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Sunday, July 24, 2016

नीलाभ को आख़िरी सलाम

नीलाभ नहीं रहे.


नीलाभ से मेरी पहली मुलाकात १९८८ की गर्मियों में हुई थी. मैं नैनीताल में एम. ए. का छात्र था. नैनीताल के नाट्य-समूह 'युगमंच' के निमंत्रण पर वे 'दस्ता' नाम की टीम लेकर आए थे. तल्लीताल रिक्शा स्टैंड पर उनका यह दस्ता डफली की थाप पर गा रहा था -'लिखने वालों को मेरा सलाम, पढ़ने वालों को मेरा सलाम.' इस दस्ते में पंकज श्रीवास्तव भी थे और इरफ़ान भी और के.के. पांडे भी - ये सारे आज मेरे सबसे अन्तरंग दोस्तों में शुमार हैं.

 इस पहली - पूरी मुलाकात पर एक लम्बी पोस्ट कभी फिर.

जो सबसे गहरा क्षण अब तक जेहन में बैठा हुआ है वो ये है कि हम दोनों रिक्शे में बैठकर मल्लीताल की तरफ़ जा रहे थे जहां रामलीला मैदान पर कोई आयोजन था. दस्ता की टीम ने एक शो करना था. हम नैनीताल बैंक बिल्डिंग के पास थे जब पता नहीं किस रौ में नीलाभ जी ने मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर सुनाया -

उस बज़्म में मुझको नहीं बनती हया किये
बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किए


इत्तफ़ाकन मुझे इस ग़ज़ल का एक और शेर याद था -

सोहबत में गैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
देने लगा है बोसे बिग़ैर इल्तिज़ा किये


मेरे ख़्याल से यह एक दीर्घकालिक सम्बन्ध की बुनियाद बना पाने को काफ़ी था. यह सम्बन्ध उनके यूं चले जाने से ख़त्म तो नहीं हुआ हां एक टीस ज़रूर भीतर गहरे तक पैठ गयी है. जब कबाड़खाने पर जैज़ पर लिखी उनकी सीरीज़ छप रही थी, वे बहुत उत्साहित होकर उसके प्रकाशन की योजना मेरे साथ बनाना शुरू कर चुके थे. मुझे उन्होंने इस किताब की डिज़ाइन का "ठेका" दे दिया था. सोचता हूँ अब उस ठेके का क्या होगा.

पिछले साल से अब तक तक तीन ऐसे कवि हिन्दी ने खोये हैं जिनके साथ युवतर पीढ़ी के गहरे और अर्थपूर्ण सम्बन्ध रहे और जिसे वे अपने रचनाकर्म और जीवनशैली से सदैव प्रेरणा देते रहे. वीरेन डंगवाल और पंकज सिंह के बाद अब नीलाभ का जाना हिन्दी साहित्य के संसार का और भी अधूरा और मनहूस रह जाना है.

अभी अभी मैंने किसी वेबसाइट पर मंगलेश डबराल का कथन पढ़ा है कि नीलाभ इस मायने में अपनी तरह के अमूल्य हिन्दी कवि/लेखक थे जिनकी चार-चार भाषाओं - उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी और पंजाबी - पर गहरी पकड़ थी. उनका साहित्यिक काम बहुत विषद है. उन्होंने बहुत सारे अनुवाद किये और ढेरों कविताएं लिखीं. नीलाभ का मोर्चा नाम से उनका एक ब्लॉग था जिस पर वे लगातार सक्रिय रहा करते थे.  

नीलाभ एक बेबाक, मीठे मगर तुर्शज़बान आदमी थे और ज़ाहिर है चाहे-अनचाहे ऐसे आदमी को अपना दुश्मन माननेवाले भी काफी बन जाया करते हैं. इसीलिये विवादों ने उनका दामन कभी नहीं छोड़ा. कल वे खुद उन सारों का दामन छोड़ कर चले गए. आप बहुत याद आयेंगे दद्दा!      

कबाड़खाने की श्रद्धांजलि.
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बांगला कवि सुकांत भट्टाचार्य की इस कविता का नीलाभ ने मूल से अनुवाद किया था.


इस नवान्न में

इस हेमन्त में धान की कटाई होगी
फिर ख़ाली खलिहान से फ़सल की बाढ़ आयेगी
पौष के उत्सव में प्राणों के कोलाहल से भरेगा श्मशान-सा नीरव गाँव
फिर भी इस हाथ से हंसिया उठाते रुलाई छूटती है
हलकी हवा में बीती हुई यादों को भूलना कठिन है
पिछले हेमन्त में मर गया है भाई, छोड़ गयी है बहन,
राहों-मैदानों में, मड़ई में मरे हैं इतने परिजन,
अपने हाथों से खेत में धान बोना,
व्यर्थ ही धूल में लुटाया है सोना,
किसी के भी घर धान उठाने का शुभ क्षण नहीं आया -
फ़सल के अत्यन्त घनिष्ठ हैं मेरे-तुम्हारे खेत।
इस बार तेज़ नयी हवा में
जययात्रा की ध्वनि तैरती हुई आती है,
पीछे मृत्यु की क्षति का ख़ामोश बयान -
इस हेमन्त में फ़सलें पूछती हैं : कहाँ हैं अपने जन ?
वे क्या सिर्फ़ छिपे रहेंगे,
अक्षमता की गलानि को ढँकेंगे,
प्राणों के बदले किया है जिन्होंने विरोध का उच्चारण ?
इस नवान्न में क्या वंचितों को नहीं मिलेगा निमन्त्रण?

