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Wednesday, May 5, 2010

हिमालय में प्लूटोनियम - सी आई ए का एक और अपराध -2


(पिछली किस्त से जारी)

दर असल सी आई ए के पस्त पड़ जाने का मुख्य कारण कुछ और थी - आर टी जी के भीतर धरे प्लूटोनियम की नैसर्गिक ऊष्मा के कारण आर टी जी सीधे सीधे बर्फ़ को गलाता हुआ किसी ग्लेशियर के बीचोबीच पहुंच चुका था.

इस पूरे किस्से के दो पहलू हैं. अच्छा तो यह होगा कि आर टी जी किसी चट्टान पर जा कर टिक गया हो. लेकिन इसका बुरा पहलू यह है कि बर्फ़ और चट्टान के किसी पिण्ड ने आर टी जी की कठोर परत को तोड़ दिया हो और प्लूटोनियम बहता हुआ गंगा में न पहुंच गया हो.

१९७८ में जब आउटसाइड पत्रिका में हावर्ड कोन नामक पत्रकार ने द नन्दा देवी केपर शीर्षक अपने लेख में इस बात का पर्दाफ़ाश किया तो जाकर भारत की सरकार चेती.

भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री ने देश को आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीकठाक था और इसे लेकर मामला रफ़ादफ़ा करने वाले कुछ सरकारी दस्तावेज़ पेश किये. जब मैंने खुद इस मिशन से सम्बन्धित अमरीकी अधिकारियों से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि ताकेदा की किताब को साइन्स फ़िक्शन से अधिक कुछ नहीं माना जाना चाहिये. अमरीकी सरकार के किसी दफ़्तर में इस अभियान को अधिकृत रूप से रेकॉर्ड नहीं किया गया है.

जैसा कि भारत सरकार की रिपोर्ट ने संकेत किया था आर टी जी से यदि प्लूटोनियम निकला भी होगा तो आबादी वाले हिस्सों तक पहुंचने से पहले ही वह गंगा के किनारे रेत-कंकड़ में धंस गया होगा. और यदि वह मैदानी इलाके में प्रवेश कर भी गया होगा तो उसकी शक्ति नदी के अपार जल के कारण बेहद क्षीण हो गई होगी और उस के कारण किसी भी किस्म का स्वास्थ्य संकट नहीं हो सकता.

तो सिद्धान्ततः कोई बड़ी दिक्कत नहीं थी. लेकिन प्लूटोनियम को लेकर वास्तविकता में कुछ भी निश्चित नहीं कहा जा सकता - खास तौर पर १९६० के दशक में आर टी जी में बतौर ईंधन इस्तेमाल किये जाने वाले प्लूटोनियम को लेकर. १९४१ में ग्लेन सीबोर्ग और उसकी टीम द्वारा बनाए गए प्लूटोनियम के बारे में कहा जाता है कि यह इस पृथ्वी को बिलॉन्ग नहीं करता और उसका व्यवहार ऐसा होता है जैसे उसे यहां रहना कतई नापसन्द है.

परमाणु विज्ञान के हिसाब से देखा जाए तो प्लूटोनियम अपने करीब बीस आइसोटोप्स के ऐसे उबलते लौंदे की तरह अस्तित्वमान रहता है जो लगातार टूटते और बनते रहते हैं और लगातार रेडियेशन छोड़ते रहते हैं.

भौतिकविज्ञान और रसायनविज्ञान की दृष्टि से भी यह तत्व बेहद खतरनाक माना जाता है - खासतौर पर मानव जीवन के लिए. इसका एक माइक्रोग्राम मनुष्य के लिये जानलेवा हो सकता है.

१९६० के दशक में अमरीकी सरकार द्वारा जारी किये गए दिशानिर्देशों के अनुसार किसी एक जगह पर अधिक से अधिक चार पाउन्ड प्लूटोनियम का भण्डारण किया जा सकता था. नन्दा देवी में इतना ही प्लूटोनियम रखा गया था.

अमरीका इतने से ही सन्तुष्ट नहीं हुआ. अगले ही साल एक और आर टी जी को नन्दा देवी के समीप २२,५०० फ़ीट ऊंची एक और चोटी नन्दा कोट पर सफलतापूर्वक इन्स्टॉल कर दिया गया. कुछ महीनों बाद उस से सिग्नल आना बन्द हो गए. बर्फ़ की वजह से मशीन ने काम करना बन्द कर दिया था. अच्छी बात यह थी कि आर टी जी को वापस लाया जा सकता था. अक्टूबर १९६७ में यह काम किया गया. इन तीनों अभियानों में काम करने वाले शेरपाओं को रेडियेशन से बचाने के कोई उपाय नहीं किये गए थे. फ़ौजियों और पर्वतारोहियों को भी जो एन्टी-रेडियेशन बैज दिए गए थे उनकी गुणवत्ता पर किसी तरह का यकीन नहीं किया जा सकता था.

हम शायद कभी नहीं जान पाएंगे कि असल में वहां हुआ क्या था.

