Sunday, April 24, 2011

जैसे चॉकलेट के लिए पानी -५


(पिछली किस्त से जारी)

यह हद थी. पाकीता को लगता कि वह नशे में है. वह नहीं चाहती थी कि पाकीता के दिल में ज़रा भी सन्देह रह जाए वरना वह उसकी मां से कह देती. मां के भय से कुछ पल को तीता पेद्रो को भूल गई. वह पूरी शिद्दत से पाकीता को यह यकीन दिलाने लगी कि वह बिल्कुल ठीक से सोच पा रही है और चैतन्य है. उसने उस से बातचीत की और यहां तक कि नोयो शराब बनाने की विधि भी बतलाई. इस शराब को बनाने के लिए चार औंस आड़ू और आधा पाउन्ड खुबानी को चौबीस घन्टे पानी में भिगोना होता हैताकि उनके छिलके उतारे जा सकें, फिर उन्हें छीक और कुचल कर पन्द्रह दिन तक गरम पानी में भिगाया जाना चाहिए - इसके बाद शराब डिस्टिल की जाती है. जब पानी में ढाई पाउन्ड चीनी घुल जाए उसमें सन्तरे के फूलों का चार औंस पानी मिलाकर हिलाया जाना चाहिए, ताकि पाकीता के मन में ज़रा भी सन्देह न रह जाए, तीता ने जैसे खुद से बातचीत करते हुए उसे बताया कि पानी के पात्रों में २.०१६ आता है न अधिक न कम.

सो जब मामा एलेना पाकीता के पास्पूछने आईं कि उन्हें ठीक लरहा है या नहीं, उन्होंने बड़े उत्साह से जवाब दिया -

"हां हां ! सब ठीक है - आपकी बेटियां लाजवाब हैं - मुझे बातचीत में आनन्द आ रहा है.

मामा एलेना ने तीता को रसोई से मेहमानों के लिए कुछ लाने को भेज दिया. उसी समय "इत्तेफ़ाकन" पेद्रो भी वहां से गुज़रा और उसने तीता की मदद करने की पेशकश की. तीता बिना कुछ कहे रसोई की तरफ़ भाग गई. पेद्रो की उपस्थिति उसके लिए बेहद असुविधाजनक थी. वह उसके पीछे पीछे रओई में आया तो तीता ने उसके हाथों में स्नैक्स की एक ट्रे थमा दी जो रसोई की मेज़ पर उठाए जाने की प्रतीक्षा में रखी हुई थी.

उस क्षण को वह कभी नहीं भूल पाएगी जब वे दोनों एक साथ ही ट्रे उठाने के लिए झुके और उनके हाथ एक दूसरे से छू गए.

उस समय पेद्रो ने अपने प्रेम का इज़हार किया.

"सेन्योरीता तीता, इस अवसर का लाभ उठाते हुए जब तुम्हारे साथ मैं अकेला हूं, मैं कहना चाहता हूं कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है. मैं जानता हूं यह सब बहुत अचानक कह रहा हूं पर तुम अकेली मिलती ही कहां हो, सो मैंने फ़ैसला किया है आज रात तुम्हें बता दूंगा. मैं सिर्फ़ इतना पूछना चाहता हूं कि क्या मुझे तुम्हारा प्यार मिल पाएगा?"

"मैं क्या कहूं... मुझे सोचने के लिए थोड़ा समय चाहिए"

"नहीं ऐसा नहीं हो सकता. मुझे अभी उत्तर चाहिए, प्यार के बारे में सोचा थोड़े ही जाता है, या वह महसूस होता है या नहीं होता. मैं बहुत कम बातें करता हूं लेकिन मे्रे शब्द मेरी प्रतिज्ञा हैं. मैं कसम खाता हूं मैं तुमसे हमेशा प्यार करता रहूंगा और तुम? क्या तुम भी मेरे बारे में ऐसा सोचती हो?