Saturday, March 7, 2015

जैज़ पर नीलाभ - 18


मुझे यह जानने में ज़िन्दगी लग गयी है कि क्या नहीं बजाना है.
- डिज़ी गिलेस्पी

डिज़ी गिलेस्पी
चालीस के दशक में चार्ली पार्कर ने डिज़ी गिलिस्पी और फिर बाद में माइल्स डेविस के साथ मिल कर एक नया अन्दाज़े-बयाँ विकसित किया था. नयी सोच के साथ जैज़ की दुनिया में दाख़िल होने वाले संगीतकारों में दो नाम और थे - थेलोनिअस मंक और चार्ल्स मिंगस. चार्ली पार्कर का ज़िक्र हम कर आये हैं, अब औरों की चर्चा करने के सिलसिले में पहले ज़िक्र जॉन बर्क्स गिलेस्पी का, जिन्हें लोगों ने शायद इसलिए डिज़ी बुलाना शुरू कर दिया था, क्योंकि उनके वादन में ऐसे पेचो-ख़म होते जो  सुनने वालों को चकरा देने की कैफ़ियत रखते थे.


(अ नाईट इन ट्यूनीशिया)

डिज़ी गिलेस्पी का जीवन ही नहीं, उनका वादन भी परस्पर विरोधी तत्वों से बना था. शायद यही वजह है कि उनका ज़िक्र "आश्चर्य की आवाज़" कह कर किया गया. उनके एकल वादन की ख़ूबी थी ते़ज़ रफ़्तार वाली तानें जिनके बीच में हल्की-हल्की ख़ामोशियां पिरोयी गयी होतीं और फिर लम्बी-लम्बी छलांगें होतीं, ख़ासे ऊंचे सुर आते जिनके बीच ब्लूज़-सरीखे टुकड़े होते. 


(सॉल्ट पीनट्स)

डिज़ी गिलेस्पी अपने सुनने वालों को हमेशा अपनी अनोखे तान-पलटों से चकित करते रहते. उनके वादन में कभी कुछ भी पहले से तय न होता, ट्रम्पेट बजाने के दौरान अगर कोई नया ख़याल या सुर आ जाता तो वे उसे अपनी धारा में शामिल कर लेते.


(नो मोर ब्लूज़ भाग 1)


डिज़ी के वादन की इस कैफ़ियत के सिलसिले में मुझे वह क़िस्सा याद आ जाता है, जो प्रसिद्ध नाटककार पु.ल. देशपाण्डे ने कुमार गन्धर्व के बारे में सुनाया था. कुमार गन्धर्व एक बार बम्बई में दादर के एक हाल में राग भूप में एक बन्दिश पेश कर रहे थे. भूप चल रहा था, जैसे हाथी-घोड़ों और छत्र-चंवर के साथ राजा की सवारी निकल रही हो. कोई पौन-एक घण्टे के बाद उस भूप को शुद्ध मद्धम का एक बारीक-सा सुर छू गया. महफ़िल को अच्छा लगा; लेकिन जो जानकार थे, वे कुछ विचलित भी हो उठे. कुमार गन्धर्व ने सुनने वालों की उस हल्की-सी हलचल को भांप लिया, तानपुरे वालों से आवाज़ धीमी करवायी, तबले पर वसन्त आचरेकर की उंगलियां भी नरम हो गयीं. कुमार ने कहा: "भाई, क्या करूं, यह शुद्ध मद्धम बहुत देर से अनुरोध कर रहा था कि मुझे भी अन्दर ले लीजिए, ले लीजिए. भूप के दरबार में उसे प्रवेश की इजाज़त नहीं है. पर बहुत गिड़गिड़ाने लगा तो सोचा - आने दो बेचारे को थोड़ी देर के लिए, कब तक बाहर रखें, आख़िर अपना दोस्त है."

शायद यह गुण सभी बड़े कलाकारों में होता है. उन कलाओं में जहां परम्परा और शास्त्र ने मिल कर दायरे तय कर दिये हैं वहां भी लीक छोड़ कर कुछ अनोखा कर ले जाने की हुनरमन्दी सचमुच क़ाबिले-तारीफ़ है. डिज़ी भी ऐसे ही बिरले वादक थे. उनकी बिजली की-सी तेज़ प्रतिक्रिया और बेहद सधे हुए कान उनके ख़यालों और उनकी अदायगी का निर्दोष ताल-मेल सम्भव बनाते. मज़े की बात यह थी कि वे किसी भी तरह का जोखिम उठाने से हिचकते नहीं थे और यह जोखिम कभी उन्हें धोखा नहीं देता था. इसका कारण था बचपन में हर इतवार को गिरजे में जा कर बजाना जहां से उनके अनुसार उन्होंने "रूह को मुख़ातिब करना" सीखा.


(नो मोर ब्लूज़ भाग 2)

