एक बूढ़ी स्त्री की डायरी
अनुवादकीय नोट :
‘बूढ़ी स्त्री ’ (ओल्ड वूमन) से मूल जापानी शब्द ‘ओबासान’ का सही सही अर्थ समझ में नहीं आता। ‘ओबासान’ का सबसे नजदीकी अर्थ ‘छोटी मां’ हो सकता है जो किसी भी स्त्री सम्बंधी या आदरणीय स्त्री के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
1
किनारे पर उकड़ूं बैठी है वह बूढ़ी स्त्री । उसके पीछे एक विशाल चिमनी धुआं उगल रही है। आप उससे नहीं कह सकते कि अब यह करो तुम बूढ़ी स्त्री । उससे नहीं कह सकते कि अब यह करो। बूढ़ी स्त्री होती है बूढ़ी स्त्री । वह कह रही है कि आज रात वह थोड़ा सा कोन्याकू उबालेगी।
2
उसने अभी अभी क्या कहा वह भूल जाती है और फिर से दोहराती है वही कहानी। आप समझते हो कि वह गुस्से में है पर अगले ही पल वह खुश नजर आने लगती है। पुराने दिनों में मैं बढ़िया चावल पकाया करती थी मगर देखो कैसे जल गए हैं वे।जो भी हो क्या फर्क पड़ता है। भुला दिया जाता है जल जाना। मगर कितने शर्म की बात है ! किसी भी चीज को इस तरह जला देना! अपने में खोई बूढ़ी स्त्री किसी और पर दोष मढ़ देती है। इस मुश्किल बूढ़ी स्त्री के भीतर पुराने समय की कर्मठ बूढ़ी स्त्री लुकाछिपी खेल रही है। क्या कहीं चली गई बूढ़ी स्त्री ? नहीं वह यहीं है। सूरज में दमकते अपने सुन्दर सफेद केशों के साथ वह बनी रहती है जिन्दा।
3
बूढ़ी स्त्री कहती है छोड़ो जाने दो ¸ कहती है वह। एक टूटी कील से फंसकर फट गया था एप्रन। उस आदमी ने झटक लिए थे अपने हाथ। वह एक नालायक आदमी है; गुस्से में है बूढ़ी स्त्री । हालांकि यह घटा था तीस साल पहले पर फड़फड़ाते नथुनों के साथ कुछ देर के लिए बूढ़ी स्त्री वाकई बहुत गुस्सा होती है।
4
केवल दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियां ही नहीं होतीं सारी बूढ़ी स्त्रियां। किसी वाइरस की तरह बूढ़ी स्त्रियां मुझे लगातार नष्ट करती जाती हैं। न दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियां ज्यादा खतरनाक होती हैं दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियों से¸ और अब मैंने उनमें और अपने आप में फर्क करना बन्द कर दिया है। न दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियोंको देखने के लिए मैं बूढ़ी स्त्रियों के स्केच बनाने की कोशिश करता हूं। इम्म्यूनिटी? किस काम के होते हैं इस तरह के शब्द?
