनों तक हम दोनों ने एक दूसरे की कोई खोज-खबर नहीं ली. मैं इस
अर्से में कबाड़ से जुगाड़ पद्धति से जिन्दा रहा. पिता की पेंशन न जाने कहाँ अटक
गयी थी. वो ऐसे महारथी थे कि गाँव में रह कर भी हरकारों के जरिये लॉटरी के शेयर
मार्केट में अपना दखल बनाये रहे. सपने देख-देख कर नम्बर निकाल रहे थे. लॉटरी
हार-जीत रहे थे. अब हरकारे कितनी ईमानदारी बरतते होंगे कहना मुश्किल है. वो छः
महीने बाद अचानक प्रकट भये एक दिन गोर्की जैसी मूछें बढ़ाये हुए. पेंशन चल पड़ी थी.
लॉटरी
उनसे तब तक नहीं छूटी जब तक सरकार ने इसे बंद न कर दिया. इस धंधे में असफल रहने का
कारण उनकी नजर में मैं था. बकौल उनके- गुरू हम तो क्या का क्या कर दें, इस शख्स से जो हमें इतना सा सहयोग मिल
जाये. मैंने कब उनके हाथ बाँधे, उन्होंने मेरा कहा कब किया,
याद नहीं. जो भी चीज उनके मन मुताबिक न होती, उसका
ठीकरा मेरे सर फोड़ा जाता. उन्होंने कुछ ऐसी बातें भी मेरे साथ चस्पा कर रखी थीं
कि जिनका मुझ से कोई मतलब नहीं था. उनके कहे मुताबिक वो बीमार पड़ना तब से शुरू
हुए जब से उन्होंने भात खाना शुरू किया. वर्ना पहले तो हम उस घर में ही नहीं जाते
थे जहाँ चावल पक रहा हो. गुरू हमारी शादी (पहली) में सात गाँवों की पंचायत बैठी,
सिर्फ हमारी वजह से भात का प्रोग्राम कैंसिल कर पूड़ियाँ बनीं. तो
चावल वो मेरी वजह से अपनी जान पर खेल कर खाये जा रहे थे. जब कि सच यह है कि मुझे
चावल कोई इतने पसंद नहीं कि भात खाये बिना खाया हुआ सा न लगे. पिता सुबह को चावल
बना कर परोस दें तो मैं क्या कर सकता था, सिवाय इसके कि
चुपचाप खा लूँ और देखने वाले की नजर में अपने बाप की सेहत से खिलवाड़ करता हुआ
रंगे हाथों पकड़ा जाऊँ. गुनहगार कहलाऊँ. पिता दूसरों की नजर में बुजुर्ग, सीधे और भलेमानुष, मैं कमीना और बूढ़े बाप को सताने
वाला. परिस्थितियाँ कभी भी मेरे अनुकूल नहीं रहीं.
मकान
मालिक लोगों की जो जमीन यूँ ही पड़ी-पड़ी कूड़ेदान का काम कर रही थी, पिता ने उसमें शाक-सब्जियाँ उगाना शुरू
कर दिया. यह काम वह पहले भी करते ही थे. अब होल टाइमर थे. बारहों महीने मौसम के
मुताबिक सब्जी खेत में मौजूद. सब्जी तोड़-तोड़कर पास-पड़ोस में बाँट रहे हैं. इस
उस को दे रहे हैं. पेड़ों को पब्लिक नल से पानी ढोकर सींच रहे हैं. और मजे की बात
कि न आप मिर्च खाते हैं न बैगन. बैगन का नाम आपके मुताबिक दरअसल बेगुन है, इसमें कोई गुण नहीं होता. भगवान इसकी रचना भूलवश कर बैठा. अचार के सीजन
में बड़े-बड़े केनों में अचार ठुँसा पड़ा है. लहसुन छील-छील कर उँगलियों के पोर गल
गये हैं.
आपके
कथनानुसार कोई खाता नहीं, वर्ना
हम तो ससुर टर्रे का भी आचार डाल दें. टर्रा मतलब मेंढक. बड़ियों के मौसम में
बड़ी-बड़ी मुंगौड़ियों की रेलम पेल. बड़ी पिता के मुताबिक स्वास्थ्य खराब करने
वाली चीज है, उसकी तासीर ठंडी होती है. एक बार उन्होंने 17
किलो माश की बड़ियाँ बना डालीं. 17 किलो माश
को धोना, साफ करना और सिल में पीसना अपने आप में एक बड़ा काम
है- संस्था का काम है. पर उन्होंने पीस डाले रो-धोकर मुझे सुनाते हुए रुआँसी आवाज
में कि मेरा कोई होता तो माश पीस देता. ऐसे चूतियापे के कामों में सचमुच मैंने कभी
उनका साथ नहीं दिया. सिवाय इसके कि अचार का आम या बड़ियाँ छत में सूखने पड़ी हैं,
बूँदाबाँदी होने लगी तो उन्हें उठा कर भीतर रख दूँ. सोचने वाले
सोचते कि इस आदमी ने अचार-बड़ियों का कुटीर उद्योग खोल रखा है. अच्छा भला मुनाफा
हो रहा है. इसका लड़का अगर थोड़ा हाथ बँटा देता तो क्या बुरा था. आखिर यह बूढ़ा
आदमी इतनी मेहनत किसके लिये कर रहा है. सचमुच बेटा इसका नासमझ है और कमीना भी.