अब जैसे यही देखिए कि डिज़ी गिलेस्पी जिस ट्रम्पेट को बजाते थे उसका अगला सिरा बजाय सीधा होने के लगभग पैंतालीस डिग्री के कोण पर ऊपर को उठा रहता. डिज़ी ने बताया था कि यह अनोखापन एक दुर्घटना की वजह से आया था जब दो नाचने वाले न्यूयॉर्क में डिज़ी की पत्नी के जन्म दिवस के जलसे में उस मेज़ पर जा गिरे जहां यह ट्रम्पेट रखा हुआ था और इसका अगला सिरा ऊपर को मुड़ गया. इससे वाद्य के सुरों में थोड़ा फ़र्क आ गया और हालांकि डिज़ी ने ट्रम्पेट को सीधा करा लिया, पर वे उन बदले हुए सुरों को भूल नहीं पाये और उन्होंने फिर वाद्य बनाने वाले कारीगर से कह कर वैसे ही मुड़े हुए सिरे वाला ट्रम्पेट बनवाया और अन्त तक उसे ही बजाते रहे. लेकिन उनके जीवनीकार ने किस्सा यों बयान किया है कि डिज़ी को मुड़े हुए सिरे वाले ट्रम्पेट का खयाल इंग्लैण्ड की एक यात्रा के दौरान आया जब वहां उन्होंने एक ऐसा ही ट्रम्पेट देखा और उसे बजाने पर उन्हें नया प्रयोग करने की सूझी. बहरहाल, किस्सा जो भी हो, इतना सच है कि सीधे सिरे वाला हो या मुड़े सिरे वाला, ट्रम्पेट पर डिज़ी को कमाल की महारत हासिल थी और उन्होंने बहुत-से नये वादकों को सिखा कर परवान चढ़ाया.


(ब्लूज़ आफ़्टर डार्क) 
  
इस सारी गम्भीर संगीत-साधना के पीछे जो इन्सान था, वह जहां श्रोताओं को अपने मज़ाकिया स्वभाव से हंसा सकता था, वहीं ग़ुस्से में हिंसक भी हो सकता था. एक बार का क़िस्सा उस झगड़े का है जो डिज़ी गिलेस्पी और कैब कैलोवे के बीच हुआ जिनके बैण्ड में डिज़ी शामिल थे. हुआ यह कि संगीत के एक कार्यक्रम में कैब कैलोवे ने डिज़ी पर आरोप लगाया कि उन्होंने खंखार कर बलग़म का लौंदा मंच पर फेंक दिया था. यों भी, कैलोवे डिज़ी के बजाने की शैली से चिढ़े रहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि डिज़ी कुछ ज़्यादा ही नियमों को तोड़ते थे और वैसे भी कैलोवे को डिज़ी का शरारती नटखट अन्दाज़ पसन्द नहीं था. कैलोवे के बैण्ड के एक अन्य सदस्य के अनुसार कैलोवे डिज़ी के बजाने के अन्दाज़ को "चीनी संगीत" कहते थे. बहरहाल, डिज़ी ने बलग़म का लौंदा फेंकने से इनकार किया, मगर कैलोवे नहीं माने और बात इतनी बढ़ी कि कैब कैलोवे ने डिज़ी पर हाथ उठा दिया. डिज़ी कहां पीछे रहने वाले थे. उन्होंने अपनी जेब से चाकू निकाला और कैब को दौड़ा लिया. किसी तरह मण्डली के बाक़ी सदस्यों ने दोनों को अलग किया. छीना-झपटी के दौरान कैब का हाथ कट भी गया. नतीजा वही हुआ जो होना था. कैब कैलोवे और डिज़ी गिलेस्पी अलग हो गये और डिज़ी अर्ल हाइन्ज़ के बैण्ड में जा शामिल हुए.

मगर ग़ुस्से के ये दौरे बहुत विरल थे. बुनियादी तौर पर डिज़ी मौज-मस्ती में यक़ीन रखने वाले आदमी थे. इसकी सबसे बड़ी मिसाल थी 1964 का अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव, जिसमें डिज़ी गिलेस्पी ने ठिठोली के तौर पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन भी कर दिया. अपने घोषणा-पत्र में डिज़ी ने कुछ बहुत ही मज़ेदार क़िस्म के वादे किये. उन्होंने कहा कि अगर वे चुने गये तो राष्ट्रपति भवन का नाम "वाइट हाउस" से बदल कर "द ब्लूज़ हाउस" रख दिया जायेगा और उनके मन्त्रिमण्डल में ड्यूक एलिंग्टन (विदेश मन्त्री), माइल्ज़ डेविस (सी.आई.ए. के निदेशक), लुई आर्मस्ट्रौंग (कृषि मन्त्री), मैक्स रोच (रक्षा मन्त्री), चार्ल्स मिंगस (शान्ति मन्त्री), रे चार्ल्स (संसद के पुस्तकालयाध्यक्ष), थेलोनिअस मंक (घुमन्तू राजदूत), मेरी लू विलियम्स (वैटिकन को राजदूत) और मैल्कम एक्स (ऐटोर्नी जेनरल) शामिल होंगे. इनमें मैल्कम एक्स को छोड़ कर, जो नीग्रो अधिकारों के उग्रतावादी आन्दोलनकारी थे, बाक़ी सब संगीतकार थे. अपने इस कथित मख़ौल को बढ़ाते हुए डिज़ी ने राष्ट्रपति चुनाव के अभियान के बिल्ले भी बंटवाने शुरू कर दिये. ये बिल्ले उनकी प्रचार एजेन्सी ने बरसों पहले "प्रचार के लिए, मज़ाक के तौर पर" बनाये थे. अब उनके बदले चन्दे में आने वाली रक़म नस्ली समता संगठन और मार्टिन लूथर किंग को अनुदान के रूप में जानी थी. ख़ैर, मज़ाक तो मज़ाक था, डिज़ी गिलेस्पी ने उसी भावना के साथ लिया और फिर अपनी असली मुहिम - संगीत - की तरफ़ लौट गये. ये बिल्ले बाद के वर्षों में संग्रहणीय बन गये. 1971 में डिज़ी गिलेस्पी ने ऐलान किया कि वे फिर चुनावी अखाड़े में उतरेंगे, लेकिन इस बार उन्होंने कहा कि बहाई पन्थ के अनुयायी होने के कारण वे चुनाव से अपना नाम वापस ले रहे हैं.