5
चाय के दाग लगे चटखे हुए बरतन का बहुत ख्याल रखती है बूढ़ी स्त्री । जब वह उस बरतन से प्याले में चाय डाल रही होती है वह बेहद गरिमावान लगती है। फिर वह खामोशी से अखबार पर निगाह डालती है ; वह अच्छे से जानती है कि छोड़े गए एक बच्चे की कहानी और जबरिया सत्ता परिवर्तन की खबर का बराबर महत्व है क्योंकि दोनों का प्रिन्टसाइज़ एक है। बूढ़े लोगों को मिलने वाले चश्मों की तीन जोड़ियां खो चुकी है वह। यह चौथी है।
6
हमारे संसार में किसी भी चीज को स्पष्ट नाम दे पाना सम्भव नहीं होता। जिस तरह खाना बनाने का बरतन बहुत सी ऐसी चीजों से बना होता है जो खाना बनाने का बरतन नहीं होतीं¸ उदासी भी उसी तरह पुराने समय की असंख्य भयानक रूप से थका देने वाली चीजों की परछाईं भर होती है। ब्लैक होल की तरह एक नाम अपने भीतर निगल जाता है सारे नाम। नाम जड़ जमाते हैं बेनाम में। (जल्दबाजी में जोड़ा गया एक नोट।)
7
बूढ़ी स्त्री कहती है कि संसार एक बेहतर जगह बन के रहेगा। लेकिन दुनिया ऐसी होती है वह कहती है। दीवार की तरफ मुंह किए रोती है बूढ़ी स्त्री । मैंने देखा है उसे। मैं कुछ नहीं कर सकता सिवा उसे देखते चले जाने के। मैं भयाक्रान्त तरीके से असहाय हूं। और कई दफे मुझे अहसास होता है कि उसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती। इस कदर खूबसूरत है वह।
8
मुझे इस खौफनाक सच्चाई का अहसास हो गया था कि दुनिया में कविता के सिवाय किसी चीज का अस्तित्व नहीं होता। सारी चीजें और सारी संभव चीजें कविताएं होती हैं; भाषा के जन्म के बाद से ही यह एक अकथनीय सत्य है। मैं हैरत करता हूं कि खुद को कविता से आजाद करने के लिए हर किसी ने कितना कुछ नष्ट किया। जो भी हो यह रही है एक बेहद मुश्किल बहस। इस कदर बेतहाशा बेतुकी लगने वाली बातचीत।
9
जब भूख लगती है बूढ़ी स्त्री एक बरतन में कुछ खोज लेती है और उसे मुंह में ठूंस लेती है। कभी तो वह लगातार तीन दिनों तक नहाती है और कभी पूरे महीने नहीं नहाती। अपने खोए हुए चीथड़ा अन्तर्वस्त्र चुरा ले जाने वाले को वह गालियां देती है। उस वक्त वह गद्दे के नीचे छिपा कर रखे हुए स्टाक सर्टिफिकेट्स के बारे में भूल जाती है। टुकड़ों में तब्दील कर दी गई है यह स्त्री। उसके भीतर एक और बूढ़ी स्त्री रह रही है। वह उन छोटे बक्सों जैसी है जो मुझे बचपन में तोहफे में मिले थे। एक बक्से के अन्दर एक और ¸ फिर उसके अन्दर एक और छोटा बक्सा और उसके अन्दर एक और भी छोटा बक्सा और उसके अन्दर ॰॰॰ । किसी छिपी हुई चीज को खोजने के लिए वह एक के बाद एक उन्हें खोलती जाती है लेकिन वह उस खालीपन तक कभी नहीं पहुंचती जहां बक्से पहुंचते हैं। इस बारे में बात करना बेमानी है कि असली बूढ़ी स्त्री कौन सी है ; निश्चय ही वह विरोधाभासों और संशयों से भरपूर है। सो वह अतिशय ईमानदार स्त्री से मुझे कभी कभी बेहद नफरत होने लगती है। क्योंकि जो मुझ पर लदी है वह मैं ही हूं।
10
मैं किसी भी वक्त ले जाए जाने के लिए तैयार हूं ¸ बूढ़ी स्त्री कहती है। लेकिन जब तक मुझे ले जाया नहीं जाता में मरने नहीं जा रही¸ वह कहती है। अपनी चीजों का ख्याल रखने में नाकाम, वह हमेशा दूसरों के मामलें में टांग अड़ाती है। बस मुझे अकेला छोड़ दो¸ कहती है बूढ़ी स्त्री।मैं नहीं कह सकता कि इस तरह से आत्मसम्मान का मैं थोड़ा इस्तेमाल नहीं कर सकता। क्योंकि बूढ़ी स्त्री के सामने मैं आखिरकार मैं बन जाता हूं।
11
दुनिया एक सनकभरी रजाई है। हालांकि पागलपन की तरह उस में तमाम रंग और कपड़े चिप्पी किए गए हैं ¸ उसके चार किनारे बहुत दक्षता के साथ सिए गए हैं। सौ साल पहले उत्तरी अमेरिका में रही होगी कोई बूढ़ी स्त्री बिल्कुल इस बूढ़ी स्त्री की तरह। किसी बड़ी नदी के नजदीक¸ पेड़ों के झुरमुट में¸ शहर की सीमा के जरा सा बाहर किसी जर्जर मकान के अहाते में।
12
शायद किसी दिन मैं भी बन जाऊंगा वही बूढ़ी स्त्री। शायद मैं अभी से बन चुका हूं वह बूढ़ी स्त्री। मेरा नाम¸ मेरा धन¸ मेरा भविष्य¸ मेरा यह, मेरा वह … इनमें से कोई भी चीज मुझे बूढ़ी स्त्री से अलग नही कर सकती। मेरे हाथ¸ मेरे बाल¸ मेरे शब्द¸ गुजरती हुई मेरी चेतना¸ वे सारी चीजें जिन्हें मेरा कहा जा सकता है और उस बूढ़ी स्त्री की तमाम चीजें - अण्डों की तरह एक सी नजर आती हैं।
13