Tuesday, May 4, 2010

हिमालय में प्लूटोनियम - सी आई ए का एक और अपराध

इधर दिल्ली में हुए कोबाल्ट रेडियेशन की बहुत चर्चा है और यह खासी चिन्ता का विषय भी है. लेकिन आज से करीब चालीस साल पहले अमरीका ने हिमालय की पवित्र चोटियों पर ऐसा पाप किया था जिसके परिणाम क्या हुए या क्या हो रहे हैं या क्या होंगे, कोई नहीं जानता. पीटर ली के एक लम्बे और महत्वपूर्ण लेख के कुछ अंश प्रस्तुत हैं



शीतयुद्ध के दौरान सी आई ए ने कुछ कामों को हर सूरत में सरंजाम देना ही था - कम्यूनिज़्म को रोकने के लिए कैसी भी कीमत चुकाई जा सकती थी और किसी भी तरह की तकनीकी बाधा को पराजित किया जा सकता था. और चीन के मिसाइल कार्यक्रमों की ख़ुफ़िया सूचना प्राप्त करने के लिए कोई भी पहाड़ फ़तह किया जा सकता था.

लोप नोर में चीन द्वारा किये जा रहे मिसाइल परीक्षणों की जासूसी करने के लिए सी आई ए ने एक हैबतनाक ऑपरेशन किया था - दुनिया के चुनिन्दा पर्वतारोहियों की मदद से नन्दा देवी और नन्दा कोट की चोटियों पर परमाणु ऊर्जा से चलने वाली लिसनिंग डिवाइसेज़ स्थापित करने का प्रयास. लेकिन इस हिमालयी अभियान में सी आई ए ने लिसनिंग डिवाइसेज़ के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम नामक तत्व के चलते होने वाले दुष्परिणामों को पूरी तरह नज़र अन्दाज़ कर दिया था जिसका खतरा उस मिशन में शामिल लोग आज तक महसूस करते हैं.

१९६६ में चार पाउन्ड प्लूटोनियम नन्दादेवी में खो गया था और आज तक कोई नहीं जानता कि उसका क्या हुआ या उन शेरपाओं और पर्वतारोहियों का जो इस अभियान में शामिल थे. मालूम तो यह भी नहीं कि जिस चोटी की बर्फ़ पिघल कर गंगा नदी में जाती है, उस गंगा के किनारे बसने वाले लोगों के साथ क्या क्या हो चुका है और होने वाला है.

न्यू यॉर्क की थंडर्स माउथ प्रेस द्वारा २००६ में प्रकाशित पीट ताकेदा की लिखी पुस्तक एन आई ऑन टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड में इस ख़ौफ़नाक अभियान के विस्तृत विवरण पढ़ने को मिलते हैं.

यह बहुत सीधा सा मिशन था. यह सैटेलाइट और डिजिटल उपकरणों से पहले का समय था जब सामान्य रेडियो उपकरण लगी हुई मिसाइलें सन्देश भेजा करती थीं जिन्हें कोई भी अपने रेडियो रिसीवर पर प्राप्त कर सकता था.

अपने सिग्नल्स को दुश्मनों से दूर रखने की नीयत से चीन ने अपनी मिसाइलों का परीक्षण लोप नोर में किया. बाहरी संसार का कोई भी व्यक्ति इन सिग्नल्स को सिर्फ़ और सिर्फ़ हिमालय की चोटी से ही सुन सकता था. सो सी आई ए ने निर्णय लिया कि वह २५००० फ़ीट की ऊंचाई पर नन्दा देवी कॊ चोटी पर अपना रिसीवर स्थापित करेगी.

हिमालय की कठिन परिस्थितियों के कारण यह असम्भव था कि इस रिसीवर की देखभाल कोई मानव कर पाता. चूंकि रिसीवर की बैटरियां लगातार बदली जानी होती थीं, सी आई ए ने इसका समाधान खोज निकाला. अमरीकी अन्तरिक्ष अभियानों में इस्तेमाल होने वाले रेडियोसोटोपिक थर्मल जेनेरेटर यानी आर टी जी के इस्तेमाल का निर्णय ले लिया गया.

१९६५ में एवरेस्ट फ़तेह करने वाले पहले भारतीय कैप्टेन एम एस कोहली को फ़्रिज के आकार के इस उपकरण को नन्दादेवी की चोटी पर पहुंचाने के अभियान हेतु सारी तैयारियां करने का ज़िम्मा सौंपा गया.

कोहली ने भी अपने संस्मरण लिखे हैं. विवरणों में कुछ अन्तर होने के बावजूद दोनों का नैरेटिव करीब करीब एक सा है.

१९६५ के पतझड़ में एक भारतीय-अमरीकी दल नन्दादेवी के बेस कैम्प तक पहुंचा. इकत्तीस लोगों के इस दल को बेस कैम्प में हैलीकॉप्टर द्वारा उक्त रिसीवर, आर टी जी और प्लूटोनियम २३८ की सात छड़ें मुहैय्या कराई गईं जिन्हें चोटी तक पहुंचाने में तीन सप्ताह लगे.