बहरहाल, अगर इन क़िस्से कहानियों को छोड़ दें तो डिज़ी गिलेस्पी ने अपने 76 वर्षों के लम्बे जीवन के दौरान बहुत-से उतार-चढ़ाव देखे, ज़िन्दगी में भी और संगीत में भी. कैब कैलोवे के बैण्ड में अपनी शमूलियत के दौरान ही डिज़ी ने बड़े बैण्डों के लिए धुनों और रागों की रचना शुरू कर दी थी. 


(लीप फ्रॉग - चार्ली पार्कर और डिज़ी गिलेस्पी)
  
जैज़ संगीत भी अपने पिछले दौर से बाहर आ कर लोकप्रिय होने के क्रम में स्विंग म्यूज़िक और बीबौप कहलाने लगा था. अर्ल हाइन्ज़ के बैण्ड में अपने समय के बारे में याद करते हुए डिज़ी ने कहा,"...लोगों का ख़याल है कि जब स्विंग और बीबौप आया तो वह संगीत नया था. ऐसा नहीं था. वह संगीत उसी संगीत से विकसित हुआ था जो उसके पहले था. बुनियादी तौर पर वही संगीत था. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि आप यहां से वहां कैसे जाते थे...कुदरती तौर पर हर ज़माने का अपना रंग होता है." 

डिज़ी गिलेस्पी जीवन के अन्त तक सक्रिय रहे और 1970 के बाद उन्होंने बहाई धर्म अपना लिया था, जिसने उन्हीं के हवाले से कहें तो उन्हें चाकूबाज़ की अपनी छवि बदल कर एक विश्व नागरिक बनने में और दारू छोड़ कर आत्म-परीक्षण करने में मदद की. 

(जारी)


Friday, February 27, 2015

जैज़ पर नीलाभ - 17

"जैज़ का इतिहास चार शब्दों में बताया जा सकता है - 
लुई आर्मस्ट्रॉन्ग चार्ली पार्कर."
- माइल्स डेविस 


तीस का दशक अगर प्रसार के लिहाज़ से जैज़ संगीत का सुनहरा काल था तो चालीस का दशक एक बिलकुल ही अलग ढंग से जैज़ के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ. पहली बार संगीतकारों के रवैये में एक तब्दीली आयी और उन्होंने अपने संगीत को केवल मनोरंजन से नहीं, बल्कि कला के प्रतिमानों से जोड़ कर देखना शुरू किया. 

जहाँ तक दूसरों पर असर डालने का सम्बन्ध है इसमें कोई शक नहीं कि लुई आर्मस्ट्रॉन्ग जैज़ संगीत के पहले महान कलाकार के रूप में सामने आते हैं, लेकिन उनकी निगाह हमेशा अपने श्रोताओं की ओर केन्द्रित रही. यही नहीं, बल्कि तीस के दशक से पहले जैज़ का जो बुनियादी ढाँचा तैयार हुआ था, उसमें उन्होंने बहुत कम परिवर्तन किया. यही वजह है कि लुई आर्मस्ट्रॉन्ग के साये में जैज़ संगीत उत्तरोत्तर मनोरंजन प्रधान होता गया था. न्यू और्लीन्स का प्रारम्भिक जैज़ खुली फ़िज़ा का संगीत था, उस शहर के बाशिन्दों का संगीत था और इस तरह पूरे समाज का अंग था. लुई आर्मस्ट्रॉन्ग ने अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर इस संगीत को जन-सामान्य के दायरे से उठा कर संगीत की शोभा-यात्रा का सिरमौर बना दिया, ‘शोबिज़का अंग बना दिया. 

चार्ली पार्कर

मगर दूसरी ओर ऐसे बहुत-से उभरते हुए संगीतकार थे, जो इस चकाचौंध-भरी व्यावसायिकता के ख़िलाफ़ थे, जो महसूस करते थे कि अगर जैज़-संगीत को सचमुच अपना सही रूप माना है तो उसे जन-रुचि और आत्माभिव्यक्ति के बीच सन्तुलन बनाये रख कर, तल्लीनता और द्वन्द्व के आपसी रिश्तों को पुष्ट करते चलना होगा. और चाहे प्रयोग और आशु रचना जिस भी सीमा तक की जाये जैज़ को अपनी जड़ों को विस्मृत नहीं करना है जो एक पूरी जाति के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, संघर्ष  और आशा-आकांक्षा में गहरे उतरी हुई हैं. और इस धारा के सबसे बड़े प्रवक्ता थे - चार्ली पार्कर, जिन्होंने अपने तईं जैज़ को एक बिल्कुल नयी दिशा में मोड़ दिया. सुनिये उन पर लिखा ऐन्टनी प्रोवो का गीत :




(यार्डबर्ड स्वीट - चार्ली पार्कर - शब्दों के साथ)

चार्ली पार्कर (1920-55) कैन्सस सिटी में पैदा हुए थे और ग्यारह साल की उमर ही से सैक्सोफ़ोन बजाने लगे थे. चौदह का होने पर वे अपने स्कूल के बैण्ड में शामिल हो गये, ताकि उन्हें अभ्यास और प्रदर्शन के लिए स्कूल का वाद्य उपलब्ध हो सके. अपने जीवन के शुरू ही में उन्हें "यार्डबर्ड" (आंगन पाखी) या सिर्फ़ "बर्ड" के नाम से बुलाया जाने लगा और यह नाम ज़िन्दगी भर उनके बुलाने वाला नाम रहा उनकी बहुत-सी रचनाओं की प्रेरणा भी रहा जैसे "यार्डबर्ड सुईट" -

http://youtu.be/HmroWIcCNUI  (यार्डबर्ड स्वीट - चार्ली पार्कर )