एक कुत्ते का पेट सहलाती हुई वह बूढ़ी स्त्री कुत्ते से दबी जबान में बात करती है। कुत्ते के आनन्द से उसे बहुत खुशी मिलती है। हैरत करते हुए कि क्या वह बूढ़ी स्त्री कुत्ते को अनन्त तक दुलारती जाएगी¸ मैं उस दृश्य से आंखें नहीं हटा पाता। तो भी आखिरकार बूढ़ी स्त्री धीरे धीरे उठती है और घर के भीतर जाती है। मेरे भीतर बचती है उखड़ी सांसों वाली एक संवेदना जिसे मैं किसी भी तरह कोई नाम नहीं दे सकता।
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Tuesday, October 30, 2007
Sunday, October 28, 2007
अब कलम से इजारबंद ही डाल (हबीब जालिब की नज़्म 'सहाफी से')
कौम की बेहतरी का छोड़ ख़्याल
फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल
तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल
बेजमीरी का और क्या हो मआल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
तंग कर दे गरीब पे ये ज़मीन
ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे ज़बीं
ऐब का दौर है हुनर का नहीं
आज हुस्न-ए-कमाल को है जवाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
क्यों यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात बात चले
क्यों सितम की सियाह रात ढले
सब बराबर हैं आसमान के तले
सबको रज़ाअत पसंद कह के टाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
नाम से पेश्तर लगाके अमीर
हर मुसलमान को बना के फकीर
कस्र-ओ-दीवान हो कयाम कयाम पजीर
और खुत्बों में दे उमर की मिसाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
आमीयत की हम नवाई में
तेरा हम्सर नहीं खुदाई में
बादशाहों की रहनुमाई में
रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
लाख होंठों पे दम हमारा हो
और दिल सुबह का सितारा हो
सामने मौत का नज़ारा हो
लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
(*सहाफी : पत्रकार। इजारबंद: नाड़ा )
यह पोस्ट इस से पहले इरफान के सस्ता शेर में लगाई जा चुकी है। स्रोत: 'पहल' १८
फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल
तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल
बेजमीरी का और क्या हो मआल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
तंग कर दे गरीब पे ये ज़मीन
ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे ज़बीं
ऐब का दौर है हुनर का नहीं
आज हुस्न-ए-कमाल को है जवाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
क्यों यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात बात चले
क्यों सितम की सियाह रात ढले
सब बराबर हैं आसमान के तले
सबको रज़ाअत पसंद कह के टाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
नाम से पेश्तर लगाके अमीर
हर मुसलमान को बना के फकीर
कस्र-ओ-दीवान हो कयाम कयाम पजीर
और खुत्बों में दे उमर की मिसाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
आमीयत की हम नवाई में
तेरा हम्सर नहीं खुदाई में
बादशाहों की रहनुमाई में
रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
लाख होंठों पे दम हमारा हो
और दिल सुबह का सितारा हो
सामने मौत का नज़ारा हो
लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
(*सहाफी : पत्रकार। इजारबंद: नाड़ा )
यह पोस्ट इस से पहले इरफान के सस्ता शेर में लगाई जा चुकी है। स्रोत: 'पहल' १८
Wednesday, October 24, 2007
`समोसे´ :वीरेन डंगवाल

हलवाई की दुकान में घुसते ही दीखे
कढाई में सननानाते समोसे
बेंच पर सीला हुआ मैल था एक इंच
मेज पर मिक्खयां
चाय के जूठे गिलास
बड़े झन्ने से लचक के साथ
समोसे समेटता कारीगर था
दो बार निथारे उसने झन्न -फन्न
यह दरअसल उसकी कलाकार इतराहट थी
तमतमाये समोसों के सौन्दर्य पर
दाद पाने की इच्छा से पैदा
मूर्खता से फैलाये मैंने तारीफ में होंट
कानों तलक
कौन होगा अभागा इस क्षण
जिसके मन में नहीं आयेगी एक बार भी
समोसा खाने की इच्छा ।
कढाई में सननानाते समोसे
बेंच पर सीला हुआ मैल था एक इंच
मेज पर मिक्खयां
चाय के जूठे गिलास
बड़े झन्ने से लचक के साथ
समोसे समेटता कारीगर था
दो बार निथारे उसने झन्न -फन्न
यह दरअसल उसकी कलाकार इतराहट थी
तमतमाये समोसों के सौन्दर्य पर
दाद पाने की इच्छा से पैदा
मूर्खता से फैलाये मैंने तारीफ में होंट
कानों तलक
कौन होगा अभागा इस क्षण
जिसके मन में नहीं आयेगी एक बार भी
समोसा खाने की इच्छा ।
Wednesday, October 17, 2007