मुझे कहीं पनाह नहीं थी.
पाव
या आधा लीटर दूध को दिन भर में चार-छः बार उबाल कर उसकी मलाई निकाली जा रही है, फिर 10-15 दिन
में उससे घी बन रहा है. आने वाले को दिखाया जाता है- देखिये, हमारे हाथ का घी, मलाई से बनाते हैं हम. देखने वाला
वाह करता, मेरा मन उसे तमाचा जड़ने का होता, क्योंकि वह 100 ग्राम जो घी है मैं जानता हूँ वह
जैतून और बादाम के तेल से भी महंगा पड़ गया है. और उस पर तुर्रा ये कि अमूमन घी
अचानक गायब हो जाता. पूछने पर पता चलता कि फलाँ को दे दिया. बेकार चीज है, खाँसी करता है.
ताश खेलना उन्हें
बेहद पसंद था. उनकी नजर में यह एक महान खेल था जो कि दिमाग के लिये शंखपुष्पी और
रोगने बादाम जैसी प्रचलित चीजों से ज्यादा गुणकारी था. उनके मुताबिक अगर बच्चों को
अक्षर ज्ञान ताश के पत्तों के जरिये करवाया जाये तो वे जल्दी सीखेंगे और उनका
दिमाग भी खुलेगा. जरा ऊँचा सुनते थे, ऐसे मौकों पर मैं चिढ़कर लुकमा देता कि वो बच्चे नौकरी रोजगार से न भी लग
पाये तो जुआ खेल कर रोजी कमा ही लेंगे. सामने बैठा आदमी इस पर हँसने लगता. पिता
सोचते कि वह उनकी बात पर हँस रहा है. इसलिये जोश में आकर दो-चार ऐसी बातें और कह
जाते. मैंने उन्हें घंटों अकेले ताश खेलते देखा है. ताश में एक खेल होता है ‘सीप’. यह खेल उन्हें ज्यादा ही पसंद था. चाहे जितनी
तबियत खराब हो, सीप का जानने वाला कोई आ जाये तो
खाँसते-कराहते उठ बैठते और खेल जारी रहने तक सब दर्द तकलीफ भूल जाते. अगर दो बाजी
हार जाते तो चिढ़ कर खेल बंद कर देते कि – बंद करिये हमारी
तबियत ठीक नहीं. पता नहीं साला कैंसर है, न जाने क्या है.
जीतने पर उनका जोश बढ़ जाता. फिर सामने वाला खिलाड़ी चाहे गणित में गोल्ड मैडलिस्ट
क्यों न हो, उसे सुनना पड़ता कि गुरू आपका हिसाब बड़ा कमजोर
है. कौन पत्ता फेंक दिया, कौन सा हाथ में है, इत्ता सा हिसाब नहीं रख सकते.
खिलाने पिलाने के
बड़े शौकीन थे. तरह-तरह के प्रयोग खाने में अकसर होते रहते. करेले की रसेदार सब्जी
मैंने उन्हीं के हाथ बनी खायी. सब्जी परोसते हुए उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि
असल में करेला ऐसे नहीं बनता. इसे बारीक काट कर तवे में सूखा बनाया जाता है. जरा
भी कड़वा नहीं होता. एक बार उन्होंने मेरे कुछ दोस्तों को बुलवा भेजा. आइये गुरू
देखिये आज हमने आपके लिये क्या बनाया है ! उस दिन बिच्छू घास की सब्जी बनी थी.
शराब मैंने पहली बार उन्हीं के साथ चखी. जब कभी पास में पैसे हों, मूड हो तो कहते वाइन लेगा, है मूड ? आज साली ठंड भी है यार. मैं चुपचाप हाथ
पसार देता और जाकर पव्वा ले आता. दोनों बाप बेटे हमप्याला हम निवाला होते, कुल्ला करके सो जाते.
