Wednesday, August 12, 2009

एक और किताब


हमारे समय के मह्त्वपूर्ण युवा कवि पवन करण की नयी किताब '' अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन'' राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। यहां प्रस्तुत है उसी संकलन से एक कविता।

चांद के बारे में
इस चाॅद के बारे में तुम कुछ भी नहीं जानते

एक नंबर का धोखेबाज है

ये एकदम बिगड़ा नबाब

इसकी संगत ठीक नहीं

ये तुम्हें भी कहीं का नहीं छोड़ेगा

कहीं भी फंसा देगा लंे

जाकर इसका तो काम ही है आवारागर्दी करना


ये तुम्हें रात भर घुमायेगा सड़को पर

बिठाये रखेगा मोहल्ले क ेबाहर पुलिया पर

ओैर लायेगा ऐसी ऐसी बातें ढूंढकर

तुम्हें लगेगा ही नहीं घर भी जाना है

अैार जब तुम नींद आने की कहोगे तब यह बोलेगा

काहे की नींद यार, चलो स्टेशन चाय पीकर आते हैं

जो लोग यह कहते है , रात सोने के लिये होती है

मूर्ख होते है रात आंखों में काटने के लिये होती हेेै

ये तुमसे तुम्हारी प्रेमिका के बारे में पूछ पूछकर ढेर कर देगा,

कहेगा क्या तुमने कभी अपनी प्रेमिका के कान के निचले हिस्से को

अपने दांतो के बीच दबाकर उसे अपने होठो से कुनमुनाया है

कभी उसके पैरों के तलुए के बीचों बीच घुमायी है अपनी जीभ ,

कितनी देर तक बिना पलक झपकाए झांकते रहे हो तुम उसकी आंखो में

यह खुद तो गायेगा नहीं और तुमसे लगातार जिद करेगा गाना सुनाने की

तुम्हारे मुंह से सुनते हुए कोई गीत

उड़ाते हुए अपने मुंह से धुंए के छल्ले खो जायेगा कहीं ,

और बड़ी सफाई से पोछ लेगा अपनी आखों में उतर आयी नमी

फिर हमेशा कही तरह कहेगा अच्छा यार

वो गाना तो सुनाओ जो सरस्वती चंद्र में नूतन गाती हेै

जिसमें एक जगह मेैं भी आता हूं

यह खुद ही छेड़ेगा राजनीति पर बातचीत

और बात बढ़ते ही जमीन पर थूक देगा खूब सारा

फिर कहेगा यार बहुत दिन हुए शराब नही पी

ना हीं किसी होटल में खाया अच्छा खाना

रोज वही घर की दाल, पालक,तोरई

नौकरी होती तो कितना अच्छा होता

कम से कम महीने में एक दो बार तो

छककर शराब पी जा सकती थी

अभी तो हाल यह है कि कोई दोस्त सिगरेट पीना शुरू करता है

तो हम उसके मुंह की तरफ देखना शुरू कर देते है ,

कि वह कब उसे हमारी तरफ बढ़ाये

कहेगा हां मानता हूुं यार कि अपराध बुरी चीज है

लेकिन क्या किया जाये आखिर में लगता हे

हमारे करने के लिये बस एक यही चीज बची है दुनिया में

आखिर इस दुनिया की नींद में से हमारा स्वप्न कहां उड़ गया

क्यों ध्वस्त हो गया हमारा मोर्चा

क्यों अंततः कुछ ही हाथ दिखाई देते हेै

जिन्हें या तो हम ललचाई हुई या फिर घणित नजरों से देखते हेै

विदा लेते हुए हमेशा की तरह कहेगा

हमारी इस फांका मस्ती को जो लोग आवारागर्दी कहते हैं

दरअसल वे जीवन के बारे में नहीं समझते कुछ भी

उन्हें नहीं पता वास्तविकताएं इन्हीं अंधेरो में आकर समय से टकराती हैं

मुझे पता है ठीक नहीं बताई जाती मेरी संगत

तुमसे भी यही कहा जाता होगा मेरे बारे में

ये चांद का बच्चा तुम्हें बरबाद कर देगा

लेकिन तुम्ही बताओं यार जिंदगी के अंधेरे को काटने के लिये

रात और ये आकाश कितना छोटा है

10 comments:

डॉ .अनुराग said...

शीर्षक अच्छा है .पर पता नहीं क्यों कविता ने उतना प्रभावित नहीं किया..गुलज़ार साहब की एक नज़्म का कंटेंट यही है ..ओर ज्यादा बेहतर है .

Naveen Joshi said...