अनीता वर्मा की कविता ' वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत'
एक पुराने परिचित चेहरे पर
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखें बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को
व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था
मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ
उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला
आंखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो
जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम
हम वहां चल कर नहीं जा सकते
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है
जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम
ये आंखें कितनी अलग हैं
इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है
प्यार मांगना मूर्खता है
वह सिर्फ किया जा सकता है
भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं
मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें
विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में
विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ
विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ
या उसका समुद्र का चेहरा
मैंने देखा उसके सोने का कमरा
वहां दो दरवाज़े थे
एक से आता था जीवन
दूसरे से गुज़रता निकल जाता था
वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं
एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों
तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी
और एक भ्रम जैसी बेचैनी
जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी
जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था
एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर
विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था
मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है
जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में
इसलिए मैंने खुद को अकेला किया
मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग
इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं
यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था
पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं
ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे
मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता
आलू खाने वालों और शराव पीने वालों के लिए भी नहीं
मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है
अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे
कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो
कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला
समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था
इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा
फ़सल काटने वाली मशीन की तरह
मैं काटता रहा दुख की फ़सल
आत्मा भी एक रंग है
एक प्रकाश भूरा नीला
और दुख उसे फैलाता जाता है।
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखें बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को
व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था
मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ
उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला
आंखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो
जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम
हम वहां चल कर नहीं जा सकते
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है
जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम
ये आंखें कितनी अलग हैं
इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है
प्यार मांगना मूर्खता है
वह सिर्फ किया जा सकता है
भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं
मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें
विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में
विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ
विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ
या उसका समुद्र का चेहरा
मैंने देखा उसके सोने का कमरा
वहां दो दरवाज़े थे