कैन्सस सिटी में रहते हुए ही पार्कर ने सैक्सोफ़ोन वादक बनने का फ़ैसला कर लिया था और  यही वह समय था जब संगीत को गम्भीरता से लेते हुए पार्कर ने जम कर अभ्यास करना शुरू किया. अर्से बाद एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि तकरीबन 3-4 बरस का समय उन्होंने 15-15 घण्टे रोज़ाना अभ्यास किया था. इसी अर्से में काऊण्ट बेसी और बेनी मूटॉन के बैण्डों ने उन पर गहरा असर डाला और इसी दौरान अपने शहर के स्थानीय मण्डलियों में सैक्सोफ़ोन बजाते हुए उन्होंने आशु रचना की बारीक़ियां भी सीखीं. 1938 में पार्कर ने जे मक्शैन की मण्डली में हिस्सा लेते हुए बाहर के शहरों के दौरे भी किये जो उन्हें शिकागो और न्यूयॉर्क तक ले गये. 


http://youtu.be/_KaNwqdlz50 (औटम इन न्यूयॉर्क - चार्ली पार्कर ) 

1939 में चार्ली पार्कर न्यूयॉर्क आ गये और यह शहर उन्हें इतना भाया कि उन्होंने इसे ही अपना घर बना लिया. इससे कुछ समय पहले एक दुर्घटना में घायल हो जाने पर इलाज के दौरान चार्ली पार्कर को हस्पताल ही में मौर्फ़ीन की लत लग गयी जो आगे चल कर हेरोइन की लत में बदल गयी. जैज़ के परिवेश और परिदृश्य में गांजा, अफ़ीम, कोकीन और हेरोइन का नशा आम था और यह लत दूर होने के बजाय जड़ पकड़ती चली गयी. 

न्यूयॉर्क में कुछ समय बाद पार्कर ने अर्ल हाइन्स की मण्डली में भी सैक्सोफ़ोन बजाया जहां उनकी मुलाक़ात डिज़ी गिलेस्पी से हुई जिनके साथ वे मिल कर बहुत-से अवसरों पर कार्यक्रम देने वाले थे. लेकिन सिर्फ़ डिज़ी गिलेस्पी ही नहीं, चार्ली पार्कर के परिचय के दायरे में ऐसे बहुत-से बुतशिकन आने वाले थे जो जैज़ में नयी राहें खोज रहे थे, मसलन, माइल्ज़ डेविस, थेलोनिअस मंक, मैक्स रोच, चार्ल्स मिंगस. ये सभी प्रतिभाशाली संगीतकार अब जैज़ को केवल मनोरंजन के दायरे से उठा कर एक कला-रूप बनाने पर कमर कसे बैठे थे. 

  

(ब्लूमडीडू - पार्कर, गिलेस्पी, थेलोनिअस मंक) 

पार्कर का इनकी तरफ़ आकर्षित होना एक ही बालो-पर के अन्दीलबों के इकट्ठा होने जैसा था. एक दिन वे गिटारवादक विलियम फ़्लीट के साथ किसी सभा में बजा रहे थे जब अचानक उन्हें यह सूझा कि जैज़ की क्रोमैटिक सरगम  के बारह सुरों से किसी भी "की" में नियमपूर्वक जाया जा सकता है, जिससे जैज़ के एकलवादन की बहुत-सी पाबन्दियां तोड़ी जा सकती हैं.  

चार्ली पार्कर और माइल्स देविस, १९४७

लेकिन इन सभी नये पैग़म्बरों के संगीत को शुरू-शुरू में काफ़ी विरोध का सामना पड़ा. इसके अलावा, दुर्भाग्य से उन दिनों संगीतकारों के संघ ने व्यावसायिक रेकॉर्डिंग पर पाबन्दी लगायी हुई थे, इसलिए ढेरों अवसर बिना रिकौर्ड किये ही गुज़र गये. लेकिन पाबन्दी उठने के बाद साल भर बाद 1945 में दो ऐसे मौक़े आये जब इन सभी साथियों के साथ पार्कर ने अपनी कला का सिक्का जमा दिया. पहला मौका जून के महीने में डिज़ी गिलेस्पी, मैक्स रोच और बड पावेल की संगत में न्यूयॉर्क के टाउन हॉल की एक संगीत सभा में बजाने का था और दूसरा अवसर सवौये की एक रेकॉर्डिंग सभा का था जिसमें सभी नये संगीतकार चार्ली पार्कर के नेतृत्व में इकट्ठा थे - डिज़ी गिलेस्पी, माइल्ज़ डेविस, मैक्स रोच और कर्ली रसेल - और इस रेकॉर्डिंग के कई टुकड़े आज ऐतिहासिक माने जाते हैं, जैसे को-को, बिलीज़ बाउन्स और नाओज़ द टाइम - 

 

(बिलीज़ बाउन्स - चार्ली पार्कर) 

अगले दस साल चार्ली पार्कर की ज़िन्दगी के सुनहरे साल कहे जा सकते हैं हालांकि हेरोइन की लत ने उन्हें परेशान करना नहीं छोडा था. एक बार तो वे हस्पताल में छै महीने काट कर पूरी तरह "साफ़" हो आये थे और इसी समय उन्होंने "रिलैक्सिन ऐट द कैमारिलो" के नाम से एक गत कैमारिलो हस्पताल को खिराज देते हुए पेश की -



(रिलैक्सिन ऐट द कैमारिलो - चार्ली पार्कर)

