Sunday, August 4, 2013

एक है ज़ोहरा - ४

(पिछली क़िस्त से आगे)


क्वीन मैरीज परदे वाला स्कूल था,  इसका मतलब यह कि स्कूल की चारदीवारी के अंदर किसी पुरूष को प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी. माली और चौकीदार जैसे कुछ पुरूष कर्मचारी स्कूल का समय खत्म होने के बाद ही अंदर जा सकते थे जब सारी लड़कियां अपने कमरों में सुरक्षित सो रही होती थीं. स्कूल अपने पहले फ्लश वाले शौचालयों की खूब शान बघारता था. इन दस शौचालयों में से पांच हिंदुस्तानी तरीके के थे जो छोटी लड़कियों के  लिए थे और पांच यूरोपियन तरीके के वरिष्ठ छात्राओं के  लिए. यह स्कूल प्रमुख निजी स्कूल था जिसमें टेनिस और बैडमिंटन कोर्ट बने थे और हॉकी और नेटबॉल मैदान थे. मेरे स्कूल छोड़ने से पहले एक स्विमिंग पूल भी स्कूल के आकर्षणों में शामिल हो चुका था.

उस समय की लगभग सारी रियासतों के शाही परिवार अपनी लड़कियों को इस स्कूल में भेजते थे. एक तो इसलिए कि वो यहां एक खास तबके की लड़कियों के समूह तक ही सीमित रहती थीं और दूसरा यह स्कूल कला और खेल-कूद  के लिए प्रसिद्ध था. एक अमेरिकी लेखिका मिस मेयो ने भारत पर कटाक्ष करती अपनी किताब 'मदर इंडिया' में  इस स्कूल का ज़िक्र किया है. हालांकि क्वीन मैरीज में दसवीं कक्षा तक की स्कूली पढ़ाई होती थी लेकिन फिर भी इसे 'कॉलेज' कहे जाने का सम्मान प्राप्त था. खेल-कूद में यह लाहौर में लड़कियों के अन्य कॉलेजों को बराबर की टक्कर देता था. बाद में इसमें बी.ए तक की पढ़ाई होने लगी थी.

मेरी बड़ी बहन और मैंने अक्टूबर 1919 में क्वीन मैरीज में दाखिला लिया था. मुझे दो बार दोहरा प्रमोशन मिलने के बावजूद मुझे दसवीं में ढाई साल तक रोका गया क्योंकि स्कूल के नियमानुसार किसी छात्रा को 15 साल में मैट्रिक की परीक्षा देने की अनुमति नहीं थी. इसके अलावा मिस कोक्स को मुझसे सहानुभूति थी कि अगर मैंने ज़ल्दी दसवीं पास कर ली तो स्कूल छोड़ते ही इतनी कम उम्र में मेरी शादी हो जाएगी. मैं उनके फैसले से पूरे दिल से सहमत थी और मैंने उस मस्ती भरे समय का पूरा आनंद लिया. मैंने लगातार दो साल तक सर्वश्रेष्ठ छात्रा को दिया जाने वाला लेडी हेली पुरस्कार का चांदी का मग जीता. स्कूल में बिताए पूरे दस साल मेरी यादों में पूरी स्पष्टता के साथ सुरक्षित हैं. खेल-कूद,  इनाम, पिकनिक, हंसी-मज़ाक, भूख, खाना और छुट्टियां. मुझे पहले साल में ही स्कूल के नाटक में शामिल कर लिया गया था, मैं 'द रोज़ एंड द रिंग' नाटक के शेरों में से एक थी. हमने खाकी कमीजें और पायजामें पहने थे. हम लोग अपनी पीठ पर शेर की खाल कर रूप में पायदान बांधे जाने का इंतज़ार कर रहे थे, तभी मैंने उर्दू के इनाम के लिए अपना नाम सुना. मैं उसी वेशभूषा में गवर्नर की पत्नी के हाथों इनाम लेने के लिए मंच पर पहुंच गई, यह देख कर वहां उपस्थित दर्शक हंसने लगे.

