Saturday, October 13, 2007

पत्थर और पानी


कभी सोचा भी नहीं था कि मुनस्यारी, जोहार और मिलम ग्लेशियर के बारे में किसी ने इतने शानदार तरीक़े से कुछ लिखा होगा. नेत्र सिंह रावत का यात्रा बृतांत पत्थर और पानी पढ़कर मेरा भ्रम टूट गया. कुछ महीने पहले कथादेश में कथाकार योगेंद्र आहूजा ने अपनी पसंदीदा किताबों में इसका ज़िक्र किया था. तभी से मैं इसे तलाश रहा था. और इत्तेफ़ाक देखिए कि एक दिन इस क़िताब के साथ अज़दक वाले प्रमोद जी मेरे ठिकाने पर थे. वो टूटी-बिखरी वाले इरफ़ान भाई के पास से इसे उठाकर लाए थे.
किताब से इसलिए भी आत्मीय रिश्ता बन पाया कि पूरा परिवेश जाना-पहचाना और आत्मीय-सा लगा. मिलम और वहां जाने वाले पहाड़ी रास्ते के जो बिंब नेत्र सिंह रावत ने खींचे हैं वो अद्भुत हैं. पहाड़ी नदियों, बनस्पतियों, पक्षिओं और परंपराओं का जिस तरह उन्होंने ज़िक्र किया है वो हमें सीधे मिलम वाले रास्ते पर ही पहुंचा देता है।


लेखक की इस यात्रा का मक़सद सिर्फ एक हिमालयी ग्लेशियर देखना भर नहीं है. वो अपनी जड़ों को तलाशता हुआ भी चलता है. किताब़ भारत-तिब्बत व्यापार बंद होने के सौका दुख का इज़हार करती है तो ऊंचाई में रहने वाले इस समुदाय की मुश्किल ज़िंदगी की हक़ीक़त भी बयां करती है.

मैं नेत्र सिंह रावत के बारे में ज़्यादा नहीं जानता. वो शायद दिनमान के संपादकीय विभाग में काम करते थे और सिनेमा के गंभीर जानकार थे. वैसे इस क़िताब में ज़िक्र मिलता है कि मिलम की इस यात्रा में मंगलेश डबराल को भी साथ जाना था. लेकिन किन्ही अज्ञात कारणों से वो साथ नहीं जा पाए. रावत एक जगह पर मंगलेश जी को कोट करते हुए regionalism और sense of belonging के फ़र्क पर भी बात करते हैं. इससे ये बात सामने आती है कि जिस जगह की मिट्टी,पानी और हवा में हम पले-बढ़े हों उसके लिए दिल में जगह होना क्षेत्रवाद नहीं.

महानगर की आपाधापी और उसमें भी न्यूज चैनल की चाकरी. ऐसे में ख़ुद से ही शिकायत रहती है कि पढ़ना-लिखना सब चौपट होता जा रहा है. लेकिन पत्थर और पानी को पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं दिल्ली में यमुना की गंदगी को नहीं बल्कि बल खाती गोरी नदी को बहते हुए क़रीब से देख रहा हूं. पता नहीं ये नॉस्टेलजिया कैसा है.

याद आ रहा है कि हल्द्वानी वाले कबाड़ी ने कभी गगास नदी के बारे में कुछ लिखा था. मुझे ख़ुशी है कि मैंने ना सही किसी ने गुमनाम सी गोरी नदी को हिंदी की दुनिया में एक नाम दिया है।

और अंत में : मौक़ा मिले तो सभी कबाड़ी एक अनिवार्य पुस्तक की तरह इसे ज़रूर पढ़े. कबाड़वाद को आगे बढ़ाने में ये महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. इससे कुदरत के ज़्यादा क़रीब होने की प्रेरणा हम ले सकते हैं.

5 comments:

Ashok Pande said...

भूपेन् को पहली पोस्ट भेजने के लिए बधाई। आप के जानकर अच्छा लगेगा कि 'पत्थर और पानी' कुमाऊं विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाई जा चुकी है। अच्छा आलेख है आपका।

इन्दु said...

बिल्कुल सही कहा आपने. 'पत्थर और पानी' पढ़कर मुझे 'निराई' जैसी लग आयी. नेत्र सिंह रावत को पहली ही बार पढा, इतनी रोचक किताब सचमुच हाल-फिलहाल तो नहीं ही पढी थी. जिस तरह पूरी किताब में ध्वनियों, बिम्बों का प्रवाह कल-कल करके बहा है, उसमें तो हम सभी बहने लगते हैं. इतने सीन बनते हैं कि कुछ देर के लिए तो लगता है, हम वहीं पहुंच गए हैं . उसके तो कुछ अंश भूपेन भाई, कबाड़खाना में देने लायक हैं .

[ आशुतोष ] said...

नेत्र सिंह रावत के लायक वारिस नवीन पांगती ने हाल ही में 25 साल बाद मुनस्यारी की यात्रा की। अपने गांव पहुंचते ही बाल्मीकि ऋषि की तरह उनकी भी कविताई फूट पड़ी। अपनी जड़ों पर इतनी सुंदर कविताएं मैंने पहले नहीं पढ़ी थीं। ऊपर से जोहार के नयनाभिराम दृश्यों के साथ इन्हें इतने सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि पुस्तक को देखते ही लपक लेने का मन करता है। बस थोड़ा धीरज रखिए, जल्द कबाड़खाने में दिखाई देंगी नवीन की कविताएं।

काकेश said...

ये किताब तो खरीदनी पड़ेगी दाज्यू हो...

पांगती जी की किताब तो खरीद ली.बोलो तो निकाल के लाऊं कुछ कबाड़.

ANUNAAD said...

पत्थर और पानी मैंने 4 साल एम0ए0 में पढ़ाई है। अब उसे बी0ए0 में खिसका दिया गया है। जल्द ही वो पढ़ाई से बाहर कर दी जाएगी !
ये मुझ जैसी कबाड़ी अध्यापक की भविष्यवाणी है!