लेकिन न्यूयॉर्क आने पर हेरोइन ने फिर पार्कर को अपनी चंगुल में जकड़ लिया. तो भी वे लगातार सैक्सोफ़ोन बजाते रहे और उन्होंने दर्जनों नयी धुनें रिकौर्ड कीं. अब तक यह नयी शैली लोकप्रिय हो चुकी थी और लोगों ने इसे बीबौप कहना शुरू कर दिया था. अपने साथियों - थेलोनिअस मंक और चार्लस मिंगस - की तरह चार्ली पार्कर भी संगीत की बुनियाद में दिलचस्पी रखते थे, इसलिए उनकी बहुत इच्छा थी कि वे पश्चिमी शस्त्रीय संगीत के वाद्य वृन्द यानी और्केस्ट्रा के साथ जैज़ को मिला कर बजायें और नये प्रयोग करें. वे शास्त्रीय संगीत में अच्छा-ख़ासा दखल रखते थे और जब 1949 में जब उन्हें जैज़ वादकों और शास्त्रीय संगीतकारों की एक मिली-जुली मण्डली के साथ सैक्सोफ़ोन बजाने का मौका मिला तो उन्हों ने कुछ शानदार धुनें रिकौर्ड कीं जैसे, "जस्ट फ़्रेण्ड्स," "एवरीथिंग हैपन्स टू मी," "एप्रिल इन पैरिस," "समरटाइम," और "इफ़ आई शुड लूज़ यू."



(एप्रिल इन पैरिस - चार्ली पार्कर)

जीवन के अन्त तक चार्ली पार्कर प्रयोग करते ही रहे, कभी संगीत की अदायगी को ले कर और कभी अपने वाद्य को ले कर जिसके अनेक नमूनों को उन्होंने आज़माया और सुनने वालों को अपनी महारत से चकित किया. उनके वादन की शैली अनोखी थी और उन्होंने जैज़ के हर पहलू पर अपनी प्रतिभा से अमिट छाप छोड़ी. 1955 में जब वे दिवंगत हुए तो अपने महज़ पैंतीस बरस के जीवन के पीछे न सिर्फ़ अनगिनत चाहने वालों का समुदाय छोड़ गये, बल्कि अपने प्रशंसक साथियों को भी. चार्ली पार्कर के साथ अनेक बार संगत कर चुके प्रख्यात सैक्सोफ़ोन वादक माइल्स डेविस ने उनके निधन पर शायद उन्हें सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यह कह कर दी,"जैज़ का इतिहास चार शब्दों में बताया जा सकता है - लुई आर्मस्ट्रॉन्ग चार्ली पार्कर."



(चार्ली पार्कर - श्रेष्ठ चयन 1)



(चार्ली पार्कर - श्रेष्ठ चयन 2)


(जारी)

Thursday, February 26, 2015

जैज़ पर नीलाभ - 16

लोग यह समझते ही नहीं कि जो तुम गाना चाहते हो और 
जैसे गाना चाहते हो, उसे गाने के लिए कैसी लड़ाई लड़नी पड़ती है.”

- बिली हॉलिडे


बिली हॉलिडे

तीस के ही दशक में कई छोटे-छोटे मगर शानदार दल भी मौजूद थे और तीस के ही दशक में प्रख्यात ब्लूज़ गायिका बिली हॉलिडे ने अपने जादू भरे गायन से लोगों के दिल जीत लिये थे. 



(लेडी सिंग्स द ब्लूज़ - बिली हॉलिडे)

चवालीस साल की छोटी-सी उमर में दिवंगत होने से पहले बिली हॉलिडे की दुखद कहानी एक सम्वेदनशील कलाकार और उसके इर्द-गिर्द के निपट व्यावसायिक वातावरण के द्वन्द्व की अनिवार्य परिणति थी.

वैसे तो अमरीका में रंगभेद के युग में किसी भी नीग्रो या नीग्रो मूल के कलाकार का जीवन आसान नहीं था, लेकिन संगीत और वह भी जैज़ संगीत के सिलसिले में बड़े-से-बड़े फ़नकारों को ऐसे-ऐसे उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता कि हैरत होनी स्वाभाविक थी. एक पल आप शोहरत की बुलन्दियों पर होते और दूसरे ही पल मामूली-से-मामूली लोग आपको आपके रंग और नस्ल की वजह से दो कौड़ी का बना कर रख सकते थे. हालांकि कहा जाता है कि अब हालात सुधर गये हैं, मगर लोग जानते हैं कि अन्दर की सच्चाई कुछ और ही है. और आज से सौ साल पहले तो हालत कहीं ज़्यादा ख़राब रही होगी जब भेद-भाव खुले तौर पर बरता जाता था. 

बिली हॉलिडे को शोहरत की बुलन्दियों पर पहुंचने से पहले नारकीय स्थितियों से हो कर गुज़रना पड़ा था. पिता संगीतकार थे और मां को कुंवारेपन ही में मां बनने पर अपने मां-बाप के घर से निकल कर चले आना पड़ा था. बिली का जन्म फिलाडेल्फ़िया में १९१५ में हुआ, लेकिन एक तो उनके पिता ने उसकी मां से शादी नहीं की हुई थी, दूसरे दो साल बाद ही उसके पिता उन सब को छोड़ कर जैज़ गिटारवादक के तौर पर अपनी किस्मत आज़माने निकल लिये थे और तीसरी बात यह थी कि बिली की मां को अक्सर रेलगाड़ियों में काम मिलता जिसकी वजह से बिली को वापस उसके ननिहाल बौल्टिमोर भेज दिया गया. ज़ाहिर है, मां-बाप की देख-रेख के अभाव में दूसरों का आसरा बिली के बहुत काम नहीं आ सकता था. उसका बिगड़ जाना लाज़िमी था. 