एक से आता था जीवन
दूसरे से गुज़रता निकल जाता था
वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं
एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों
तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी
और एक भ्रम जैसी बेचैनी
जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी
जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था
एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर
विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था
मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है
जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में
इसलिए मैंने खुद को अकेला किया
मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग
इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं
यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था
पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं
ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे
मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता
आलू खाने वालों और शराव पीने वालों के लिए भी नहीं
मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है
अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे
कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो
कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला
समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था
इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा
फ़सल काटने वाली मशीन की तरह
मैं काटता रहा दुख की फ़सल
आत्मा भी एक रंग है
एक प्रकाश भूरा नीला
और दुख उसे फैलाता जाता है।
Wednesday, October 10, 2007
आलोक धन्वा की 'सफेद रात'
सफेद रात
पुराने शहर की इस छत पर
पूरे चांद की रात
याद आ रही है वर्षों पहले की
जंगल की एक रात
जब चांद के नीचे
जंगल पुकार रहे थे जंगलों को
और बारहसिंगे
पीछे छूट गए बारहसिंगों को
निर्जन मोड पर ऊंची झाडियों मे
ओझल होते हुए
क्या वे सब अभी तक बचे हुए हैं
पीली मिट्टी के रास्ते और खरहे
महोगनी के घने पेड
तेज महक वाली कड़ी घास
देर तक गोधूलि ओस
रखवारे की झोपड़ी और
उसके ऊपर सात तारे
पूरे चांद की इस शहरी रात में
किसलिए आ रही है याद
जंगल की रात
छत से झांकता हूं नीचे
आधी रात बिखर रही है
दूर-दूर तक चांद की रोशनी
सबसे अधिक खींचते हैं फुटपाथ
खाली खुले आधी रात के बाद के फुटपाथ
जैसे आंगन छाए रहे मुझमें बचपन से ही
और खुली छतें बुलाती रहीं रात होते ही
कहीं भी रहूं
क्या है चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
एक असहायता
जो मुझे कुचलती है और एक उम्मीद
जो तकलीफ जैसी है
शहर में इस तरह बसे
कि परिवार का टूटना ही उसकी बुनियाद हो जैसे
न पुरखे साथ आए न गांव न जंगल न जानवर
शहर में बसने का क्या मतलब है
शहर में ही खत्म हो जाना?
एक विशाल शरणार्थी शिविर के दृश्य
हर कहीं उनके भविष्यहीन तंबू
हम कैसे सफर में शामिल हैं
कि हमारी शक्ल आज भी विस्थापितों जैसी
सिर्फ कहने के लिए कोई अपना शहर है
कोई अपना घर है
इसके भीतर भी हम भटकते ही रहते हैं
लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ
इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद
कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़
अब इन्हीं शहरों में
कई तरह की हिंसा कई तरह के बाजार
कई तरह के सौदाई
इनके भीतर इनके आसपास
इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर
और श्रीनगर तक
हिंसा
और हिंसा की तैयारी
और हिंसा की ताकत
बहस चल नहीं पाती
हत्याएं होती हैं
फिर जो बहस चलती है
उनका भी अंत हत्याओं में होता है
भारत में जन्म लेने का
मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था
अब वह भारत भी नहीं रहा
जिसमें जन्म लिया
क्या है इस पूरे चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
जो मेरी सांस
लाहौर और कराची और सिंध तक उलझती है?
क्या लाहौर बच रहा है?
वह अब किस मुल्क में है?
न भारत में न पाकिस्तान में
न उर्दू में न पंजाबी में
पूछो राष्ट्रनिर्माताओं से
क्या लाहौर फिर बस पाया?
जैसे यह अछूती
आज की शाम की सफेद रात
एक सचाई है
लाहौर भी मेरी सचाई है
कहां है वह
हरे आसमान वाला शहर बगदाद
ढूंढो उसे
अब वह अरब में कहां है?