भाई अशोक, क्या खूब कविता पढवाई आपने. जिसे कहते हैँ आनन्द और आवारागर्दी, दोनोँ का मज़ा आ गया.आइये, किसी दिन चाँद के साथ ऐसी आवारागर्दी पर निक्ल जाये.... मैँ अपने युआ साथियोँ के बीच दफ्तर मेँ ही इसका पाठ करने जा रहा हूँ.

तल्ख़ ज़ुबान said...

अनुराग जी सही कह रहे हैं. अपनी कहूँ तो मुझे पवनकरण की कोई कविता कभी पसंद नही आई. संकलन आते-जाते रहते हैं - देखिए ना अभी कबाड़खाना पर ही कितने आए-गये - क्या फ़र्क़ पड़ता है !

सुशील छौक्कर said...

आजकल मैं भी पवन जी की एक किताब "स्त्री मेरे भीतर" पढ रहा हूँ उसमें कई रचनाएं बहुत अच्छी है। सोच रहा था अपनी पसंद की एक आध मैं भी अपने ब्लोग पर लगा दूँ। खैर इनका सादे शब्दों में गहरी बातों को भी सादे ढ़ग से कह जाना मुझे अच्छा लगता है।

मुनीश ( munish ) said...

छंद विहीन तथाकथित 'रचनाएँ' नख-दंत विहीन श्वान की भाँति लोक रंजन एवम लोक -रक्षण दोनों में असमर्थ हैं . क्या ही अच्छा हो की इस प्रकार की रचना में रत युवा-शक्ति गद्य को अपना माध्यम बना ले और कवि कर्म भूषण, केशव , सुभद्रा , दिनकर और पन्त (छंद के बंध तक ) आदि की परंपरा के लुप्तप्रायः ध्वजा धारियों के लिए रहने दे . असल कविता तो एन्दंजर्ड स्पीशीज़ हो चुकी है !

मुनीश ( munish ) said...

मेरे ये कु/सु -विचार किसी भी कविता या कवि विशेष के सन्दर्भ में क़तई नहीं हैं बल्कि एक ट्रेंड पर टिप्पणी मैंने की है ! छंद न सही तुक तो मिलाओ यारो , मेरे प्यारों , लुक को बदलो कविता के भर्तारों!

प्रीतीश बारहठ said...

मुनीश,
कविता से प्रेम करने में एक सुविधा यह है कि इसके लिए कविता की रजामंदी नहीं लेनी पड़ती। इसलिये न तो जोर-जबरदस्ती का आरोप लगता है, न अपने एक-तरफा प्यार की हीनता का कभी अहसास हो पाता है। आप चाहें तो आप भी अपना देवर पद छोड़ कर कविता के भर्तार हो सकते हैं, वो हाँ नहीं करेगी तो ना भी नहीं करेगी। तिस पे मेरे जैसे मित्र आपको यह भी कहेंगें कि यार वो तो तुझ पर मरती है, तब तो आपको विश्वास करना ही पड़ेगा अपनी खूबसूरती और कविता के समर्पण का। तो आप क्यों नहीं...

इस कविता में चाँद प्रेमिका के बाबत बहुत कम सवाल करता है जी !!
सवाल यही है कि तुक मिलाता है कि नहीं मिलाता लेकिन चाँद इतना क्यूँ शरमाता है ? ज्यादा शरमाने वाला चाँद ज्यादा रोमांटिक नहीं होता है। इसलिये भाइयो जब कविता से प्यार उसकी मर्जी से करो या जबरदस्ती करो, पर जब करो तो डूब कर करो वरना वो बिना बोले भी जाहिर कर देती है कि यह उसके साथ ज्यादती हो रही है। तब मुनीश भी इस बात को ताड़ लेते हैं।

राकेश अकेला said...

पवन की अधिकांश कविताओं में अतिकथन है। उनकी द़ष्टि सीमित है और वे अवांछित विवरणों में कुछ इस तरह जाते हैं कि उनके पक्ष का भी पता नहीं चलता।
उनके पूर्व संग्रह की कविताएं, लगता है लोकप्रिय तो हुईं मगर उनमें भी स्‍त्रीविमर्श की बहुआयामिता का गहरा अभाव था। केवल देह से स्‍वतंत्र होकर स्‍त्री कभी स्‍वतंत्र नहीं हो सकती।
प्रस्‍तुत कविता में भी बहुत भटकाव है और यात्रा और यायावरी का सुख गायब है। कविता बन नहीं पाई है।

Bahadur Patel said...

achchhi kavita hai. apako dhanywaad tatha pavan ko badhai .
sangrah ke liye bhi.

शायदा said...

achhi kavitahai.
ये चांद का बच्चा तुम्हें बरबाद कर देगा sahi kaha.