नौ साल की उमर में जब इस लगभग बेआसरा लड़की से चालीस बरस के एक आदमी ने बलात्कार किया तो सज़ा भी उस आदमी को नहीं बिली को दी गयी. वह आवारगी के आरोप में बाल गृह के हवाले कर दी गयी, फिर जब वह छूट कर आयी और कुछ समय अपनी मां के साथ रही जो इस बीच एक होटल चलाने की कोशिश कर रही थी तो एक पड़ोसी ने उससे बलात्कार का प्रयास किया. बारह साल की उमर में बिली हॉलिडे जो तब तक अपने असली नाम एलेनोरा फ़ैगन के नाम से जानी जाती थी, फिर रिमाण्ड होम पहुंच गयी. 1929 में बिली की मां ने न्यूयॉर्क में कालों की बस्ती हारलेम में किस्मत आज़माने का फ़ैसला किया और बिली भी वहीं आ गयी. उनकी मकान मालिकिन एक वेश्यालय चलाती थी और कोई और काम न ढूंढ पाने पर बिली की मां ने भी यही पेशा अपना लिया. और फिर बिली भी अभी चौदह की नहीं हुई थी कि उसे भी पेशा करने पर मजबूर होना पड़ा. जल्दी ही उस चकले पर छापा पड़ा और एक बार फिर बिली सुधार गृह की दीवारों के पीछे थी.

इस बार छूटने पर बिली ने अपनी ज़िन्दगी का ढर्रा बदलने का फ़ैसला किया और नाइट क्लबों में गाना शुरू किया.



(योर मदर्स सन इन लॉ - बिली हॉलिडे) 

एक लोकप्रिय गायिका बिली डव के नाम का पहला हिस्सा अपने पिता क्लैरेन्स हॉलिडे के नाम के दूसरे हिस्से से जोड़ कर बिली ने अपना पेशेवर नाम बिली हॉलिडे ईजाद किया और अगले दो साल तक न्यूयॉर्क के अलग-अलग क्लबों में अपनी गायकी के बल पर शोहरत की सीढ़ियां चढ़नी शुरू कर दीं. 1932 में बिली की साधना रंग लायी और उन पर संगीत प्रोड्यूसर जॉन हैमण्ड की नजर पड़ी. हुआ यों कि बिली को एक क्लब की जानी-मानी गायिका के एवज़ में गाने का मौका मिला क्योंकि उस दिन वह गायिका वहां नहीं आ पायी थी. जॉन हैमण्ड उस गायिका को पसन्द करते थे और उसे सुनने आये हुए थे. वे बिली के गाने से बहुत प्रभावित हुए. बाद में उन्होंने कहा,"बिली के गाने ने मेरी संगीत की रुचि और संगीत के जीवन को लगभग बदल कर रख दिया, क्योंकि जो गायिकाएं मैंने तब तक देखी थीं, उनमें वह पहली गायिका थी, जो जैज़ को सचमुच किसी जीनियस फ़नकार की तरह गाती थी." हैमण्ड ने जाने-माने जैज़ संगीतकार बेनी गुडमैन की संगत में बिली के गाये गाने रिकौर्ड करवाये और यहां से बिली का जीवन एक दूसरी ही दिशा में मुड़ गया.



(गुड मौर्निंग हार्टेक - बिली हॉलिडे)

अगले कुछ साल बिली हॉलिडे टेडी विल्सन, काउण्ट बेसी और आर्टी शॉ जैसे संगीतकारों की मण्डलियों में गाती रही और धीरे-धीरे उनके रेकॉर्ड्स की लोकप्रियता बढ़ती रही. लेकिन यह सफ़र आसान नहीं था. मण्डलियों के साथ दौरा करने पर कई बार उन्हें रंगभेद के सबसे घटिया रूपों से रू-ब-रू होना पड़ता. फिर जैसे सामाजिक भेद-भाव और सफ़र के तनाव ही काफ़ी न थे, बिली को शराब और नशीले पदार्थों की भी लत लग गयी थी. और जीवन के अन्त तक इन लतों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.

तभी 1930 के दशक के अन्त में पहली बार बिली हॉलिडे की ज़िन्दगी में ऐसा मौका आया जिसने उनकी शोहरत को एकबारगी आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया. वे कोलम्बिया के लिए गाने रिकौर्ड कर रही थीं जब उनके सामने एक गीत आया "स्ट्रेन्ज फ़्रूट" (अजीब फल). 



(स्ट्रेंज फ़्रूट - बिली हॉलिडे)

गीत गोरों द्वारा कालों को फांसी दे कर पेड़ पर लटकाये जाने की घटनाओं के बारे में था जो अमरीका के दक्षिणी इलाक़ों में आम थीं. उसे एक यहूदी स्कूल  अध्यापक ने लिखा था और छद्म नाम से जारी किया था. यह गीत न्यू यौर्क के ग्रीनविच विलेज के एक क्लब मालिक ने सुना और बिली के सामने प्रस्ताव रखा कि वह इसे गाये. ज़ाहिर है, गीत के बोल बहुत विस्फोटक थे और बिली हॉलिडे को डर था कि उन्हें बदले की कार्रवाई का निशाना बनना पड़ सकता है. इसलिए जब वह उसे गाने के लिए क्लब के मंच पर आयी तो उसके मन में घबरहट थी. लेकिन दूसरी तरफ़ उनका कहना था कि गीत के बिम्बों ने उन्हें उनके पिता की मौत की याद करा दी थी, जिनसे उनके सम्बन्ध गायिका बनने के बाद सुधर गये थे और जिनको उनके रंग की वजह से फेफड़े के कैन्सर का इलाज नहीं मुहैया कराया गया था.