पूछो युद्ध सरदारों से
इस सफेद हो रही रात मे
क्या वे बगदाद को फिर से बना सकते हैं?
वे तो खजूर का एक पेड भी नहीं उगा सकते
वे तो रेत में उतना भी पैदल नहीं चल सकते
जितना एक बच्चा ऊंट का चलता है
ढूह और गुबार से
अंतरिक्ष की तरह खेलता हुआ
क्या वे एक ऊंट बना सकते हैं?
एक गुम्बद एक तरबूज एक ऊंची सुराही
एक सोता
जो धीरे-धीरे चश्मा बना
एक गली
जो ऊंची दीवारों के साए में शहर घूमती थी
और गली में
सिर पर फिरोजी रूमाल बांधे एक लड़की
जो फिर कभी उस गली में नहीं दिखेगी
अब उसे याद करोगे
तो वह याद आएगी
अब तुम्हारी याद ही उसका बगदाद है
तुम्हारी याद ही उसकी गली है
उसकी उम्र है
उसका फिरोजी रूमाल है
जब भगत सिंह फांसी के तख्ते की ओर बढ़े
तो अहिंसा ही थी
उनका सबसे मुश्किल सरोकार
अगर उन्हें कुबूल होता
युद्ध सरदारों का न्याय
तो वे भी जीवित रह लेते
बरदाश्त कर लेते
धीरे-धीरे उजड़ते रोज मरते हुए
लाहौर की तरह
बनारस अमुतसर लखनऊ इलाहाबाद
कानपुर और श्रीनगर की तरह
(सौजन्य: शिरीष मौर्य)
पुराने शहर की इस छत पर
पूरे चांद की रात
याद आ रही है वर्षों पहले की
जंगल की एक रात
जब चांद के नीचे
जंगल पुकार रहे थे जंगलों को
और बारहसिंगे
पीछे छूट गए बारहसिंगों को
निर्जन मोड पर ऊंची झाडियों मे
ओझल होते हुए
क्या वे सब अभी तक बचे हुए हैं
पीली मिट्टी के रास्ते और खरहे
महोगनी के घने पेड
तेज महक वाली कड़ी घास
देर तक गोधूलि ओस
रखवारे की झोपड़ी और
उसके ऊपर सात तारे
पूरे चांद की इस शहरी रात में
किसलिए आ रही है याद
जंगल की रात
छत से झांकता हूं नीचे
आधी रात बिखर रही है
दूर-दूर तक चांद की रोशनी
सबसे अधिक खींचते हैं फुटपाथ
खाली खुले आधी रात के बाद के फुटपाथ
जैसे आंगन छाए रहे मुझमें बचपन से ही
और खुली छतें बुलाती रहीं रात होते ही
कहीं भी रहूं
क्या है चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
एक असहायता
जो मुझे कुचलती है और एक उम्मीद
जो तकलीफ जैसी है
शहर में इस तरह बसे
कि परिवार का टूटना ही उसकी बुनियाद हो जैसे
न पुरखे साथ आए न गांव न जंगल न जानवर
शहर में बसने का क्या मतलब है
शहर में ही खत्म हो जाना?
एक विशाल शरणार्थी शिविर के दृश्य
हर कहीं उनके भविष्यहीन तंबू
हम कैसे सफर में शामिल हैं
कि हमारी शक्ल आज भी विस्थापितों जैसी
सिर्फ कहने के लिए कोई अपना शहर है
कोई अपना घर है
इसके भीतर भी हम भटकते ही रहते हैं
लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ
इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद
कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़
अब इन्हीं शहरों में
कई तरह की हिंसा कई तरह के बाजार
कई तरह के सौदाई
इनके भीतर इनके आसपास
इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर
और श्रीनगर तक
हिंसा
और हिंसा की तैयारी
और हिंसा की ताकत
बहस चल नहीं पाती
हत्याएं होती हैं
फिर जो बहस चलती है
उनका भी अंत हत्याओं में होता है
भारत में जन्म लेने का
मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था
अब वह भारत भी नहीं रहा
जिसमें जन्म लिया
क्या है इस पूरे चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
जो मेरी सांस
लाहौर और कराची और सिंध तक उलझती है?
