Thursday, September 6, 2012

नज़रों में परख ले है नज़रबाज़ तो देखो


शेख़ ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी (१७५०-१८२४) मूलतः अमरोहा के रहने वाले थे. रदीफ़ – क़ाफ़िए की उनकी समझ ख़ासी नैसर्गिक थी और अपनी जवानी के दिनों में ही वे दिल्ली चले आए थे. दिल्ली में उनकी शायरी को काफ़ी शोहरत मिली. मुशायरों में वे एक पॉपुलर नाम हुआ करते थे. मगर दिल्ली के राजनैतिक माहौल के कारण उन्हें लखनऊ का रास्ता पकड़ना पड़ा. यह बात अलग है कि वे ताउम्र दिल्ली को याद करते रहे.

पुराने ढब की उर्दू लिखने वाले उस्तादों मीर सोज़, सौदा और ख़ुद बाबा मीर तकी मीर के बाद मुसहफ़ी आख़िरी उस्ताद माने जाते हैं. मुसहफ़ी साहब के बारे में विस्तार से फिर कभी. आज उनकी एक रचना का लुत्फ़ उठाइए ताहिरा सैयद की आवाज़ में –



आता है किस अंदाज़ से टुक नाज़ तो देखो
किस धज से क़दम पड़ता है अंदाज़ तो देखो

करता हूँ मैं दुज़्दीदा नज़र गर कभी उस पर
नज़रों में परख ले है नज़रबाज़ तो देखो

मैं कंगूरा-ए-अर्श से पर मार के गुजरा
अल्लाह रे रसाई मेरी परवाज़ तो देखो

अबतर है ये दीवान तो मियाँ ‘मुसहफ़ी’ सारा
अंजाम की क्या कहते हो आग़ाज़ तो देखो

1 comment:

abcd said...

pata nahi kyo...andaze bayaan,aisa hai ki...nazir akbarabadi ki yaad aa gayi !!