आखिरी दो-तीन सालों
में उनका दम बेहद फूलने लगा था इसलिये धूम्रपान छोड़ कर सुर्ती फटकने लगे थे. अब
उनकी नजर में सुर्ती भी एक महान चीज थी. एक बार उन्होंने मेरे एक दोस्त को सुर्ती
पेश की. दोस्त ने कहा मुझे आदत नहीं है, चूने से मुँह फट जायेगा. पिता ने उसे समझाया- गुरू शादी से पहले लड़कियाँ
भी इसी तरह डरती हैं…..बाद में सब ठीक हो जाता है. आपको भी
आदत पड़ जायेगी. खाया कीजिये, बड़ी महान चीज है, दिमाग तेज करती है.
कई बार वो ऐसी बातें
सिर्फ कहने के लिये कह जाते कि जिसकी निरर्थकता का उन्हें खुद भी अहसास होता. मसलन, गुरू कुत्ता बड़ा महान जीव होता है.
उसके धार्मिक खयालात बहुत ऊँचे होते हैं. उसे अगर रास्ते में दूसरे कुत्ते काट
खाने को न आयें तो वह रातोंरात हरिद्वार जाकर नहा आये. मेरा ऐतराज था कि जो कुत्ते
उसका रास्ता रोकने को बैठे रहते हैं वो खुद क्यों नहीं उससे पहले हरिद्वार चले
जाते ? पिता बात बदल देते या चिढ़ जाते.
किसी को अंग्रेजी
शराब पीता देखते तो कहते- ये साली बड़ी बेकार चीज है, ठर्रा बड़ी महान चीज है. ठर्रे वाले को
राय होती कि ये कोई अच्छी चीज थोड़ा है, आँतें गला देती है.
कम लो, अच्छी चीज लो, इंगलिश पिया करो.
इसी तरह उनका दिन चाय पीने और चाय की बुराइयाँ गिनवाने में बीतता.
उनका
दावा था कि अगर कोई उन्हें सात फाउंटेन पैनों में सात रंग की स्याहियाँ भर कर ला
दे तो वे असल जैसा दिखने वाला नकली नोट बना सकते हैं. उनका इतना सा काम किसी ने
करके नहीं दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था चौपट होने से बच गयी. इस नेक काम में मैंने
भी सहयोग नहीं किया. अटल बिहारी वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने
कहा- देखना गुरू, अब अटलजी मैरिज कर लेंगे. सैटल हो गये हैं न.
पिता
जैसे थे मैंने ठीक वैसे ही कलम से पेंट कर दिये. न मैंने उनका मेकअप किया, न उन पर कीचड़ उछाला. उन्हें याद करने
के बहाने माँ, जिसकी याद मुझे जरा कम ही आती है, को भी याद कर लिया और खुद अपने अतीत की भी गर्द झड़ गयी. बात से बात
निकलती चली गयी, डर है कहीं रौ में कुछ गैरजरूरी न कह गया
होऊँ.
मेरे
लिये पिता की दो छोटी सी ख्वाहिशें थीं- एक तो मुझे किसी तरह चार छः बोतल ग्लूकोज
चढ़ जाये. जिससे मैं थोड़ा मोटा हो जाऊँ. मेरा दुबलापन उनके अनुसार सूखा रोग का
लक्षण था. ग्लूकोज चढ़ने से मैं बकौल उनके ‘बम्म’ हो जाता. और दूसरी ख्वाहिश थी कि अनाथालय से
मेरी शादी हो जाये. जाहिर सी बात है कि मैंने हमेशा की तरह यहाँ भी उन्हें सहयोग
नहीं किया और नतीज़तन इतना दुबला हूँ कि मेरी उम्र मेरे वजन को पीछे छोड़ चुकी है.

(शंभू राणा की किताब "माफ
करना हे पिता" नैनीताल समाचार से प्रकाशित हो चुकी है. शंभू राणा कम चर्चित
किन्तु विलक्षण प्रतिभा के व्यंगकार हैं. नितांत यायावर जीवन जीने वाले शंभू राणा
की लेखनी परसाई की परंपरा को आगे बढाती है. इस किताब को हल्द्वानी में जस्ट बुक
डिपो, अल्मोड़ा में अल्मोड़ा किताब घर,
बागेश्वर में सैनिक स्वीट्स, नैनीताल में कंसल
बुक डिपो और पिथौरागढ़ में किताबघर से प्राप्त किया जा सकता है. दिल्ली के आस-पास
के मित्र इसके लिए विनोद उप्रेती से 8800268127 पर संपर्क कर सकते हैं. यह सूचना अपने मित्रों से भी साझा करें. तब भी न मिले तो मुझे ashokpande29@gmail.com पर मेल करें.)