दक्षिण के पेड़ों पर फलते हैं अजीब फल
पत्तियों पर लहू और जड़ों पर है ख़ून
दक्षिणी हवाओं पर झूमें काले शरीर
पोपलर के पेड़ों पर कैसे अजीब फल

शूरों की धरती का देहाती नज़ारा
बाहर को निकली आंखें ऐंठा मुंह सारा
मैग्नोलिया के फूलों की महक मीठी मधुर
सहसा जलते हुए मांस की गन्ध हवा में फिर  

ये रहे फल कौवे मारेंगे चोंचें जिन पर
बारिश बहा ले जायेगी, हवा चूसेगी जम कर
सूरज सड़ायेगा इन्हें, पेड़ गिरायेंगे
यही है वह अजीब और कड़वी फ़सल

दक्षिण के पेड़ों के ये अजीबो-ग़रीब फल


इस गीत को गाते समय बिली सुनने वालों को बिलकुल चुप करा दिया करती थी. गीत के दौरान धीरे-धीरे बत्तियां मद्धिम होती जातीं और सारी हरकतें बन्द हो जातीं, सिर्फ़ रोशनी का एक चकत्ता बिली के चेहरे पर रहता और आखिरी सुर पर यह बत्ती भी गुल हो जाती और जब लौटती तो बिली जा चुकी होती.

न सिर्फ़ यह गीत बेइन्तेहा लोकप्रिय हुआ, अगले कई बरसों तक यह बिली का फ़रमाइशी गीत बना रहा. अपनी आत्म-कथा में उसने लिखा,"यह मुझे याद कराता है कि पिता किस तरह मरे थे. लेकिन मुझे इसको गाते ही रहना है, महज़ इसलिए नहीं कि लोग फ़रमाइश करते हैं, बल्कि इसलिए भी कि पिता के मरने के बीस साल बाद भी हालात वैसे ही हैं."

"अजीब फल" की लोकप्रियता के बाद जहां तक संगीत और गायकी का ताल्लुक है बिली ने मुड़ कर नहीं देखा. एक के बाद दूसरा हिट गीत आता रहा और इसी के साथ बड़े-बड़े क्लबों और संगीत सभाओं में गाने के मौके भी.   



(फ़ाइन ऐण्ड मैलो - बिली हॉलिडे) 

लेकिन दूसरी तरफ़ शराब और हेरोइन की लत और उसके चलते लगातार पुलिस और अदालत के चक्कर भी जान का वबाल बने रहे. एक हफ़्ते वह कार्नेगी हौल या ब्रौडवे पर भारी भीड़ के सामने गा रही होती और दूसरे हफ़्ते वह सलाखों के पीछे होती.

संगीत से जुड़ी व्यावसायिकता के दबाव सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं थे कि संगीतकार बराबर अपनी कला को बेचते चले जायें. इससे भी आगे बढ़ कर कई बार संगीतकारों के मैनेजर उनके जीवन तक को नियन्त्रित करने लगते थे. बिली हॉलिडे के साथ हुआ यह कि एक शहर से दूसरे शहर और दूसरे शहर से तीसरे शहर का दौरा करने के क्रम में जब शरीर जवाब देने लगा तो उनके अपने प्रबन्धकों ने उन्हें मादक दवाइयों का आदी बना दिया. दूसरी ओर अपने माहौल के साथ ताल-मेल न बिठा पाने से उपजे अन्तर्विरोधों और विषमताओं ने बिली हॉलिडे को मानसिक रूप से भी तोड़ दिया. नतीजे के तौर पर यह शानदार गायिका, जिसका कार्यक्रम लन्दन के ऐल्बर्ट हॉल में हो चुका था, अन्ततः पागलख़ाने और फिर अकाल मृत्यु के शिकंजे में जा पहुँची. मगर अपने छोटे-से जीवन में ही बिली हॉलिडे अपने पीछे संगीत का ऐसा विरसा छोड़ गयीं, जिसका मूल्य आज भी कम नहीं हुआ है.

बिली के गाये गानों को बहुत-सी गायिकाओं ने गाया जिनमें सारा वॉन और डायना रॉस जैसी गायिकाएं शामिल हैं. डायना रॉस ने तो बिली के जीवन पर बनी फ़िल्म "लेडी सिंग्स द ब्लूज़" में बिली का किरदर भी अदा किया. यहां बिली के एक मशहूर गीत "लवर मैन" की तीन अदायगियां पेश हैं. एक बिली के स्वर में, एक सारा वॉन के और एक डायना रॉस के. 






https://www.youtube.com/watch?v=hMtXuD4-63o (लवर मैन - डायना रॉस)

बिली के गायन में बोलों की अदायगी में दम-ख़म और विश्वास तो था ही, एक अजीब-सी गर्मजोशी भी थी जो बोलों को सतर-दर-सतर आगे बढ़ाती हुई सुनने वालों के दिलों के तार भी झंकृत करती चलती थी. जैसा कि एक समीक्षक ने लिखा कि उसकी आवाज़ में एक ही साथ इस्पाती दृढ़ता भी थी और बेहिसाब नरमी भी, उसमें बुज़ुर्गों का-सा सयानापन भी था और एक अजीब-सी बच्चों जैसी फ़ितरत भी. इसीलिए बिली हॉलिडे के बेहतरीन गीतों में जो सबसे बड़ा गुण उभर कर सामने आता है वह दिल की सच्चाई है.



(गॉड ब्लैस द चाइल्ड दैट्स गॉट इट्स ओन - बिली हॉलिडे)


(जारी)