Sunday, July 8, 2012

शहर देहरादून को कभी इससे पहले ऐसा जि़म्मेदार और मुहब्बत करने वाला कवि नहीं मिला होगा


कल से कबाड़खाने पर आप राजेश सकलानी की कविताएं पढ़ रहे हैं.अभी एकाध दिन उनकी अनूठी कविताओं से आप रू-ब-रू होते रहेंगे. उनके नवीनतम काव्य-संग्रह 'पुश्तों का बयान' का ब्लर्ब हमारे समय के बड़े कवि असद ज़ैदी ने लिखा है. पेश है -

राजेश सकलानी की कविताओं में एक निराली धुन, एक अपना ही तरीका और अनपेक्षित गहराइयाँ देखने को मिलती हैं। अपनी तरह का होना ऐसी नेमत (या कि बला) है जो हर कवि को मयस्सर नहीं होती, या मुआफि क नहीं आती। राजेश हर ऐतबार से अपनी तरह के कवि हैं। वह जब जैसा जी में आता है वैसी कविता लिखने के लिए पाबन्द हैं, और यही चीज़ उनकी कविताओं में अनोखी लेकिन अनुशासित अराजकता पैदा करती है।

उनकी कविता में एक दिलकश अनिश्चितता बनी रहती है—पहले से पता नहीं चलता यह किधर जाएगी। यह गेयता और आख्यानपरकता के बीच ऐसी धुंधली सी जगहों में अपनी ओट ढूँढ़ती है जहाँ से दोनों छोर दिखते भी रहें। ऐसे ठिकाने राजेश को खूब पता हैं। राजेश व्यक्तिगत और राजनीतिक के दरम्यान फासला नहीं बनाते।

वह मध्यवर्ग के उस तबके के दर्दमंद इंसान हैं जो आर्थिक नव-उदारीकरण और लूट के इस दौर में भी जन-साधारण से दूर अपना अलग देश नहीं बनाना चाहता। जो मामूलीपन को एक नैतिक अनिवार्यता की तरह—और इंसानियत की शर्त की तरह—बरतता है। वह इस तबके की मौजूदगी और अब भी उसमें मौजूद नैतिक पायेदारी को लक्षित करते रहते हैं। राजेश एक सच्ची नागरिकता के कवि हैं, और अपने कवि को अपने नागरिक से बाहर नहीं ढूँढ़ते।

शहर देहरादून को कभी इससे पहले ऐसा जि़म्मेदार और मुहब्बत करने वाला कवि नहीं मिला होगा। वह अपनी ही तरह के पहाड़ी भी हैं। पहाड़ी मूल के समकालीन कवियों में पहाड़ का अनुभव दरअसल प्रवास की परिस्थिति या प्रवासी दशा की आँच से तपकर, और मैदानी प्रयोगशालाओं से गुज़रकर, ही प्रकट होता है। इस अनुभव की एक विशिष्ट नैतिक और भावात्मक पारिस्थतिकी है जिसने बेशक हिन्दी कविता को नया और आकर्षक आयाम दिया है।

राजेश सकलानी की कविता इस प्रवासी दशा से मुक्त है, और उसमें दूरी की तकलीफ नहीं है। इसीलिए वे पहाड़ी समाज के स्थानीय यथार्थ को, और उसमें मनुष्य के डिसलोकेशन और सामाजिक अंतर्विरोधों को, सर्वप्रथम उनकी स्थानीयता, अंतरंगता और साधारणता में देख पाते हैं।

यह उनकी कविता का एक मूल्यवान गुण है। राजेश की खूबी यह भी है कि वह बड़े हल्के हाथ से लिखते हैं : उनकी इबारत बहुत जल्दी ही, बिना किसी जलवागरी के, पाठक से उन्सियत बना लेती है। यकीनन यह एक लम्बी तपस्या और होशमंदी का ही हासिल है।

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संग्रह की शीर्षक-कविता ये रही

पुश्तों का बयान

हम तो भाई पुश्तें हैं
दरकते पहाड़ की मनमानी
सँभालते हैं हमारे कंधे

हम भी हैं सुन्दर, सुगठित और दृढ़

हम ठोस पत्थर हैं खुरदरी तराश में
यही है हमारे जुड़ाव की ताकत
हम विचार और युक्ति से आबद्ध हैं

सुरक्षित रास्ते हैं जिंदगी के लिए
बेहद खराब मौसमों में सबसे बड़ा भरोसा है
घरों के लिए

तारीफ़ों की चाशनी में चिपचिपी नहीं हुई है
हमारी आत्मा
हमारी खबर से बेखबर बहता चला आता
है जीवन।

(पुश्ता : भूमिक्षरण रोकने के लिए पत्थरों की दीवार। पहाड़ों सड़कें, मकान और खेत पुश्तों पर टिके रहते हैं)


3 comments:

शालिनी कौशिक said...

शानदार प्रस्तुति.आभार.

वन्दना said...

्सही कहा

वन्दना said...

्सही कहा