Saturday, June 29, 2013

वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया


गुलाम अली और आशा भोंसले के अल्बम ‘मेराज़-ए-ग़ज़ल’ से एक उम्दा ग़ज़ल –




दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया

जुदाइयों के ज़ख्म दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिए
तुझे भी नींद आ गयी मुझे भी सब्र आ गया

ये सुबह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

वो दोस्ती तो खैर अब नसीब-ए-दुश्मनां हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

ये किस खुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ गई ये मैं कहाँ समा गया

1 comment:

सरिता भाटिया said...

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा सोमवार [01-07-2013] को
चर्चामंच 1293 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
सादर