Monday, April 25, 2011

काली मौतों ने आज बुलाया है स्वयंवर में - सुकान्त की कविता बरास्ते नीलाभ -3


सुकान्त का परिचय यहां देखे

यूरोप के प्रति

वहाँ अभी मई का महीना है, बर्फ़ के गलने के दिन,
यहाँ आग बरसाता वैशाख है, निद्राहीन।
शायद वहाँ शुरू हो गयी है मन्थर दक्खिनी हवा,
यहाँ वैशाखी लू के थपेड़े धावा बोलते हैं।
यहाँ-वहाँ फूल उगते हैं आज तुम्हारे देश में,
कैसे-कैसे रंग, कितनी विचित्र रातें देखने को मिलती हैं,
सड़कों पर निकल पड़े हैं कितने लड़के-लड़कियाँ घर छोड़ कर
इस वसन्त में, कितने उत्सव हैं, कितने गीत गाये जा रहे।
यहाँ तो सूख गये हैं फूल, मटमैली धूल में;
चीख़-पुकार करता है सारा देश, चैन ख़त्म हो चुका है,
कड़ी धूप के डर से लड़के-लड़कियाँ बन्द हैं घरों में,
सब ख़ामोश : शायद जागेंगे वैसाखी तूफ़ान में,
बहुत मेहनत, बहुत लड़ाई करने के बाद।
चारों ओर क़तार-दर-क़तार हैं तुम्हारे देश में फूलों के बा़ग़,
इस देश में युद्ध, महामारी, दुर्भिक्ष जलता है हड्डी-हड्डी में,
इसीलिए आग बरसाते ग्रीष्म के मैदान में छीन लेती है नींद
बेपरवाह प्राणों को; आज दिशा-दिशा में लाखों-लाख लोग होते हैं इकट्ठा --
तुम्हारे मुल्क में मई का महीना है, यहाँ तूफ़ानी वैशाख।

प्रस्तुत

काली मौतों ने आज बुलाया है स्वयंवर में
कई दिशाओं में कई हाथों को हिलते देखता हूँ इस बड़ी-सी दुनिया में
डरा हुआ मन खोजता है आसान रास्ता, निष्ठुर नेत्र;
इसलिए ज़हरीले स्वाद से भरी इस दुनिया में
सिर्फ़ मन के द्वन्द्व निरन्तर फैलाते हैं आग।

अन्त में टूटे हैं भ्रम, आया है ज्वार मन के कोने में
तेज़ भौहें तनी हैं कुटिल फूलों के वन में
अभिशापग्रस्त वे सभी आत्माएँ आज भी हैं बेचैन
उनके सम्मुख लगाया है प्राणों का मज़बूत शिविर
ख़ुद को मुक्त किया है आत्म-समर्पण में।

चाँद के सपने में धुल गया है मन जिस समय के दौरान
उसे आज दुश्मन जान कर लिया है पहचान
धूर्तों की तरह शक्तिशाली नीच स्पर्द्धाएं
मौक़ा पाने पर आज भी मुझे झपट सकती हैं
इसीलिए सतर्क हूँ, मन को गिरवी नहीं रखा मैंने।

बीते हैं असंख्य दिन प्राणों के व्यर्थ रुदन में
नर्म सोफ़े पर बैठ कर क्रान्तिकारी चेतना के उद्बोधन में
आज लेकिन जनता के ज्वार में आयी है बाढ़
प्यासे मन में रक्तिम पथ के अनुसरण की कामना,
कर रही है पृथ्वी पहले की राह का संशोधन।

उठाया है हथियार अब सामने दुश्मन चाहिए
क्योंकि महामारण का निर्दयी व्रत लिया है हमने आज
जटिल है संसार, जटिल है मन का सम्भाषण
उनके प्रभाव में रखा नहीं मन में कोई आसन,
आज उन्हें याद करना भूल होगी यह जानता हूँ मैं।

(ये सभी अनुवाद नीलाभ ने मूल बांग्ला से किए हैं)

2 comments:

वन्दना said...

दोनो रचनाये अलग दुनिया मे ले जाती हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही गहरी रचनायें।