Friday, December 28, 2007

यूँ लाद चलोगे पंडा जी ?


इस क़िस्से को लगभग डेढ़ दशक हो चुका है. हो सकता है इससे कुछ अधिक ही समय हुआ हो. लेकिन इस मरणासन्न ब्लॉग के पाठकों के हितार्थ यहाँ एक बार फिर याद किया जा रहा है.

नैनीताल शहर में तल्लीताल के एक पाताललोक जैसी खोह से पतले-झिल्ले कागजों में, हैंडसैटिंग प्रेस की मदद से छपने वाला हमारा पाक्षिक अखबार 'नैनीताल समाचार' एक समय मरणासन्न हो चला था. अखबार चलाने लायक पैसे थे नहीं, व्यापारी लोग विज्ञापन क्यों देते, अखबार पढ़ने वाले अपनी या बच्चों की फीस ही मुश्किल से दे पाते थे, अखबार को डोनेशन क्या देते. अंततः संपादक-मालिक-कार्यकर्ता-संवाददाता और आंदोलनकारी राजीव लोचन साह ने पाठकों के नाम एक अपील छाप ही दी. अब उसकी ठीक ठीक इबारत याद नहीं लेकिन भाव कुछ यूँ था कि बस भई, अब नहीं चल सकता. नैनीताल समाचार बंद करना पड़ रहा है क्योंकि उसके छापने लायक खर्च हमारे पास नहीं है.

आज 2007 में भी नैनीताल समाचार जिंदा है, चल रहा है, लगातार निकल रहा है. तो फिर संपादक की उस मार्मिक अपील के बाद ऐसा क्या हुआ कि अखबार बंद नहीं हुआ? राजीव लोचन साह तल्लीताल में ही मिल जाएँगे. कभी वहाँ जाना हो तो उनसे पूछिएगा. वो बताएंगे कि अखबार बंद करने की उस सूचना के बाद थैले के थैले भर भर कर चिट्ठियाँ उनके पास पहुँचने लगीं कि -- वाह, वाह, आप कौन होते हैं समाचार बंद करने वाले. समाचार हमारा है, और चलेगा.

जनाब-ए-आली, किस्सा मुख्तसर ये कि समाचार आज भी चल रहा है और पूरे जोशो खरोश के साथ.

अशोक पांडे, जिसे मैं हमेशा प्यार से पंडा कहता आया हूँ, अब कह रहा है कि कबाड़खाना नहीं चलेगा. मेरा जवाब सुन लिया जाएः वाह, वाह, तुम कौन होते हो पंडा जी, अपनी मर्जी से कबाड़खाना बंद करने वाले और ये कहने वाले कि मेरा रामनगर और बाकी आपकी सभी पोस्टें 31 दिसंबर से हटा ली जाएँगी. और ये भी कहने वाले कि अब मैं चला, आप लोग चलाइए ब्लाग.

ये समझ लो मियां कि शुरू करना तो तुम्हारे हाथ में था, अब उसे बंद करना कतई तुम्हारे बस में नहीं है. ये गाड़ी तो अब छूट चुकी है तल्लीताल डाँठ से. अब कहते हो कि मैं इसमें नहीं बैठूंगा. भई, तुम्हें उतरने कौन दे रहा है.

एकतरफा ऐलान करके यूँ लाद चलोगे पंडा जी? और सोच रहे हो कि कोई कुछ बोलेगा नहीं?

और जो ये बेनामी सज्जन तो इधर उधर बीट कर रहे हैं, ये तो हमारी रामलीला के एक्स्ट्रा आर्टिस्ट हैं भई. इनके कारण कबाड़खाना बंद हो नहीं सकता बल्कि इन्हीं के कारण चलता रहेगा. कुछ कड़वी बहसों की शुरुआत इन्हीं के बहाने सही.

अब मान जा रे, पंडा.

3 comments:

swapandarshi said...

Ashok sukhansaaz to band kar diyaa hai aapne.

itanaa hee kah sakatee hoon ki agar zara bhee apanee aalochanaa sunane kee takaat nahee hai (usase muhje bhee pareshaanee hai) to aage se kisee doosare par ungalee mat uthanaa.
aur jaane se pahale MR. MODee ke liye ek prashansaa geet likh jaanaa.
vichardharaa na sahi, unkee mazbootee zaroor kabile tareef hai.

Anonymous said...

प्यारे अशोक ,
तुमको आश्चर्य होगा की में कहा से आ टपका ! में आजकल लंदन में हूँ. ऋचा और राजेश और मुसी के साथ. तुम्हारे सभी ब्लोग्स पड़ लिए है. बहुत गदगद हूँ . समसेर बहादुर और गोबिंद बल्लभ पन्त वाले में तो मज़ा आ गया. मेरे पास तब की फोटो है . मुझे इसमें लिखना नही आता है . फिलहाल भागने की ज़रूरत नही है . अपनी जगह मुस्तैद रहो .
मुझे धूमिल कवि की ये पंक्तिया याद आ रही हैं :
" हाँ हाँ कवि हूँ
भाषा में भदेश हूँ
इस कदर कायर हूँ
कि उत्तर प्रदेश हूँ" .

बहुत प्यार के साथ.
शेखर पाठक
लंदन
२८.१२.२००७

munish said...

YAAR ITNA PYAAR PAKAR BHI KYA EK ANJAAN ABABEEL KI VAJEH SE YE KHANDAHAR CHHOD DOGE JAHAN SAB CHARAG TUHARE HI ROSHAN KIYE HAIN . MAZAK NAHI BHAI ...RUK JAO ...DEKHO MAIN TEEN TAK GINUNGA VARNA GOLI CHAL JAYEGI...