जब ये लोग चोटी पर पहुंचने ही वाले थे, मौसम बेतहाशा ख़राब हो गया. पर्वतारोहण का सीज़न समाप्त हो चुका था और रिसीवर स्थापित करने का कोई भी प्रयास अब अगले साल से पहले सम्भव न था. बजाय इस तमाम उपकरणों को वापस नीचे लाने की जेहमत उठाने के, यह तय किया गया कि उन्हें एक चट्टान से बांध कर वहीं छोड़ कर अगले साल आ कर काम को अंजाम दिया जाय.

अगले साल वसन्त में जब ये पर्वतारोही वापस उस जगह पहुंचे तो यह देख कर उनके होश उड़ गए कि वह पूरी की पूरी चट्टान बर्फ़ अपने साथ नीचे कहीं बहा ले गई थी.

रिसीवर, आर टी जी और प्लूटोनियम की छड़ें सम्भवतः हज़ारों फ़ीट नीचे किसी ग्लेशियर में दफ़न थे. इन्हीं ग्लेशियरों से उत्तर भारत के मैदानी इलाकों को पानी मिलता है. बेतहाशा प्रयास किये गए कि इन चीज़ों को वापस खोज लिया जाए पर ऐसा हो न सका और आखिरकार सी आई ए ने अपने हाथ खड़े कर दिये

फ़ोटो: ऊपर नन्दादेवी में बर्फ़ीला तूफ़ान, नीचे हिमस्खलन के बाद बाहर निकलते पीट ताकेदा

(जारी)

Friday, December 25, 2009

एक हिमालयी यात्रा - दसवां हिस्सा



(पिछली किस्त से जारी)

जौलिंगकौंग से निकलते-निकलते हमें बारह बज गया है. जौलिंगकौंग छोड़ते हुए मैं किसी छोटी-मोटी फ़तह की धुंधलाई प्रसन्नता में एक दफ़ा पलटकर सिन-ला पर निगाह डालता हूं. जीवन में देखे गए सुन्दरतम लैन्डस्केप हैं ये.

कुटी के रास्ते में हमें विचित्र भूगर्भीय संरचनाएं नज़र आती हैं - ये पुराकालीन टैथीज़ महासागर के अवशेष हैं. चट्टानें मुझे नीदरलैन्ड्स एन्टीएज़ के कुरासाओ द्वीप में देखे समुद्रतटों की याद दिलाती हैं. वे खुरदरी हैं और उनमें तमाम फ़ॉसिल्स धंसे हुए हैं. मैं आंखें बन्द करता हूं और कल्पना करता हूं कि कुरासाओ की समुद्री गुफा बोका ताब्ला के सम्मुख खड़ा हूं. एक संक्षिप्त क्षण को मुझे वह असम्भव जादू घटता महसुस होता है.

मुझे विशाल लहरों की सुदूर ध्वनियां सुनाई देती हैं और मैं प्रस्तरयुग से पहले की सड़ी मछलियों की बदबू तक सूंघ पाता हूं. अचानक मेरा दिमाग मारकेज़ के उपन्यासों सरीखी जादुई छवियों से अट जाता है जिनमें तमाम सूख चुके महासागर हैं. मुझे एक पल को लगता है मैं इस दुनिया में हूं ही नहीं.

यह सब इतनी तेज़ी और संक्षिप्तता के साथ हुआ है कि मैं हक्काबक्का हूं.

हम कोशिश करते हैं कि कुछ फ़ॉसिल्स स्मृति के वास्ते अपने साथ रख लें लेकिन वे बेहद मजबूती के साथ चट्टानों में खुभे हुए हैं. उन्हें निकाल पाने के लिए छैनी-हथौड़ी की ज़रूरत पड़ेगी. इसी सूखे समुद्रतट का रास्ता कुछ देर साथ चलता है. इस सम्पूर्ण बंजर इलाके में हमें अचानक एक बौना सा भोजपत्र का वृक्ष दिखता है.

"तुम्हें अहसास है, चोको" सबीने पूछती है "पिछले तीन दिनों में हमने यह पहला पेड़ देखा है."

मैं तुरन्त इस बौने गांठदार पेड़ के गांठदार तने को गौर से देखने लगता हूं.

जौलिंगकौंग से कुटी के बीच के चौदह किलोमीटर के फ़ासले के दौरान कोई भी, किसी भी तरह की बसासत नहीं है. चाय की एक दुकान तक नहीं. रास्ते में कई जगह भूस्खलन हुआ है. इनमें से कई ताज़े लग रहे हैं. और अब पेड़ हैं - काफ़ी सारे. हम कुटी यांगती के बगल - बगल चल रहे हैं. लैन्ड्स्केप थोड़ा सा घुमावदार होने लगा है - नदी के दोनों तरफ़ विशाल पर्वत हैं. नदी अब भी शान्त बहती जाती है.

जौलिंगकौंग के दो खुशनुमा दिनों ने हमारी थकान काफ़ी हद तक दूर कर दी है. दो स्थानीय लोग नज़र आते हैं - यानी हम कुटी पहुंचने को हैं. दोनों लोग जयसिंह के पास जाकर हमारे बारे में सवाल करते हैं. मुझे यह जानकर हंसी में फूट पड़ने की इच्छा होती है कि वे मुझे भी फ़िरंगी समझे हुए हैं.