क्या लाहौर बच रहा है?
वह अब किस मुल्क में है?
न भारत में न पाकिस्तान में
न उर्दू में न पंजाबी में
पूछो राष्ट्रनिर्माताओं से
क्या लाहौर फिर बस पाया?
जैसे यह अछूती
आज की शाम की सफेद रात
एक सचाई है
लाहौर भी मेरी सचाई है
कहां है वह
हरे आसमान वाला शहर बगदाद
ढूंढो उसे
अब वह अरब में कहां है?
पूछो युद्ध सरदारों से
इस सफेद हो रही रात मे
क्या वे बगदाद को फिर से बना सकते हैं?
वे तो खजूर का एक पेड भी नहीं उगा सकते
वे तो रेत में उतना भी पैदल नहीं चल सकते
जितना एक बच्चा ऊंट का चलता है
ढूह और गुबार से
अंतरिक्ष की तरह खेलता हुआ
क्या वे एक ऊंट बना सकते हैं?
एक गुम्बद एक तरबूज एक ऊंची सुराही
एक सोता
जो धीरे-धीरे चश्मा बना
एक गली
जो ऊंची दीवारों के साए में शहर घूमती थी
और गली में
सिर पर फिरोजी रूमाल बांधे एक लड़की
जो फिर कभी उस गली में नहीं दिखेगी
अब उसे याद करोगे
तो वह याद आएगी
अब तुम्हारी याद ही उसका बगदाद है
तुम्हारी याद ही उसकी गली है
उसकी उम्र है
उसका फिरोजी रूमाल है
जब भगत सिंह फांसी के तख्ते की ओर बढ़े
तो अहिंसा ही थी
उनका सबसे मुश्किल सरोकार
अगर उन्हें कुबूल होता
युद्ध सरदारों का न्याय
तो वे भी जीवित रह लेते
बरदाश्त कर लेते
धीरे-धीरे उजड़ते रोज मरते हुए
लाहौर की तरह
बनारस अमुतसर लखनऊ इलाहाबाद
कानपुर और श्रीनगर की तरह
(सौजन्य: शिरीष मौर्य)
Saturday, October 6, 2007
चंद्रकांत देवताले की कविता
इस बार राजनीति के कबाड़ से छांट कर देवताले जी की ये कविता लाया हूँ जिसमें बरसों पहले मध्य प्रदेश में हुए टाट पट्टी घोटाले की गूँज है........ ऐसे कवि का और श्यामलाल गुरू जीं का हमारे कबाड़ खाने में स्वागत है....... ध्यान दें कि दिल्ली में अभी विश्व बैंक ने भारत में प्राथमिक शिक्षा पर कोई सेमीनार भी आयोजित किया था।
बच्चों और युवाओं के भविष्य के लिए
बहस में शामिल पिपलोदा के श्यामलाल गुरूजी सोच रहे हैं
इतने बड़े नेक काम के लिए याद किया गया उन जैसा
वे अहोभाग्य समझकर सपनों की टूटी हड्डियाँ
अपने भीतर जोड़ रहे हैं
पूरा राष्ट्र बहस मे में शामिल है
इसलिये इसे राष्ट्रीय बहस कहा गया
और श्यामलाल गुरू जी ने भी दो शब्द कहे
पिपलोदा गाँव की कच्ची पाठशाला में
और सोच खुश हुए - उनके शब्द भी शामिल हुए
मुद्दों के राष्ट्रीय दस्तावेज़ में
श्यामलाल गुरू जी टाट पट्टियों और डस्टर के बारे में
परेशान थे पूरी बहस के दौरान
और महीनों तक देखते रहे थे आसमान में
नयी टाट पट्टियों की उड़ान.
