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Wednesday, December 14, 2016

गुलाम अली की आवाज़ में नेपाली गीत


आज इंटरनेट खंगालते हुए यह मिला -


Monday, December 29, 2014

इतने अच्छे क्यूँ लगते हो


ग़ज़ल पुरानी है. गुलाम अली भी पुराने हैं. उतनी ही पसंदीदा रही है स्कूल-कॉलेज के ज़माने से. पेश कर रहा हूँ - इतनी मुद्दत बाद मिले हो - 


Saturday, June 29, 2013

वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया


गुलाम अली और आशा भोंसले के अल्बम ‘मेराज़-ए-ग़ज़ल’ से एक उम्दा ग़ज़ल –




दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया

जुदाइयों के ज़ख्म दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिए
तुझे भी नींद आ गयी मुझे भी सब्र आ गया

ये सुबह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

वो दोस्ती तो खैर अब नसीब-ए-दुश्मनां हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

ये किस खुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ गई ये मैं कहाँ समा गया

Tuesday, May 8, 2012

इतने अच्छे क्यों लगते हो


बरसों पुरानी किसी एक याद को ताज़ा करते हुए गुलाम अली की गाई इस गज़ल को सुना गया आज.

 


ये भी याद आया कि गुलाम अली की बनाई इसी धुन पर दिलराज कौर ने भी मोहसिन नकवी की इस गज़ल को गाया है.

 

आप के साथ बाँट रहा हूँ.

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो


तेज हवा ने मुझ से पूछा
रेत पे क्या लिखते रहते हो


हमसे न पूछो हिज्र के किस्से
अपनी कहो अब तुम कैसे हो


कौन सी बात है तुम है ऐसी
इतने अच्छे क्यों लगते हो