व्यांस घाटी में सबसे ज़्यादा ऊंचाई पर स्थित गांव है कुटी. कुटी जब आपके सामने आता है वह उतना नाटकीय तरीके से हतप्रभ कर देने वाला सुन्दर नहीं होता जितना दारमा घाटी का बालिंग गांव. अलबत्ता छतों के ठीक सामने दो विशालकाय पहाड़ हैं. इन्हें देखकर पीठ के बल लेटे दो बूढ़े और प्राचीन रोमन योद्धाओं की छवि उभरती है. उनकी आंखें बन्द हैं और ऐसा लगता है कि वे एक दूसरे की उपस्थिति से बेपरवाह हैं.

कुमाऊं मन्डल विकास निगम का कैम्प गांव के प्रवेश पर अवस्थित है. हम करीब पांच बजे वहां हैं. वही दो इगलू, वही तीन लोगों का स्टाफ़ - एक मैनेजर, एक कुक और एक वायरलैस ऑपरेटर. तीनों ताश खेलने में मगन हैं और हमें आता हुआ देख चुकने के बाद भी बहुत बेरुखी दिखलाते हैं.

मुझे तीन बार अपनी उपस्थिति जतानी होती है तब जाकर उनमें से एक बेमन से उठता है और हमें इगलू का रास्ता दिखाता है. जब मैं उसे बतलाता हूं कि हम जौलिंगकौंग से आ रहे हैं, उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आ जाता है.

"ओ! सो यू आर मिस्टर पाण्डे? कल रात शर्माजी ने मुझे वायरलैस किया था. तुमूंल पैली किलै नी बताय? (आपने पहले क्यों नहीं बताया)"

वह तीन भाषाओं में तीन वाक्य बोलता है - क्रमशः अंग्रेज़ी, हिन्दी और कुमाऊंनी में.

"वन मोर ब्रदर फ़ॉर यू चोको" सबीने मेरी टांग खेंचना शुरू करती है.

दोनों इगलू खाली हैं. हम उनमें से एक चुन लेते हैं.

मैं मैनेजर से पूछता हूं कि कुटी में आई. टी. बी. पी. की चैकपोस्ट है या नहीं. हां सुनने पर हम तुरन्त आई. टी. बी. पी. कैम्प का रुख करते हैं. जौलिंगकौंग जैसी घटना की पुनरावृत्ति हम नहीं चाहते.

आई. टी. बी. पी. कैप इन सारी घाटियों में देखा गया सबसे बड़ा है. बहुत सारे सिपाही हैं. सारे किसी न किसी काम में लगे हुए हैं. दस मिनट के भीतर तमाम ऑपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं और कोई भी हमें उबाऊ वार्तालाप में नहीं घसीटता.

इगलू के दरवाजे पर खटखट होती है. कोई बेहद नफ़ीस अंग्रेज़ी में कहता है: "मे आइ डिस्टर्ब यू फ़ॉर अ व्हाइल सर?"

(जारी)

Wednesday, December 23, 2009

हिमालय की कुछ और छवियां

आज प्रस्तुत कर रहा हूं कुमाऊं की व्यांस घाटी के चन्द फ़ोटोग्राफ़. जिस हिमालयी यात्रा की सीरीज़ पिछले कुछ दिनों से यदा-कदा लगाई जाती रही है, हिमालय की ये चोटियां उसी यात्रा के दौरान नज़र आया करती हैं. यह तस्वीरें हल्द्वानी निवासी मेरे मित्र मनोज भट्ट के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं. सो उनका शुक्रिया.








Sunday, October 25, 2009

पर्वत यात्रा की कुछ तस्वीरें और एक पहेली


ऊपर लगी तस्वीर 'उत्तर के काशी' के एक पुराने मंदिर की है.
क्या बता सकते हैं यह कौन - सी जगह है ...?
अभी तो पिछ्ले सप्ताह की गई यात्रा की कुछ तस्वीरें पेश हैं. रपट या यात्रा वृतान्त शीघ्र ही...

भागीरथी के पुल से आती हुई शाम

डूब , झील , बस्ती और हिमालय

ईंट , पहाड़ , बादल और बर्फ

बुला रहे हैं पहाड़ के रास्ते

'चम्बे दा गाँव' के नीचे चाय की दुकान


Tuesday, October 23, 2007

तितली वाला फ्रेडरिक



‘वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन' वाले जापानी मासानोबू फुकुओका और पर्मीकल्चर के प्रतिनिधि ऑस्ट्रियाई किसान सैप होल्ज़र फिलहाल विश्वविख्यात नाम हैं और दुनिया भर के पर्यावरणविद उन्हें हाथोंहाथ लेते हैं और उनकी लिखी किताबों की लाखों प्रतियां बिका करती हैं। सुन्दरलाल बहुगुणा और मेधा पाटकर के कामों को मीडिया द्वारा पर्याप्त ख्याति दिलाई जा चुकी है। लेकिन उत्तराखंड के कोटमल्ला गांव के बंजर में बीस हज़ार पेड़ों का जंगल उगाने वाले जगत सिंह चौधरी ‘जंगली’ जैसे प्रकृतिपुत्रों को उनके हिस्से का श्रेय और नाम मिलना बाकी है। ठीक ऐसा ही मेरे प्यारे दोस्त फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर के बारे में भी कहा जा सकता है।

