Wednesday, October 17, 2007

अनीता वर्मा की कविता ' वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत'

एक पुराने परिचित चेहरे पर
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखें बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को
व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था

मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ
उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला
आंखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो
जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम
हम वहां चल कर नहीं जा सकते
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है
जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम

ये आंखें कितनी अलग हैं
इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है
प्यार मांगना मूर्खता है
वह सिर्फ किया जा सकता है
भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं
मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें
विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में
विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ
विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ
या उसका समुद्र का चेहरा

मैंने देखा उसके सोने का कमरा
वहां दो दरवाज़े थे
एक से आता था जीवन
दूसरे से गुज़रता निकल जाता था
वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं
एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों
तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी
और एक भ्रम जैसी बेचैनी
जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी
जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था

एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर
विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था
मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है
जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में
इसलिए मैंने खुद को अकेला किया
मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग
इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं
यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था
पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं
ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे
मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता
आलू खाने वालों और शराव पीने वालों के लिए भी नहीं
मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है

अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे
कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो
कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला
समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था
इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा
फ़सल काटने वाली मशीन की तरह
मैं काटता रहा दुख की फ़सल
आत्मा भी एक रंग है
एक प्रकाश भूरा नीला
और दुख उसे फैलाता जाता है।

6 comments:

Avanish Gautam said...

..अनीता जी वान गाग की पेंटिंग्स को देखते हुए मैं हमेशा उनके खुरदुरे बोल्ड स्ट्रोकस में फंस जाया करता था.. पता नहीं क्यों?

आज आपकी कविता पढ कर लगा शायद यही बातें रही होगी. इस कविता के लिए कवि और कबाडखाने का आभार..

इसके अलावा अन्य सामग्री के लिये भी कबाडखाने का आभार..

bhupen said...

सात-साठ साल वैन गॉग के एक दीवाने दोस्त ने उसकी जीवनी पर आधारित उपन्यास लस्ट फॉर लाइफ पढ़ने को दिया था. इस कविता को पढ़कर उस उपन्यास के पात्र वैन गॉन की भावनात्मक तीब्रता याद हो आई.

Ashok Pande said...

भूपेन बाबू आपके यह जानकर अच्छा लगेगा कि यह कविता 'लस्ट फॉर लाइफ़' के हिन्दी अनुवाद की भूमिका से ही ली गई है।

दीपा पाठक said...

वान गॉग के बारे में लस्ट फॉर लाइफ के जरिए जो बातें पता चलती हैं, उनकी पेंटिंग पर अनीता वर्मा की कविता उन्हें थोङे शब्दों में बहुत खूबसूरती से बयान करती है। कबाङखाना साहित्य और कला के विभिन्न आयामों से दिलचस्प तरीके से परिचय करवा रहा है जिसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

[ आशुतोष ] said...

`लस्ट फॉर लाइफ´ का हिन्दी में शानदार अनुवाद कबाड़श्री 1008 हल्द्वानीवाले कबाड़पंथी अशोक पांडे ने ही किया है। विनम्रतावश बता नहीं रहे हैं।

कथाकार said...

ब्‍लागिस्‍तान की नागरिकता लेने का सबसे बड़ा फायदा ये हुआ है कि जो कुछ अब तक अपढ़ा, अनदेखा, अनकहा, अनजाना, अनभोगा, अन . .अन . . रह गया था. सब यहां मिल रहा है ओर खूब मिल रहा है. अब तो ये डर है कि कहीं ब्‍लागों की सैर के चक्‍कर में नौकरी से हाथ न धोना पड़े.
इस कविता को पढ़ना बेहद सुकूनभरा अनुभव रहा. अनीता जी को बधाई, खूब खूब
सूरज