बाद में, जब मैं दस साल की थी और 'जैक एंड द बीनस्टॉक' नाटक में जैक का पात्र कर रही थी तो मैंने अपनी अंग्रेजी की अध्यापिका मिस हार्वे को कहते सुना, "यह लड़की लंदन में नाटक कर के हफ्ते में दस पाउंड तक कमा सकती है." मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि दस पाउंड कितने होते हैं लेकिन सुनने में यह रकम बहुत ज़्यादा लग रही थी. मुझे यह अहसास हुआ कि चांद तक पहुंचने का आधा रास्ता तो मैंने पार कर लिया! अपनी अध्यापिका की कही यह बात मेरे दिमाग पर धंस कर रह गई थी शायद अभिनय को कैरियर के रूप में चुनने के पीछे भी कहीं न कहीं इसी बात का प्रभाव रहा हो.


हमारे सबसे खुशनुमा दिन वो थे जब गर्मियों के तीन महीनों के लिए हमारा स्कूल डलहौजी स्थानांतरित हो गया था. पहाड़ी जगह डलहौजी में वो दिन एक लंबी पिकनिक की तरह बीते. सब कुछ बदल गया था. लोग, मौसम, प्राकृतिक दृश्य, फूल, चिड़िया और तितलियों के साथ ही हमारी अध्यापिकाओं का व्यवहार भी बदल गया था. हम लोग बाहर खुबानी के पेड़ों के नीचे बैठ कर पढ़ते थे और कभी-कभी शाम की सैर के दौरान 7,000 फीट तक की चढ़ाई करते थे. मैंने पहली बार गिरती हुई बर्फ और बर्फीली चोटियां डलहौजी में ही देखी. क्वीन मैरीज में हमें तमीज़दार और आदर्श लड़की बनना सिखाया जाता था. स्कूल का आदर्श वाक्य था "सादगी के साथ सेवा", लेकिन स्वास्थ्य और सफाई पर जोर देने के पीछे नेक विचार होने के के बावजूद स्कूल ने हमें अंग्रेजीदां अभिमानी लड़कियों में बदल दिया था. जब मैंने स्कूल छोड़ा तो अपने ही देश के बारे में मेरी जानकारी बहुत कम थी.


किशोरावस्था में मेरे जीवन पर मेरे बड़े भाई ज़काउल्लाह खान का काफी गहरा प्रभाव रहा. छुट्टियों के दौरान जब हम लोग अपने-अपने बोर्डिंग स्कूल से घर लौटते थे तो वह 'बुक ऑफ नोलेज' से देख कर शानदार मॉडल बनाया करते थे . वह हमें जो बातें बताते थे वो हमारे लिए एक नई दुनिया देखने जैसा होता था. वही हर हफ्ते एक नाटक तैयार करवाते थे. ये नाटक बायस्कोप पर देखी 'डॉन पेद्रो' की नाटकीय प्रस्तुतियों पर आधारित होते थे. अब क्योंकि अभिनय के लिए गिने-चुने लोग ही उपलब्ध होते थे, इसलिए भाई हमेशा हीरो बनते थे, मेरी बहन खलनायक और मैं नायिका बनती थी. नायिका बनने के लिए मेरे बाल खुले रहते थे और चेहरा टेलकम पाउडर से पुता रहता था. भाई  हमेशा हमें अच्छा आचरण करने और आदर्शवादी बनने के लिए उपदेश देते रहते थे. उनकी कुछ बाते जरूर मेरे जेहन में घर गई होंगी, हालांकि उस समय हमें उनके उपदेश बहुत खलते थे. उनकी ऊंचे सुर वाली आवाज़ बहुत अच्छी थी और अगर वह प्रशिक्षित होते तो जरूर बड़ा नाम होता उनका, लेकिन उन दिनों इस बारे में कोई सोचता भी नहीं था.

(आगे का हिस्सा जल्दी)

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