उत्तराखंड कुमाऊं के विख्यात पर्यटन स्थल भीमताल की जून एस्टेट में फ्रेडरिक स्मेटाचेक के घर पर (माफ करें फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर के घर) पर आपको एशिया का सबसे बड़ा व्यक्तिगत तितली संग्रह देखने को मिलेगा। हल्द्वानी से भीमताल की तरफ जाएं तो पहाड़ी रास्ता शुरू होने पर आपको चीड़ के पेड़ों की बहुतायत मिलेगी । यह हमारे वन विभाग की मेहरबानी है कि पहाड़ों में कल्पवृक्ष के नाम से जाने जाने वाले बांज के पेड़ों का करीब करीब खात्मा हो चुका है। भीमताल पहुंचने के बाद आप बाईं तरफ को एक तीखी चढ़ाई पर मुड़ते हैं और जून एस्टेट शुरू हो जाती है। जून एस्टेट में आपको चीड़ के पेड़ खोजने पड़ेंगे। यहां केवल बांज है दशकों से सहेजा हुआ।
फ्रेडरिक के पिता यानी फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर 1940 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में यहाँ आकर बस गए थे।यहां स्मेटाचेक परिवार की संक्षिप्त दास्तान बताना ज़रूरी लगता है। चेकोस्लोवाकिया के मूल निवासी लेकिन जर्मन भाषी फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर 1940 के आसपास हिटलर विरोधी एक संस्था के महत्वपूर्ण सदस्य थे। विश्वयुद्ध का दौर था और हिटलर का सितारा बुलंदी पर। वह अपने सारे दुश्मनों को एक एक कर खत्म करता धरती को रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा था। फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर की मौत का फतवा भी बाकायदा हिटलर के दस्तखत समेत जारी हुआ। जान बचाने की फेर में फ्रेडरिक सीनियर अपने कुछ साथियों के साथ एक पुर्तगाली जहाज पर चढ़ गए। यह जहाज कुछ दिनों बाद गोआ पहुंचा। गोआ में हुए एक खूनी संघर्ष में जहाज के कप्तान का कत्ल हो गया। सो बिना कप्तान का यह जहाज चल दिया कलकत्ता की तरफ।
कलकत्ता पहुंचकर रोजी रोटी की तलाश में फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर ने उन दिनों वहां बड़ा व्यापार कर रही बाटा कम्पनी में नौकरी कर ली। बाटानगर में रहते हुए फ्रेडरिक सीनियर ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक क्लब की स्थापना की। चुनिन्दा रईसों के लिए बना यह क्लब सोने की खान साबित हुआ। इत्तफाक से इन्हीं दिनों अखबार में छपे एक विज्ञापन ने उनका ध्यान खींचा: कुमाऊं की नौकुचियाताल एस्टेट बिकाऊ थी। उसका ब्रिटिश स्वामी वापस जा रहा था। मूलत: पहाड़ों को प्यार करने वाले फ्रेडरिक सीनियर को फिर से पहाड़ जाने का विचार जंच गया। वे कलकत्ता से नौकुचियाताल आ गए और फिर जल्दी ही उन्होंने नौकुचियाताल की संपत्ति बेचकर भीमताल की जून एस्टेट खरीद ली जो फिलहाल उनके बेटों के पास है।
नौकुचियाताल और भीमताल के इलाके में फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर ने प्रकृति और पर्यावरण का गहन अध्ययन किया खासतौर पर इस इलाके में पाए जाने वाले कीट पतंगों का और तितलियों का। पर्यावरण के प्रति सजग फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर ने अपने बच्चों को प्राकृतिक संतुलन का मतलब समझाया और पेड़ पौधों जानवरों कीट पतंगों के संसार के रहस्यों से अवगत कराया। यह फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर थे जिन्होंने 1945 के साल से तितलियों का वैज्ञानिक संग्रह करना शुरू किया। यह संग्रह अब एक विषद संग्रहालय बन चुका है। संग्रहालय के विनम्र दरवाज़े पर हाफ पैंट पहने हैटधारी स्मेटाचेक सीनियर का फोटो लगा है। स्मेटाचेक सीनियर के मित्रों का दायरा बहुत बड़ा था। विख्यात जर्मन शोधार्थी लोठार लुट्जे अक्सर अपने दोस्तों के साथ जून एस्टेट में रहने आते थे। इन दोस्तों में अज्ञेय और निर्मल वर्मा भी थे और विष्णु खरे भी। अभी कुछ दिन पहले स्मेटाचेक जूनियर ने मुझे सम्हाल कर रखा हुआ एक टाइप किया हुआ कागज़ थमाया। यह स्वयं विष्णु जी द्वारा टाइप की हुई उनकी कविता थी : ‘दिल्ली में अपना घर बना लेने के बाद एक आदमी सोचता है’। कविता के बाद कुछ नोट्स भी थे। शायद यह कविता वहीं फाइनल की गई थी।
