Wednesday, June 20, 2012

अनिल यादव की फेसबुक दीवार से


कबीर के छूते ही भाषा की लचक और मार दोनों बढ़ जाती है, तोपें झेंपने लगती हैं-


ऐसा लोग न देखा भाई, भूला फिरै लिए गफिलाई।
महादेव को पंथ चलावै, ऐसो बड़ो महंत कहावे।
हाट बजारे लावै तारी, कच्चे सिद्ध न माया प्यारी।
कब दत्ते मावासी तोरी, कब सुखदेव तोपची जोरी।
नारद कब बंदूक चलाया, व्यासदेव कब बंब बजाया।
करहि लराई मतिकै मंदा, ई अतीत की तरकस बंदा।
भए बिरक्त लोभ मन ठाना, सोना पहिरि लजावै बाना।

1 comment:

lokendra singh rajput said...

बहुत सुन्दर