Saturday, April 21, 2012

मैंने एक उम्दा ऑमलेट लिखा


निक्की जियोवानी की इस कविता में रोज़मर्रा की ज़िंदगी से उठाई गयी चीज़ों और क्रियापदों को इस ख़ूबसूरती से (अ)व्यवस्थित किया गया है कि नए-नए प्यार के उद्दाम आवेग और उसके साथ उड़ा लिए जाने के अहसास को पूरी तरह महसूस किया जा सकता है. आप बस मुस्करा सकते हैं. इसे समझने के लिए आपको किसी आलोचक की टिप्पणियों की दरकार नहीं होती. जनाब लाल्टू ने यह कविता मुझे मेल से भेजी. पढते ही मुझे लगा कि इसका तुरंत अनुवाद नहीं किया तो फिर बात टलती चली जाएगी.


मैंने एक उम्दा ऑमलेट लिखा

मैंने एक उम्दा ऑमलेट लिखा ... और खाई एक गर्म कविता ...
तुम्हें मोहब्बत करने के बाद

अपनी कार के बटन कसे ... और अपने कोट को ड्राइव पर ले गयी ... बारिश
में ...
तुम्हें मोहब्बत करने के बाद

मैं लालबत्ती पर चला की ... और हरी पर थमी ... दोनों
के दरम्यान तैरती हुई कहीं ...
तुम्हें मोहब्बत करने के बाद

मैंने अपना बिस्तरा लपेटा ... अपने बालों की आवाज़ हल्की की ... थोड़ी सी
भ्रमित थी मगर ... परवाह नहीं मुझे ...
मैंने अपने दांतों को फैलाया सामने ... और अपने गाउन का कुल्ला किया ... फिर मैं
खड़ी हुई ... और खुद को नीचे रखा ...
सो जाने के लिए ...
तुम्हें मोहब्बत करने के बाद

1 comment:

Neeraj Basliyal said...

कुछ होश नहीं रहता , कुछ ध्यान नहीं रहता ...
इंसान मुहब्बत में इंसान नहीं रहता ...