अपने पिता की परम्परा को आगे बढ़ाने का काम उनके बेटों विक्टर और फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर ने संभाला। बड़े विक्टर अब जर्मनी में रहते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भूवैज्ञानिक माने जाते हैं : अंटार्कटिका की पारिस्थितिकी के विशेषज्ञ। सो अब एक तरह से स्मेटाचेक परिवार का इकलौता और वास्तविक ध्वजवाहक फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर है। पचपन छप्पन साल का फ्रेडरिक पिछले करीब आठ सालों से पूरी तरह शैयाग्रस्त है। बिस्तर पर लेटे इस बेचैन शख्स के पास आपको कुछ देर बैठना होगा और धीरे धीरे आपके सामने पिछले चालीसेक सालों की आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय कथाओं का पुलिन्दा खुलना शुरू होगा।
फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर के घर में घुसते ही उसकी बेहतरीन वास्तुकला ध्यान खींचती है। बहुत सादगी से बने दिखते इस घर के भीतर लकड़ी का बेहतरीन काम है। यह अपेक्षाकृत नया मकान है और इसे नींव से शुरू करके मुकम्मल करने का काम खुद फ्रेडरिक ने स्थानीय मजदूर मिस्त्रियों की मदद से किया। घर की तमाम आल्मारियां दरवाज़े पलंग कुर्सियां सब कुछ उसने अपने हाथों से बनाए हैं। किंचित गर्व के साथ वह कहता है कि इस पूरे इलाके में उस जैसा बढ़ई कोई नहीं हो सकता। न सिर्फ बढ़ईगीरी में बल्कि बाकी तमाम क्षेत्रों में अपने पिता को वह अपना उस्ताद मानता है। अपने पिता से फ्रेडरिक ने प्रकृति को समझना और उसका आदर करना सीखा। किस तरह कीट पतंगों और तितलियों चिड़ियों के आने जाने के क्रम के भीतर प्रकृति अपने रहस्यों को प्रकट करती है और किस तरह वह अपने संतुलन को बिगाड़ने वाले मानव के खिलाफ अपना क्रोध व्यक्त करती है यह सब फ्रेडरिक को बचपन से सिखाया गया था।
कोई आश्चर्य नहीं सत्तर के दशक में अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए करने के बाद फ्रेडरिक ने थोड़े समय नौनीताल के डी एस बी कॉलेज में पढ़ाया लेकिन नौकरी उसे रास नहीं आई। उसने बंजारों का जीवन अपनाया और कुमाऊं गढ़वाल भर के पहाड़ों और हिमालयी क्षेत्रों की खाक छानी। सन 1980 के आसपास से कुमाऊं में फैलते भूमाफिया के कदमों की आहट पहचानने और सुनने वाले पहले लोगों में फ्रेडरिक था। यह फ्रेडरिक था जिसने अपने इलाके के निवासियों के लिए राशनकार्ड जैसा मूल अधिकार सुनिश्चित कराया।
अस्सी के दशक में फ्रेडरिक अपनी ग्रामसभा का प्रधान चुना गया और पांच सालों के कार्यकाल के बाद उसकी ग्रामसभा को जिले की आदर्श ग्रामसभा का पुरूस्कार प्राप्त हुआ।इस दौरान उसने अपने क्षेत्र के हर ग्रामीण की ज़मीन जायदाद को बाकायदा सरकारी दफ्तरों के दस्तावेजों में दर्ज कराया। जंगलों में लगने वाली आग से लड़ने को स्थानीय नौजवानों की टुकड़ियां बनाईं दबे कुचले लोगों को बताया कि शिक्षा को वे बतौर हथियार इस्तेमाल करें तो उनका जीवन बेहतर बन सकता है। साथ ही यह समय आसन्न लुटेरों के खिलाफ लामबन्दी की तैयारी का भी था जो तरह तरह के मुखौटे लगाए पहाड़ों की हरियाली को तबाह करने के गुप्त रास्तों की खोज में कुत्तों की तरह सूंघते घूम रहे थे।
पूरा पहाड़ न सही अपनी जून एस्टेट और आसपास के जंगलों को तो वह बचा ही सकता था। इसके लिए उसने कई दफा अपनी जान की परवाह भी नहीं की। जून एस्टेट में पड़ने वालै एक सरकारी जमीन को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भगवा सरकार ने रिसॉर्ट बनाने के वास्ते अपने एक वरिष्ठ नेता को स्थानांतरित कर दिया। इस रिसॉर्ट के निर्माणकार्य में सैकड़ों बांजवृक्षों को काटा जाना था। इन पेड़ों की पहरेदारी में स्मेटाचेक परिवार ने करीब आधी शताब्दी लगाई थी। भगवा राजनेता ने धन और शराब के बल पर स्थानीय बेरोजगारों का समर्थन खरीद कर निर्माण चालू कराया लेकिन फ्रेडरिक के विरोध और लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद न्यायालय का निर्णय निर्माण को बन्द कराने में सफल हुआ। इस पूरे प्रकरण में कुछ साल लगे और कानून की पेचीदगियों से जूझते फ्रेडरिक को पटवारियों क्लर्कों पेशकारों से लेकर कमिश्नरों तक से बात करने और लड़ने का मौका मिला। उसे मालूम पड़ा कि असल लड़ाई तो प्रकृति को सरकारी फाइलों और तुगलकी नीतियों से बचाने की है। कम से कम लोगों को इस बाबत आगाह तो किया जा सकता है।