(प्रस्तुति : शिरीष मौर्य )
बच्चों और युवाओं के भविष्य के लिए
बहस में शामिल पिपलोदा के श्यामलाल गुरूजी सोच रहे हैं
इतने बड़े नेक काम के लिए याद किया गया उन जैसा
वे अहोभाग्य समझकर सपनों की टूटी हड्डियाँ
अपने भीतर जोड़ रहे हैं
पूरा राष्ट्र बहस मे में शामिल है
इसलिये इसे राष्ट्रीय बहस कहा गया
और श्यामलाल गुरू जी ने भी दो शब्द कहे
पिपलोदा गाँव की कच्ची पाठशाला में
और सोच खुश हुए - उनके शब्द भी शामिल हुए
मुद्दों के राष्ट्रीय दस्तावेज़ में
श्यामलाल गुरू जी टाट पट्टियों और डस्टर के बारे में
परेशान थे पूरी बहस के दौरान
और महीनों तक देखते रहे थे आसमान में
नयी टाट पट्टियों की उड़ान.
(प्रस्तुति : शिरीष मौर्य )
Friday, October 5, 2007
पेप्पोर रद्दी पेप्पोर
पहर अभी बीता ही है
पर चौंधा मार रही है धूप
खड़े खड़े कुम्हला रहे हैं
सजीले अशोक के पेड़
उरूज पर आ पहुंचा है बैसाख
सुन पड़ती है सड़क से
किसी बच्चा कबाड़ी की संगीतमय पुकार
गोया एक फरियाद है अजान की
एक फरियाद है एक फरियाद
कुछ थोड़ा और भरती मुझे
अवसाद और अकेलेपन से
वीरेन डंगवाल
पर चौंधा मार रही है धूप
खड़े खड़े कुम्हला रहे हैं
सजीले अशोक के पेड़
उरूज पर आ पहुंचा है बैसाख
सुन पड़ती है सड़क से
किसी बच्चा कबाड़ी की संगीतमय पुकार
गोया एक फरियाद है अजान की
एक फरियाद है एक फरियाद
कुछ थोड़ा और भरती मुझे
अवसाद और अकेलेपन से
वीरेन डंगवाल
वीरेन डंगवाल की एक ताज़ा अप्रकाशित शीर्षकहीन कविता
कटहली चम्पा की दबी धीमी खुश्बू
मन में बसावे सांप,
आये याद होंठों का दांतों से कटना
तो अब भी जावे कलेजा काँप
मन में बसावे सांप,
आये याद होंठों का दांतों से कटना
तो अब भी जावे कलेजा काँप
Wednesday, October 3, 2007
वीरेन डंगवाल की ' इतने भले नहीं बन जाना '
इतने भले नहीं बन जाना
इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना
ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो
काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी
इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना
ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो
काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी
Tuesday, October 2, 2007
वीरेन डंगवाल की अतिप्रसिद्ध ' पी टी ऊषा' एक बार और
पी टी ऊषा
काली तरुण हिरनी अपनी लम्बी चपल टांगों पर
उड़ती है
मेरे ग़रीब देश की बेटी
आंखों की चमक में जीवित है अभी
भूख को पहचानने वाली
विनम्रता
इसीलिए चेहरे पर नहीं है
सुनील गावस्कर की-सी छटा
मत बैठना पी टी ऊषा
इनाम में मिली उस मारुति कार पर
मन में भी इतराते हुए
बल्कि हवाई जहाज में जाओ
तो पैर भी रख लेना गद्दी पर
खाते हुए
मुँह से चपचप की आवाज़ होती है ?
कोई ग़म नहीं
वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता
दुनिया के
सबसे खतरनाक खाऊ लोग हैं।
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