Wednesday, September 5, 2012

ना नींद नैनां ना अंग चैना ना आप ही आवें ना भेजें पतियां

अमीर ख़ुसरो की यह रचना मैंने अर्सा पहले छाया गांगुली की मख़मल आवाज़ में कभी कबाड़ख़ाना के सुनने-पढ़ने वालों के लिए प्रस्तुत की थी. आज उसी रचना को सुनिए एक बार.





और ये रहे बोल और नीचे उनका अनुवाद. अनुवाद में हुई गलतियों के लिए ज़िम्मेदारी मेरी है -

ज़ेहाल-ए-मिस्किन मकुन तग़ाफ़ुल, दुराये नैना बनाए बतियां
कि ताब-ए-हिज्रां नदारम अय जां, न लेहो काहे लगाए छतियां

चो शाम-ए-सोज़ां चो ज़र्रा हैरां हमेशा गिरियां ब इश्क़ आं माह
ना नींद नैनां ना अंग चैना ना आप ही आवें ना भेजें पतियां

यकायक अज़ दिल बज़िद परेबम बबुर्द-ए-चश्मश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाएं प्यारे पी को हमारी बतियां 


शबान-ए-हिज्रां दराज़ चो ज़ुल्फ़ वा रोज़-ए-वस्लस चो उम्र कोताह
सखी़ पिया को जो मैं ना देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां


बहक़-ए-रोज़-ए-विसाल-ए-दिलबर कि दाद मारा फ़रेब खुसरो
सपेत मन के वराए राखो जो जाए पाऊं पिया की छतियां


(आंखें फ़ेरकर और कहानियां बना कर यूं मेरे दर्द की अनदेखी न कर
अब बरदाश्त की ताब नहीं रही मेरी जान! क्यों मुझे सीने से नहीं लगा लेता

विरह की रात ज़ुल्फ़ की तरह लम्बी, और मिलन का दिन जीवन की तरह छोटा
मैं अपने प्यारे को न देख पाऊं तो कैसे कटे यह रात

मोमबत्ती की फड़फड़ाती लौ की तरह मैं इश्क़ की आग में हैरान-परेशान फ़िरता हूं
न मेरी आंखों में नींद है, न देह को आराम, न तू आता है न कोई तेरा पैगाम

अचानक हज़ारों तरकीबें सूझ गईं मेरी आंखों को और मेरे दिल का क़रार जाता रहा
किसे पड़ी है जो जा कर मेरे पिया को मेरी बातें सुना आये

अपने प्रिय से मिलन के दिन के सम्मान में, जिसने मुझे इतने दिनों तक बांधे रखा है ए ख़ुसरो
जब भी मुझे उसके करीब आने का फिर मौक़ा मिलेगा मैं अपने दिल को नियन्त्रण में रखे रहूंगा)

2 comments:

Anupama Tripathi said...

anand dayak ...
abhar ...

नीरज बसलियाल said...

अनुवाद में गलती तो नहीं लेकिन शायद आगे पीछे हो गया है सर :)

आनंद आया सुनकर !