इधर 1990 के बाद से दिल्ली और बाकी महानगरों से आए बिल्डरों ने औने पौने दाम दे कर स्थानीय लोगों की जमीनें खरीदना शुरू किया। इन जमीनों पर रईसों के लिए बंगले और कॉटेजें बनाई गईं। भीमताल की पूरी पहाड़ियां इन भूमाफियाओं के कब्जे में हैं और एक भरपूर हरी पहाड़ी आज सीमेन्ट कंक्रीट की बदसूरत ज्यामितीय आकृतियों से अट चुकी है। अकेला फ्रेडरिक इन सब से निबटने को काफी नहीं था। फिर भी सन 2000 में उसने नैनीताल के उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की । यह याचिका पिछले दशकों में शासन की लापरवाही प्रकृति के प्रति क्रूरता और आसन्न संकट से निबटने के लिए वांछनीय कार्यों का एक असाधारण दस्तावेज है । पांच सालों बाद आखिरकार 2005 के शुरू में इस याचिका पर शासन ने कार्य करना शुरू कर दिया है।
वर्ष 2000 में फ्रेडरिक ने बाकायदा भविष्यवाणी करते हुए जल निगम को चेताया था कि उचित कदमों के अभाव में जल्द ही समूचे हल्द्वानी की तीन चार लाख की आबादी को भीमताल की झील के पानी पर निर्भर रहना पड़ेगा क्योंकि लगातार खनन और पेड़ों के कटान ने एक समय की सदानीरा गौला नदी को एक बीमार धारा में बदल दिया था। 2005 की गर्मियों में यह बात अक्षरश: सच साबित हुई।
बहुत कम लोग जानते हैं कि फ्रेडरिक एक बढ़िया लेखक और कवि भी है। वह अंग्रेजी में लिखता है और उसका ज्यादातर लेखन व्यंग्यात्मक होता है। उसे शब्दों और उनसे निकलने वाली ध्वनियों से खेलने और शरारत में आनन्द आता है। ‘द बैलेस्टिक बैले ऑफ ब्वाना बोन्साई बमचीक’ उसका अब तक का सबसे बड़ा काम है अलबत्ता उसे अभी छपना बाकी है । इसके एक खण्ड में पेप्सी और कोकाकोला के ‘युद्ध’ को समाप्त करने के लिए कुछ अद्भुत सलाहें दी गई हैं। दुनिया भर के साहित्य पढ़ चुके फ्रेडरिक के प्रिय लेखकों की लिस्ट बहुत लम्बी है। वह हिमालयी पर्यावरण के विरले विशेषज्ञों में एक है। पिछले दस सालों से जून एस्टेट के पेड़ों के हक के लिए लड़ते भारतीय दफ्तरों की
लालफीताशाही और खत्ता खतौनी जटिलताओं से रूबरू होता हुआ अब वह भारतीय भू अधिनियम कानूनों का ज्ञाता भी है। अपने बिस्तर पर लेटा हुआ वह एक आवाज सुनकर बता सकता है कि कौन सी चिड़िया किस पेड़ पर बैठकर वह आवाज निकाल रही है और कि वह ठीक कितने सेकेंड बाद दुबारा वही आवाज निकालेगी़ जब तक कि उसका साथी नहीं आ जाता। जंगली मुर्गियों तेंदुओं हिरनों के पत्तों पर चलने भर की आवाज से वह उन्हें पहचान सकता है और जैसा कि मैंने बताया था वह एक विशेषज्ञ बढ़ई तो है ही ।
गांव के बच्चों को हर मेले में जाने के लिए जेबखर्च देने वाला फ्रेडरिक, गैरी लार्सन जैसे भीषण मुश्किल काटूर्निस्ट का प्रशंसक फ्रेडरिक, देश विदेश के लेखक बुद्धिजीवियों का दोस्त फ्रेडरिक, ‘बटरफ्लाइ मैन’ के नाम से विख्यात फ्रेडरिक, कभी कभार शराब के नशे में भीषण धुत्त सरकार अफसरों को गालियां बकता फ्रेडरिक, बैसाखियों के सहारे धीमे धीमे चलने की कोशिश करता ईमानदार ठहाके लगाता फ्रेडरिक : पता नहीं क्या क्या है वह।
हां कभी भीमताल से गुजरते हुए लाल जिप्सी पर निगाह पड़े तो समझिएगा वह फ्रेडरिक की गाड़ी है। गाड़ी चालक से कहेंगे तो वह सीधा आपको फ्रेडरिक के पास ले जाएगा। आप पाएंगे कि ऊपर चढ़ती गाड़ी बिना आवाज किए चढ़ रही है। बाद में जब आप फ्रेडरिक से मिल चुके होंगे उसकी कुछ बातें सुन चुके होंगे हो सकता है अपनी पुरानी जिप्सी का जिक्र आने पर वह आपको बताए कि गाड़ी बीस साल पुरानी है। अपने जर्मन आत्मगर्व के साथ वह आपको बताएगा कि वह न सिर्फ इलाके का सबसे बढ़िया बढ़ई है बल्कि सबसे बड़ा उस्ताद कार मैकेनिक भी।

