दगा
तेनजिन त्सुंदे
हमारे घर,
हमारे गाँव, हमारे देश को बचाने की कोशिश में
मेरे पिता ने अपनी जान गंवाई.
मैं भी लड़ना चाहता था.
लेकिन हम लोग बौद्ध हैं.
शांतिप्रिय और अहिंसक.
सो मैं क्षमा करता हूँ अपने शत्रु को.
लेकिन कभी कभी मुझे लगता है
मैंने दगा दिया अपने पिता को.
1 टिप्पणियां:
जब दोनों ही तरह से संस्कृति जा रही हो तो पिता की राह चलना श्रेयस्कर..
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