"हां"

हां, एक हज़ार बार हां. उस रात के बाद वह हमेशा उससे प्रेम करती रही. यह अशालीन होता है कि अपनी बहन के होने वाले पति से प्यार किया जाए. अब किसी तरह तीता को अपने दिमाग से उस को दूर करना था ताकि वह सो सके. उसने दूध का गिलास और वह क्रिसमस रोल खाना शुरू किया जो नाचा ने उसके लिए छोड़ रखा था. यह उपाय पहले भी कारीगर साबित हो चुका था. नाचा जानती थी कि तीता का कोई भी ऐसा दर्द नहीं जो क्रिसमस रोल खाने से दूर न हो जाए. मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ.उसके पेट में जो ख़ालीपन गुड़गुड़ा रहा था उससे कोई आराम न था. उसे लगा कि पेट का ख़ालीपन भूख के कारण नहीं था, बल्कि वह दुःख की एक ठण्डी अनुभूति था. उस भीषण ठण्ड से वह राहत पाना चाहती थी. उसने पहले ऊनी कपड़े पहने फिर एक लबादा डाल लिया. ठण्ड अब भी लग रही थी. उसने ऊनी चप्पलें पहनीं और दो शॉल और ओढ़ लिए. आख़िरकार वह अपने सिलाई वाले बक्से के पास गई. उसने वह चादर निकाली जिसे उसने उस दिन बनाना शुरू किया थाजब पेद्रो ने उस से पहली बार शादी की बात की थी. क्रोशिए की बनी ऐसी चादर को पूरा होने में करीब एक साल लगता है. पेद्रो और तीता ने अपनी शादी से पहले इतने ही समय रुकने की योजना बनाई थी. उसने धागे का इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया ताकि वह बर्बाद न हो जाए सो उसने चादर पर काम करना शुरू किया - सुबह होने तक वह रोती रही, चादर पर काम करती रही. आखिर उसने उसे भी अपने ऊपर डाल लिया. इस से कोई फ़ायदा नहीं हुआ. न उस रात को और कई रातों को. जब तक वह जीवित रही तीता उस ठण्ड से ख़ुद को आज़ाद नहीं कर सकी.

(पहला अध्याय समाप्त)

(अगले माह का व्यंजन - चाबेला वैडिंग केक)

3 comments:

दर्पण साह said...

शायद आज से १०-१२ साल पहले की बात थी तब ये धारावाहिक के रूप में छपता था आधारशिला में. बड़ा इंतज़ार रहता था, हर माह इसका. आधारशिला प्रकाशन ने इसे उपन्यास /पुस्तक के रूप में भी निकला है हाल ही में. पुस्तक का रंग चॉकलेटी है. इसक यहाँ देख कर अच्छा बहुत अच्छा लगा.

Ashok Pande said...

किताब को आधारशिला ने नहीं मोनाल प्रकाशन ने छापा था. व्यावसायिक असफलता के कारण मोनाल बन्द हो गया. इसकी बची हुई अधिसंख्य प्रतियां लखनऊ में रहने वालीं कवयित्री-सामाजिक कार्यकर्त्री कात्यायनी उठवा ले गई थीं. बीसेक प्रतियां आधारशिला वाले दिवाकर भट्ट. अब मैं तलाश में हूं कि कोई सलीके का प्रकाशन इसे बाहर लाए. यह सत्य है कि इस उपन्यास की कई शुरूआती कड़ियां आधारशिला में छपी थीं पर उनमें वर्तनी की असंख्य अक्षम्य गलतियां भी होती थीं. खैर!

दर्पण साजी, किताब का आवरण चॉकलेटी ही है और मेरा ही डिज़ाइन किया हुआ है. कवर पर जो पेन्टिंग है वह मशहूर चित्रकार पॉल सेज़ान की कृति Les Oignous Roses है. चलिए आपको याद तो है!

Shailendra singh Rathore said...

सर प्लीज क्या आप मुझे बता सकते हैं,आपके द्वारा अनुवाद की गयी पुस्तकें कहाँ से मिल सकती हैं ....क्या ज्यां क्रिस्तोफ़,काफ्का पर आपकी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है .....लस्ट फॉर लाइफ के लिए भी संवाद प्रकाशन को कई बार मेल किया है .....क्या कोई ऑनलाइन लिंक है,जहाँ ये मिल सकें ....