(फ्रेडी आजकल बहुत बीमार हैं । आप का एक फोन उन्हें बहुत सहारा देगा। वे हिन्दी अंग्रेजी और कुमाऊंनी धाराप्रवाह बोलते हैं । उनका नम्बर है : 09719285968। इस लेख के वास्ते विक्टर स्मेटाचेक ने जर्मनी से फ्रेडी का फोटो भेजा। उनका आभार । बहुत मामूली परिवर्तनों को साथ यह लेख एक साल पहले 'लोकमत समाचार' के वार्षिकांक में छपा था। )

Saturday, October 13, 2007

पत्थर और पानी


कभी सोचा भी नहीं था कि मुनस्यारी, जोहार और मिलम ग्लेशियर के बारे में किसी ने इतने शानदार तरीक़े से कुछ लिखा होगा. नेत्र सिंह रावत का यात्रा बृतांत पत्थर और पानी पढ़कर मेरा भ्रम टूट गया. कुछ महीने पहले कथादेश में कथाकार योगेंद्र आहूजा ने अपनी पसंदीदा किताबों में इसका ज़िक्र किया था. तभी से मैं इसे तलाश रहा था. और इत्तेफ़ाक देखिए कि एक दिन इस क़िताब के साथ अज़दक वाले प्रमोद जी मेरे ठिकाने पर थे. वो टूटी-बिखरी वाले इरफ़ान भाई के पास से इसे उठाकर लाए थे.
किताब से इसलिए भी आत्मीय रिश्ता बन पाया कि पूरा परिवेश जाना-पहचाना और आत्मीय-सा लगा. मिलम और वहां जाने वाले पहाड़ी रास्ते के जो बिंब नेत्र सिंह रावत ने खींचे हैं वो अद्भुत हैं. पहाड़ी नदियों, बनस्पतियों, पक्षिओं और परंपराओं का जिस तरह उन्होंने ज़िक्र किया है वो हमें सीधे मिलम वाले रास्ते पर ही पहुंचा देता है।


लेखक की इस यात्रा का मक़सद सिर्फ एक हिमालयी ग्लेशियर देखना भर नहीं है. वो अपनी जड़ों को तलाशता हुआ भी चलता है. किताब़ भारत-तिब्बत व्यापार बंद होने के सौका दुख का इज़हार करती है तो ऊंचाई में रहने वाले इस समुदाय की मुश्किल ज़िंदगी की हक़ीक़त भी बयां करती है.

मैं नेत्र सिंह रावत के बारे में ज़्यादा नहीं जानता. वो शायद दिनमान के संपादकीय विभाग में काम करते थे और सिनेमा के गंभीर जानकार थे. वैसे इस क़िताब में ज़िक्र मिलता है कि मिलम की इस यात्रा में मंगलेश डबराल को भी साथ जाना था. लेकिन किन्ही अज्ञात कारणों से वो साथ नहीं जा पाए. रावत एक जगह पर मंगलेश जी को कोट करते हुए regionalism और sense of belonging के फ़र्क पर भी बात करते हैं. इससे ये बात सामने आती है कि जिस जगह की मिट्टी,पानी और हवा में हम पले-बढ़े हों उसके लिए दिल में जगह होना क्षेत्रवाद नहीं.

महानगर की आपाधापी और उसमें भी न्यूज चैनल की चाकरी. ऐसे में ख़ुद से ही शिकायत रहती है कि पढ़ना-लिखना सब चौपट होता जा रहा है. लेकिन पत्थर और पानी को पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं दिल्ली में यमुना की गंदगी को नहीं बल्कि बल खाती गोरी नदी को बहते हुए क़रीब से देख रहा हूं. पता नहीं ये नॉस्टेलजिया कैसा है.

याद आ रहा है कि हल्द्वानी वाले कबाड़ी ने कभी गगास नदी के बारे में कुछ लिखा था. मुझे ख़ुशी है कि मैंने ना सही किसी ने गुमनाम सी गोरी नदी को हिंदी की दुनिया में एक नाम दिया है।

और अंत में : मौक़ा मिले तो सभी कबाड़ी एक अनिवार्य पुस्तक की तरह इसे ज़रूर पढ़े. कबाड़वाद को आगे बढ़ाने में ये महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. इससे कुदरत के ज़्यादा क़रीब होने की प्रेरणा हम ले सकते हैं.